एंटोनी ब्लिंकेन: अमेरिका के नए विदेश मंत्री के लिए भारत कितना अहम होगा?

एंटोनी ब्लिंकेन

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    • Author, ज़ुबैर अहमद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

बीते अगस्त में अमेरिकी भारतीयों की एक वर्चुअल सभा का आयोजन हुआ था जिसकी अगुवाई भारत में अमेरिका के राजदूत रह चुके रिचर्ड वर्मा ने की थी. भाषण देने वालों के पैनल में शामिल तीन विशेषज्ञों में से एक थे एंटोनी ब्लिंकेन. सोमवार को जो बाइडन ने उन्हें अमेरिका का अगला विदेश मंत्री घोषित किया.

उस वर्चुअल सभा में रिचर्ड वर्मा के एक सवाल के जवाब में ब्लिंकेन ने कहा था कि चीन से निपटने के लिए अमेरिका को एक बार फिर से मज़बूत लोकतंत्र होना पड़ेगा और इसके लिए भारत को साथ लेकर चलना पड़ेगा. भारत से पार्टनरशिप पर उन्होंने काफ़ी ज़ोर दिया था.

अगस्त में हुई इस कॉफ्रेंस में ब्लिंकेन ने कहा था कि अगर जो बाइडन अमेरिका के अगले राष्ट्रपति चुने गए तो चीन नीति के लिए भारत से अहम पार्टनरशिप स्थापित करना एक प्राथमिकता होगी.

उनका कहना था, "राष्ट्रपति के रूप में जो बाइडन हमारे लोकतंत्र को नया करने, भारत जैसे हमारे क़रीबी सहयोगियों के साथ काम करने और अपने मूल्यों पर ज़ोर देने और अपनी विदेशी नीति पर फ़ोकस करेंगे ताकि चीन से मज़बूती से निबटा जा सके."V

अब जो बाइडन राष्ट्रपति चुने जा चुके हैं और ब्लिंकेन का विदेश मंत्री के रूप में चयन हो चुका है. उनके चयन को सीनेट की विदेश संबंध समिति की मंज़ूरी मिलनी बाक़ी है जो आम तौर से सिर्फ़ एक औपचारिकता भर होती है.

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एंटोनी ब्लिंकेन से भारत को कितनी उम्मीद?

भारत के राजनयिक हलक़ों में इस चयन को किस तरह से देखा जा रहा है?

मेक्सिको में भारत के पूर्व राजदूत और कनाडा में भारतीय राजनयिक रहे राजीव भाटिया ने बीबीसी से कहा, "भारत में इससे आशावादिता है, प्रसन्नता है और भारत ने राहत की सांस ली है. मगर साथ ही भारत सरकार ये तीखी नज़र से देखेगी कि अमेरिका चीन के साथ किस तरह पेश आता है.''

भारतीय विदेशी नीति पर आधारित सरकारी थिंक टैंक 'इंडियन काउंसिल ऑफ़ वर्ल्ड अफ़ेयर्स' के पूर्व डायरेक्टर जनरल राजीव भाटिया कहते हैं, "भारत के बुद्धिजीवी और राजनयिक वर्ग में काफ़ी संतोष है कि एक ऐसे व्यक्ति का चयन किया गया है जिसे हम जानते हैं. एस. जयशंकर साहब (भारत के मौजूदा विदेश मंत्री) जब विदेश सचिव थे तो वो ब्लिंकेन से मिलते थे. अमेरिका में हमारे पूर्व राजदूत ब्लिंकेन को अच्छी तरह से जानते हैं."

राजीव भाटिया का मानना है कि नए अमेरिकी विदेश मंत्री संस्थाओं के क़द्रदान और पेशेवर राजनयिक हैं.

वो कहते हैं, "वो सज्जन पेशेवर हैं और संस्थाओं के साथ मिल कर काम करने वाले हैं. इसलिए ये भी भारत को अच्छा लगता है क्योंकि पिछले चार वर्षों में ट्रंप जैसे व्यक्ति को हैंडल करने में बड़ी परेशानी हुई है.''

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'चीन नीति देखने के बाद ही कुछ साफ़ होगा'

राजीव भाटिया के अनुसार नए अमेरिकी प्रशासन की चीन नीति के बाद ही अंदाज़ा होगा कि उसके लिए भारत कितना महत्वपूर्ण होगा.

वो कहते हैं, "अमेरिका की भारत की तरफ़ नीति ज़्यादा बदलेगी नहीं लेकिन कुछ तो बदलेगी. कितनी बदलेगी और क्या बदलाव आएगा ये इस बात पर निर्भर करेगा कि अमेरिका की चीन की तरफ़ क्या रणनीति बन कर आती है. शुरू में हो सकता है कि ये सॉफ्ट रहे लेकिन बाद में अगर परिणाम अच्छे नहीं हों तो हो सकता है सख़्त हो जाए."

जो बाइडन ने हाल ही में कहा था- अमेरिका इज़ बैक. इससे उनका मतलब शायद ये था कि ट्रंप ने अमेरिका को दुनिया में लीडर की जिस पोज़िशन से हटा दिया था अब बाइडन उसे दोबारा हासिल करने की प्रक्रिया शुरू करने जा रहे हैं. ऐसा करने की पहली ज़िम्मेदारी उनके चुने गए विदेश मंत्री एंटोनी ब्लिंकेन की है.

इस मामले में ब्लेंकिन की क्षमता पर किसी को संदेह नहीं है. लंदन की वेस्टमिनिस्टर यूनिवर्सिटी में अंतरराष्ट्रीय मामलों की विश्लेषक डॉक्टर निताशा कौल का मानना है कि एंटोनी ब्लिंकेन एक स्थापित अंतरराष्ट्रीयवादी हैं.

एंटोनी ब्लिंकेन

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'कहीं और भी जा सकता है ध्यान...'

निताशा को लगता है कि नए अमेरिकी विदेश मंत्री का ध्यान भारत की बजाय पहले किसी और पर जा सकता है.

उन्होंने कहा, "अमेरिका की विदेश नीति प्राथमिकताओं में प्रमुख हो सकता है एक लीडरशिप की भूमिका में कई बहुपक्षीय समझौतों में इसकी वापसी. जलवायु परिवर्तन, सार्वजनिक स्वास्थ्य और लोकतंत्र पर व्यापक रूप से इसकी शुरुआत करना सबसे आसान होगा."

भारत ब्लिंकेन की प्राथमिकता होगा, इससे निताशा कौल पूरी तरह से इनकार भी नहीं करतीं. उनका मानना है कि भारत के लिए कोई सीधा जवाब नहीं हैं.

वो कहती हैं, ''यह स्पष्ट है कि ट्रंप प्रशासन के दौरान विरोध को बढ़ाने के विपरीत चीन को इंगेज और समायोजित करने के लिए भारत (अमेरिका के लिए) महत्वपूर्ण होगा.''

''भारतीय विश्लेषक सोच सकते हैं कि बाइडन प्रशासन ईरान, ब्रेग्ज़िट, अफ़ग़ानिस्तान आदि मामलों के साथ बहुत व्यस्त होगा और चीन से जूझने के लिए एक मज़बूत पोज़िशन से भारत के साथ पार्टनरशिप में काम करेगा. और अगर ऐसा है तो अमेरिका भारत के घरेलू मुद्दों पर कुछ नहीं बोलेगा या मानवाधिकार और कश्मीर आदि मुद्दों के बारे में नहीं बोलेगा. ऐसा बाइडन प्रशासन के शुरू में निश्चित रूप से हो सकता है."

मगर निताशा कौल ये भी कहती हैं कि गठबंधन निर्माण एक कठिन प्रक्रिया है और भारत के साथ अमेरिकी संबंधों को आगे बढ़ाने के लिए भारत से कुछ रियायत की आवश्यकता होगी और जिसे हासिल करने के लिए अमेरिका एक मज़बूत स्थिति में है.

जो बाइडन और एंटोनी ब्लिंकेन

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विदेश नीति की प्राथमिकता क्या होगी?

इस समय वॉशिंगटन में भी अमेरिका की विदेश नीतियों में संभावित बदलाव और प्राथमिकताओं पर चर्चा जारी है. इस विषय में अटकलों से लेकर गंभीर विश्लेषण सामने आ रहे हैं.

क्या विशाल राजनयिक अनुभव वाले एंटोनी ब्लिंकेन के विदेश मंत्री के पद के लिए चुने जाने से बाइडन की विदेश नीति की प्राथमिकताओं का अंदाज़ा होता है?

अमेरिका के जाने-माने राजनयिक रिचर्ड हास, जो प्रभावशाली थिंक टैंक "काउंसिल ऑन फ़ॉरेन रिलेशन्स" के अध्यक्ष भी हैं, ये तर्क देते हैं कि देश के अंदर बाइडन की पहली प्राथमिकता होगी घातक कोरोना वायरस से लड़ना और विभाजित समाज को जोड़ना और देश के बाहर उनकी पहली प्राथमिकता होगी चीन के बढ़ते असर पर अंकुश लगाना.

शिकागो यूनिवर्सिटी के पॉलिटिक्स और विदेशी नीतियों के विभाग में प्रोफ़ेसर जॉन गिन्सबर्ग ने बीबीसी से कहा कि जहाँ तक नए विदेश मंत्री के अंतर्गत अमेरिका की विदेश नीति का सवाल है, चीन, एंटोनी ब्लिंकेन की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए जिसके कारण अमेरिका को भारत की और भारत को अमेरिका की ज़रूरत पड़ेगी और साथ ही इन दोनों देशों को भारत-प्रशांत क्षेत्र के सभी देशों की.

मगर वो कहते हैं कि ये कहना मुश्किल है कि नए विदेश मंत्री अपना ध्यान पहले कहाँ देंगे.

उन्होंने कहा, "टोनी (एंटोनी ब्लिंकेन) के अनुभव पर किसी को शक नहीं है. टोनी के बहुपक्षीय दृष्टिकोण पर भी किसी को शक नहीं है. टोनी को न्यूयॉर्क टाइम्स ने हाल में ग्लोबल एलायंस का डिफेंडर कहा है, जो बिल्कुल सही है. लेकिन टोनी चीन के विशेषज्ञ नहीं हैं. वो यूरोप के कहीं अधिक क़रीब हैं."

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यूरोपीय संघ से होगी क़रीबी?

प्रोफ़ेसर गिन्सबर्ग के अनुसार रिपब्लिकन पार्टी के कुछ नेताओं और विदेश नीति के कुछ जानकारों को शक है कि जो बाइडन और एंटोनी ब्लिंकेन चीन के प्रति नरम रवैया अपनाएंगे. और अगर ऐसा हुआ और जब तक चीन के प्रति अमेरिका की नीति नरम रही तब तक भारत को प्राथमिकता नहीं भी मिल सकती है.

उधर पश्चिमी देशों की राजधानियों में भी ये उम्मीदें लगाई जा रही हैं कि ट्रंप के दौर में बिगड़ते रिश्ते को एक बार फिर से मज़बूत करने के लिए 'टोनी' यूरोपीय संघ की तरफ़ सब से पहले ध्यान देंगे.

एक तरह से ब्लिंकेन अमेरिकी कम और यूरोपीय ज़्यादा हैं. पेरिस में स्कूल की पढ़ाई करने और पलने बढ़ने वाले ब्लिंकेन के माता-पिता यूरोप के यहूदी परिवार से हैं.

उनके सौतेले पिता का ताल्लुक़ भी जर्मनूी से था. वो नाज़ी जर्मनी के सताए परिवार से थे. ब्लिंकेन फ्रेंच भाषा फ़्रांस के नागरिकों की तरह बोलते हैं और फ़ुटबॉल के शौक़िया खिलाड़ी भी रह चुके हैं. वो इंग्लैंड के मशहूर म्यूज़िकल ग्रुप बीटल्स के फ़ैन भी हैं. यूरोप में उनके दोस्त और रिश्तेदारों की एक जमात मौजूद है.

अमेरिका-चीन

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चीन अब भी है 'सिर दर्द'

तो क्या यूरोप और नेटो देशों के साथ रिश्ते दोबारा से बनाना उनकी पहली प्राथमिकता होगी?

अमेरिकी पॉलिटीको वेबसाइट के लिए पेरिस से भेजी गयी एक रिपोर्ट के मुताबिक़ टोनी ब्लिंकेन के विचारों को तीन शब्दों में बयान किया जा सकता है: यूरोपीय, बहुपक्षीय और अंतरराष्ट्रीयवादी. ब्लिंकेन की प्राथमिकताएँ भी इसी क्रम में होंगी.

प्रोफ़ेसर गिन्सबर्ग के अनुसार ईरान और इसराइल अमेरिका की विदेश नीति के पेचीदा मुद्दों में से एक है.

लेकिन वो भी ये मानते हैं कि चीन एक ऐसा मुद्दा है जो केवल राष्ट्रपति ट्रंप का 'सिर दर्द नहीं है बल्कि आज का चीन पूरे पश्चिमी देशों और लोकतांत्रिक देशों का दुश्मन है.' उनके मुताबिक़ इसलिए भी ब्लिंकेन विदेश मंत्री की हैसियत से 20 जनवरी के बाद जिन देशों का पहले दौरा करेंगे उनमें भारत पहली लिस्ट में शामिल हो सकता है.

चीन को लेकर जितना अमेरिका परेशान है उतना ही भारत भी. ख़ास तौर से पूर्वी लद्दाख में नियंत्रण रेखा पर चीनी घुसपैठ से भारत में हाल में चिंता काफ़ी बढ़ी हैं.

ट्रंप प्रशासन में भारत को दो समस्याएँ थीं- ट्रंप कुछ ही देशों को लेकर चीन से भिड़ना चाहते थे और भारत को उनकी पॉलिसी में भयानक अनिश्चितता का सामना करना पड़ता था. एंटोनी ब्लिंकेन और उनके बॉस जो बाइडन चीन के ख़िलाफ़ एक बड़े मोर्चे के पक्ष में हैं जिसमें कई देश शामिल हों.

कश्मीर

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कश्मीर और मानवाधिकार: क्या रुख़ अपनाएगा अमेरिका?

राजीव भाटिया के अनुसार भारत को भी यही पसंद है. दूसरे यह कि अब अनिश्चितता का माहौल भी ख़त्म होगा और इसलिए भारतीय विदेश मंत्रालय के पॉलिसी मेकर आराम की मुद्रा में हैं.

लेकिन डेमोक्रैटिक पार्टी के राष्ट्रपतियों के ज़माने में अक्सर कश्मीर और भारत में मानवधिकारों के उल्लंघन के मसले सामने आए हैं. जो बाइडन, उप-राष्ट्रपति कमला हैरिस और चुने गए नए विदेश मंत्री एंटोनी ब्लिंकेन, तीनों कश्मीर के मुद्दे पर भारत सरकार के पिछले साल अनुच्छेद 370 के निरस्त किए जाने पर चिंता प्रकट कर चुके हैं.

अब देखना यह है कि सत्ता में आने के बाद वो कश्मीर के मुद्दे को किस तरह से और कितनी गंभीरता से भारत सरकार के सामने रख पाते हैं.

यह भी देखना होगा कि भारत सरकार इससे कैसे निपटती है. अब तक तुर्की और मलेशिया ने कश्मीर के मुद्दे को उठाया है जिसके बाद से भारत के साथ दोनों देशों के रिश्ते खटाई में पड़ गए हैं. मोदी सरकार को मालूम है कि अमेरिका की बात कुछ और है.

लेकिन भारत की पूर्व राजनयिक और मुंबई में विदेश नीतियों वाले थिंक टैंक 'गेटवे हाउस' की अध्यक्ष नीलम देव ने बीबीसी से हाल में कहा था कि पहले भी अमेरिका के कई राष्ट्रपति कश्मीर के मुद्दे उठाते रहे हैं लेकिन इसके बावजूद दोनों देशों के रिश्ते आगे बढ़ते रहे हैं.

राजीव भाटिया कहते हैं, "पिछले 20 बरसों में और ख़ास तौर से पिछले 12 बरसों में दोनों देशों के बीच रिश्ते हमेशा प्रगति पर रहे हैं, प्रगति के साथ-साथ जो समस्याएं हैं वो भी उभरती रही हैं, उनको सुलझाने का प्रयत्न किया जाता रहा है, पिछले चार सालों में काफ़ी तकलीफ़ें हुई हैं दिल्ली के नेताओं को और दिल्ली के राजनयिकों को. उन सबको देखते हुए हम सब नए विदेश मंत्री से काफ़ी आशा लगाए हुए हैं."

वो आख़िर में कहते हैं, "निश्चित रहें, अब भारत को चिंता करने की बिलकुल ज़रुरत नहीं है."

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