पाकिस्तान को उत्तर कोरिया और ईरान की तरह क्या FATF की ब्लैकलिस्ट में शामिल कर दिया जाएगा?

पाकिस्तान FATF की ब्लैकलिस्ट से बचने के लिए क्या कर रहा है?

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    • Author, सच्चल अहमद
    • पदनाम, बीबीसी मॉनिटरिंग

बीते कुछ समय से पाकिस्तान एफ़एटीएफ़ की ग्रे लिस्ट से अपने नाम को हटाने की जद्दोजहद में लगा हुआ है.

दुनिया भर की वित्तीय अनियमितताओं, मनी लॉन्ड्रिंग और चरमपंथ के वित्तपोषण पर नज़र रखने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था फाइनेंशियल एक्शन टास्क फ़ोर्स ने जून 2018 में पाकिस्तान को ग्रे लिस्ट में डाल दिया था. आम तौर पर इस लिस्ट में आने वाले देशों की निगरानी बढ़ा दी जाती है.

पाकिस्तान को मनी लॉन्ड्रिंग और टेरर फंडिंग के ख़िलाफ जारी लड़ाई को लेकर क़ानून और नियामक उपायों को लागू करने के लिए अक्तूबर 2019 तक का समय दिया गया जिसे बाद में चार महीने के लिए और बढ़ाया गया.

फ़रवरी 2020 में यह मानते हुए कि पाकिस्तान ने 27 बिंदुओं वाले एक्शन प्लान में से 14 पर ही कार्रवाई की है, एफ़एटीएफ़ ने इन कार्रवाइयों को लेकर कई क्षेत्रों में कमी को देखते हुए पाकिस्तान को ग्रे लिस्ट में बरकरार रखा.

अब 14-21 सितंबर के बीच एफ़एटीएफ़ के अधिकारियों की बैठक होने वाली है जहां एक बार फिर पाकिस्तान के बाक़ी 13 बिंदुओं पर की गई कार्रवाइयों की समीक्षा की जाएगी.

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उत्तर कोरिया और रान की तरह

इसके बाद अक्तूबर में प्लेनरी की बैठक होगी जहां यह तय किया जाएगा कि पाकिस्तान ग्रे लिस्ट में बरकरार रहेगा या व्हाइट लिस्ट में जाएगा या फिर उत्तर कोरिया और ईरान की तरह उसे ब्लैक लिस्ट किया जाएगा.

सितंबर में होने वाली बैठक पाकिस्तान की सरकार ने कहा है कि उसने वर्तमान एंटी मनी लॉन्ड्रिंग और चरमपंथ के वित्तपोषण क़ानून में संशोधन के लिए आठ बिल तैयार किए हैं.

इसने 24 सरकारी और विपक्षी सांसदों वाली एक संयुक्त समिति गठित किया गया ताकि इन बिलों पर सर्वसम्मति बनाई जा सके, वहां सरकार को संसद के ऊपरी सदन में बहुमत नहीं है लिहाजा वो ऐसा करने के लिए बाध्य हुई.

तब से, संसद ने विपक्ष के समर्थन से अब तक आठ में से छह बिल पारित कर दिए हैं. हालांकि इस बहुत ख़ास सर्वसम्मति के पीछे भी सैन्य प्रभाव माना जा रहा है.

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गिरफ़्तारी और दोषी साबित होना

एफ़एटीएफ़ एक्शन प्लान ने पाकिस्तान से ख़ास तौर पर यह कहा है कि वो प्रतिबंधित संगठनों और अभियुक्तों को क़ानून के तहत कोर्ट से सज़ा दिलवा कर और उनकी प्रॉपर्टी को जब्त करके दिखाए.

पहले की ही तरह पाकिस्तान सरकार ने एफ़एटीएफ़ की बैठक से पहले कई हाई प्रोफ़ाइल लोगों को सज़ा दिलवाने और प्रतिबंधित लगाने का काम किया है.

अगस्त में, पाकिस्तान ने विभिन्न चरमपंथ समूहों से जुड़े 88 लोगों के ख़िलाफ़ प्रतिबंधों की घोषणा की जिसमें इस्लामिक स्टेट, अल क़ायदा और तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान शामिल हैं.

इसी तरह, फ़रवरी में एफ़एटीएफ़ की बैठक से पहले भारत विरोधी लश्कर-ए-तैयबा के संस्थापक और उसकी चैरिटी विंग जमात-उद-दावा के संस्थापक हाफिज़ सईद को दोषी करार देने की तरही ही 27 अगस्त को उनके तीन सहयोगियों को आतंकवाद के वित्तपोषण के आरोप में पाकिस्तान की कोर्ट में दोषी पाया गया है.

हालांकि, (सईद समेत) चमरपंथियों को गिरफ़्तार करने से लेकर छोड़ने तक के इतिहास को देखते हुए इस पर नज़र बनी रहेगी कि एफ़एटीएफ़ के सामने इसे किस तरह देखा जाता है.

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कूटनीति

एक्शन प्लान के अनुपालन के अलावा पाकिस्तान इस मामले में अपने राजनयिक संबंधों से मदद मिलने की उम्मीद भी कर रहा है. पहले भी तुर्की, मलेशिया और चीन का समर्थन पाकिस्तान को ब्लैक लिस्ट से दूर रखने में महत्वपूर्ण रहा है.

इस बीच चीन भी चरमपंथी संगठनों के ख़िलाफ़ उसके प्रयासों को बढ़ाने और एफ़एटीएफ़ की मांगों को पूरा करने के लिए पाकिस्तान पर जोर दे रहा है.

भारतीय मीडिया में आई ख़बरों के मुताबिक अपनी हालिया बीजिंग दौरे में पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूह क़ुरैशी ने प्लेनरी की आगामी बैठक को लेकर चीन से समर्थन मांगा है.

पाकिस्तान यह भी उम्मीद कर रहा है कि अफ़ग़ानिस्तान की शांति प्रक्रिया को सुविधाजनक बनाने में उसकी भूमिका भी एफ़एटीएफ़ की बैठक में अमरीका के रुख को सकारात्मक रूप से प्रभावित करेगा.

माना जा रहा है कि अमरीका ने सऊदी अरब को पाकिस्तान के ख़िलाफ़ उसके निर्णायक वोट को वापस लेने के लिए मना लिया है जिससे पाकिस्तान 2018 की ग्रे लिस्ट से बाहर हो सके.

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अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की अफ़ग़ानिस्तान से अमरीकी सेना को हटाने की योजना में महत्पूर्ण बातचीत के लिए तालिबान को मनाने में भी पाकिस्तान लगातार महत्वपूर्ण भूमिका निभाता आ रहा है.

अगस्त में पाकिस्तान ने अफ़ग़ान तालिबान के ख़िलाफ़ संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रतिबंधों को लागू करने का आदेश दिया है, कोई संदेह नहीं है कि इसका कारण भी एफ़एटीएफ़ की होने वाली बैठक ही है.

इसने शांति प्रक्रिया की दिशा में अगले चरण के रूप में बेहद महत्वपूर्ण माने जा रहे एक उच्च स्तरीय तालिबान प्रतिनिधिमंडल की मेजबानी भी की है.

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चुनौतियां

हालांकि कुछ ऐसी भी चीज़ें हैं जो पाकिस्तान की इन सभी कोशिशों के आड़े आ रहे हैं.

ख़ास कर भारत की शिकायतें कि पाकिस्तान ने अभी तक अपने देश से चलने वाले चरमपंथी समूहों को समर्थन देना बंद नहीं किया है.

अगस्त में भारत में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने एक 13,500 पेज की रिपोर्ट दर्ज़ की है जिसमें पाकिस्तान स्थित चरमपंथी समूह जैश-ए-मोहम्मद के प्रमुख मौलान मसूद अज़हर समेत उन 19 लोगों के नाम थे जिन्होंने तथाकथित रूप से 2019 में भारत प्रशासित कश्मीर के पुलवामा में सीआरपीएफ के दस्ते पर हमला किया था और जिसमें 40 सुरक्षाकर्मी मारे गए थे. भारतीय अधिकारियों का दावा है कि इस रिपोर्ट में पुलवामा हमले में पाकिस्तान की भूमिका को लेकर अकाट्य सबूत हैं.

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स्थानीय मीडिया में क्या चल रहा है?

पाकिस्तान की मीडिया एफ़एटीएफ़ के फ़ैसलों और उसकी मांग पर सरकार के प्रयासों को बारीकी से कवर कर रहा है.

मीडिया में सरकार के प्रयासों की सराहना की गई है. 1 अगस्त को अग्रेज़ी अख़बार पाकिस्तान टुडे की संपादकीय में लिखा गया, "एफ़एटीएफ़ के आगे अगर पाकिस्तान ब्लैकलिस्ट होने से बच जाता है तो भी जिस तरह से अब तक सरकार ने मनी लॉन्ड्रिंग और वित्तपोषण को रोकने की गति बनाई है उसे कम नहीं किया जाना चाहिए."

इसी तरह, दुनिया न्यूज़ के टॉक शो "दुनिया कामरान ख़ान के साथ" में सुरक्षा मामलों के विशेषज्ञ अमीर राना ने कहा कि "13 पॉइंट को लेकर पाकिस्तान की रिपोर्ट काफी संतोषजनक है, जिसकी समीक्षा अक्तूबर में होनी है" और उन्होंने भविष्यवाणी की कि पाकिस्तान को ग्रे लिस्ट से हटा दिया जाएगा.

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हालांकि अधिकांश मीडिया कवरेज में सरकार और विपक्ष के बीच टकराव पर ध्यान केंद्रित किया गया.

विपक्ष बार बार सरकार पर 24 सदस्यीय कमेटी में किए गए समझौतों का उल्लंघन करने का आरोप लगा रही है जबकि सरकार का कहना है कि विपक्ष अपनी जवाबदेही पर रियायतों के लिए एफ़एटीएफ़ को लेकर बनाए जा रहे क़ानूनों में समर्थन दे रहा है.

वहीं विपक्षी पार्टियों का दावा है कि सरकार एफ़एटीएफ़ को लेकर हो रहे संबंधित क़ानूनी संशोधनों की आड़ में निरंकुश शक्तियां लेने की कोशिश कर रही है. इस तर्क पर मीडिया में भी खासी चर्चा हुई.

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डॉन ने लिखा, "एफ़एटीएफ़ से जुड़े क़ानूनों को बनाने की आड़ में सरकार ने चुपके से एक 'आर्थिक आतंकवाद' बिल को लाने का प्रयास किया जो बहुत ही अनैतिक और ख़तरनाक है. प्रस्तावित क़ानून में ख़ुफ़िया एजेंसियों की बनाई समिति की सिफारिश पर किसी भी नागरिक को 180 दिनों के लिए हिरासत में रखने का प्रावधान है. सौभाग्य से विपक्ष ने इसे गिरा दिया."

वहीं राष्ट्रवादी उर्दू दैनिक नवा-ए-वक़्त ने विपक्ष को सरकार से समझौता करने का आग्रह करते हुए लिखा, "इस बिल की आज पाकिस्तान को ज़रूरत है क्योंकि कथित रूप से एफ़एटीएफ़ में इसकी ज़रूरत है. यह बेहद ही बेतुका तर्क है क्योंकि पाकिस्तान अपनी गतिविधियों की रिपोर्ट एफ़एटीएफ़ को पहले ही सौंप चुका है.

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