कोरोना वैक्सीन बच्चों के लिए ज़रूरी है या नहीं?

इमेज स्रोत, HAZEM BADER/AFP via Getty Images
- Author, सुशीला सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत के कई राज्यों में तमाम दिशानिर्देशों और एतिहयाती क़दमों के साथ स्कूल खोले जा रहे हैं.
एक पक्ष जहां बच्चों के विकास के लिए स्कूल खोलने की अहमियत पर ज़ोर दे रहा है, वहीं दूसरा पक्ष ये सवाल पूछ रहा है कि स्कूल खोलने की इतनी जल्दी भी क्या है, ऑफलाइन पढ़ाई तो चल ही रही है.
ये बहस मेडिकल जगत, शिक्षण संस्थाओं और अभिभावकों के बीच चल रही है वहीं अब एक बड़ी बहस शुरू हो गई है कि क्या बच्चों को कोरोना से बचने के लिए वैक्सीन दी जानी चाहिए या नहीं ?
भारत ही नहीं विदेशों में भी ये बहस तेज़ है.
ब्रिटेन की बात करें तो वहां वैक्सीन एडवाइज़री बॉडी या वैक्सीन पर सलाह देने वाली समिति ने 12-15 साल के के स्वस्थ बच्चों को केवल स्वास्थ्य के आधार पर वैक्सीन देने को लेकर अपनी असहमति जताई है.

इमेज स्रोत, Getty Images
वहां की ज्वाइंट कमेटी ऑन वैक्सीनेशन एंड इम्यूनाइज़ेशन (जेसीवीआई) का कहना है कि बच्चों को वायरस का ख़तरा इतना कम है कि वैक्सीनेशन का बहुत ही मामूली फ़ायदा होगा.
डॉक्टरों की सलाह है कि उन बच्चों को कोविड वैक्सीन दी जाए जिन्हें हार्ट, लंग या लिवर की गंभीर दिक्कत है क्योंकि स्वस्थ बच्चों की तुलना में ऐसे बच्चों में कोविड का ख़तरा ज़्यादा है. यानी ऐसे बच्चे जिनमें को-मॉर्बिडिटीज़ हैं.
वहीं भारत में भी मेडिकल विशेषज्ञ बच्चों को वैक्सीन दिए जाने के मामले में बंटे हुए नज़र आते हैं.
भारत में बच्चों को वैक्सीन
नेशनल टेक्निकल एडवायज़री ग्रुप ऑन इम्यूनाइज़ेशन इन इंडिया(एनटीएजीआई) के प्रमुख डॉ एन के अरोड़ा ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि ज़ायडस-कैडिला की ज़ायकोव-डी वैक्सीन (ZyCov-D) 12-17 साल के बच्चों को अक्तूबर महीने के पहले या दूसरे हफ़्ते से दी जाएगी और ये वैक्सीन किशोरों के लिए सुरक्षित और प्रभावशाली है.
लेकिन वे कहते हैं कि इस वैक्सीन में पहली प्राथमिकता वो बच्चे होंगे जो को-मॉर्बिड हैं.
वे कहते हैं, ''हम उन बच्चों में वैक्सीन देने की शुरुआत करेंगे जिन्हें को-मॉर्बिडिटीज़ (अन्य बीमारियां) हों जैसे कैंसर, डायबीटिज़ आदि. ऐसे बच्चों में कोविड की गंभीर स्थिति हो सकती है या मृत्यु होने की आशंका बढ़ जाती है. जैसे ही बड़े लोगों का वैक्सीनेशन दिसंबर महीने के अंत तक पूरा हो जाएगा, उसके बाद हम स्वस्थ बच्चों को वैक्सीन देने की शुरुआत करेंगे.''
ज़ायडस कैडिला की वैक्सीन को भारत में मंज़ूरी मिल गई है. ये नीडल फ्री यानी सुई रहित वैक्सीन है और डॉ एन के अरोड़ा के मुताबिक 'इसमें ज़्यादा दर्द भी नहीं होगा.'
इस बीच वे उम्मीद जताते हैं कि कोवैक्सीन के 2-18 साल के बच्चों में ट्रायल के नतीजे भी सामने आ जाएंगे, वहीं दूसरी कंपनियां भी बच्चों में ट्रायल कर रही हैं जिसके आंकड़े आ सकते हैं, ऐसे में 18 साल से कम उम्र के 44 करोड़ बच्चों को अगले साल की पहली तिमाही में वैक्सीनेशन की शुरुआत की जा सकेगी.
स्वस्थ बच्चों ना दी जाए वैक्सीन

इमेज स्रोत, ANI
आईएपीएसएम की राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ सुनीला गर्ग का साफ़तौर पर कहना है कि सभी बच्चों को वैक्सीन नहीं दी जानी चाहिए.
इंडियन एसोसिएशन ऑफ़ प्रिवेंटिव एंड सोशल मेडिसिन या आईएपीएसएम में पूरे भारत से 550 मेडिकल कॉलेज के सदस्य हैं.

डॉ सुनीला गर्ग यूके के डॉक्टरों की राय पर सहमति जताते हुए कहती हैं कि कोविड वैक्सीन केवल उन बच्चों को दी जानी चाहिए जिनमें को-मॉर्बिडिटीज़ हैं.
वे भारत में किए गए सीरो सर्वे-4 का उल्लेख करते हुए कहती हैं, ''लगभग 60 प्रतिशत बच्चे सीरो सर्वे में पॉजीटिव पाए गए हैं जबकि वे ना स्कूल गए और ना घर से बाहर निकले. इसका मतलब है कि बच्चे संक्रमित हुए लेकिन एसिम्टोमैटिक रहे. जिसमें तीन प्रतिशत बच्चे दस साल से नीचे थे और 9 प्रतिशत 11-18 साल के थे जिनमें हल्का संक्रमण पाया गया था.''
लेकिन डॉ एन के अरोड़ा मानते हैं कि स्वस्थ बच्चों को भी वैक्सीन दी जानी चाहिए क्योंकि वे संक्रमण को फैलाने के कारक हो सकते हैं.
मैक्स अस्पताल में पीडिएट्रिक(बच्चों) एंड इन्फेक्शियस डीसिज़ विभाग के प्रमुख डॉ श्याम कुकरेजा मानते हैं कि 12 साल से कम उम्र के बच्चों को वैक्सीन फिलहाल ना भी दे तो चल जाएगा क्योंकि उनमें रोग प्रतिरोधक क्षमता अच्छी होती है. लेकिन 12 साल से ऊपर के बच्चों को वैक्सीन ज़रूर लगाई जानी चाहिए.
उनके अनुसार,'' जैसे-जैसे इंसान की उम्र बढ़ती है तो ये प्रतिरोधक क्षमता कम होती चली जाती है इसलिए बड़े बच्चों को वैक्सीन दी जानी चाहिए.

इमेज स्रोत, Getty Images
लेकिन वे ये भी मानते हैं कि बच्चों में कोविड के गंभीर मामले उनके सामने नहीं आए हैं.
भारत में भी लोगों को चरणबद्ध तरीके से वैक्सीनेशन की शुरुआत हुई थी जिसमें स्वास्थ्य कर्मचारियों, पुलिसकर्मी, नगरनिगम कर्मचारी सहित फ्रंटलाइन वर्कर शामिल थे. फिर 45 साल से ज्यादा उम्र के लोग शामिल हुए जिन्हें कई बीमारियां(को-मॉर्बिडिटीज़) हैं . इसके बाद 60 साल से ज्यादा उम्र के लोगों और फिर 18 साल से ऊपर के लोगों के लिए वैक्सीनेशन की शुरूआत हुई थी.
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार भारत में अब तक 68 करोड़ 75 लाख से ज़्यादा लोगों को कोविड वैक्सीन दी जा चुकी है.

इमेज स्रोत, Getty Images
इंडियन कॉउंसिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च(आईसीएमआर) ने जून और जुलाई में किए गए सर्वेक्षण में तीन में से एक व्यक्ति में एंटीबॉडी पाए जाने की बात कही थी. ये सर्वे 21 राज्यों के 36,227 लोगों पर किया गया था.
वैक्सीन के दुष्प्रभाव
यूके में हर स्वस्थ्य बच्चों को वैक्सीन ना देने की सिफ़ारिश इसलिए की जा रही क्योंकि फाइज़र और माडर्ना में कुछ बहुत दुर्लभ दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं जैसे दिल में सूजन, जिसमें सीने में दर्द होना और धड़कन तेज़ होना शामिल हैं.
अमेरिका से मिले आंकड़ों के मुताबिक़ जहां लाखों किशोरों को वैक्सीन दी जा चुकी है उनमें वैक्सीन का दूसरा डोज़ लेने वाले 12 से 17 साल तक के लड़कों में प्रति दस लाख में 60 लड़कों में दिल से जुड़ी दिक्कतें पाई गईं. वहीं इसी उम्र की लड़कियों में प्रति दस लाख में सिर्फ आठ लड़कियों में ऐसे लक्षण देखे गए.
अमेरिका से मिली जानकारी के मुताबिक जहां लाखों किशोरों को वैक्सीने दी जा चुका है वहां 12-17 साल के लड़कों में प्रति दस लाख में 60 मामले सामने आए जहां ऐसे लक्षण दिखे. ऐसे लक्षण दूसरी डोज़ के बाद सामने आए हैं जबकि लड़कियों में प्रति लाख में आठ मामले दिल में सूजन के सामने आए हैं.
यूके में बच्चों के डॉक्टरों का कहना है कि अगर स्वस्थ बच्चों को कोविड होता है तो दस लाख में से केवल दो की दर से बच्चे इंटेनसिव केयर में पहुंचते हैं लेकिन अगर बच्चों में स्वस्थ्य संबंधी दिक्कतें है तो ये आंकड़ा बढ़कर प्रति दस लाख में 100 बच्चों का हो जाता है.
मैक्स अस्पताल में बच्चों के डॉक्टर श्याम कुकरेजा भी कहते हैं कि कोई भी वैक्सीन हो उसके साइड इफेक्ट या दुष्प्रभाव तो होते ही हैं. माडर्ना या फ़ाइज़र में देखा गया है कि वो कुछ बच्चों के दिल में सूजन ला देती है लेकिन ये देखना चाहिए कि ये बहुत रेअर या दुर्लभ है.
वे सलाह देते हैं कि कोविड से स्थिति बिगड़े और उसके गंभीर परिणाम हों उससे बेहतर है कि वैक्सीन लगानी चाहिए.
डॉ एन के अरोड़ा भी मानते हैं कि दिल में सूजन की ख़बरें आ रही हैं. लेकिन वे आश्वस्त हैं कि भारत के लिए चिंता की बात नहीं है क्योंकि अभी बच्चों के लिए कोवैक्सीन और बायोलॉजिकल ई. लिमिटेड की 'कार्बेवैक्स' आ रही है जो कि हेपेटाइट्स बी की वैक्सीन की तरह होगी.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)














