तालिबान के ख़तरे का सामना करने के लिए कितना तैयार है अफ़ग़ानिस्तान?

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- Author, हारून रहमानी और अवनीश पांडेय
- पदनाम, बीबीसी मॉनिटरिंग
पिछले कुछ हफ़्तों में अफ़ग़ानिस्तान के कई ज़िलों पर तालिबान ने कब्ज़ा कर लिया है. इसके बाद कुछ पूर्व अफ़ग़ान लड़ाकों और कमांडरों ने युद्ध के मैदान में वापस लौटने की इच्छा ज़ाहिर की है.
पूर्व लड़ाकों का कहना है कि देश के उत्तर और पश्चिम के प्रांतों में तालिबान के बढ़ते क़दमों को रोकने में सरकारी फ़ौज की नाकामी की वजह से एक संयुक्त मोर्चा बनाना ज़रूरी हो गया है.
नब्बे के दशक में तालिबान विरोधी नॉर्दर्न अलायंस के सदस्य रहे कई लड़ाके अपने गढ़ में आज भी ताक़तवर हैं और उनका रसूख़ क़ायम है. लेकिन किसी संयुक्त मोर्चे के अभाव में इनका तालिबान से मुक़बला करना, टेड़ी खीर साबित हो सकता है.

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तालिबान का आक्रामक रुख़
अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी की शुरुआत एक मई के बाद से हो गई है और तब से ही तालिबान ने सरकारी सेना के ख़िलाफ़ अपना अभियान तेज़ कर दिया था.
तब से अब तक, तालिबान ने अफ़ग़ानिस्तान के 30 से अधिक ज़िलों पर कब्जा कर लिया है. इनमें कुछेक को बाद में सरकारी सेना ने वापस भी ले लिया था, लेकिन हालात बद से बदतर होते दिख रहे हैं.
तालिबान की इस जीत पर सरकार का तर्क दिलचस्प है.
अफ़ग़ान सरकार ज़िलों पर तालिबान के कब्ज़े की रिपोर्ट को सिरे से ख़ारिज करती है. सरकार का दावा है कि सेना सामरिक वजहों से लौटी है ताकि जंग में कम से कम नागरिक हताहत हों.
16 जून को हाई काउंसिल फोर नेशनल रिकंसिलिएशन (एचसीएनआर) के अध्यक्ष अब्दुल्ला अब्दुल्ला ने कहा, "तालिबान, सैनिकों की वापसी के अवसर का लाभ उठाते हुए लड़ाई के मैदान में विजेता बनने की कोशिश कर रहा है. "
हाल के हफ़्तों में तालिबान ने अधिकांश हमले उत्तर और पश्चिम के इलाक़ों में किए हैं, जहां ताजिक, हज़ारा और उज़्बेकों का प्रभाव है. ये कबीले हमेशा से तालिबान के विरोधी रहे हैं और उनका डटकर मुक़ाबला करते रहे हैं.
एक निजी अख़बार सुब-ए-काबुल के एक लेख में लिखा गया, "अपने सामाजिक और सांस्कृतिक ताने-बाने की वजह से उत्तरी क्षेत्र पर कब्ज़ा करना तालिबान या अन्य चरमपंथी समूहों के लिए अहम है."
अख़बार आगे लिखता, "अगर पहले से असरदार पश्तुन समूह उत्तर में कबायलियों से गठजोड़ की वजह से अपना नियंत्रण बरकरार रखने में कामयाब रहा उनके लिए दक्षिण और पूर्वी क्षेत्रों पर कब्जा करना आसान होगा."

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लड़ाकों की वापसी
तो क्या तालिबान के बढ़ते क़दमों को रोकने के लिए अफ़ग़ानिस्तान में कोई कारगर संयुक्त मोर्चा अस्तित्व में आ सकता है?
ऐसी किसी पहल के लिए अब्दुल राशिद दोस्तम, अता मोहम्मद नूर और मोहम्मद मोहाक़िक़- नाम के तीन कमांडरों की भूमिका अहम होगी.
अपने-अपने कबीलों और इलाक़े में ताक़तवर, ये तीनों कमांडर ग़ैर-पश्तून हैं. दोस्तम उज़्बेक हैं, नूर ताजिक और मोहक़िक़ हज़ारा हैं. ये सभी एक ज़माने में नॉर्दर्न अलायंस के नाम से मशहूर एक ताक़तवर फौजी गठबंधन का हिस्सा थे.
अब्दुल राशिद दोस्तम
इनमें से दोस्तम सरकार की सुरक्षा नीतियों के मुखर आलोचक रहे हैं और अपने बेटे यार मोहम्मद दोस्तम के साथ उत्तर में फ़रयाब, जोज़जन और सर-ए-पुल जैसे प्रांतों में तालिबान को और आगे बढ़ने से रोकने के लिए युद्ध के मैदान में लौट गए हैं.
दोस्तम शांति प्रकिया को लेकर अक्सर अपनी नाराज़गी व्यक्त करते रहे हैं.
हाल ही में दोस्तम ने कहा था, "यह कोई मज़ाक नहीं बल्कि युद्ध है. अब अमेरिका पहले की तरह हमारा समर्थन नहीं कर रहा है और हमारे ऊपर उनके लड़ाकू जहाज़ भी मौजूद नहीं हैं."
वे कहते हैं, "अगर उत्तरी इलाका तालिबान के हाथ लगा तो अफ़ग़ानिस्तान तबाह हो जाएगा."
उपराष्ट्रपति के रूप में अपने कार्यकाल में दोस्तम ने उत्तर में तालिबान के ख़िलाफ़ कुछ सफल सैन्य हमलों का नेतृत्व किया था. लेकिन ये अभियान युद्ध अपराधों और मानवाधिकारों के उल्लंघन के आरोपों से घिर गया था.
ऐसा माना जाता है कि तब से, दोस्तम का उज़्बेकों के बीच असर कम हुआ है और कुछ उज़्बेकों ने तालिबान के साथ जाने का भी फ़ैसला किया है. इसके अलावा फ़रयाब प्रांत के गवर्नर को हटाने को लेकर राजनीतिक असहमति के कारण, केंद्र सरकार के साथ उनके रिश्तों में भी खटास भी आई है.
अता मोहम्मद नूर
अता मोहम्मद नूर भी इसी तरह अपनी राजनीतिक पार्टी जमीयत-ए इस्लामी में आंतरिक झगड़े की वजह से कमज़ोर हो गए हैं.
नूर अपने एक फ़ेसबुक पोस्ट में लिखते हैं, "सत्ता, धन, संसाधन, हथियार और युद्ध की कमान सरकार के पास है, मेरे पास नहीं. लेकिन दुर्भाग्य यह है कि सरकार को नहीं मालूम कि करना क्या है?"
नूर आगे लिखते हैं, "बिना किसी व्यापक सहमति के 'दुश्मन को रोकना' मुश्किल है."
मोहक़िक़
उधर मध्य और उत्तरी प्रांतों में हज़ारा समुदाय पर ख़ासा प्रभाव रखने वाले मोहक़िक ने हाल ही में कहा था कि उन्होंने तालिबान के ख़िलाफ़ 10 हज़ार लोगों को लामबंद किया है.
हालांकि उन्होंने इस पर भी बल दिया कि बड़े पैमाने पर तालिबान विरोधी किसी भी युद्ध के मोर्चे के गठन में सरकार की भागीदारी अहम साबित होगी.
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संयुक्त मोर्चा?
फ़िलहाल जो हालात हैं उनमें संयुक्त सैन्य मोर्चे के गठन में दो बाधाएं हैं- कभी ताक़तवर रहे कमांडरों की कमज़ोर पड़ती जा रही सियासी पूंजी और तालिबान विरोधी नेताओं के बीच एकता की कमी.
ये भी देखने में आया है कि बड़े शहरों के तालिबान के कब्ज़े में जाने के बाद, उनके ख़िलाफ़ लड़ाई में शामिल होने का वादा करने वाले कई नेता, चुप्पी साधे लेते हैं.
उदाहरण के लिए, पूर्व जिहादी कमांडर इस्माइल ख़ान को लें.
इस्माइल ख़ान कहा था कि वे बड़े शहरों की हिफ़ाज़त के लिए तैयार हैं. उनके गृह प्रांत हेरात के कई ज़िलों पर तालिबान ने हाल ही में कब्ज़ा कर लिया है. इसके बावजूद उन्होंने, अपना खोया हुआ इलाक़ा वापस लेने के लिए कोई क़दम नहीं उठाया है.
इसी प्रकार जमीयत पार्टी के वर्तमान प्रमुख सलाहुद्दीन रब्बानी भी अपने गृह प्रांत बदख़्शां के अरगंजख़्वा ज़िले पर तालिबान के कब्ज़े पर ख़ामोश रहे.
नॉर्दर्न अलायंस के धाकड़ जनरल रहे अहमद शाह मसूद के बेटे अहमद मसूद, तालिबान के साथ जंग के लिए, पहले की तरह अपनी तत्परता दिखाने में विफल रहे हैं.
दोस्तम, मोहक़िक और नूर तालिबान के ख़िलाफ़ लड़ाई में अपने अलायंस को फिर से ज़िंदा करने की संभावना की ओर बढ़ते दिख रहे हैं. पर कई अन्य तालिबान विरोधी नेताओं का रुख़ अब भी स्पष्ट नहीं हैं.
उत्तरी अफ़ग़ानिस्तान के हालात 90 के दशक से बहुत अलग है.
उस ज़माने में तालिबान से लोहा लेने वाले कुछ नेता आज पहले से अधिक धनी हैं लेकिन उनका राजनीतिक प्रभाव पहले कहीं कम है.
इसकी एक वजह शायद अहमद शाह मसूद और बुरहानुद्दीन रब्बानी जैसे कद्दावर नेताओं की ग़ैर मौजूदगी भी है. अब ये लोग पहले की तरह केंद्र सरकार दबाव बनाने सक्षम नहीं हैं. यही वजह है कि उत्तर में अन्य ग़ैर पश्तून जातीय समूहों के बीच तालिबान की प्रभाव में वृद्धि हुई है.
निजी अफ़ग़ान अख़बार अरमान-ए मेली ने अपने एक संपादकीय में लिखा है कि एक महत्वपूर्ण मोर्चा बनाने के लिए बहुत बड़े और व्यापक स्तर पर लामबंद होने की ज़रूरत है.
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