ग्वादर: ओमान और फिर पाकिस्तान के नियंत्रण वाला बंदरगाह, जिस पर भारत की थी नज़र

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- Author, फ़ारुक़ आदिल
- पदनाम, लेखक और स्तंभकार
इतिहास में केवल दो ताक़तें हुई हैं जिन्होंने ग्वादर के महत्व को पहचाना है- पहला ब्रिटेन और फिर उसके बाद पाकिस्तान.
ब्रिटेन की दिलचस्पी वाली बात तो अब पुरानी हो गई है, क्योंकि उसका संबंध 19वीं सदी के पहले हिस्से से है, जब अफ़ग़ानिस्तान ने 1839 में इस क्षेत्र पर हमला किया था. उस समय, ब्रिटिश सरकार को यह ज़रूरत महसूस हुई कि तुर्बत और ईरान के बीच के पूरे क्षेत्र के बारे में जानकारी प्राप्त करे.
और ग्वादर के ऐतिहासिक, राजनीतिक और रक्षा महत्व के बारे में भी जानकारी जुटाए. भारत के विभाजन के तुरंत बाद ही पाकिस्तान का ध्यान ग्वादर की ओर आकर्षित हो गया था. अपनी स्थापना के लगभग दो साल बाद ही इसने इस क्षेत्र को अपने नियंत्रण में लेने के गंभीर प्रयास करने शुरू कर दिए.
अरब सागर के तट पर स्थित इस क्षेत्र में पाकिस्तान की दिलचस्पी के दो कारण थे, पहला, अर्थव्यवस्था और दूसरा, एक मजबूत रक्षा कवच. इन दोनों उद्देश्यों को पूरा करने के रास्ते में ग्वादर एक बड़ी दीवार की तरह रुकावट बन कर खड़ा था.
इस दीवार को तभी तोड़ा जा सकता था, जब इस क्षेत्र को पाकिस्तान में शामिल कर लिया जाता.

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ग्वादर को पाकिस्तान में शामिल करने की क्या ज़रूरत थी?
अपनी स्थापना के बाद पाकिस्तान अपने इतिहास में शायद सबसे बड़े आर्थिक संकट का सामना कर रहा था. उसके पास सरकारी कर्मचारियों के वेतन का भुगतान करने के लिए संसाधन भी नहीं थे. तस्करी ने इस समस्या को और बढ़ा दिया था, क्योंकि इससे राष्ट्रीय संसाधन तेजी से सिकुड़ते जा रहे थे.
उस समय ग्वादर का यह पुराना और अविकसित बंदरगाह तस्करी के प्रमुख केंद्रों में से एक था. हालांकि यहां एक हवाई अड्डा भी मौजूद था, लेकिन इसके उपयोग की ज़रुरत कम ही पड़ती थी.
साल 1956 में आख़िरी बार यहां चहल-पहल उस समय देखी गई थी जब इस्माइली समुदाय के शहज़ादे अली ख़ान यहां आए थे. रक्षात्मक असुरक्षा के मुद्दे को हल करने के लिए, पाकिस्तान सरकार ने विभिन्न समीक्षाओं का संकलन किया.
उन समीक्षाओं के कुछ चुनिंदा अंश 25 सितंबर, 1958 को पाकिस्तानी अख़बार नवा-ए-वक़्त में प्रकाशित हुए थे.
रिपोर्ट के अनुसार, "पाकिस्तान ने अरब सागर के इस तट पर 'ग्वाटर' तक सड़क बनाने का इरादा किया, जो पाकिस्तानी ज़मीन का आख़िरी हिस्सा है. जिससे देश की सुरक्षा को मज़बूत करने के साथ-साथ तस्करी पर भी काबू पाया जा सके. लेकिन इस परियोजना के रास्ते में सबसे बड़ी रुकावट ग्वादर के रूप में खड़ी थी, जिस पर उसका (पाकिस्तान का) कोई नियंत्रण नहीं था."
रिपोर्ट के अनुसार, "यही कारण था कि पाकिस्तान की सरकार ने 1949 में ही ग्वादर को हासिल करने के लिए गंभीरता से ध्यान देना शुरू कर दिया था."

'सद्भावना के तहत निशुल्क' हासिल होने वाला क्षेत्र
पाकिस्तान के इन प्रयासों का समापन 1958 में हुआ जब पाकिस्तान और ओमान के बीच एक निर्णायक वार्ता हुई. वार्ता में इस क्षेत्र पर पूर्व में सत्ता पर क़ाबिज और ओमान में सैन्य ठिकाना रखने वाली ताक़त ब्रिटेन ने दोनों देशों की सहायता की.
इस तरह उस समय का अविकसित बंदरगाह पाकिस्तान का हिस्सा बन गया. पाकिस्तान में ग्वादर के विलय की घोषणा पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री फ़िरोज़ ख़ान नून ने संसद के सत्र के दौरान की थी.
उन्होंने राष्ट्र को बताया था कि ओमान के सुल्तान आला हज़रत सईद बिन तैमूर ने सद्भावना से इस क्षेत्र को पाकिस्तान को मुफ़्त में सौंप दिया है. जो कि जातीय, भाषाई, भौगोलिक और ऐतिहासिक रूप से पाकिस्तान का हिस्सा था.
इसके साथ यह भी स्पष्ट किया गया कि संविधान के अनुच्छेद 104 के तहत इस क्षेत्र को पश्चिमी पाकिस्तान में शामिल माना जाएगा. इसे एक विशेष दर्जा प्राप्त होगा लेकिन इसके निवासियों के अधिकार देश के अन्य नागरिकों के बराबर होंगे.
इस घोषणा को पूरे पाकिस्तान में एक बड़ी उपलब्धि के रूप में स्वीकार किया गया और देश के सभी हिस्सों में रोशनी कर इसकी ख़ुशी मनाई गई. ग्वादर की आबादी भी इन ख़ुशियों में शामिल थी.
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कब्ज़ा हस्तांतरण और टाइम मैगज़ीन में छपी ख़बर
ओमान से ग्वादर का औपचारिक रूप से क़ब्ज़ा लेने के लिए जब उस समय संघीय सरकार के कैबिनेट सचिव आग़ा अब्दुल हमीद कराची से समुद्री रास्ते से होते हुए ग्वादर पहुंचे, तो स्थानीय आबादी बंदरगाह पर उमड़ पड़ी.
जबकि बड़ी संख्या में नाविकों और मछुआरों ने गर्दन तक गहरे पानी में तैरते हुए क्रूज तक पहुंच कर उनका स्वागत किया. अगले दिन, ब्रिटिश काउंसिल जनरल ने आग़ा अब्दुल हमीद को वो दस्तावेज़ दिए जिनमें ग्वादर को पाकिस्तान का हिस्सा घोषित किया गया.
इसके बाद ग्वादर के प्रशासक के आवास पर पाकिस्तानी झंडा फहराया गया. इस घटना को पाकिस्तानी मीडिया में भी देश की ऐतिहासिक जीत और भारत के हार के रूप में देखा गया. इस संबंध में, रोज़नामा जंग में एक बहुत ही दिलचस्प कार्टून प्रकाशित हुआ था जिसमें दो दरवाज़े दिखाए गए थे.
उनमें से एक भारतीय तटीय क्षेत्र गोवा का था, जिसमें से भारत को बाहर निकलते हुए दिखाया गया था, जबकि पाकिस्तान को ग्वादर के दरवाज़े से प्रवेश करते हुए दिखाया गया था.
पाकिस्तान में हर्षोल्लास की यह स्थिति अगले दो सप्ताह यानी उस समय तक जारी रही जब तक विश्व प्रसिद्ध पत्रिका टाइम का 22 सितंबर, 1958 का अंक प्रकाशित नहीं हुआ.
उसमे यह कहा गया था कि पाकिस्तान को ग्वादर का क़ब्ज़ा सद्भावना के रूप में मुफ़्त में नहीं मिला, बल्कि इसके लिए एक अच्छी ख़ासी क़ीमत 4 करोड़ 20 लाख रुपये अदा किये गए हैं.
पत्रिका ने यह भी दावा किया कि पाकिस्तान की सरकार ने सुल्तान को आश्वासन दिया है कि अगर इस क्षेत्र से तेल निकाला जाता है, तो इसकी आय से कुछ हिस्सा उन्हें भी दिया जाएगा.
पाकिस्तानी मीडिया ने इस ख़बर को बहुत ही प्रमुखता से प्रकाशित किया, जिसने देश में संकट की स्थिति पैदा कर दी. सरकार पर राष्ट्र को ग़लत जानकारी देने और उसे अंधेरे में रखने का आरोप लगाया गया था.

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भारत के 'इरादे'
इस विकट स्थिति में, सरकार कुछ दिनों तक चुप रही, लेकिन 24 सितंबर, 1958 के बाद पश्चिमी पाकिस्तान के गवर्नर नवाब मुज़फ़्फ़र क़ज़लबाश ने इस मामले में एक पॉलिसी बयान के साथ अपनी चुप्पी तोड़ी.
इससे टाइम पत्रिका की रिपोर्ट के साथ शुरू हुई बहस भी ख़त्म हो गई और इस मामले में एक नया पहलु भी जुड़ गया. यानी ग्वादर को हासिल करने के संबंध में भारत की दिलचस्पी सामने आई. उनके बयान का सार यह था, "यह सच है कि पाकिस्तान ने ग्वादर को हासिल करने के लिए रक़म अदा की है."
"इसकी वजह यह थी कि ग्वादर में भारत की भी दिलचस्पी थी और भारत ने इसे हासिल करने के लिए ओमान के सुल्तान को पाकिस्तान की तुलना में दस गुना अधिक मुआवज़े की पेशकश की थी. इसके लिए भारत ने कई देशों को अपना सहयोगी बनाने की कोशिश भी की जो इस मामले में प्रभावशाली हो सकते थे."
उनके अनुसार, भारत का पक्ष यह था कि ग्वादर की अधिकांश आबादी हिंदू है, इसलिए पहला अधिकार उनका है. (इसके विपरीत, पाकिस्तान द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार, विलय के समय ग्वादर की कुल आबादी बीस हज़ार थी, जिनमें से केवल एक हज़ार हिंदू थे).
उन्होंने कहा किया कि "मुआवज़े की पेशकश करने और राजनयिक समर्थन प्राप्त करने में असफल होने के बाद, भारत ने अंतिम कोशिश यह थी कि, क्षेत्र के भविष्य का फ़ैसला जनमत संग्रह से किया जाये. इसके लिए, भारत सरकार ने प्रधानमंत्री फ़िरोज ख़ान नून को एक पत्र भी लिखा और मांग की कि, भारतीय अधिकारियों को भी जनमत संग्रह में शामिल होने की अनुमति दी जाए."
नवाब क़ज़लबाश के दावे के अनुसार, "पाकिस्तान की सरकार ने मांग को अस्वीकार कर के भारत की यह कोशिश भी नाकाम कर दी."
ग्वादर में भारत की दिलचस्पी कब और कैसे हुई?
इसका इतिहास बहुत ही रोचक है. इस कहानी की शुरुआत जनवरी 1947 से होती है.
ओमान के सुल्तान ने यह महसूस किया कि उनके देश में ग्वादर एक सुदूर और शुष्क इलाक़ा है, जहां व्यवस्था बनाए रखना उसकी सरकार के लिए मुश्किलें खड़ी कर रहा है.
इसके लिए, फ़ारस की खाड़ी के रेजीडेंसी बहरीन ने भारत सरकार के सचिव को एक पत्र लिखा, जिसमें सुल्तान के इरादे के बारे में सूचना दी गई थी कि सुल्तान क़लात रियासत में मौजूद ग्वादर को बेचना चाहते हैं.
चूंकि बहुत पहले से ही ब्रिटिश सरकार की इस क्षेत्र में रुचि थी इसलिए उसने इस प्रस्ताव पर विचार किया. लेकिन उस समय द्वितीय विश्व युद्ध उनके लिए सरदर्द बना हुआ था जिससे पहले निपटना ज़रूरी था. इसलिए, युद्ध के ख़त्म होने तक मामले को स्थगित करने का निर्णय लिया गया.
ग्वादर ओमान का हिस्सा कैसे बना?
ग्वादर की ऐतिहासिक और भौगोलिक स्थिति के बारे में पाकिस्तान सरकार की रिपोर्ट के जो अंश प्रकाशित हुए उसमें सबसे ज़्यादा ज़ोर इस बात पर दिया गया था कि क़लात रियासत कभी भी इस क्षेत्र की मालिक नहीं रही.
इसका प्रमाण कई ऐतिहासिक दस्तावेज़ों में है और 19वीं सदी में ब्रिटिश पर्यटक मेजर जनरल सर चार्ल्स मैट कीफ़े मैक ग्रेगोर की पुस्तक 'वांडरिंग इन बलूचिस्तान' में पेश किया गया है. इस पुस्तक के अनुसार, यह क्षेत्र सिकंदर-ए-आज़म के समय से मकरान का हिस्सा रहा है.

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बलोच मुखियाओं के आपसी झगड़े और तनाव के परिणामस्वरूप, मकरान के कचकी मुखियाओं ने क़लात रियासत के साथ एक समझौते के तहत उनका प्रभुत्व स्वीकार किया था. जिसमें यह सहमति हुई थी कि वो उनके आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे.
यह इस क्षेत्र में ओमान के शहज़ादे सईद सुल्तान के आने से पहले की बात है. शहज़दा सईद उत्तराधिकार की लड़ाई में विफल हुए.
विफलता के बाद वह साल 1783 में क्वाडा के रास्ते से मकरान के मिरवारी क़बीले के एक गांव 'जक' में पहुंचे. क़बीले के प्रमुख, दाद करीम मिरवारी ने उनकी मुलाक़ात ख़ान ऑफ़ क़लात से कराई.
शहज़ादा सईद चाहते थे कि सिंहासन की इस लड़ाई में उन्हें सैन्य समर्थन मिले. लेकिन स्थानीय प्रमुखों ने ओमान के गृहयुद्ध का हिस्सा बनने की बजाय, ग्वादर क्षेत्र को इस शर्त पर दे दिया कि अगर उनकी सत्ता बहाल हो गई तो वह ग्वादर को गचकी प्रमुखों को सौंप देंगे.
इसकी पुष्टि बलूचिस्तान गजेटियर से भी होती है. गज़ेटियर के सातवें खंड में लिखा है, "ग्वादर बा आरियत अमानत वादा" यानी ग्वादर को एक अमानत (विश्वास) के रूप में ओमान के शहज़ादे को सौंपा गया था.
ग्वादर को हासिल करने के लिए पाकिस्तान द्वारा प्रस्तुत दस्तावेज़ों में एक अफ़ग़ान हाजी अब्दुल ग़नी की एक रिपोर्ट का संदर्भ भी शामिल है.
इस मामले में हाजी अब्दुल ग़नी की दिलचस्पी वास्तव में ग्वादर में ब्रिटिश सरकार की दिलचस्पी दर्शाती है.
जब अफ़ग़ानिस्तान ने 1939 में इस क्षेत्र पर हमला किया, तो क़लात के ब्रिटिश रेजिडेंट जनरल ने अफ़ग़ान नागरिक की मदद से इस रिपोर्ट को संकलित कराई. 1939 में एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल की तरफ़ से प्रकाशित होने वाली इस रिपोर्ट से भी यह पता चलता है कि यह क्षेत्र ऐतिहासिक रूप से मकरान का हिस्सा था और यह कचकी बलोच के स्वामित्व में था.
रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्वादर और चाबहार (रिपोर्ट में चाबहार नहीं लिखा गया है) दो बलोच क्षेत्र हैं और मकरान का हिस्सा हैं. यह ऐसा समुद्री क्षेत्र है जिसके माध्यम से क्षेत्र के स्ट्रेटिजिक मामलों और व्यापार पर फ़ारस की खाड़ी पर नियंत्रण के माध्यम से नज़र रखी जा सकती है. जैसे कि यही वह असाधारण दस्तावेज़ है जिसके माध्यम से ब्रिटिश सरकार ने ग्वादर की उपयोगिता को समझा था.
सबूतों से यह स्पष्ट होता है कि पाकिस्तान ग्वादर के स्वामित्व के लिए इन ऐतिहासिक और भौगोलिक संदर्भों को संकलित करने पर इस लिए मजबूर हुआ था. क्योंकि जनवरी 1947 में ब्रिटिश सरकार के माध्यम से ओमान के सुल्तान द्वारा इसकी बिक्री की पेशकश की गई थी. जिसके कारण भारत ने इसमें दिलचस्पी लेनी शुरू कर दी और वो ग्वादर को हासिल करने के प्रयासों में लग गया.

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ग्वादर में भारतीय मुद्रा और तस्करी का सामान
ग्वादर में भारत की रुचि के दो प्रमुख कारण एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल की रिपोर्ट से स्पष्ट होते हैं.
उस समय के समाचार पत्रों के अनुसार एक और भी महत्वपूर्ण कारण था कि उस समय यह क्षेत्र तस्करों के स्वर्ग के रूप में जाना जाता था.
इन रिपोर्टों के अनुसार, तस्करों का एक नेटवर्क कराची से ग्वादर तक सक्रीय था. ये पाकिस्तान से सोना, खाद्य पदार्थों और दूसरे क़ीमती सामानों की तस्करी विदेशों में करता था.
अख़बारों की रिपोर्ट के मुताबिक़, ग्वादर के पाकिस्तान में शामिल होने के बाद ये गतिविधियां और भी तेज़ हो गईं. तस्करी में वृद्धि की ख़बरें उस समय सामने आईं जब ग्वादर के पाकिस्तान में शामिल होने के बाद, पाकिस्तान के पर्यटक और विदेशी सामान को सस्ते दामों में ख़रीदने के शौक़ीन लोगों का ग्वादर आना-जाना बढ़ गया.
उस समय कराची से ग्वादर तक की यात्रा समुद्र के रास्ते होती थी जिसकी कीमत 23 रुपये थी. लेकिन उन दिनों यह बढ़कर 300 रुपये तक पहुंच गया था.
इन पर्यटकों ने ग्वादर की स्थिति का वर्णन कुछ इस प्रकार किया, "पाकिस्तान में ग्वादर के शामिल होने के समय, वहां के बाज़ार मूल्यवान वस्तुओं और विदेशी कपड़ों से भरे हुए थे. फ़िर बाज़ार पर एकाधिकार रखने वाले हिंदू व्यापारियों के कारण यह सामान रातोंरात ग़ायब होने लगा."
पर्यटकों ने यह भी बताया कि ओमान का हिस्सा होने के बावजूद, वहां भारतीय मुद्रा में लेन-देन होता था.
पर्यटकों के इन बयानों की पुष्टि पाकिस्तान में ग्वादर के शामिल होने के बाद व्यापार और आयात-निर्यात के लिए जल्दबाजी में उठाए गए कदमों से भी होती है.
शुरुआत में, सरकार ने घोषणा की थी कि सभी प्रकार के व्यापार हमेशा की तरह जारी रहेंगे, लेकिन जब सोने, मुद्रा और अन्य सामानों की तस्करी शुरू हो गई, तो सरकार को मजबूरी में कई तरह के प्रतिबंध लगाने पड़े.
हालांकि, इसी तरह की गतिविधियां जारी रही होंगी, जिनकी रोकथाम के लिए तटीय क्षेत्रों के चारों ओर एक राजमार्ग के निर्माण की आवश्यकता महसूस की गई थी.
लेकिन इसके रास्ते में ओमान एक रुकावट बना हुआ था, जिसका ग्वादर पर नियंत्रण था. ग्वादर के पाकिस्तान में शामिल होने से यह रुकावट भी दूर हो गई.

ग्वादर में हवाई अड्डे और बंदरगाह की भविष्यवाणी
टाइम पत्रिका ने अपने सितंबर 1958 के अंक में दो बातें कहीं, "पहला यह कि ग्वादर के लिए राशि का भुगतान किया गया था, और दूसरा यह कि पाकिस्तान इस जगह पर एक बड़ा एयरपोर्ट और बंदरगाह बनाने का इरादा रखता है."
यह भविष्यवाणी लगभग आधी सदी के बाद पूरी होने वाली है, जिसे आने वाले समय की कुंजी माना जा रहा है.
शायद इसी कारण से, एक भारतीय लेखक, कार्तिक नांबी ने दावा किया है कि ओमान के सुल्तान ने भारत के विभाजन के बाद भी ग्वादर की बिक्री के लिए भारत से संपर्क किया था. लेकिन भारत सरकार ने इस प्रस्ताव पर ध्यान नहीं दिया. उसके बाद सुल्तान ने पाकिस्तान से संपर्क कर लिया.
इस प्रकार भारतीय नेतृत्व की अदूरदर्शिता ने भारत के भाग्य के सितारे को बुलंद करने का अवसर गंवा दिया और इतिहास और भूगोल दोनों का धारा बदल गया.
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