अमरीकी चुनाव: भारत-पाकिस्तान के लोग मिलकर किस पार्टी के लिए कर रहे प्रचार

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- Author, विनीत खरे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, वॉशिंगटन (अमरीका) से
यह 14 दिसंबर 2012 की बात है, जब यह ख़बर आई थी कि एक बंदूकधारी व्यक्ति ने सैंडी हूक एलिमेंट्री स्कूल में कई बच्चों और वयस्कों की हत्या कर दी है. इस ख़बर ने हर किसी को सकते में डाल दिया था.
भारतीय अमरीकी शेखर नरसिम्हन उस वक़्त व्हाइट हाउस में एक पार्टी में थे, लेकिन यह ख़बर सुनकर उनका मूड बिगड़ गया था.
शेखर उस घटना को याद करते हैं, "इस मामले को ज़्यादा तवज्जो नहीं दी गई और एक तरह से दबा दिया गया था. हम सब वहीं बैठे हुए थे."
वहीं पर पहली बार उनकी मुलाक़ात एक पाकिस्तानी-अमरीकी दिलावर सैय्यद से हुई.
कैलिफ़ोर्निया के एक टेक्नॉलॉजी उद्यमी दिलावर सैय्यद के अनुसार, "हमारी भावनाएँ एक जैसी थीं. पूरे क़मरे में मुझे एक शख़्स ऐसा लगा जो दक्षिण-एशियाई अमरीकी था और जो मेरी तरह ही भावुक था."
दोनों ने इस मुलाक़ात के बाद मिलकर एएपीआई विक्ट्री फंड की शुरुआत की.
यह एक ऐसी मुहिम है जो एशियाई अमरीकियों और प्रशांत क्षेत्र के लोगों (एएपीआई) को अमरीका की राष्ट्रीय और क्षेत्रीय राजनीति में सक्रिय करने के मक़सद से शुरू की गई है.

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इस समुदाय में मतदाता के तौर पर रजिस्ट्रेशन कराने और वोट देने का प्रतिशत राष्ट्रीय औसत से कम है.
शेखर नरसिम्हन एक निवेशक बैंकर हैं और वे एएपीआई विक्ट्री फंड बोर्ड में विविधता के हिमायती हैं.
शेखर नरसिम्हन बताते हैं, "दिलावर के साथ काम करने की मुख्य वजह यह थी कि वे देश के दूसरे हिस्से से आते थे और वे उन कई लोगों के अच्छे दोस्त थे जो मेरे जानने वाले थे. इसके अलावा उनका अलग-अलग क्षेत्रों के लोगों के साथ नेटवर्क है जो मेरे पास नहीं है."
जनवरी के महीने में एएपीआई विक्ट्री फंड ने अमरीकी राष्ट्रपति पद के लिए जो बाइडन के समर्थन की घोषणा की थी.
एक अनुमान के मुताबिक़, क़रीब दो करोड़ से ज़्यादा एशियाई अमरीकी और प्रशांत क्षेत्र के लोग अमरीका में रहते हैं. यह संख्या पूरी आबादी की 6 फ़ीसदी से अधिक है.
दिलावर और शेखर का मानना है कि जो बाइडन अमरीकी राष्ट्रपति के तौर पर 'ज़्यादा बराबरी वाले और न्यायपरक अमरीका' का नेतृत्व करेंगे.
दोनों ने जो बाइडन के लिए कैंपेन किया है. उन्होंने वर्चुअल बैठकें की हैं और लोगों तक उनके पक्ष में संदेश दिये हैं.
दिलावर सैय्यद व्हाइट हाउस कमिशन में काम कर चुके हैं. वे कहते हैं, "ऐसा नहीं था कि हम भारतीय और पाकिस्तानी अमरीकी हैं और हमारी भाषा और खान-पान एक जैसा है, इसलिए हमारे बीच अच्छा तालमेल बना और हम साथ काम करने को तैयार हुए. यह इसलिए हो पाया क्योंकि हमारे मूल्य एक जैसे थे."

बाँटने वाले मुद्दे
1947 में भारत का विभाजन हुआ और पाकिस्तान अस्तित्व में आया. अब ये दोनों ही देश परमाणु हथियार संपन्न देश हैं.
दोनों ही देशों ने कई लड़ाइयाँ लड़ी हैं. जम्मू-कश्मीर के पूरे क्षेत्र पर दोनों ही देश अपना-अपना दावा करते हैं और अक्सर ही एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति करते हैं.
दोनों ही देशों के बीच क़ायम इस शत्रुता ने कई पीढ़ियों को प्रभावित किया है.
लेकिन कई भारतीय और पाकिस्तानी अमरीकी जो इतिहास की अलग-अलग व्याख्याओं को पढ़ते-सीखते बड़े हुए हैं, वो मानते हैं कि जिन मुद्दों पर मतभेद हैं वो उनके व्यक्तिगत संबंधों में किसी भी तरह की खटास नहीं पैदा करते और अपनी पसंद के किसी उम्मीदवार को समर्थन देने के लिए एक साथ हैं.

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दिलावर और शेखर विवादास्पद कश्मीर मुद्दे या फिर उप-महाद्वीप के किसी दूसरे विवादित मुद्दे को लेकर बात नहीं करते हैं.
शेखर बताते हैं, "बिल्कुल भी नहीं. हम इसे नज़रअंदाज करने की कोशिश करते हैं. हम एक-दूसरे से यह कहते हैं कि ये चुनाव घरेलू मुद्दों को लेकर है."
भारत पाकिस्तान पर भारत प्रशासित कश्मीर में अशांति फैलाने का आरोप लगाता है, तो वहीं पाकिस्तान भारत पर उनके क्षेत्र में मानवाधिकार के उल्लंघन का आरोप लगाता है.
मुख्यधारा के मीडिया का एक तबका और सोशल मीडिया आग में घी डालने का काम करते हैं.
नतीजतन पहली पीढ़ी के कई भारतीय और पाकिस्तानी अमरीकियों के लिए उनका वोट उनकी व्यक्तिगत पसंद का मसला बन चुका है. उनके मौजूदा देश के लिए कोई 'अच्छा' उम्मीदवार है या नहीं, इसके हिसाब से वो अपना फ़ैसला लेते हैं.

शेखर बताते हैं, "ये मुद्दे अमरीका में मायने नहीं रखते हैं. आपकी कुछ सोच हो सकती है, मेरी भी कुछ सोच हो सकती है, लेकिन मैं नतीजों को तो प्रभावित नहीं करता. मैं मोदी से हर रोज़ बात नहीं करता. वो हर रोज़ पाकिस्तान के प्रधानमंत्री से बात नहीं करते. ये हमारे मुद्दे नहीं हैं."
भारतीय-पाकिस्तानी अमरीकी कोई एकरूपीय समुदाय नहीं हैं. उनकी प्रतिक्रियाएँ, उनके व्यक्तिगत अनुभवों की वजह से हैं.
दिलावर बताते हैं, "मुझे लगता है कि पहली पीढ़ी के कई पाकिस्तानी अमरीकियों ने 9/11 की घटना के बाद एक अमरीकी मुसलमान की अपनी पहचान को ज़्यादा अपनाया है क्योंकि यह प्रतिक्रिया के तौर पर अपनी आस्था पर गर्व जताने जैसा है."
"ट्रंप प्रशासन के दौर में, ख़ासतौर पर मैंने अपनी आस्था को ज़्यादा जताया. मैं चाहता हूँ कि लोग जाने कि एक अमरीकी मुसलमान ऐसा दिखता है."
लेकिन अमरीका में जन्मे और पले-बढ़े बहुत से भारतीय और पाकिस्तानी अमरीकियों के लिए भारत और पाकिस्तान के बीच का विवाद कोई मायने नहीं रखता.
शेखर बताते हैं, "मेरा बेटा ख़ुद को एक भारतीय अमरीकी बताने से पहले हिन्दू अमरीकी कहना पसंद करता है, क्योंकि हिंदू धर्म भारत से ज़्यादा व्यापक है."
"वो कहता है कि 50-60 साल पहले भारत और पाकिस्तान के बीच क्या हुआ उससे मुझे क्या लेना-देना."
प्रभावित करने वाले मुद्दे
अमरीका में पाकिस्तानी अमरीकी समुदाय की आबादी कम से कम दस लाख है. वहीं भारतीय अमरीकियों की आबादी क़रीब 45 लाख के क़रीब है.
दोनों ही समुदायों में बड़ी आबादी का झुकाव डैमोक्रेट्स की तरफ है, लेकिन रिपब्लिकन इस समुदाय में अपनी पैठ बनाने की कोशिश में लगे हुए हैं.
भारत में जन्मे रियल्टर (प्रॉपर्टी का काम करनेवाले) राज कथूरिया एक पाकिस्तानी अमरीकी शहाब क़रानी को क़रीब आठ साल से जानते हैं.
उनके घर मैरीलैंड में एक-दूसरे से 20 मिनट की दूरी पर हैं.
दोनों ही रिपब्लिकन पार्टी के समर्थक हैं और ट्रंप के लिए ऑनलाइन कैम्पेनिंग करते हैं.
मेरे ज़ूम कॉल के दौरान दोनों आपस में मज़ाक करते हुए ठहाके लगाते हैं.
राज के माता-पिता भारत-पाकिस्तान विभाजन के समय पाकिस्तान से भारत चले गए थे.
राज कहते हैं, "भारत-पाकिस्तान के मुद्दों से हम प्रभावित होते हैं क्योंकि जो हम हैं, वो हैं. मगर असल में यह हम पर असर नहीं डालता, क्योंकि सभी पर स्थानीय राजनीति का असर पड़ता है."
हाल में हुए एक अध्ययन में कहा गया है कि "भारतीय अमरीकी भारत और अमरीका के बीच संबंध को चुनाव के दौरान अपनी पसंद के लिए एक निर्णायक मसला नहीं मानते हैं."
इस समुदाय के सामने अर्थव्यवस्था और हेल्थकेयर - दो सबसे अहम मुद्दे हैं.
शहाब कहते हैं, "हमारी चिंता यह है कि हम अपने टैक्स कैसे बचा सकते हैं. कैसे सरकारी कॉन्ट्रैक्ट हासिल कर सकते हैं. मैं पैसे कमाने के लिए श्रीनगर नहीं जाने वाला."
भारतीय और पाकिस्तानी अमरीकियों ने ख़ासतौर पर महामारी के दौरान आगे बढ़कर सामाजिक कार्यों में हिस्सा लिया है.
फिर चाहे वो व्यापारी हों, हेल्थ केयर प्रोफ़ेशनल हों या फिर टेक्नॉलॉजी सेक्टर में काम करने वाला कोई प्रोफ़ेशनल हो.
दोनों ही समुदाय बहुत कुछ आपस में साझा करते हैं.
मसलन वे एक जैसी भाषा बोलते हैं. उनका खान-पान मिलता-जुलता है और क्रिकेट-बॉलीवुड को लेकर उनमें दीवानगी भी एक जैसी ही है.
डलास में रहने वाले एक भारतीय अमरीकी मनु मैथ्यू का कहना है कि "मुझे अमरीका में मिले कुछ बेहद अच्छे लोग पाकिस्तान से आते हैं."
वो और उनके पाकिस्तानी अमरीकी दोस्त कामरान राव अली स्थानीय डैमोक्रेट उम्मीदवार कैंडेस वालेजुएला का समर्थन कर रहे हैं.
कामरान अली पाकिस्तान-अमरीकी पॉलिटिकल एक्शन कमिटी के राष्ट्रीय बोर्ड के अध्यक्ष हैं.
भारत-पाकिस्तान तनाव के बारे में मनु कहते हैं, "हम इस मुद्दे पर बात करने से बचते हैं क्योंकि हम जानते हैं कि हम इस पर सहमत नहीं होने वाले हैं."
"अगर मैं कामरान के साथ बैठकर लंबे वक़्त तक भी इस मसले पर बात करूँ तो मैं जानता हूँ कि हम दोनों इस पर न सहमत होंगे और न ही ज़मीन पर जो हो रहा है, उस पर कोई फ़र्क पैदा होने वाला है."
भले ही यह उम्मीद के मुताबिक़ जवाब ना हो, लेकिन इससे टकराव कम होने की उम्मीद तो है ही.
पाकिस्तान में जन्मीं सबा शबनम अपने भारतीय अमरीकी दोस्त मोहम्मद उस्मान के साथ मिलकर कैंडेस वालेजुएला के लिए कैम्पेन कर रही हैं.
वे कहती हैं, "कश्मीर एक मुद्दा तो है और इस मामले से हमारा दिल दुखा है. पर मैं उम्मीद करती हूँ कि इसका समाधान हो जाए."
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