बाइडन प्रशासन जिन मोर्चों पर भारत में बना सकता है दबाव

बाइडन और मोदी

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    • Author, सप्तऋषि दत्ता
    • पदनाम, बीबीसी मॉनिटरिंग
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अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन के प्रशासन के शुरुआती संदेश यह संकेत देते हैं कि भारत और अमेरिका संबंध संभवत: और प्रगाढ़ होंगे लेकिन कुछ ऐसे तथ्य हैं जिनके संदर्भ में दोनों देशों के बीच के संबंधों की मज़बूती को अभी परीक्षा से गुजरना है.

पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल के दौरान दोनों देश अपने राजनयिक और रणनीतिक संबंधों को प्रगाढ़ करने की दिशा में लगातार काम कर रहे थे. भारत को पाकिस्तान और चीन को लेकर तकरार की स्थिति में लगातार अमेरिका का साथ मिलता रहा था.

इन मुद्दों पर भारत को अब भी अमेरिका का साथ मिलने की उम्मीद है लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत में धार्मिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आज़ादी के मसले पर अमेरिका का रुख़ अलग हो सकता है. व्यापार के मसलों पर भी दोनों देशों के बीच मतभेद होने की आशंका है.

मोदी सरकार पर दबाव

आम तौर पर अमेरिका मज़बूत भारत को एक उभरते हुए चीन के ख़िलाफ़ 'काउंटर बैलेंस' की तरह देखता है. बाइडन के कार्यकाल में भी शायद ही यह रुख़ बदले क्योंकि चीन के साथ अमेरिका के रिश्ते और तल्ख़ हो चुके हैं. लेकिन इसके बावजूद बाइडन ट्रंप की तुलना में भारत पर लोकतंत्र के प्रति प्रतिबद्ध होने को लेकर संभवत: ज़ोर देंगे.

बाइडन की विदेश नीति का एक मुख्य मक़सद दुनिया भर में लोकतंत्र को बढ़ावा देना और सुरक्षा सुनिश्चित करना है. वो अपने कार्यकाल के पहले साल में ही एक वैश्विक शिखर सम्मेलन की योजना बना रहे हैं जो 'एक उदार दुनिया की भावना को बढ़ावा देने के मक़सद से आयोजित किया जाएगा.'

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र होने के नाते भारत स्वभाविक रूप से इस आयोजन का हिस्सा होगा. लेकिन कुछ आलोचक कथित तौर पर सरकार के हिंदू बहुसंख्यकवाद के एजेंडे को लेकर देश की लोकतांत्रिक परंपराओं में गिरावट देखते हैं और इसे लेकर चिंतित हैं.

अंग्रेजी अखबार द टेलीग्राफ़ में राजनीतिक विश्लेषक असीम अली कहते हैं, "कोई भी लोकतंत्र इतनी तेज़ी से गिरावट की ओर नहीं जा रहा है जैसा कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के साथ हो रहा है. "

वो लिखते हैं, "बाइडन प्रशासन के पास कई ऐसे विकल्प हैं जो भारत को वापस लोकतंत्र के रास्ते पर बिना किसी कूटनीतिक तकरार के ला सकता है."

ट्रंप और मोदी

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मोदी के कुछ आलोचक मानते हैं कि उनकी सरकार देश के लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष नींव को लगातार ध्वस्त करने में लगी हुई है. मीडिया और न्यायिक व्यवस्था में मौजूद अपने सहयोगियों की बदौलत वो ऐसा कर रहे हैं. राजनीतिक विश्लेषक प्रताप भानु मेहता इसे 'न्यायिक बर्बरता में उतरना' कहते हैं.

सरकार और उसके आलोचकों के बीच तकरार का सबसे ताज़ा मामला तीन कृषि क़ानूनों को लेकर बना हुआ है. इन क़ानूनों के ख़िलाफ़ विरोध-प्रदर्शन कर रहे किसानों को सत्तारूढ़ बीजेपी के कुछ नेता और समर्थक 'देशद्रोही' और 'आंतकवादी' कहकर ब्रैंड कर रहे हैं.

सत्तारूढ़ पार्टी का तंत्र अक्सर इस तरह के संबोधनों का इस्तेमाल अपनी आलोचना को बंद करने के लिए करता है.

भारत में मौजूद अमेरिकी दूतावास ने चार फरवरी के एक बयान में कहा है कि "हम मानते हैं कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन किसी भी लोकतंत्र की पहचान है...हम विभिन्न पार्टियों के बीच किसी भी तरह के मतभेद को बातचीत के ज़रिए सुलझाने को प्रोत्साहित करते हैं."

बाइडन

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कश्मीर मसले पर भारत के रवैये पर टेढ़ी नज़र

अगस्त 2019 में भारत प्रशासित कश्मीर में इसकी स्वायत्तता ख़त्म करने के बाद भारत सरकार ने सुरक्षा संबंधी कड़े क़दम उठाए थे. सरकार ने दूरसंचार के सभी माध्यमों को बंद कर दिया था. अभी पिछले साल ही इंटरनेट यहाँ फिर से बहाल किया गया है.

भारत सरकार के इस रवैये पर बाइडन समेत डेमोक्रेटिक पार्टी के कई नेताओं ने अपनी चिंता प्रकट की है लेकिन भारत ने इसे सकारात्मक तरीक़े से नहीं लिया.

कश्मीर को लेकर अमेरिकी सांसद प्रमिला जयपाल की आपत्तियों के बाद विदेश मंत्री सुब्रमण्यम जयशंकर ने दिसंबर 2019 में अमेरिकी सांसदों के साथ होने वाली एक बैठक को रद्द कर दिया था.

प्रमिला जयपाल अब बाइडन प्रशासन की एक अहम सदस्य हैं. वो कॉन्ग्रेसनल प्रोग्रेसिव कॉकस की अध्यक्ष भी है. इसमें वैसे डेमोक्रेट्स नेता बड़ी संख्या में हैं जो मानवाधिकार हनन के मसले पर मुखर आलोचक हैं.

असीम अली लिखते हैं, "किसी को भी बड़े पैमाने पर आलोचना की उम्मीद नहीं है. बाइडन को बहुत बारीकी से या फिर कठोर तरीके से मोदी को अपने प्रभाव में लेना है ताकि मोदी अपनी स्वेच्छा से इस पर ध्यान दें."

यह देखने वाली बात है कि आगे क्या होगा, क्योंकि अमेरिका अक्सर चीन और रूस को लोकंतात्रिक मूल्यों की अवहेलना करने को लेकर कोसता रहता है तो क्या वो भारत के साथ भी यही रुख अपनाएगा.

बाइडन और मोदी

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व्यापार संबंधी असहमतियाँ

व्यापार के क्षेत्र में भी भारत और अमेरिका के बीच मतभेद सामने आ सकते हैं. पिछले कुछ दशकों से इन दोनों ही देशों के बीच में लगातार व्यापार बढ़ा है लेकिन इसके बावजूद ज़्यादा ट्रैफिक, बौद्धिक संपदा का अधिकार और काम के वीज़ा जैसे कुछ अनसुलझे मसले बने हुए हैं.

मोदी की ओर से अर्थव्यवस्था के मामले में आत्मनिर्भर बनने का आह्वान इस फेहरिस्त को और बढ़ाने वाला है.

कई लोग मोदी सरकार की संरक्षणवादी नीति को लेकर डरे हुए हैं. इसके तहत सरकार का ज़ोर घरेलू स्तर पर उत्पादन करने और उसे घरेलू स्तर पर ही खपाने को लेकर है.

इससे विदेशी कंपनियों को भारत में व्यापार करने में कठिनाई होगी और ये भारतीय व्यापार को बाहर के देशों में धक्का पहुँचाने वाला होगा.

जनवरी में डेली मिंट ने भारत के लिए नियुक्त पूर्व अमेरिकी राजदूत केनीथ जस्टर के हवाले से लिखा था, "यह भारत की क्षमता को वैश्विक पैमाने पर एक चेन से जुड़ने को प्रभावित करेगा और इसकी वजह से भारतीय ग्राहकों को महंगाई का सामना करना पड़ेगा."

दोनों ही देशों के बीच व्यापार समझौता इस बात को लेकर अटका पड़ा है कि भारत अपना बाज़ार अमेरिकी कंपनियों के लिए व्यापक पैमाने पर खोलने के लिए तैयार नहीं है.

दूसरी तरफ़ बाइडन ने कहा है कि वो जब तक अपने देश में चीज़ें ठीक नहीं कर लेते तब तक वो कोई भी अंतरराष्ट्रीय समझौता नहीं करेंगे. विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि बाइडन प्रशासन के साथ कोई भी समझौता करना इतना आसान नहीं होगा.

विदेशी मामलों की विशेषज्ञ अपर्णा पांडे कहती हैं, "व्यापारिक समझौते से राजनयिक संबंधों पर असर पड़ेगा."

अपर्णा पांडे न्यूज़ वेबसाइट द प्रिंट में लिखती हैं, "निवेश के मामले में अमेरिकी कंपनियों को तरजीह देने की भारतीय चाहत और अमेरिका की भारत में निवेश करने की प्रतिबद्धता को प्रोत्साहित करने से चीन की चुनौती से निपटने में भारत की क्षमता बढ़ सकती है."

चीन के साथ प्रतिद्वंद्विता दोनों देशों के बीच कॉमन फै़क्टर

वीडियो कैप्शन, जो बाइडन का भारत को लेकर रुख कैसा होगा?

कथित मानवाधिकार हनन के मसले पर पिछले हफ़्ते चीन के विदेश मंत्री यांग जेची को नए अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने कूटनीतिक बयान दिया है और इसके साथ ही भारत का समर्थन किया है.

इससे यह संकेत जाता है कि अमेरिका की नई सरकार चीन को लेकर ट्रंप की कठोर नीतियों पर ही चलने वाली है और उसमें कोई फ़र्क़ नहीं आने वाला है.

अंग्रेज़ी अख़बार डेक्कन हेरल्ड में एस रागोथम लिखते हैं कि अगर मोदी भारत के लोकतंत्र में आने वाली गिरावट को रोक पाते हैं तो यह उनके लिए एक अच्छा अवसर हो सकता है.

BBC ISWOTY

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