बाबरी मस्जिद केस के फ़ैसले पर विदेशी मीडिया ने क्या कहा

बाबरी मस्जिद

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    • Author, प्रशांत चाहल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में सीबीआई की विशेष अदालत के निर्णय को कई देशों की मीडिया ने कवर किया है.

बुधवार को अदालत ने इस मामले में निर्णय सुनाते हुए बीजेपी के मार्गदर्शक मण्डल के प्रमुख नेता लाल कृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी, उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह, पूर्व केंद्रीय मंत्री उमा भारती समेत सभी 32 अभियुक्तों को बरी कर दिया था.

अदालत ने 2300 पन्ने के अपने आदेश में कहा कि 'इस मामले में किसी अभियुक्त के ख़िलाफ़ कोई ठोस सबूत नहीं मिला है' और न्यायाधीश ने कहा कि 'बाबरी मस्जिद को ढहाया जाना सुनियोजित नहीं था, ये अचानक हुआ और इसमें किसी भी अभियुक्त का हाथ नहीं था.' यह कहते हुए अदालत ने सभी अभियुक्तों को बरी कर दिया.

अदालत के इस फ़ैसले को अलग-अलग देशों के मीडिया ने अलग-अलग ढँग से कवर किया है.

वीडियो कैप्शन, बाबरी मस्जिद केस के फ़ैसले पर अंतरराष्ट्रीय मीडिया में कैसी चर्चा है?
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अमरीकी अख़बार द न्यूयॉर्क टाइम्स ने अपनी रिपोर्ट का शीर्षक रखा है, 'ऐतिहासिक बाबरी मस्जिद विध्वंस के हिन्दू नेताओं को भारतीय न्यायालय ने बरी किया.'

अख़बार लिखता है कि "भारत में, जहाँ मुसलमान ख़ुद को पीड़ित महसूस करते हैं, वहाँ 1992 में हिंदू राष्ट्रवादियों द्वारा अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराए जाने पर सांप्रदायिक हिंसा भड़क उठी थी."

अख़बार ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, "भारतीय न्यायालय ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पार्टी के सभी हाई-प्रोफ़ाइल नेताओं को (जो इस केस में अभियुक्त थे) मुक़्त कर दिया है. अदालत के इस निर्णय से देश के मुसलमानों के बीच असुरक्षा की भावना पैदा हो सकती है, जो पहले से ही पीएम मोदी द्वारा भारत को एक हिन्दू राष्ट्र में बदलने के प्रयासों से ख़तरा महसूस करते हैं."

अख़बार ने लिखा है कि "पहले इस केस में 49 मुख्य अभियुक्त थे, लेकिन केस इतना लंबा चलने की वजह से 17 अभियुक्तों की इस बीच मृत्यु हो गई."

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ब्रितानी अख़बार द गार्डियन ने भी इसे कवर किया है. अख़बार ने लिखा है, "उन 32 लोगों को अदालत ने क्लीन चिट दे दी है जिन पर 1992 में हिन्दू दंगाईयों को भड़काकर बाबरी मस्जिद गिरवाने का आरोप था."

अख़बार लिखता है कि "बाबरी मस्जिद ध्वस्त होने के बाद भारत में धार्मिक दंगे हुए जिसमें लगभग दो हज़ार लोग मारे गए थे. इनमें ज़्यादातर मुसलमान थे. इस घटना को इतिहास में भारतीय समाज के धार्मिक आधार पर विभाजन का एक निर्णायक क्षण माना गया है."

नेपाल और बांग्लादेश के अधिकांश अख़बारों और वेबसाइटों ने सीबीआई की विशेष अदालत के आदेश पर एजेंसियों के हवाले से ख़बरें प्रकाशित की हैं जिनमें आदेश से संबंधित तथ्य शामिल हैं.

बांग्लादेश के बड़े अख़बार द डेली स्टार ने अपने पाठकों के लिए इस केस से संबंधित टाइमलाइन प्रकाशित की है जिसके ज़रिये अख़बार ने यह समझाने की कोशिश की है कि बीते 28 वर्षों में इस मामले में क्या-क्या हुआ.

अख़बार ने लिखा है कि "बाबरी विध्वंस मामले में (1992) दो एफ़आईआर दर्ज की गई थीं. एक एफ़आईआर अनाम लोगों के ख़िलाफ़ थी जिन्होंने ढाँचे को गिराया. दूसरी एफ़आईआर बीजेपी नेता लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और अन्य नेताओं के ख़िलाफ़ थी जिन्होंने विध्वंस से पहले कथित भड़काऊ भाषण दिये थे."

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खाड़ी देशों की मीडिया ने भी इस केस को कवर किया है. अरब न्यूज़ ने अपनी रिपोर्ट को शीर्षक दिया है: "भारतीय अदालत मस्जिद केस के निर्णय से 'विश्वासघात' की दोषी."

अख़बार ने लिखा है कि "मुसलमानों के धार्मिक स्थल को नष्ट करने की साज़िश रचने वाले वरिष्ठ बीजेपी नेता और धार्मिक नेताओं को भारतीय अदालत ने बरी किया. मुस्लिम समुदाय अदालत के इस निर्णय को 'न्यायपालिका से मिले एक और धोखे' की तरह देख रहा है क्योंकि अधिकांश बीजेपी नेताओं और उनके सहयोगियों को बाबरी मस्जिद गिराने का दोषी ठहराया गया था."

वहीं गल्फ़ न्यूज़ के एडिटर बॉबी नक़वी ने बाबरी मस्जिद विध्वंस केस पर निर्णय आने के बाद एक विस्तृत रिपोर्ट लिखी है, जिसमें एक रिटायर्ड पुलिस अफ़सर के हवाले से उन्होंने लिखा है कि 'अगर राज्य सरकार चाहती तो बाबरी को गिरने से बचाया जा सकता था.'

इस रिपोर्ट में बॉबी नक़वी ने बहुत सा ब्यौरा दिया है कि 6 दिसंबर 1992 के दिन क्या हुआ था. साथ ही कुछ तथ्यों के ज़रिये उन्होंने यह सवाल उठाने की कोशिश की है कि 'तमाम चश्मदीदों और रिकॉर्ड मौजूद होने के बाद भी अदालत में उन्हें साबित कैसे नहीं किया जा सका.'

पाकिस्तान सरकार ने भारतीय न्यायालय के इस आदेश पर आपत्ति ज़ाहिर की है. इमरान ख़ान सरकार के कुछ नेताओं ने कहा है कि "मोदी सरकार का असर न्यायालय के आदेश पर दिखाई दिया." उन्होंने यह भी कहा कि "भारत सरकार को चाहिए कि वो अल्पसंख्यकों की सुरक्षा का ध्यान रखे और उनकी इबादतगाहों की रक्षा करे."

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पाकिस्तान के मीडिया ने भी बाबरी मस्जिद केस में अदालत के फ़ैसले को काफ़ी तवज्जो दी है. पाकिस्तानी मीडिया ने अदालत के इस फ़ैसले को 'विवादित' क़रार दिया है.

पाकिस्तान के जियो न्यूज़ ने कहा कि "भारतीय अदालत ने सभी 32 अभियुक्तों को एक विवादित निर्णय के तहत बरी कर दिया." वहीं पाकिस्तान के डॉन न्यूज़ ने लिखा, "भारतीय कोर्ट ने हिन्दू राष्ट्रवादी नेताओं को बाबरी विध्वंस केस में पर्याप्त साक्ष्य ना होने की दलील देते हुए क्लीन चिट दी."

पाकिस्तान के बड़े अख़बारों में शामिल, द एक्सप्रेस ट्रिब्यून और उर्दू भाषा के अख़बार जंग ने भी इस आदेश को काफ़ी कवरेज दी है.

द एक्सप्रेस ट्रिब्यून ने अपनी एक रिपोर्ट में दावा किया है कि "पाकिस्तानी हिन्दू बाबरी मस्जिद केस पर अदालत के निर्णय से दुखी हैं."

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अख़बार ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि "भारत में बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद पाकिस्तान में भी हिंसा हुई थी. इसे 'क्रिया की प्रतिक्रिया' बताया गया था. पाकिस्तान में मुसलमानों ने बदले की कार्रवाई करते हुए दर्जनों हिन्दू मंदिरों पर हमला कर दिया था. मुस्लिम बहुसंख्यक पाकिस्तान में क़रीब 30 हिन्दू मंदिर ऐसे थे जिन्हें निशाना बनाया गया था. इनमें से 25 मंदिर दक्षिणी प्रांत सिंध में स्थित थे जहाँ पाकिस्तान में 85 प्रतिशत हिन्दू आबादी रहती है. भारत के विपरीत, पाकिस्तान में तब से अब तक - या तो तोड़े गए अधिकांश हिन्दू मंदिर दोबारा नए सिरे से बना दिए गए हैं, या फिर पुराने मंदिरों की मरम्मत कर दी गई है."

अख़बार ने अपनी रिपोर्ट में यह भी लिखा है कि "भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव ने राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में बाबरी मस्जिद के पुनर्निर्माण का संकल्प लिया था, लेकिन भारत ऐसा नहीं कर पाया."

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