फ्रांस में मुसलमानों पर बढ़ता दबाव, इस्लाम को राजनीतिक आंदोलन के तौर पर ख़ारिज करें

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- Author, लूसी विलियम्सन
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पेरिस
फ़्रांस की मुस्लिम परिषद इस हफ़्ते राष्ट्रपति मैक्रों से मिलेगी. वे चाहते हैं कि राष्ट्रपति इमामों के लिए नए रिपब्लिकन मूल्यों के चार्टर पर रज़ामंदी दे.
ये परिषद नौ अलग-अलग मुस्लिम संगठनों का प्रतिनिधित्व करती है. परिषद से कहा गया था कि वे अपनी किताबों में फ़्रांस के रिपब्लिकन मूल्यों को शामिल करें, इस्लाम को राजनीतिक आंदोलन के तौर पर अस्वीकार करें और विदेशी प्रभाव को प्रतिबंधित करें.
इस परिषद सीएफ़सीएम के उपाध्यक्ष शम्स-एद्दीन हाफ़िज़ ने कहा, "इस नए चार्टर को लेकर सब सहमत नहीं हैं लेकिन फ़्रांस में इस्लाम एक ऐतिहासिक मोड़ पर आ गया है और हम मुसलमानों को अपनी ज़िम्मेदारियों का सामना करना है."
उन्होंने बताया कि आठ साल पहले वह अलग तरह से सोचते थे. उन दिनों एक मुसलमान कट्टरपंथी मोहम्मद मेराह ने टूलूज़ में हमला किया था.
हाफ़िज़ ने बताया, "पूर्व राष्ट्रपति सार्कोज़ी ने मुझे सुबह पाँच बजे बात करने के लिए उठाया. मैंने उन्हें बताया कि उसका नाम मोहम्मद हो सकता है लेकिन वो है एक अपराधी. मैं उस अपराध और अपने धर्म में बीच कोई संबंध नहीं बनाना चाहता था. लेकिन आज मैं ऐसा करता हूँ. फ़्रांस के इमामों को बहुत काम करना है."
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धार्मिक स्वतंत्रता का मामला
ये परिषद फ़्रांस में इमामों का एक रजिस्टर तैयार करेगी और मान्यता प्राप्त करने के बदले इन इमामों को चार्टर पर हस्ताक्षर करने होंगे.
राष्ट्रपति मैक्रों ने अक्तूबर में मुस्लिम अथॉरिटी पर दबाव बनाने की बात कही थी. लेकिन जो देश सेक्युलरिज़म पर चलता हो, वहाँ ये मसला थोड़ा दिक्कत भरा हो सकता है.
मैक्रों राजनीतिक इस्लाम के फैलाव को रोकना चाहते हैं लेकिन धार्मिक गतिविधियों में दख़्ल देते हुए भी नहीं दिखना चाहते और ना ही किसी विशेष समुदाय को अलग-थलग करते हुए.
हाल के सालों में मुसलमानों के सभी संगठनों को फ़्रांस के समाज से जोड़ने का मुद्दा एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुका है.
फ़्रांस में लगभग 50 लाख मुसलमान रहते हैं.
फ़्रेंच इस्लाम में एक्स्पर्ट ओलीवियर रॉय कहते हैं कि इस चार्टर में दो समस्याएँ हैं. पहली तो ये कि ये सिर्फ़ इस्लाम प्रचारकों को ही टार्गेट कर रहा है जिससे एक भेदभाव झलकता है. दूसरी बात, ये धार्मिक स्वतंत्रता का मामला है.
कट्टरपंथी मुसलमानों से दुर्व्यवहार
उन्होंने कहा, "आपको देश के क़ानून मानने पड़ेंगे लेकिन आपको उसके मूल्यों को मानने की ज़रूरत नहीं होती. जैसे आप एलजीबीटी समुदाय के ख़िलाफ़ भेदभाव नहीं कर सकते लेकिन चर्च को समलैंगिक विवाह मानने की ज़रूरत नहीं होती."
फ़ैशन डिज़ाइनर ईमान को लगातार कट्टरपंथी मुसलमानों से लगातार दुर्व्यवहार झेलना पड़ता है जो कहते हैं कि उनके ब्रांड के स्कार्फ़ महिलाओं के बालों को ठीक से नहीं ढँकते.
लेकिन उनका कहना है कि इमामों को फ़्रेंच मूल्यों पर हस्ताक्षर करवाने में समस्या है क्योंकि पहले ही मुसलमानों को पूरी तरह फ़्रेंच नहीं समझा जाता.
उन्होंने कहा, "ये हमको एक अजीब स्थिति में डाल रहा है जहां हमको लोगों को दिखाना है कि हम रिपब्लिकन मूल्यों को मानते हैं, हम ख़ुद को फ़्रेंच मानते हैं लेकिन उन्हें नहीं लगता कि हम फ़्रेंच हैं."
"हमको लगता है कि हम चाहे कुछ भी कर लें, टैक्स दे, राष्ट्र की सेवा करें लेकिन कुछ भी पर्याप्त नहीं है. हमको साबित करना पड़ेगा कि हम सही मायने में फ़्रेंच हैं- सुअर का माँस खाकर, वाइन पीकर, हिजाब ना पहन कर, छोटी स्कर्ट पहन कर. और ये बहुत ग़लत है."

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'चरमपंथी टाइम बम'
पेरिस के बाहरी इलाक़े में ड्रेंसी मस्जिद के इमाम हसन कहते हैं कि सालों से चल रहे चरमपंथी हमलों के बाद सरकार को कार्रवाई करने पर मजबूर होना पड़ा है. हसन फ़िलहाल छिपे हुए हैं क्योंकि उनके रिफ़ॉर्म की वकालत करते विचारों कि वजह से उन्हें जान से मारने की धमकी मिल रही है.
"हमको थोड़ा ज़्यादा काम करना पड़ेगा ये दिखाने के लिए हम यहाँ घुल-मिल चुके हैं और हम क़ानून का सम्मान करते हैं. चरमपंथियों की वजह से हमें ये क़ीमत चुकानी पड़ रही है."
पेरिस की बड़ी मस्जिद में दीनाई चरकी अपनी क़ुरान और चटाई के साथ नमाज़ के लिए आए हैं.
वह कहते हैं, "ये युवा चरमपंथी टाइम बॉम्ब हैं. मेरे ख़याल से इमाम इन लोगों के साथ कुछ ज़्यादा ही अच्छा व्यवहार करते हैं. हम फ़्रांस के क़ानूनों का पालन करके भी इस्लाम मान सकते हैं. ये मुमकिन है. मैं तो यही करता हूँ."
लेकिन सवाल ये है कि इमामों का इन युवा मुसलमानों पर कितना प्रभाव है, ख़ासकर जब बात चरमपंथी हिंसा की आती है.
ओलीवियर रॉय कहते हैं, "इससे कुछ नहीं होगा. इसका कारण है कि आतंकवादी सलाफ़ी मस्जिदों से नहीं आते हैं. अगर आप आतंकवादियों के बारे में पढ़ेंगे तो उनमें से कोई भी सलाफ़ी शिक्षा का प्रोडक्ट नहीं है."
सलाफ़ी एक कट्टर और घोर-रूढ़िवादी आंदोलन है जो राजनीतिक इस्लाम से सम्बंधित है.

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भटके हुए युवा
ये चार्टर सरकार की एक रणनीति है विदेशी प्रभाव को रोकने की, चरमपंथियों की धमकी और हिंसा को रोकने के लिए और इन युवाओं का दिल जीतने की जिन्हें लगता है कि देश उन्हें भूल गया है.
मैक्रों ने देश के स्कूलों में अरबी भाषा को ज़्यादा पढ़ाने का और छोटे इलाक़ों में ज़्यादा निवेश की बात कही है. उन्होंने इस बार पर ज़ोर दिया है कि वे उन कट्टरपंथियों को टार्गेट कर रहे हैं जो फ़्रांस के क़ानूनों को नहीं मानते, ना कि मुस्लिम समुदाय को.
हाकिम अल-करूई इंस्टीट्यूट मॉन्टेन में फ़्रांसीसी इस्लामी मूवमेंट्स के विशेषज्ञ हैं. वह नियमित तौर पर सरकारी नीतियों पर चर्चाओं में योगदान देते हैं.
उन्होंने बताया, "मुझे रणनीति पसंद है. ये काफ़ी विस्तृत है. ये सांस्कृतिक तो है ही साथ में संगठन और उसे मिलने वाले धन के बारे में भी है."
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इस्लाम का उदारवादी स्वरूप
मगर साथ ही उनका ये भी कहना है कि सरकार को इस तरह की परियोजनाओं में ख़ुद मुसलमानों को भी शामिल करना चाहिए. उनके अनुसार, "क्योंकि वे सोशल नेटवर्क्स पर इस्लाम का ये उदारवादी स्वरूप फैलाने में काफ़ी कुछ कर सकते हैं जो कि सरकार नहीं कर सकती."
ओलिवियर रॉय कहते हैं कि जब तक आम मुसलमान इस पर राज़ी नहीं होगा इसे लागू करवाना मुश्किल होगा.
उन्होंने बताया, "मान लीजिए स्थानीय मुसलमान समुदाय सीएफ़सीएम को नज़रअंदाज़ करने का फ़ैसला करता है और अपना इमाम नियुक्त करता है तब सरकार क्या करेगी? या तो हम संविधान बदलें और धार्मिक स्वतंत्रता के विचार को छोड़ दें (वरना) सरकार इस तरह स्थानीय मुसलमान समुदायों पर अपने इमाम नहीं थोप सकती."
पेरिस के एक स्टूडियो में इमाम मेस्ताउए अपने नए कैटेलॉग के लिए तस्वीरें खिंचवा रही हैं. उन्होंने मुझे बताया कि उन्होंने अपने पूरे परिवार से 2017 में राष्ट्रपति मैक्रों को वोट दिलवाए थे.
मगर उन्हें लगता है कि तब से उन्होंने इमिग्रेशन और सुरक्षा के मसलों पर दक्षिणपंथ की ओर झुकाव देखा है.
वह कहती हैं, "मैं मैक्रों समर्थक थी. वह हमारे समुदाय में एक बड़ी उम्मीद थे मगर अब हमें लगता है कि हमें लावारिस छोड़ दिया गया है."
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