मोदी ने क्वाड सम्मेलन में कहा, हम सब लोकतांत्रिक मूल्यों के कारण एकजुट हैं

मोदी और बाइडन

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि क्वाड समूह के सभी देश लोकतांत्रिक मूल्यों के कारण एक दूसरे से जुड़े हुए हैं. मोदी ने कहा कि वो इस आपसी सहयोग को नए मुक़ाम पर ले जाने की कोशिश करेंगे.

मोदी ने कहा कि हमलोग एक आज़ाद, खुले हुए और समावेशी भारत-प्रशांत क्षेत्र के लिए प्रतिबद्ध हैं.

मोदी अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन, ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन, और जापान के प्रधानमंत्री योशिहिदे सुगा के साथ क्वाड देशों के पहले वर्चुअल सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे.

इस अवसर में प्रधानमंत्री ने कहा, "हमलोग अपने साझा मूल्यों को आगे बढ़ाने और एक सुरक्षित, स्थायी और समृद्ध भारत-प्रशांत क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए पहले की तुलना और ज़्यादा साथ मिलकर काम करेंगे."

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मोदी ने कहा कि वैक्सीन, जलवायु परिवर्तन और उभरती हुई टेक्नोलॉजी पर आधारित आज का हमारा एजेंडा क्वाड को वैश्विक बेहतरी के लिए एक शक्तिशाली प्लेटफ़ॉर्म बनाता है.

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इस मौक़े पर अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने कहा कि भारत-प्रशांत क्षेत्र में आपसी सहयोग के लिए क्वाड एक महत्वपूर्ण रंगभूमिक होने जा रहा है.

व्हाइट हाउस में नया राष्ट्रपति आने के बाद बाइडन के साथ यह भारतीय प्रधानमंत्री की पहली मुलाक़ात है.

सम्मेलन शुरू होने से पहले भारत के विदेश मंत्रालय की एक प्रेस रिलीज़ में कहा गया था, "नेता साझा हित के क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर चर्चा करेंगे और एक स्वतंत्र, खुले और समावेशी भारत-प्रशांत क्षेत्र को बनाए रखने की दिशा में सहयोग के व्यावहारिक क्षेत्रों पर विचारों का आदान-प्रदान करेंगे."

चीन के साथ कैसे संतुलन बनाता है भारत?

मोदी और जिनपिंग

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क्वाड सिक्योरिटी डायलॉग के चार सदस्य देश, यानी भारत, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान क्षेत्र में बढ़ते चीन के असर को रोकने के लिए एक मंच पर साथ आये हैं.

दूसरी तरफ़ भारत एक ऐसे मंच में काफ़ी सक्रिय है जिसमें भारत और चीन अहम भूमिका निभाते हैं. ये मंच है ब्रिक्स का जिसमें भारत और चीन के अलावा रूस, ब्राज़ील और दक्षिण अफ्रीका भी सदस्य हैं.

दिलचस्प बात ये है कि इस साल भारत को ब्रिक्स की अध्यक्षता मिली हुई है. और भारत साल के मध्य में या इसके तुरंत बाद ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेज़बानी करने वाला है जिसमें चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के शामिल होने की पूरी संभावना है.

अगर ऐसा हुआ तो ये साल की एक बड़ी घटना होगी क्योंकि पिछले साल भारत और चीन के बीच सीमा पर हुई झड़प के बाद दोनों देशों के आपसी रिश्ते खटाई में हैं.

सवाल ये है कि भारत एक तरफ़ चीन विरोधी मंच में शामिल है और दूसरी तरफ़ चीन के साथ मिलकर एक दूसरे मंच में भी साथ है. आख़िर भारत चीन के साथ रिश्ते में संतुलन कैसे बनाने में कामयाब होता है?

मुंबई में विदेश मामलों के थिंकटैंक गेटवे हाउस के साथ जुड़े पूर्व राजदूत राजीव भाटिया कहते हैं कि भारत दो तरह से संतुलन रखता है.

भारत क्वाड और ब्रिक्स दोनों में

ब्रिक्स सम्मेलन

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वो कहते हैं, "पहली बात तो ये है कि ब्रिक्स 15 साल पुरानी संस्था है और इसमें काफ़ी सहयोग हुआ है. मगर ये संस्था उस समय बनी थी जब चीन की दुनिया में भूमिका अच्छी थी और चीन और भारत के संबंध भी अच्छे थे. मगर पिछले तीन-चार बरसों में, और ख़ासतौर से 2020 में चीन की भूमिका भी नकारात्मक हो गयी और चीन के भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ रिश्ते भी ख़राब हो गए इसलिए क्वाड को आगे किया गया."

"क्वाड पहले भी बना था लेकिन ये चल नहीं पाया था. इसका दूसरा अवतार 2017 में सामने आया. भारत क्वाड में इसलिए शामिल है क्योंकि वो चीन को संतुलित करना चाहता है और ये तभी हो सकता है जब भारत-प्रशांत क्षेत्र की चार महाशक्तियों (भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया) आपस में सहयोग करें और चीन को बता दें कि क्षेत्र में जो भी काम करना है वो क़ानून के अंतर्गत करना होगा और अगर आप सहयोग नहीं देंगे तो फिर हमसे जो बन पड़ेगा हम करेंगे."

राजीव भाटिया कहते हैं, "ब्रिक्स में काफ़ी काम हो चुका है और ये एक स्थापित संस्था है, ये क्वाड की तुलना में एक अधिक विकसित संस्था है. अब भारत ब्रिक्स सम्मेलन की मेज़बानी करने जा रहा है तो ब्रिक्स को आगे बढ़ाना इसके भी हित में है."

यूँ तो क्वाड की स्थापना 2007 में हुई थी लेकिन इसने अभी तक कोई बड़ी कामयाबी हासिल नहीं की. साल 2017 में इसे फिर से पुनर्गठित किया गया और इस साल पहला शिखर सम्मेलन होने जा रहा है.

भारत चीन का पड़ोसी है और दोनों देश 4,500 किलोमीटर लंबी सीमा साझा करते हैं. भारत की चीन के प्रति नीति में इन बातों का ख़याल भी रखा जाता है इसलिए ब्रिक्स और क्वाड दोनों खेमों में भारत का होना हैरानी वाली बात नहीं है

भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने एक ट्वीट में सलाह दी थी कि भारत का झुकाव ब्रिक्स की तरफ़ होना चाहिए लेकिन ये सलाह भारत की विदेश नीतियों से मेल नहीं खाती.

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