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साल 2021 में वर्ल्ड इकॉनमीः कौन से देश जीतेंगे, कौन हारेंगे
- Author, स्टीव शिफेरेज
- पदनाम, अर्थशास्त्री, लंदन यूनिवर्सिटी
कोरोना वायरस ने दुनिया की अर्थव्यवस्था को धराशायी कर दिया है. दूसरे विश्व युद्ध के बाद से साल 2020 में दुनिया की अर्थव्यवस्था में सबसे तेज़ गिरावट देखने को मिली है.
करोड़ों लोगों की या तो नौकरी चली गई है या फिर कमाई कम हो गई है. सरकारें अर्थव्यवस्थाओं को हो रहे नुकसान को रोकने के लिए अरबों डॉलर लगा रही हैं. हालांकि साल 2021 में आर्थिक रिकवरी अभी भी बेहद अनिश्चित है. एक शुरुआती अनुमान के मुताबिक, चीन की अर्थव्यवस्था मजबूती के साथ फिर से बढ़ने लगी है.
लेकिन दुनिया के कई अमीर देशों के लिए साल 2022 तक पूरी रिकवरी होने में शायद मुश्किलें आएं. गैर-बराबरी भी बड़े पैमाने पर बढ़ रही है. 651 अमरीकी अरबपतियों की नेटवर्थ 30 फीसदी बढ़कर 4 लाख करोड़ डॉलर पर पहुंच गई है.
दूसरी ओर, विकासशील देशों में 25 करोड़ लोगों को बेहद गरीबी का सामना करना पड़ सकता है और शायद दुनिया की आधी वर्कफोर्स को अपनी आजीविका के साधन से हाथ धोना पड़ा है. महामारी को रोकने की रफ्तार का पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं के प्रदर्शन पर गहरा असर होने वाला है.
कोरोना वायरस के नए स्ट्रेन और वैक्सींस की दौड़ के बीच जल्दी कोई जीत मिलने की कोई गारंटी नहीं है. भले ही अमीर देशों ने ज्यादातर उपलब्ध वैक्सीन हासिल कर ली हैं, लेकिन उनके लिए भी साल 2021 के अंत तक हर्ड इम्युनिटी के लिए पर्याप्त लोगों तक इसे पहुंचा पाना शायद मुमकिन नहीं होगा.
विकासशील देशों में वैक्सीन की सप्लाई आमतौर पर कम ही है, ऐसे में इन जगहों पर वायरस के और तेजी से फैलने के आसार हैं.
जीतने वाले देश
इस मामले में बड़े तौर पर जीतने वाले देशों में चीन और दक्षिण कोरिया हो सकते हैं. ये ऐसे देश हैं जो कि कोविड-19 को शुरुआत में दबाने में सफल रहे हैं. चीन की अर्थव्यवस्था साल 2021 में 8 फीसदी की रफ्तार से बढ़ सकती है.
इस लिहाज से चीन का ग्रोथ रेट महामारी से पहले दुनिया के सबसे सफल पश्चिमी देशों के मुकाबले दोगुने से भी ज्यादा रह सकता है. मोटे तौर पर निर्यात पर टिकी हुई चीन की अर्थव्यवस्था को पश्चिमी देशों में हुए लॉकडाउन का फायदा मिला है. मनोरंजन और ट्रैवल जैसी सर्विसेज के लिए भले ही पश्चिमी देशों की डिमांड में गिरावट आई है.
लेकिन, घर के सामानों और मेडिकल सप्लाई के लिए उनकी मांग में इजाफा हुआ है. साथ ही ट्रंप प्रशासन के लगाए गए ऊंचे टैरिफ के बावजूद अमरीका को चीन से होने वाला निर्यात रिकॉर्ड स्तरों पर पहुंच गया है. पूरे एशिया में भी चीन अपना आर्थिक प्रभाव बढ़ा रहा है.
पैसिफिक में एक नए फ्री ट्रेड जोन और यूरोप से लेकर अफ्रीका तक में अपने ट्रेड रूट्स के इर्दगिर्द भारी इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के बूते चीन अपना दबदबा बना रहा है. सेमीकंडक्टरों जैसे कंपोनेंट्स पर पश्चिमी देशों की सप्लाई चेन पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए चीन एडवांस टेक्नोलॉजीज पर भी निवेश कर रहा है.
अगले पांच साल में चीन दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा और वह इस मामले में अमरीका को पीछे छोड़ देगा. यह पहले के अनुमान के मुकाबले दोगुनी रफ्तार से सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा.
हारने वाले देश
अमेरिका, ब्रिटेन और कॉन्टिनेंटल यूरोप के अमीर देशों के लिए आउटलुक ज्यादा अच्छा नहीं दिख रहा है. साल 2020 की गर्मियों में मामूली रिकवरी के बाद इन देशों की अर्थव्यस्थाओं के पहिये फिर से थम गए. कोरोना की दूसरी लहर और लॉकडाउन इसकी वजह रहे हैं.
मिसाल के तौर पर अमरीका में नौकरियां और ग्रोथ पर महामारी का गहरा असर रहा है. इसकी वजह से कारोबारी और कंज्यूमर कॉन्फिडेंस नीचे आ गए. अगले साल कुछ रिकवरी होने की उम्मीद के बावजूद 2022 में इन अर्थव्यवस्थाओं के सामान्य स्थितियों के मुकाबले 5 फीसदी सिकुड़ने की आशंका है.
हालांकि, इस बात की आशंका है कि 2021 में विकासशील देश सबसे ज्यादा नुकसान उठाएंगे. इन देशों के पास पर्याप्त वैक्सीन खरीदने के लिए वित्तीय संसाधन भी नहीं हैं और इनका पब्लिक हेल्थ सिस्टम भी ऐसा नहीं है कि ये बड़ी तादाद में संक्रमित लोगों का इलाज कर पाएं.
साथ ही ये देश भारी सरकारी सब्सिडी भी नहीं दे सकते जिससे यूरोप और अमरीका की तर्ज पर बड़े पैमाने पर बेरोजगारी को रोका जा सके.
पश्चिमी देशों में मंदी के चलते इन विकासशील देशों के कच्चे माल की मांग खत्म होने और अमीर देशों से इन पर बने मोटे कर्जों में कोई मदद न मिलने के आसार के चलते ये देश लॉकडाउन को और बढ़ाने की हैसियत में भी नहीं हैं.
यहां तक कि ब्राजील, भारत और दक्षिण अफ्रीका जैसे तेजी से ग्रोथ कर रहे देशों के लिए इन हालातों से निकलना आसान नहीं होगा.
मिसाल के तौर पर, दक्षिण अफ्रीका बेहद गरीब देशों को दी जाने वाली कोवैक्स वैक्सीन के लिए योग्य नहीं है, लेकिन यह कमर्शियल मार्केट से कोई वैक्सीन खरीदने की हैसियत में भी नहीं है. ऐसा तब है जबकि यह पश्चिमी फार्मा कंपनियों के लिए इन वैक्सीन्स को अपने यहां ही बना रहा है.
गुजरे वक्त में इन देशों में एक तेजी से बढ़ता हुआ मध्यवर्ग था. अब लाखों-करोड़ों की तादाद में कामकाजी गरीब तबका अपने गांवों और शहरी स्लम्स में वापसी करने को मजबूर हो गया है क्योंकि उसके पास करने के लिए कोई काम नहीं है. इससे भारी तौर पर गरीबी और भूख पैदा हो रही है.
नया विभाजन
महामारी के आर्थिक असर समाज पर बेहद अलग-अलग तरह से दिखाई देते हैं. जो लोग फुल-टाइम काम करते हैं और जिनकी मोटी सैलरी होती है, वे मोटी बचत करने में सफल रहे हैं क्योंकि इनके खर्चों में कमी आई है.
बेहद अमीर लोगों को, खासतौर पर अमरीका में, महामारी के दौरान औंधे मुंह गिरे शेयर बाजार के बाद इसमें आई तेजी से बड़े फायदे हुए हैं. खासतौर पर एमेजॉन, नेटफ्लिक्स और जूम के साथ ऐसा हुआ है और यह ट्रेंड आगे भी जारी रह सकता है.
अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा सवाल यह है कि क्या आने वाले साल में सुरक्षित नौकरियों और मोटी पगार पाने वाले लोग खर्चों के अपने पिछले पैटर्न पर लौटेंगे. या वे भविष्य की अनिश्चितता को देखते हुए अपनी सेविंग्स को संभालकर रखेंगे.
दूसरी तरफ, जिन लोगों की नौकरियां चली गई हैं या कारोबार बैठ गए हैं उनके लिए नई नौकरी पाना मुश्किल भरा हो सकता है या अपने पिछले आमदनी के स्तर पर आना दिक्कत तलब हो सकता है. ऐसा खासतौर पर रिटेल और हॉस्पिटैलिटी जैसे कम वेतन वाले सेक्टरों में दिख सकता है जिनके पूरी तरह से रिकवर होने के आसार अभी कम ही लग रहे हैं.
इस समूह में युवा लोग, महिलाएं और नस्लीय अल्पसंख्यक आते हैं. गैर-बराबरी में इजाफा हो सकता है क्योंकि अमीर सरकारें अपनी दी जाने वाली भारी सब्सिडी को कम कर सकती हैं और कर्मचारियों, कॉन्ट्रैक्ट वर्कर्स में कटौती कर सकती हैं.
ब्रिटेन चांसलर ऋषि सुनक ने अपने नवंबर स्पेंडिंग रिव्यू में इस मंशा के साफ संकेत दिए हैं. अमेरिका में अतिरिक्त मदद पर खर्च के लिए पैदा हुई राजनीतिक रस्साकसी आख़िरी वक्त में ही जाकर खत्म हो पाई और रिपब्लिकन अब कोशिश कर सकते हैं कि बाइडन प्रशासन इस खर्च को कम से कम करे, जबकि ट्रंप के शासन के दौरान भारी खर्च किए गए थे.
यूरोप में हाल में ही एक अभूतपूर्व एग्रीमेंट पर सहमति हुई है ताकि यूरोपीय यूनियन की फंडिंग वाली मदद को महामारी से सबसे बुरी तरह प्रभावित सदस्य देशों को मुहैया कराया जा सके. लेकिन, इस पैकेज और यह किन देशों को दिया जाना चाहिए, इसे लेकर तनाव अभी जारी रहने की आशंका है.
आपसी सहयोग इस महामारी के बाद के दौर में सबसे सही तरीका हो सकता है. लेकिन, महामारी के दौरान अंतरराष्ट्रीय सहयोग कमजोर रहा है और आर्थिक तनाव ने भी फ्री ट्रेड के लिए वैश्विक प्रतिबद्धताओं को नकारा है.
संपत्ति के फिर से वितरण और ज्यादा टैक्स के जरिए होने वाली कमाई से पश्चिमी देशों में सरकारों के हाथ ज्यादा संसाधन आ सकते हैं ताकि वे महामारी के पीड़ितों की मदद कर सकें, लेकिन मौजूदा मंदी के दौर में यह राजनीतिक तौर पर मुश्किल होगा.
गुजरी महामारियों का परिणाम सामाजिक उथल-पुथल के तौर पर देखा गया है. शायद इस बार हमें कोविड-19 की वजह से पैदा होने वाली गैर-बराबरी का हल निकालने की समझ हासिल होने और एक ज्यादा बेहतर दुनिया बनाने में मदद मिलेगी.
(स्टीव शिफेरेज, यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन के सिटी पॉलिटिकल इकॉनमी रिसर्च सेंटर में ऑनरेरी रिसर्च फेलो हैं.)
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