इमरान ख़ान और मोदी सरकार ने क्या एक सच को स्वीकार लिया है?

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- Author, आज़म ख़ान और नियाज़ फ़ारूक़ी
- पदनाम, बीबीसी उर्दू, इस्लामाबाद
पाकिस्तान और भारत के बीच नियंत्रण रेखा पर संघर्ष विराम समझौते के बाद, हाल ही में दोनों देशों के राजनीतिक और सैन्य नेताओं के ऐसे बयान सामने आए हैं, जिसने सीमा पर शांतिपूर्ण समाधान की ओर बढ़ने के संकेत दिए हैं.
हालांकि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने अपने बयान में कहा कि अगस्त 2019 में समाप्त किए गए कश्मीर के विशेष संवैधानिक दर्जे की बहाली से पहले भारत के साथ संबंधों को सामान्य बनाना कश्मीरियों के ख़ून के साथ विश्वासघात होगा.
लेकिन जानकारों का कहना है कि इस समय दोनों देशों की कुछ आर्थिक और रणनीतिक वजहें हैं, जो इन्हें तनाव कम करने के लिए मजबूर कर रहे हैं.
जानकारों का मानना है कि इन बयानों में नया कुछ भी नहीं है, लेकिन शांतिपूर्ण समाधान खोजने की दिशा में अगर देखा जाए तो दोनों पक्षों के रुख़ में कुछ नरमी ज़रूर आई है.
जो बयान हाल के दिनों में दिए गए हैं उनमें सबसे अधिक चर्चा भारतीय सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे का वो बयान है जिसमें उन्होंने कहा कि भारत और पाकिस्तान के बीच "टूटे हुए विश्वास" को बहाल करना पूरी तरह से पाकिस्तान की ज़िम्मेदारी है.
नरवणे ने कहा कि, "पाकिस्तान और भारत के बीच दशकों पुराने अविश्वास को रातोरात ख़त्म नहीं किया जा सकता. अगर वे (पाकिस्तान) संघर्ष विराम का सम्मान करते हैं और भारत में आतंकवादियों को भेजना बंद कर देते हैं, तो इनसे विश्वास बढ़ेगा."
उन्होंने कहा कि, "इस मामले में ज़िम्मेदारी पूरी तरह से पाकिस्तान पर है."

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भारत के साथ संबंध सामान्य बनाने पर पाकिस्तान कितना गंभीर?
पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय में 2013 से 2017 के बीच प्रवक्ता रहीं तसनीम असलम ने बीबीसी को बताया कि भारत को विश्वास क़ायम करने के लिए कश्मीर और अफ़ग़ानिस्तान में कुछ ऐसे क़दम उठाने होंगे, जिससे यह संकेत मिले कि वह पाकिस्तान के साथ सामान्य संबंध चाहता है.
उनके अनुसार, "पहले दिन से ही पाकिस्तान का यह रुख़ रहा है कि भारत को पहले कश्मीर का विशेष दर्जा बहाल करना चाहिए, जो ज़ाहिर है कि भारत नहीं करेगा."
पूर्व राजनयिक शमशाद अहमद ख़ान परवेज़ मुशर्रफ़ के साथ भारत के साथ संबंध सुधारने के लिए एक कंपोज़िट डायलॉग का हिस्सा रहे हैं.
उन्होंने बीबीसी को बताया कि दोनों देशों के सैन्य और नागरिक नेतृत्व के बयान एक नियमित खेल हैं और यह केवल दिखावे के लिए है.
उनके अनुसार, "हर दौर में पाकिस्तान का तो यही पक्ष रहा है कि वह शांति चाहता है और युद्ध समस्याओं का समाधान नहीं हैं."

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पाकिस्तानी सेना प्रमुख बाजवा ने क्या दिया था बयान?
भारतीय सेनाध्यक्ष के बयान से पहले पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल क़मर जावेद बाजवा ने नियंत्रण रेखा (एलओसी) पर संघर्ष विराम समझौते के बाद अपने बयान में कहा था कि, "भारत-पाकिस्तान के बीच मज़बूत संबंध वह कुंजी है जिससे पूर्व और पश्चिम एशिया के बीच संपर्क सुनिश्चित करते हुए दक्षिण और मध्य एशिया की क्षमताओं को अनलॉक किया जा सकता है."
उन्होंने कहा था, "हालांकि, दो परमाणु-सशस्त्र पड़ोसी देशों के बीच संघर्ष की वजह से यह अवसर बंधक बना हुआ है. कश्मीर विवाद स्पष्ट रूप से इस मुद्दे का केंद्र है."

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इमरान ख़ान ने भारत के साथ व्यापार से जुड़ी समरी ख़ारिज किया
पाकिस्तानी सेना प्रमुख के इस बयान के बाद, पाकिस्तान के वाणिज्य मंत्रालय ने संघीय मंत्रिमंडल को भारत के साथ व्यापार से संबंधित एक समरी भेजी थी लेकिन इमरान ख़ान की अध्यक्षता में इसे ख़ारिज कर दिया गया. साथ ही इस मुद्दे को भारत की तरफ़ से कश्मीर की विशेष संवैधानिक स्थिति को बहाल करने से जोड़ दिया गया.
पाकिस्तान की रक्षा मामलों की विश्लेषक आयशा सिद्दीक़ा ने बीबीसी से कहा कि, "पाकिस्तान के सैन्य नेतृत्व को यह उम्मीद थी कि जब पाकिस्तान संबंधों में सुधार की पेशकश करेगा, तो भारत भी इसके जवाब में कश्मीर की विशेष स्थिति की बहाली की घोषणा करेगा."
उनके अनुसार, "जब यह संभव नहीं हुआ, तब भारत के साथ व्यापार पर पेश की गई समरी को अस्वीकार कर दिया गया."
पाकिस्तान के विदेश कार्यालय की पूर्व प्रवक्ता तसनीम असलम के अनुसार, "नीति सेना प्रमुख नहीं बनाते और जो बयान राजनेताओं के होते हैं वही नीति होती है और प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के बयान में कहीं कोई विरोधाभास दिखाई नहीं देता है. एलओसी पर संघर्ष विराम समझौते के बारे में उन्होंने कहा कि डेढ़ साल से दोनों देशों में उच्चायुक्त न होने के बावजूद कुछ समझौते ऐसे हैं जिन पर अमल किया जा रहा है."
शमशाद अहमद ख़ान के मुताबिक, "भारत जानता है कि इससे पहले कि अमेरिका बातचीत के लिए दबाव डाले, उसे यह साबित करना है कि वह पहले से ही पाकिस्तान के साथ बातचीत कर रहा है. उनके अनुसार जहाँ तक सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के पाकिस्तान पर दबाव बनाने का सवाल है, तो यह कहना सही नहीं होगा. क्योंकि ये दोनों देश संबंध सुधारने की बात ज़रूर कह रहे हैं लेकिन दबाव नहीं बना रहे हैं."
"एलओसी पर फायरिंग और फ़िज़ूलखर्ची से थके भारत-पाकिस्तान"
तसनीम असलम के अनुसार, "इस समय सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के लिए आर्थिक हित महत्वपूर्ण हैं. शायद यही कारण है कि पिछले कुछ समय से ये देश हर जगह मुसलमानों के सामने आने वाली समस्याओं से हट कर दृष्टिकोण अपना रहे हैं, जैसे कि फ़लस्तीन के मुद्दे पर दृष्टिकोण में बदलाव आया है. हालांकि, पाकिस्तान को अपने हितों के आधार पर ही निर्णय लेने हैं."
आयशा सिद्दीक़ा के मुताबिक़, फ़िलहाल पाकिस्तान का फ़ोकस अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी पर भी है और फिर भारत और पाकिस्तान दोनों ही एलओसी पर फायरिंग और फ़िज़ूलखर्च से थक चुके थे.
उनके मुताबिक़, भारत की अर्थव्यवस्था भी कोरोना महामारी के कारण दबाव में है और वह कुछ समय के लिए संबंधों को सामान्य रखना चाहते हैं. यही स्थिति सीमा के इस तरफ़ भी है जहाँ पाकिस्तान को भी कई आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है.

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बातचीत की मेज पर सेना नहीं बैठेगी
आयशा सिद्दीक़ा के अनुसार, पाकिस्तानी सेना प्रमुख के भारत के साथ संबंध स्थापित करने के बयान की ज़्यादा सराहना नहीं हुई और इस कारण उन्होंने मीडिया से भी शिकायत की कि नज़रिया बनाने में कोई मदद नहीं की गई.
उनके मुताबिक़, सेना को लगता है कि रातोरात नज़रिये बदल जाएंगे, लेकिन ऐसा संभव नहीं है.
आयशा सिद्दीक़ा के मुताबिक़, "जब भारत से रिश्ते सुधारने की बात आई तो लोगों ने मज़ाक उड़ाना शुरू कर दिया था कि ऐसा तो नवाज़ शरीफ़ भी करना चाहते थे, लेकिन उन्हें ऐसा करने नहीं दिया गया."
"अभी पाकिस्तान ने एक सिविलियन को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार नियुक्त किया है, जिसका स्पष्ट अर्थ ये है कि अब अगर वार्ता का दौर शुरू भी हुआ, तो सेना सामने नहीं आएगी, क्योंकि अब सेना परवेज़ मुशर्रफ़ वाली (सामने आने की) ग़लती नहीं दोहराएगी.
शमशाद अहमद ख़ान के अनुसार, भारत के साथ कोई भी समझौता एक व्यावहारिक समाधान नहीं है और परवेज़ मुशर्रफ़ ने अतीत में जो समझौता करने की कोशिश की, वह फायदेमंद साबित नहीं हो सकी थी.

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स्थिति में सुधार का कारण संघर्ष विराम नहीं
द हिंदू अख़बार के रक्षा संवाददाता दिनकर पेरी का कहना है कि भारतीय सेना प्रमुख का बयान वास्तव में ज़मीनी स्थिति को दर्शाता है.
उनका कहना है कि संघर्ष विराम की घोषणा के बाद "सीमा पर गोलीबारी पूरी तरह से बंद हो गई है. पिछले साल लगभग पाँच हज़ार बार संघर्ष विराम के उल्लंघनों की तुलना में पिछले 100 दिनों में सीमा पर लगभग ख़ामोशी रही है.
उनका कहना है कि सीमा पर ख़ामोशी है लेकिन, ''आगे क्या करना है यह दोनों देशों के सरकारों पर निर्भर है.''
वह सीमा पर स्थिति में सुधार का श्रेय पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति, कोविड संकट, एफ़एटीएफ़ के दबाव और अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी जैसी समस्याओं को देते हैं.
"लेकिन ये हालात कब तक रहेंगे, यह अगले तीन-चार महीनों में ही साफ़ हो पाएगा, जब पहाड़ों में मौसम गर्म होगा और पहाड़ी दर्रे खुलेंगे."
उनका कहना है कि, "आर्थिक मंदी, कोविड और सीमा पर तनाव के बीच ज़मीनी हालात में सुधार भारत के भी पक्ष में है, लेकिन इसका कारण अमेरिकी दबाव भी हो सकता है."
उन्होंने कहा कि अगर दोनों देशों के बीच स्थिति में सुधार होता है तो इसकी वजह संघर्ष विराम नहीं बल्कि संघर्ष विराम के कारण उच्च स्तरीय वार्ता है.

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कश्मीरी पक्षकार अब भी बहस में शामिल नहीं
2010 में भारत प्रशासित कश्मीर में शांति बहाली के लिए केंद्र सरकार की 'मध्यस्थ' रहीं प्रोफ़ेसर राधा कुमार भारत और पाकिस्तान के बीच वर्तमान शांति प्रक्रिया के बारे में बहुत आशावादी नहीं हैं. उनका कहना है कि कश्मीरी पक्षकार अभी भी इस बहस में शामिल नहीं है.
वह कश्मीर में 2019 में हुए 'अवैध और असंवैधानिक' परिवर्तनों के ख़िलाफ़ भारतीय सुप्रीम कोर्ट में वादी हैं, लेकिन उन्हें इस मोर्चे पर भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार से कोई बदलाव नहीं दिख रहा है.
वह कहती हैं कि यह जानना दिलचस्प होगा कि क्या मोदी सरकार को आख़िरकार महसूस हुआ है कि पिछले दो वर्षों में उसके कड़े क़दम कश्मीरियों में अलगाववाद और ग़ुस्से को बढ़ाने का कारण बने हैं.
"शायद, यह हुआ हो, लेकिन जब मोदी प्रशासन की बात आती है, तो इस पर एक बड़ा सवालिया निशान लगता है."
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने इस सप्ताह के शुरू में कहा था कि शांति प्रक्रिया तब तक आगे नहीं बढ़ सकती जब तक कि भारत कश्मीर पर 2019 के अपने फ़ैसले को वापस नहीं लेता है.
राधा कुमार का कहना है कि अनुच्छेद 370 को वापस लाने का एक तरीक़ा यह हो सकता है कि पाकिस्तान और भारत के बीच इस पर पूरे पूर्व राज्य के लिए आम सहमति बने.
उन्होंने कहा कि, "इससे भारत सरकार को कुछ गुंजाइश मिलेगी, लेकिन मुझे नहीं लगता कि भाजपा सरकार किसी भी तरह से उस दिशा में आगे बढ़ रही है."
उन्होंने कहा कि, "यह मान लेना कि पाकिस्तान अन्य मुद्दों पर बिना किसी कार्रवाई के संघर्ष विराम का पालन करना जारी रखेगा, एक अवास्तविक धारणा है."
"पाकिस्तान की अपनी मजबूरियां हैं, जैसे केंद्र सरकार की स्थिरता, अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिका की वापसी के बाद चरमपंथी समूहों का प्रोत्साहन, और एफ़एटीएफ़."

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'संघर्ष विराम के बाद राजनीतिक कार्रवाई की ज़रूरत'
राधा कुमार कहती हैं कि यह महत्वपूर्ण है कि संघर्ष विराम को राजनीतिक प्रक्रिया का समर्थन प्राप्त हो.
"जम्मू-कश्मीर के लगभग सभी कमांडरों ने कहा है कि कश्मीर मुद्दे को सुलझाने के लिए एक राजनीतिक प्रक्रिया की ज़रूरत है. वो हमेशा ही स्पष्ट रहे हैं कि सेना हिंसा को कम या नियंत्रित कर सकती है. लेकिन इसके बाद राजनेताओं को एक समाधान खोजने के लिए क़दम उठाने की ज़रूरत होती है. मुझे लगता है कि सेना अपने नज़रिये को दोहरा रही है."
राधा कुमार का मानना है कि कुछ हफ़्ते पहले पाकिस्तान के प्रयासों के बाद भारत की सकारात्मक प्रतिक्रिया का एक कारण यह भी हो सकता है.
हालांकि, वह कहती हैं कि भारत अभी तक शांति प्रक्रिया को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है, बल्कि सरकार ने सार्वजनिक रूप से संघर्ष विराम को भी स्वीकार नहीं किया है.
"संघर्ष विराम का उद्देश्य यह है कि इसके बाद राजनीतिक प्रयास हों, नहीं तो संघर्ष विराम क़याम नहीं रहेगा. राजनीतिक प्रक्रिया के बगैर दुनिया में कहीं भी संघर्ष विराम क़ायम नहीं रहा है. इसराइल और फ़लस्तीन, सूडान और आयरलैंड को आप इसके उदाहरण के तौर पर देख सकते हैं."
लेकिन क्या कश्मीर में मौजूदा हालात बने रहेंगे या भारत-पाकिस्तान के रिश्ते सुधरेंगे?
इस पर उन्होंने भारत सरकार का ज़िक्र करते हुए कहा कि, "मुझे ऐसा कोई संकेत नहीं मिला, जिससे मैं कहूं कि सरकार शांति प्रक्रिया के लिए कोई तैयारी कर रही है."
"पाकिस्तान को सकारात्मक जवाब देने के लिए भारत को राजी किया गया था. लेकिन मुझे नहीं लगता कि किसी बड़े मुद्दे पर बातचीत होगी. हमें सरकार की ओर से ऐसा कोई संकेत नहीं मिला है कि संघर्ष विराम आगे किसी अन्य प्रक्रिया का कारण बनेगा. लेकिन मैं उम्मीद करती हूँ कि वो कोशिश करेंगे, क्योंकि यह करना एक स्पष्ट प्रक्रिया है."
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