नेतन्याहू: हारी बाज़ी जीतना उन्हें आता है, लेकिन इस बार क्या होगा?

    • Author, राघवेंद्र राव
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

इसराइल में जारी राजनीतिक घटनाक्रम में ये सवाल चर्चा का विषय बन गया है कि क्या प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू का दौर ख़त्म होने को है?

नेतन्याहू के राजनीतिक सफर पर नज़र डालें तो यह साफ़ है कि नेतन्याहू एक पोलिटिकल सर्वाइवर हैं यानी वे अंत तक के कगार पर पहुँचकर भी वापसी करने में माहिर हैं.

भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे नेतन्याहू इसराइल के पहले प्रधानमंत्री हैं जिन पर उनके कार्यकाल के दौरान ही मुक़दमे चल रहे हैं और इसके बावजूद इसराइल में पिछले दो साल में हुए चार चुनावों में खंडित जनादेश आने के बावजूद नेतन्याहू प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बने रहे हैं.

71 वर्षीय नेतन्याहू इसराइल में सबसे लंबे समय तक सत्ता में रहने वाले नेता हैं और इसराइल की राजनीति में एक पूरे दौर में उनका दबदबा रहा है.

पिछले कुछ दिनों में इसराइल में एक नई गठबंधन सरकार बनने की संभावना मज़बूत हो गई है. इसके बारे में नेतन्याहू ने चेतावनी दी है कि अगर ऐसा हुआ तो यह 'देश की सुरक्षा के लिए ख़तरनाक' होगा.

नेतन्याहू ने साथी दक्षिणपंथियों से आग्रह किया है कि वे उस सौदे का समर्थन न करें जिसमें अति-राष्ट्रवादी नेफ़्टाली बेनेट ने एक मध्यमार्गी पार्टी के साथ गठबंधन बनाने की बात कही है.

नेतन्याहू के विरोधियों के पास सरकार बनाने के लिए बुधवार तक का समय है. अगर वे सरकार बनाने में सफल होते हैं तो यह इसराइल में सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहने वाले नेतन्याहू के शासन को समाप्त कर देगा.

नेतन्याहू भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों का सामना कर रहे हैं और जेल जा सकते हैं. मार्च में हुए आम चुनाव में वे निर्णायक बहुमत नहीं जीत पाए थे.

क्या नेतन्याहू का दौर ख़त्म होने को है?

यरुशलम में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार हरेंद्र मिश्रा कहते हैं कि अगर इसराइल में राष्ट्रीय एकता की सरकार बनती है और प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू को पद त्याग करना पड़ता है तो भी ऐसा कतई नहीं माना जा सकता कि ये नेतन्याहू के राजनीतिक करियर का अंत है.

वे कहते हैं, "1999 में जब उन्होंने पहली बार प्रधानमंत्री पद से इस्तीफ़ा दिया था तब भी यहाँ कहा जा रहा था कि उनका पोलिटिकल करियर ख़त्म हो चुका है लेकिन दस सालों के बाद 2009 में वो फिर प्रधान मंत्री बने और पिछले बारह सालों से इस पद पर आसीन हैं. तो वैसे भी राजनीति में इस तरह की बात कभी साफ़ तौर पर नहीं कही जा सकती."

एके पाशा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज़ के पश्चिम एशिया अध्ययन केंद्र में प्रोफेसर हैं. बीबीसी ने उनसे पुछा कि क्या नवीनतम ये घटनक्रम नेतन्याहू के दौर के अंत का सूचक है?

उन्होंने कहा, "मेरा जवाब हाँ और ना दोनों है. पहले तो हमें यह मानकर चलना होगा कि नेतन्याहू एक सर्वाइवर हैं. बहुत से तूफ़ान आए पर नेतन्याहु अब तक हमेशा बचकर निकल जाते रहे हैं. लेकिन अब की बार उनके खिलाफ कुछ ज़्यादा ही खतरनाक बादल मंडरा रहे हैं."

प्रोफेसर पाशा कहते हैं कि नेतन्याहू इस बात की उम्मीद नहीं कर रहे थे कि बाइडन अमेरिका के राष्ट्रपति चुन लिए जाएँगे. "डोनाल्ड ट्रम्प नेतन्याहू को लगातार सहयोग देते आ रहे थे चाहे वो ईरान परमाणु समझौते को निरस्त करने का मामला हो या यरूशलम को इसराइल की राजधानी बनाने का. तो बाइडन का अमेरिकी राष्ट्रपति चुना जाना नेतन्याहू के लिए एक बहुत बड़ा धक्का था क्योंकि ईरान परमाणु समझौते का समर्थन ओबामा-बाइडन ने नेतन्याहू के खिलाफ जाकर किया था और अब अमेरिका दोबारा इस समझौते में शामिल होना चाहता है जो नेतन्याहू नहीं चाहते."

पाशा के अनुसार "ईरान के मसले की तलवार नेतन्याहू के करीब आती जा रही है".

पाशा कहते हैं बाइडन ने ईरान के मामले में उन पुराने मध्यस्थों को नियुक्त कर दिया है जिन्हें ईरान का समर्थक समझा जाता है और ये भी नेतन्याहू के लिए एक धक्का है. वे कहते हैं, "नेतन्याहू ने इस मसले पर बात करने के लिए जो अधिकारी अमेरिका भेजे वे खाली हाथ लौटे आए और सन्देश यह था कि अमेरिका के साथ दाल गलने वाली नहीं है. ये साफ़ हो गया कि बाइडन ट्रम्प की तरह इसराइल की बात नहीं मान रहे हैं और वही करेंगे जो उन्हें करना होगा. अमेरिकी दरबार में इसराइल की सुनवाई पहले की अपेक्षा कम हो गई है."

इसराइल और हमास के बीच हाल ही में हुए संघर्ष पर पाशा कहते हैं कि इन हमलों के पीछे नेतन्याहू का मुख्य उद्देश्य राष्ट्रवादी सरकार के बनने को टालना था. वे कहते हैं, "नेतन्याहू ने हमास पर ये सोचकर हमला किया कि दुनिया की राय उनके हक़ में होगी. वहां भी उन्हें धक्का पहुंचा जिस तरह से न्यूज़ीलैंड से लेकर कनाडा और साउथ अफ्रीका तक विरोध प्रदर्शन हुए. सुरक्षा परिषद् में इसराइल की काफी आलोचना हुई. पिछली बार जब इसराइल ने हमास पर हमला किया था उस बार हुई आलोचना से कई गुना ज़्यादा आलोचना इस बार हुई."

पाशा कहते हैं कि आम इसराइली यह जानने की कोशिश कर रहा है कि नेतन्याहू कब तक अपने व्यक्तिगत एजेंडा को राष्ट्रीय सुरक्षा का नाम देते रहेंगे. "जनता की राय उनके सुरक्षा दृष्टिकोण को मानने के लिए तैयार नहीं है और लोग उनकी ईमानदारी पर भी शक कर रहे हैं".

पाशा का ये भी मानना है कि इसराइली यह मान कर चल रहे हैं कि ईरान की वजह से खतरा तो है लेकिन उनके अंदरूनी मामलों में भी काफी मुश्किलें हुई हैं. वे कहते हैं, "कोरोना के चलते इसराइल की अर्थव्यवस्था पर असर पड़ा है और मंहगाई बढ़ी है. दूसरी तरफ आवास, शरणार्थियों और अंतर सांप्रदायिक संबंध जैसे मसले भी हैं. पहली बार हुआ कि इसराइल के 5-6 बड़े शहरों में अरब फ़लस्तीनी झड़पों में काफी तनाव हुआ. ऐसा 50-60 साल में पहली बार हुआ कि कई बड़े शहरों में कर्फ्यू लगा. तो इसराइल के खिलाफ एक अनोखी घरेलू, क्षेत्रीय और वैश्विक स्थिति बन गई है और वहां का आम नागरिक ये पूछ रहा है कि ये सब कैसे हुआ, क्यों हुआ और कौन ज़िम्मेदार है."

नेतन्याहू पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों ने भी उनकी मुसीबतें बढ़ा दी हैं. पाशा कहते हैं कि लोगों को ऐसा लगने लगा है कि प्रधानमंत्री के पद पर रहकर नेतन्याहू ने गलत काम किए हैं और उससे बचने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा का नाम देकर उन्हें तकलीफ पहुंचाई जा रही है.

पाशा कहते हैं कि जहाँ एक तरफ इसराइल के मतदाता वहां की संसद को बता रहे हैं कि अगर नेतन्याहू प्रधानमंत्री नहीं बनेंगे तो देश के हालात सुधरेंगे, वहीं दूसरी तरफ "नेतन्याहू के मुक़ाबले बेनेट और लेपिड की छवि साफ़ है" और "वे सत्ता के भूखे नहीं हैं और इसराइल के हक़ में काम करना चाहते हैं और उनका पिछले रिकॉर्ड बहुत हद तक साफ़ है". पाशा का मानना है कि इसी के चलते दूसरे लोग भी उनकी तरह झुकाव दिखा रहे हैं और सहयोग करने के लिए तैयार हैं.

उनके अनुसार अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडन ने भी यह मन बना लिया है कि नेतन्याहू दो-राष्ट्र समाधान, ईरान या सीरिया में मददगार होने के बजाय रुकावटें खड़ी कर सकते हैं और इसलिए वे भी नेतन्याहू के बिना बनने वाली सरकार का समर्थन करना बेहतर समझेंगे.

वे कहते हैं, "चुनावों से पहले नेतन्याहू चार बार संयुक्त अरब अमीरात जाना चाहते थे लेकिन वहां की सरकार ने यह देखकर मना कर दिया कि शायद वो इस दौरे का इस्तेमाल चुनावों के लिए करना चाहते हैं. जो अब्राहम एकॉर्ड के तहत अमेरिका ने दबाव डालकर इन देशों से मान्यता दिलवाई थी उसमे भी कुछ दम नहीं है. ईरान, सीरिया जैसे देश तो दूर की बात हैं लेकिन अमेरिका के दोस्त देश भी नेतन्याहू और उनकी नीतियों से तंग आ गए हैं."

पाशा का मानना है कि "नेतन्याहू नैतिक रूप से दिवालिया हैं और राजनीतिक रूप से लगभग समाप्त हो चुके हैं. नेतन्याहू पर मंडराते बादल घने हो गए हैं और तूफ़ान आने वाला है."

क्या अब भी नेतन्याहू सत्ता में बने रह पाएंगे?

मिश्रा का कहना है कि नेतन्याहू की राजनीतिक वापसी कई बातों पर निर्भर होगी. वे कहते हैं, "सबसे अहम बात तो यह है कि जो राष्ट्रीय एकता की सरकार बन रही है उसमे तमान तरह के मतभेद हैं, उसमे तमाम तरह की पार्टियां हैं. उसमे लेफ्ट की, सेंटर की और राइट की पार्टियां हैं और अगर यह सरकार बनती है तो इसमें एक अरब पार्टी भी पहली बार शामिल होने जा रही है. तो ऐसे में तमाम तरह के मतभेद होंगे. साफ़ तौर पर जो मतभेद हैं उनकी बातचीत के दौरान भी सामने उभरकर आए हैं और वो लगातार कह रहे हैं कि इस तरह की सरकार को बनाए रखना हालाँकि राष्ट्रीय एकता का प्रतीक होगा लेकिन साथ ही साथ राष्ट्र के अंदर जो तमाम तरह के मतभेद हैं वो भी साफ़ तौर पर नज़र आएंगे."

मिश्रा के अनुसार इसराइल में जब अरब नागरिकों की यहूदियों के साथ झड़पें हुईं तो उस दौरान जो पार्टी नए गठबंधन में शामिल होने वाली है उसने बातचीत से इनकार कर दिया और कहा कि वो फिलहाल किसी गठबंधन को लेकर बातचीत नहीं कर सकते. वे कहते हैं, "तो जब भी कोई झड़पें होंगी या कोई मतभेद होगा तो इन पार्टियों के बीच के सारे मतभेद उभरकर सामने आएंगे और इस तरह के गठबंधन को बनाये रखना बड़ा मुश्किल होगा. अगर यह गठबंधन बिखर जाता है तो ज़ाहिर है बिन्यामिन नेतन्याहू का पक्ष मज़बूत होगा."

मिश्रा का यह भी मानना है कि नेतन्याहू की राजनीतिक वापसी होती है या नहीं काफी हद तक इस बात निर्भर करेगी की वे किस तरह लिकुड पार्टी में अपने पद पर बने रहेंगे और अपना वर्चस्व बनाए रखेंगे.

वे कहते हैं, "फिलहाल जब वे प्रधानमंत्री हैं तो कोई भी खुलकर उनका विरोध नहीं करता नज़र आ रहा है. हालाँकि लोग दबी ज़ुबान में ये ज़रूर कह रहे हैं कि लिकुड के नेतृत्व में सरकार सिर्फ इसलिए नहीं बन पा रही है क्योंकि नेतन्याहू प्रधानमंत्री बने रहना चाहते हैं. अगर वो प्रधानमंत्री नहीं बनना चाहें तो लिकुड का कोई भी और नेता अगर सामने आता है तो राइट विंग की सरकार बहुत ही आसानी से बन जाएगी."

मिश्रा के अनुसार नेतन्याहू का राजनीतिक करियर इस बात पर भी निर्भर करेगा कि उनके खिलाफ जो अदालत में जो मुकदमे चल रहे हैं उनमें किस तरह से आगे कार्रवाई बढ़ती और क्या फैसला आता है या किस तरह के हालात बनते हैं.

वे कहते हैं, "अगर अदालत में उनके खिलाफ फैसले आने शुरू होते हैं तो जो लोग अभी उनके साथ खड़े नज़र आ रहे हैं वे शायद उनका साथ छोड़ दें और तब उनकी राजनीतिक वापसी बहुत कठिन हो जाएगी."

प्रोफेसर पाशा कहते हैं कि जून में इसराइल के राष्ट्रपति का कार्यकाल ख़त्म हो रहा है और "उसमे कुछ साज़िश चल रही है कि नेतन्याहू अपने किसी ऐसे समर्थक को राष्ट्रपति बनवा दें जो या तो नेतन्याहू को सरकार बनाने को बुलाए या उनके मुताबिक चुनाव करवाए और अगले चुनाव तक नेतन्याहू को कार्यवाहक प्रधान मंत्री बने रहने का मौका दें".

नेतन्याहू का अब तक का सफ़र

बिन्यामिन नेतन्याहू का जन्म 1949 में तेल अवीव में हुआ. 1963 में उनका परिवार अमेरिका चला गया जब उनके इतिहासकार और यहूदी अधिकार कार्यकर्ता पिता बेंजियन को एक अकादमिक पद की पेशकश की गई.

18 साल की उम्र में नेतन्याहू इसराइल लौट आए उन्होंने सेना में पांच विशिष्ट वर्ष बिताए जहाँ उन्होंने एक इलीट कमांडो यूनिट में एक कप्तान के रूप में सेवा की. 1968 में नेतन्याहू ने बेरूत के हवाई अड्डे पर एक हमले में भाग लिया और 1973 के मध्य पूर्व युद्ध में वे लड़े.

इसराइल में सैन्य सेवा के बाद नेतन्याहू वापस अमेरिका चले गए जहां उन्होंने मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) में स्नातक और मास्टर डिग्री हासिल की.

1976 में नेतन्याहू के भाई जोनाथन युगांडा के एंटेबे में एक अपहृत विमान से बंधकों को छुड़ाने के लिए हुई कार्रवाई में मारे गए थे. उनकी मृत्यु का नेतन्याहू परिवार पर गहरा प्रभाव पड़ा और उनका नाम इसराइल में प्रसिद्ध हो गया.

नेतन्याहू ने अपने भाई की याद में एक आतंकवाद विरोधी संस्थान की स्थापना की और 1982 में वाशिंगटन में इसराइल के मिशन के उप प्रमुख बने.

एक विशिष्ट अमेरिकी उच्चारण के साथ स्पष्ट अंग्रेजी बोलने वाले नेतन्याहू अमेरिकी टेलीविजन पर एक जाना-पहचाना चेहरा और इसराइल के लिए एक प्रभावी वकील बन गए. नेतन्याहू को 1984 में न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र में इसराइल का स्थायी प्रतिनिधि नियुक्त किया गया.

1988 में इसराइल लौटने के बाद घरेलू राजनीति में शामिल हुए और नेसेट (संसद) में लिकुड पार्टी के लिए एक सीट जीतकर उप विदेश मंत्री बने.

कुछ समय में वे पार्टी के अध्यक्ष बने और 1996 में यित्ज़ाक राबिन की हत्या के बाद हुए चुनाव में इसराइल के पहले सीधे चुने गए प्रधानमंत्री बने.

इसराइल और फ़लस्तीनियों के बीच 1993 के ओस्लो शांति समझौते की तीखी आलोचना करने के बावजूद नेतन्याहू ने हेब्रोन के 80 प्रतिशत भाग को फ़लस्तीनी प्राधिकरण के नियंत्रण में सौंपने के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए और कब्जे वाले वेस्ट बैंक से अधिक निकासी के लिए सहमति जताई.

अपने पूर्व कमांडर और लेबर लीडर एहुद बराक से हारकर नेतन्याहू ने 17 महीने पहले चुनाव की घोषणा की और 1999 में उन्होंने अपना पद खो दिया.

इसके बाद नेतन्याहू ने लिकुड नेता के रूप में पद छोड़ दिया और उनकी जगह एरियल शेरोन ने ले ली.

2001 में शेरोन के प्रधानमंत्री चुने जाने के बाद नेतन्याहू सरकार में लौटे. वे पहले विदेश मंत्री और फिर वित्त मंत्री बने. 2005 में उन्होंने कब्जे वाले ग़ज़ा पट्टी से इसराइल की वापसी के विरोध में इस्तीफा दे दिया.

नेतन्याहू को 2005 में एक मौका फिर मिला जब शेरोन ने लिकुड पार्टी से अलग होकर एक नई मध्यमार्गी पार्टी कदीमा की स्थापना की. नेतन्याहू ने फिर से लिकुड नेतृत्व जीता और मार्च 2009 में दूसरी बार प्रधानमंत्री चुने गए.

उन्होंने वेस्ट बैंक में बंदोबस्त निर्माण पर एक अभूतपूर्व 10 महीने की रोक के लिए सहमति जताई जिससे फलस्तीनियों के साथ शांति वार्ता हो पाई लेकिन 2010 के अंत में वार्ता विफल हो गई.

हालाँकि 2009 में उन्होंने सार्वजनिक रूप से इसराइल के साथ एक फ़लस्तीनी राज्य की अपनी सशर्त स्वीकृति की घोषणा की थी लेकिन बाद में उन्होंने अपने रुख को सख्त कर लिया. 2019 में एक इसराइली रेडियो स्टेशन से बातचीत करते हुए नेतन्याहू ने कहा था कि "एक फिलिस्तीनी राज्य नहीं बनाया जाएगा, जैसा कि लोग बात कर रहे हैं. ऐसा नहीं होगा".

2016 के बाद नेतन्याहू पर भ्रष्टाचार के आरोप लगने शुरू हुए. नवंबर 2019 में उन पर तीन अलग-अलग मामलों में रिश्वतखोरी, धोखाधड़ी और विश्वास भंग करने का आरोप लगाया गया.

नेतन्याहू पर आरोप है कि उन्होंने धनी व्यापारियों से उपहार स्वीकार किए और अधिक सकारात्मक प्रेस कवरेज पाने का प्रयास करने के लिए पत्रकारों और मीडिया मालिकों पर एहसान किए.

नेतन्याहू ने इन आरोपों का खंडन किया है और कहा है कि ये आरोप राजनीति से प्रेरित हैं. मई 2020 में उन पर मुकदमा चला.

आपराधिक आरोपों के बावजूद नेतन्याहू एक वर्ष से भी कम समय में तीन गतिरोध वाले आम चुनावों में कायम रहे और उन्होंने कोरोनो वायरस आपातकाल से निपटने के लिए स्थापित सरकार में राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी बेनी गैंट्ज़ के साथ सत्ता साझा करने के लिए सहमत होकर रिकॉर्ड पांचवां कार्यकाल जीता.

ये सरकार आठ महीने में ही गिर गई और दो सालों के भीतर इसराइल में चौथा चुनाव हुआ. हालांकि लिकुड पार्टी ने सबसे अधिक सीटें जीतीं लेकिन अन्य दक्षिणपंथी दलों के बीच नेतन्याहू के प्रधानमंत्री के रूप में बने रहने के विरोध का मतलब था कि वे बहुमत हासिल नहीं कर सके, जिससे उनका राजनीतिक भविष्य संदेह में पड़ गया है.

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