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पाक को 'आख़िर अहमदिया नोबेल विजेता याद आए'
- Author, उपासना भट्ट
- पदनाम, बीबीसी मॉनिटरिंग
पाकिस्तानी अख़बारों ने नोबेल पुरस्कार विजेता अब्दुस सलाम को सरकार की ओर से 'देर से' ही सही सम्मान दिए जाने को सराहा है.
देश के पहले नोबेल विजेता अब्दुस सलाम को अहमदिया होने के कारण भुला दिया गया था. अहमदिया समुदाय को पाकिस्तान में मुसलमान नहीं माना जाता है.
अब्दुस सलाम को 1979 में भौतिक विज्ञान में उनके योगदान के लिए नोबेल पुरस्कार दिया गया था. उनक मौत हो चुकी है.
प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ ने सोमवार को कहा कि इस्लामाबाद के कायद-ए-आज़म यूनिवर्सिटी के नेशनल सेंटर फॉर फिज़िक्स का नाम बदल कर सलाम के नाम पर रखने को मंजूरी दे दी गई है.
इससे पहले अहमदिया समुदाय का होने के कारण सलाम का नाम स्कूलों की पाठ्य पुस्तिकाओं से हटा दिया गया था. सिर्फ इसी वजह से उनकी क़ब्र पर लिखी गई इबारतों में से 'मुस्लिम' शब्द भी मिटा दिया गया था. अब अब्दुस सलाम की क़ब्र पर लिखा है, 'पहला नोबेल पुरस्कार विजेता'.
देश के सभी नामी और प्रतिष्ठित अख़बारों ने माना है कि सरकार के इस फ़ैसले से एक बड़ी ऐतिहासिक भूल को सुधारने का मौक़ा मिला है.
प्रमुख अख़बार डॉन लिखता है, "37 साल का लंबा वक्त तो लगा, लेकिन आख़िरकार एक ऐतिहासिक ग़लती सुधार ली गई है. धार्मिक कारणों से महान वैज्ञानिक को भुला दिया गया था."
बेहद लोकप्रिय अख़बार द न्यूज़ ने लिखा, "जिस तरह से हमने अब्दुस सलाम को अपने इतिहास से बाहर निकालने की कोशिश की है, हमें उसका जवाब देना होगा. दुनिया भर में बच्चों के स्कूल की किताबें सलाम के वैज्ञानिक नियमों के अनुसार फिर से लिखी-गढ़ी जा रही हैं. और एक हम हैं, उनके साथ ऐसे पेश आ रहे हैं मानों उनका कोई वजूद ही ना हो. अब्दुस सलाम के साथ हमने जितना बुरा बर्ताव किया है उसकी भरपाई इस एक और देर से उठाए गए कदम से नहीं होगी."
कुछ अख़बार मानते हैं कि देर से ही सही अब अब्दुस सलाम को सम्मान दिए जाने के फ़ैसले की सराहना होनी चाहिए. चाहे इसके लिए धार्मिक कट्टरपंथियों का विरोध ही क्यों न झेलना पड़े.
द नेशन कहता है, "प्रधानमंत्री ने अपने इस फैसले से धार्मिक कट्टरपंथियों की नाराज़गी मोल ले ली है. आज भी अहमदिया समुदाय लोगों के निशाने पर है. उन्हें नफ़रत और भेदभाव सहना पड़ता है. प्रधानमंत्री का ये क़दम सराहनीय है. सरकार को इस समुदाय की परेशानियों को जड़ से खत्म करने के लिए और कई पहल करने की ज़रूरत है."
द एक्सप्रेस ट्रिब्यून के अनुसार, "प्रधानमंत्री ने एक बेहतरीन फ़ैसला किया है. इसके लिए उनकी जितनी तारीफ़ की जाए कम है. वैसे अब प्रतिक्रियावादी ताक़तों को बहाना मिल जाएगा. सरकार के इस क़दम से इस बात का संकेत मिल रहा है कि वह इस समुदाय को समाज में वो स्थान देने जा रही है. जो उनसे छीन लिया गया है."
डेली टाइम्स का कहना है, "सरकार ने एक विवादास्पद शख्स को सम्मान देने का साहस किया है. डर है कि देश की प्रतिक्रियावादी ताक़तें भड़क न उठें. सरकार का ये क़दम सराहनीय है. इससे उम्मीद जगती है कि अहमदिया समुदाय के लिए आने वाले दिन बेहतर होंगे. हम कुछ धर्मांध लोगों की ख़ातिर दूसरों को हाशिए पर नहीं डाल सकते, उनके अधिकार और आज़ादी को नहीं छीन सकते."
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