You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
पाकिस्तान के इस क़दम से अहमदिया मुसलमानों में डर
- Author, विनीत खरे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, वॉशिंगटन
अमेरिका में अमहमदिया मुसलमानों के संगठन के प्रवक्ता हारिस जफ़र को 24 दिसंबर को एक ईमेल मिला. उन्होंने इसे जंक मेल समझकर नज़रदाज़ कर ही दिया था कि अगले दिन उन्होंने देखा कि ये ईमेल उन्हें पाकिस्तान टेलिकम्युनिकेशन अथॉरिटी (पीटीए) ने भेजा है.
ये ईमेल एक लीगल नोटिस था, जो अमेरिका में अहमदिया समुदाय की वेबसाइट ट्रूइस्लाम (trueislam.com) के बारे में था.
पीटीए ने नोटिस के मिलने के 24 घंटे के भीतर इस वेबसाइट को बंद करने का आदेश दिया था.
पीटीए ने जो ईमेल भेजा था, उसमें लिखा गया था, ''इस बात पर ध्यान दिया जाए कि अहमदिया या कादियानी ना ही अपने आप को सीधे या परोक्ष रूप से मुसलमान कह सकते हैं और ना ही अपने धर्म को इस्लाम कह सकते हैं.''
इस ईमेल में वेबसाइट बंद करने का पीटीए का आदेश न मानने पर क़ानूनी कार्रवाई और 50 करोड़ पाकिस्तानी रुपयों के जुर्माने की चेतावनी दी गई थी.
वेबसाइट संचालकों ने जवाब देते हुए कहा कि 'ना सिर्फ़ ये नोटिस क़ानूनी रूप से अवैध है बल्कि बेतुका भी है.'
पाकिस्तान का संविधान अहमदिया लोगों को मुसलमान नहीं मानता हैं.
अहमदिया आंदोलन
19वीं शताब्दी में ब्रितानी शासन काल में उत्तरी भारत में शुरू हुआ अहमदिया आंदोलन अपने आप को इस्लामी विचारधारा का अभियान मानता है और क़ुरान के आदेश का पालन करता है.
हालाँकि, रूढ़िवादी मुसलमान इसे विधर्मी मानते हैं, क्योंकि अहमदिया लोग पैगंबर मोहम्मद को इस्लाम का अंतिम पैगंबर नहीं मानते.
रूढ़िवादी मुसलमानों का मानना है कि मोहम्मद इंसानों को राह दिखाने वाले आख़िरी पैगंबर थे और ऐसा ही क़ुरान में भी वर्णित है.
पाकिस्तान में अहमदिया मुसलमान हमलों का शिकार होते रहे हैं. साल 2010 में हुए एक हमले में 93 लोग मारे गए थे.
मानवाधिकार रिपोर्ट
26 नवंबर को जारी ह्यूमन राइट्स वॉच की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ जुलाई 2020 के बाद से पाकिस्तान में अहमदिया समुदाय के लोगों को निशाना बनाकर गिए गए हमलों में पाँच लोग मारे जा चुके हैं.
रिपोर्ट में कहा गया है, "पाकिस्तानी प्रशासन लंबे समय से अहमदिया समुदाय पर ऐसे हमलों को नज़रअंदाज़ और कई बार प्रेरित करता रहा है. पाकिस्तान के क़ानून के तहत अहमदिया लोगों की धार्मिक आज़ादी सुरक्षित नहीं है."
वेबसाइट के संचालकों के लिए हैरानी की बात ये है कि उनकी इस वेबसाइट पर अमेरिका में उनकी गतिविधियों के बारे में सामग्री प्रकाशित है.
हारिस जफ़र कहते हैं, "हमारी ये वेबसाइट पाँच साल पुरानी है. ये अमेरिका में हमारी गतिविधियों पर केंद्रित है. हम पुलिस के साथ मिलकर जो काम कर रहे हैं, 9/11 की याद में जो हम कार्यक्रम करते हैं, जॉर्ज फ़्लॉयड की मौत के बाद जो नस्लीय न्याय अभियान हम चला रहे हैं. यहाँ सबकुछ हमारी अमेरिकी गतिविधियों के बारे में ही है. पाकिस्तान से जुड़ी कोई सामग्री हमारी वेबसाइट पर है ही नहीं."
"उनके इरादे दुर्भावनापर्ण हैं और वो कमज़ोर अहमदिया समुदाय की आवाज़ दबाना चाहते हैं."
अमेरिका में अहमदिया समुदाय के 20 से 25 हज़ार लोग रहे हैं, जबकि पाकिस्तान में उनकी आबादी 40 लाख तक है.
पीटीए का तर्क
वेबसाइट को पाकिस्तान में बंद किए जाने के बारे में पीटीए ने अपनी वेबसाइट पर जारी बयान में कहा है, "अंतरराष्ट्रीय मीडिया में वेबसाइट ब्लॉक किए जाने के बारे में जो ख़बरें छप रही हैं उनके संदर्भ में स्पष्टीकरण दिया जाता है कि पीटीए ने ये क़दम पाकिस्तान में लागू क़ानूनों के तहत उठाया है."
वहीं पीटीए के प्रवक्ता ख़ुर्रम मेहरान ज़ोर देकर कहते हैं कि वेबसाइट को पाकिस्तान में क़ानूनी आधार पर ही प्रतिबंधित किया गया है.
पाकिस्तान ने बीते कुछ महीनों में ऑनलाइन कंटेंट पर सख़्त रुख़ अख़्तियार किया है और कई क़दम उठाए हैं.
पिछले साल पाकिस्तान ने 'ग़ैर क़ानूनी ऑनलाइन कंटेंट को हटाने और ब्लॉक करने' से जुड़े नियम प्रकाशित किए थे.
ये नियम पाकिस्तान के प्रिवेंशन ऑफ़ इलेक्ट्रॉनिक क्राइम एक्ट 2016 की धारा 37 को लागू करने के लिए दिशानिर्देशों की तरह काम करने के मक़सद से लागू किए थे.
इन नियमों के तहत पाकिस्तानी में प्रशासन 'इस्लाम की महिमा', 'पाकिस्तान की एकता और अखंडता की सुरक्षा', 'क़ानून व्यवस्था' और 'नैतिकता और शालीनता' के नाम पर ऑनलाइन कंटेंट को ब्लॉक कर सकता है.
पाकिस्तान में डिज़िटल अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठन 'बोलो अभी' से जुड़े उसामा खिलजी ने चर्चित अख़बार डॉन में प्रकाशित एक लेख में बताया, "इन नियमों के तहत पाँच लाख से अधिक सब्सक्राइबर वाली सभी सोशल मीडिया कंपनियों के लिए पाकिस्ताान में दफ़्तर खोलना, स्थानीय प्रतिनिधि नियुक्त करना, डेटाबेस सर्वर स्थापित करना और मांगने पर संघीय जाँच एजेंसियों को डेटा उपलब्ध करवाना अनिवार्य है. डेटा पढ़े जाने लायक स्थिति में होना चाहिए."
उसामा लिखते हैं, "इससे नागरिकों की निजता का अधिकार कमज़ोर होता है और सरकार के पास लोगों पर नज़र रखने की शक्तियाँ और मज़बूत होती हैं. सरकार के पास पहले से ही वेब मॉनिटरिंग सिस्टम है, जो देश में इंटरनेट की निगरानी करता है."
हारिस जफ़र की चिंता
जफ़र कहते हैं, 'पाकिस्तान सरकार इस क़दम से पहले से ही सताए गए अल्पसंख्यक अहमदिया मुसलमान समुदाय के ख़िलाफ़ पाकिस्तान के नए साइबर क़ानूनों के इस्तेमाल का इरादा रखती है, ताकि अमेरिका स्थित अहमदी संस्थानों और लोगों को निशाना बनाया जा सके और उन पर पाकिस्तान के ईशनिंदा क़ानून लागू किए जा सकें भले ही उनका पाकिस्तान से कोई संबंध ना हो.'
बीते साल दिसंबर में पीटीए ने गूगल और विकिपीडिया को नोटिस जारी कर 'अपने प्लेटफ़ॉर्म के ज़रिए आपत्तिजनक कंटेंट के प्रसार' को रोकने के लिए कहा था.'
बयान में कहा गया था कि पीटीए को 'इस्लाम के मौजूदा ख़लीफ़ा' के बारे में खोजने पर भ्रामक नतीजे मिलने और गूगल प्ले स्टोर पर पवित्र क़ुरान के अप्रमाणित संस्करण अपलोड किए जाने के बारे में शिकायतें मिल रही हैं.
हारिस ज़फ़र का कहना है कि ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन में रहने वाले अहमदी लोगों के संगठनों को भी ऐसे नोटिस मिल रहे हैं. गूगल ने पाकिस्तान में प्ले स्टोर से उनके एप्लीकेशन भी हटा दिए हैं.
जफ़र कहते हैं कि ऐसा करके पाकिस्तान अपने क़ानूनों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लागू कर रहा है और उन वेब साइटों पर नियम लागू कर रहा है, जिनका पाकिस्तान से कोई संबंध नहीं है. उन्होंने कहा कि पाकिस्तान अमेरिकी नागरिकों पर अपने ईशनिंदा क़ानून लागू करने की धमकियाँ भी दे रहा है.
जफ़र को डर है कि उनके समुदाय के चार और ऐप भी पाकिस्तान में गूगल प्ले स्टोर से हटाए जा सकते हैं.
नेशनल रिव्यू के मुताबिक अमेरिका के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि अमेरिका अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धार्मिक आज़ादी के अधिकार में मज़बूत विश्वास रखता है और सभी लोगों को ये अधिकार मिलने चाहिए, इनमें ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म भी शामिल हैं.
एमनेस्टी इंटरनेशनल, ह्यूमन राइट्स वॉच और द इंटरनेशनल कमिशन ऑफ़ जूरिस्ट ने एक साझा बयान में कहा है, "पाकिस्तानी प्रशासन को अल्पसंख्यक अहमदिया धार्मिक समूह का उत्पीड़न रोकना चाहिए. ये उत्पीड़न अब सीमाओं को भी पार कर गया है."
जफ़र का कहना है कि उनकी संस्था अमेरिका के विदेश मंत्रालय और कांग्रेस के संपर्क में है.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)