नेपाल-भारत: बीजेपी नेता का दौरा क्या संबंध बेहतर करने का है संकेत?

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- Author, फणींद्र दहाल
- पदनाम, बीबीसी नेपाली संवाददाता, काठमांडू
नेपाल के प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा के सत्ता में आने के बाद भारत और नेपाल संबंधों पर नज़र रखने वाले विशेषज्ञ उन संकेतों को परखने की कोशिश में हैं, जिनके आधार पर तय हो सके कि दोनों देशों के रिश्ते किस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं.
भारत में नरेंद्र मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से दोनों देशों के संबंधों और संपर्कों में गर्मजोशी बढ़ने और टकराव के कई दौर आए हैं.
नेपाल में विदेशी मामलों पर नज़र रखने वाले विश्लेषकों का कहना है कि मौजूद वक़्त में भारत और नेपाल के बीच राजनयिक संबंधों में भरोसे का संकट काफी बढ़ गया है. वो कहते हैं कि इसे दूर करने के लिए पहल भारत को ही करनी चाहिए.
इस बीच भारतीय जनता पार्टी के विदेश मामलों के प्रमुख विजय चौथाईवाले नेपाल का दौरा कर रहे हैं. वो रविवार को काठमांडू पहुंचे हैं. चौथाईवाले नेपाल के सत्तारूढ़ गठबंधन के नेताओं के साथ प्रमुख विपक्षी नेताओं से भी मिल रहे हैं.
दोनों देशों के संबंधों पर नज़र रखने वाले नेपाल के जानकारों का का कहना है कि भारत एक बड़ा देश है और उसके नेपाल से साथ घनिष्ठ संबंध रहे हैं, इसलिए भारत को ही आपसी संबंध सुधारने और औपचारिक बातचीत प्रक्रिया को सक्रिय करने के लिए पहल करनी चाहिए. बीजेपी नेता के दौरे को इसी कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है.

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दौरे से क्या बदलेगा?
ख़बरों के मुताबिक विजय चौथाईवाले नेपाली कांग्रेस के सह महामंत्री और प्रधानमंत्री देउबा के करीबी सलाहकार प्रकाश शरण महत के निमंत्रण पर नेपाल पहुंचे हैं.
चौथाईवाले ने प्रधानमंत्री देउबा के साथ अपनी मुलाकात की एक तस्वीर ट्विटर पर पोस्ट की और देउबा को प्रधानमंत्री चुने जाने पर बधाई दी.
उन्होंने इस बात का भी ज़िक्र किया कि पार्टी स्तर पर बातचीत को मजबूत करने के लिए एक समझौता भी हुआ है.
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चौथाईवाले ने सोमवार को पूर्व प्रधानमंत्री और सीपीएन-यूएमएल के अध्यक्ष केपी शर्मा ओली से भी मुलाकात की.
हाल के वर्षों में ओली की पहचान ऐसे नेता की बनी है जो भारत के प्रति कड़ा रुख़ रखते हैं.
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हालिया विवाद
करीब एक महीने पहले धारचूला में महाकाली नदी को एक रस्सी के ज़रिए पार कर रहे एक नेपाली नागरिक की मौत हो गई थी.
इस घटना को लेकर नेपाली मीडिया में दावा किया गया कि जब तीन लोग रस्सी के सहारे महाकाली नदी को पार कर रहे थे तब भारतीय सुरक्षा बल ने उस रस्सी को काट दिया. इसकी वजह से एक नेपाली नागरिक की मौत हो गई.
नेपाल सरकार की ओर से अभी तक इस घटना पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है.
इस मुद्दे पर नेपाल गृह मंत्रालय के संयुक्त सचिव जनार्दन गौतम की अध्यक्षता में बनी जांच समिति को 10 दिनों के भीतर रिपोर्ट सौंपने की जिम्मेदारी दी गई थी. समिति के कार्यकाल को दो बार आगे बढ़ाया गया है और अब उसका कार्यकाल मंगलवार को समाप्त हो रहा है.

विदेश मंत्रालय से नाराज़ लोग
लेकिन जनार्दन गौतम ने कहा कि वे अभी किसी नतीजे पर नहीं पहुंचे हैं.
उन्होंने कहा, ''जांच समिति के दो सदस्य किन्हीं परिस्थितियों के कारण काम नहीं कर पा रहे हैं. ये स्पष्ट नहीं है कि हमारी रिपोर्ट कल तैयार होगी या नहीं.''
नेपाल में कई लोगों ने अपने नागरिक की मौत के तीन हफ़्ते बाद भी स्पष्ट रुख अपनाने में विफल रहने के लिए विदेश मंत्रालय की आलोचना की है.
विशेषज्ञ इसे नेपाल-भारत संबंधों में आई अस्पष्टता और विश्वास के संकट के उदाहरण के रूप में देखते हैं.
प्रधानमंत्री देउबा के विदेशी मामलों के सलाहकार रहे दिनेश भट्टाराई कहते हैं, "भारत के साथ नेपाल के संबंध अहम हैं. लेकिन जब धारचूला की घटना सामने आई तो ये भी अफवाहें थीं कि दूसरी तरफ़ से डूबने वाले व्यक्ति की कोई मदद नहीं की गई."
"एक पड़ोसी देश होते हुए भी मुझे ये समझ नहीं आता कि हममें विश्वास का इतना संकट क्यों है."
नेपाल के गृह मंत्री बालकृष्ण खंड ने कहा था कि सरकार ने धारचूला घटना की जांच के लिए एक कमेटी बनाई है और उसकी रिपोर्ट को पारदर्शी तरीके से लागू किया जाएगा.
पूर्व प्रधानमंत्री ओली के विदेश मामलों के सलाहकार राजन भट्टराई ने कहा है कि धारचूला जैसी घटनाओं पर अगर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया तो ये "हालात बिगड़ने" का कारण बन सकते हैं.
राजन भट्टाराई कहते हैं, "ऐसे मामलों में तुरंत और पारदर्शी तरीके से पता लगाना चाहिए कि क्या हुआ है? कहां गलती हुई है? और गलती सुधारने की पहल करनी चाहिए. ऐसे संवेदनशील मामलों को दोनों पक्षों के बीच बातचीत के माध्यम से सुलझाने की ज़रुरत है."

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सीमा विवाद
साल 2020 में नेपाल और भारत के संबंधों में काफ़ी उतार-चढ़ाव देखे गए.
रिश्तों में खटास की शुरुआत तब हुई जब नेपाल की केपी शर्मा ओली के नेतृत्व वाली सरकार ने नेपाल के नक्शे को संशोधित किया और लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी को नेपाल का हिस्सा दिखाया.
नेपाली संसद ने नेपाल के नक्शे में इस बदलाव पर मुहर लगाई. इस घटना के बाद दोनों देशों के बीच सीमा पर चर्चा ठप हो गई.
दोनों देशों के अधिकारियों के बीच बातचीत शुरू हुई थी. लेकिन इस बीच ओली ने दो बार असंवैधानिक रूप से नेपाल की प्रतिनिधि सभा को भंग कर दिया था. बाद में नेपाल के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले ने ओली को ही सत्ता से बाहर कर दिया.
दो हफ्ते पहले देउबा के नेतृत्व वाले गठबंधन सरकार ने कहा था कि लिंपियाधुरा, कालापानी और लिपुलेख सहित पड़ोसी देशों के साथ सीमा के लंबित मुद्दों को राजनयिक चैनलों के माध्यम से हल किया जाएगा.
नेपाली कांग्रेस के उपाध्यक्ष बिमलेंद्र निधि पार्टी की बैठक में विरोध जताते हुए कहा था कि चीन के साथ सीमा विवाद के मुद्दे को नीति कार्यक्रम में शामिल नहीं किया गया है.

प्राथमिकता के साथ हल हो विवाद
यूएमएल नेता भट्टाराई ने कहा है कि भारत के साथ सीमा विवाद गंभीर समस्या है और इसे तत्काल हल करना दोनों देशों की प्राथमिकता होनी चाहिए.
उन्होंने कहा, ''हम पहले ही इस मुद्दे पर बातचीत करने की कोशिश कर चुके हैं. भारत ने ये नहीं कहा है कि इस विषय में बातचीत नहीं हो सकती. लेकिन बातचीत करने वाली टीम बनाने का माहौल काम नहीं आया.''
प्रधानमंत्री देउबा के पूर्व सलाहकार भट्टराई के अनुसार, नेपाल ने संसद में मुहर लगने के बाद पहले ही संविधान में मानचित्र को शामिल कर लिया है. इस वजह से दोनों के बीच सीमा विवाद और जटिल हो गया है.

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पहल किसे करनी चाहिए?
नेपाल के विदेशी मामलों के विशेषज्ञों का कहना है कि भारत को दोनों देशों के बीच संबंधों को सुधारने और औपचारिक संवाद तंत्र को सक्रिय करने के लिए पहल करनी चाहिए.
देउबा के पूर्व सलाहकार भट्टाराई ने कहा, "नेपाल को सकारात्मक प्रतिक्रिया देनी चाहिए. हमारे दो बड़े पड़ोसियों में से भारत सबसे महत्वपूर्ण है. हमारे भूगोल के कारण, हमें आपसी विश्वास और सद्भावना बढ़ाने की जरूरत है. साथ ही राजनीतिक संबंधों को भी उच्च स्तर पर ले जाया जाना चाहिए."
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ओली के पूर्व सलाहकार भट्टराई ने कहा कि नेपाल और भारत के बीच "सामान्य कामकाजी संबंधों में कोई समस्या नहीं है."
भट्टाराई कहते हैं, "आज जो हमने जो मुद्दे उठाए हैं, उन्हें दूर करने की भारत की इच्छा से माहौल को बेहतर बनाने और बातचीत में पहल करने से, संबंध सुधारने में मदद मिलेगी."
साल 2014 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेपाल का दौरा किया तो कई लोगों ने विश्लेषण किया कि दोनों देशों के बीच संबंध अब पहले से भी अच्छे होंगे. यह यात्रा 17 वर्षों में किसी भारतीय प्रधानमंत्री की नेपाल की पहली आधिकारिक यात्रा थी. मोदी अब तक तीन बार नेपाल की यात्रा कर चुके हैं.
लेकिन इसके बाद जैसे ही नेपाल में संविधान लिखने के लिए बनी संविधान सभा ने संविधान का अंतिम स्वरुप जारी किया, नेपाल को नाकेबंदी का सामना करना पड़ा.
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साल 2016 में मोदी और ओली की सरकार के बीच हुए समझौते के अनुसार, द्विपक्षीय मुद्दों के समाधान का सुझाव देने के लिए नेपाल-भारत प्रबुद्ध समूह का गठन किया गया था.
ऐसा कहा जाता है कि नेपाल-भारत संबंधों के भविष्य के रोडमैप पर प्रबुद्ध समूह के सुझाव प्रासंगिकता खो रहे हैं क्योंकि भारत ने तीन साल पहले इस समूह की रिपोर्ट को स्वीकार करने के लिए कोई तत्परता नहीं दिखाई है.
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