कोरोना: अमरीका-ब्राज़ील नहीं, मृत्यु दर के मामले में यह देश है नंबर वन

कोरोना से बुरी तरह प्रभावित देशों की सूची में अमरीका, ब्राज़ील, भारत और मेक्सिको हैं. लेकिन इसके बावजूद कोविड-19 से मरने वालों की दर जिस देश में सबसे अधिक है वो न तो अमरीका है, न ब्राज़ील और न ही भारत.

दक्षिण अमरीका के पूर्वी समुद्र तट से सटा पेरू वो देश है जहां कोविड-19 के कारण मृत्यु दर दुनिया में सबसे अधिक है.

जॉन्स हॉप्किन्स यूनिवर्सिटी के अनुसार, यहां 1 लाख लोग बीमार पड़े हैं तो उसमें से लगभग 89 लोगों की मौत हो जाती है.

लातिन अमरीकी देशों के बीच कोरोना वायरस संक्रमण का पहला मामला ब्राज़ील में दर्ज किया गया. ब्राज़ील कोरोना वायरस से बुरी तरह प्रभावित देशों की सूची में दूसरे स्थान पर है जहां अब तक ये वायरस क़रीब एक लाख बीस हज़ार लोगों की जान ले चुका है.

वहीं कोरोना से सबसे बुरी तरह से प्रभावित अमरीका में मौतों का आँकड़ा कुछ सप्ताह में दो लाख हो जाएगा.

सबसे पहले लगाई थी पाबंदी

महामारी के शुरुआती दौर में लातिन अमरीकी देशों में पेरू वो देश था जिसने वायरस को फैलने से रोकने के लिए कड़ी पाबंदियां लगाई थीं. लॉकडाउन से लगे झटके से उबरने के लिए राहत पैकेज देने वाले देशों में भी पेरू ही सबसे पहला देश था.

पेरू में अब तक कोरोना के कारण 28,471 लोगों की मौत हुई है और जॉन्स हॉप्किन्स के डैशबोर्ड के अनुसार इस वायरस से मरने वाले देशों में पेरू नौवें स्थान पर है.

पिछले सप्ताह यहां कोरोना से होने वाली मौतों में थोड़ी कमी आई है. बुधवार को यहां के स्वास्थ्य मंत्रालय ने 123 मौतों की पुष्टि की थी लेकिन वहीं गुरुवार को मौतों का आँकड़ा 153 हो गया.

लेकिन क्या वजह है कि 3 करोड़ 25 लाख की आबादी (साल 2019) वाले इस देश में कोरोना से ज़्यादा मौतें हो रही हैं. जानिए इसके पीछे क्या हैं पांच कारण -

पहला कारण- बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था

सायटानो हेरेडिया यूनिवर्सिटी ऑफ़ लीमा में प्रोफ़ेसर और इंस्टिट्यूट ऑफ़ ट्रॉपिकल मेडिसिन ने पूर्व निदेशक डॉक्टर एडुआर्डो गोटुज़ो कहते हैं कि स्वास्थ्य व्यवस्था को दुरुस्त करने में देश ने कम निवेश किया है.

वो बताते हैं कि यहां न केवल अस्पतालों की कमी है बल्कि आईसीयू में बेड नहीं है, स्वास्थ्यकर्मियों का वेतन कम है और केवल एक ही लैब है जो मॉलिक्यूलर टेस्ट करने में सक्षम है.

यहां स्वास्थ्य क्षेत्र में निवेश बीते दो दशक में थोड़ा बढ़ा है. विश्व बैंक के एक आकलन के अनुसार साल 2017 तक देश की कुल जीडीपी का 4.9 फ़ीसदी तक स्वास्थ्य में निवेश होने लगा.

मैक्रोकंसल्ट कंसल्टेन्सी के अर्थशास्त्री एल्मर क्यूबा कहते हैं, "फिर भी विकास दर की तुलना में यहां स्वास्थ्य पर प्रति व्यक्ति खर्च काफ़ी कम है."

महामारी के शुरुआती दौर में यहां अस्तपालों में केवल 3000 बेड्स और आईसीयू में 100 बेड्स की व्यवस्था थी. राष्ट्रपति मार्टिन विज़कारा के अनुसार जून के आख़िर तक यहां अस्तपालों में बेड्स की संख्या बढ़ा कर 18,000 और आईसीयू में बेड्स की संख्या बढ़ा कर 1,660 की गई है.

डॉक्टर एडुआर्डो गोटुज़ो कहते हैं, "लेकिन ये महामारी आपकी तैयारियों से एक क़दम आगे रहती है."

सायटानो हेरेडिया यूनिवर्सिटी में पब्लिक हेल्थ के एक्सपर्ट डॉक्टर अर्नेस्टो गॉज़र कहते हैं, "स्वास्थ्य व्यवस्था में हुए सुधार का असर मृत्यु दर कम होने पर हो रहा है."

हालांकि वो मानते हैं कि मृत्य दर अधिक होने की सिर्फ़ यही एक वजह नहीं हो सकती.

दूसरा कारण- प्रीवेन्शन पर कम ध्यान

डॉक्टर गॉज़र मानते हैं कि देश ने कोरोना से लड़ने का जो रास्ता अपनाया वो "अस्पतालों की महत्वपूर्ण भूमिका और सुरक्षा और टेस्टिंग पर कम ज़ोर देना था."

"इसका नतीजा ये हुआ कि सबसे पहले स्कूल, कॉलेज बंद करने, सीमाएं सील करने और लोगों को क्वारंटीन में रखने, अस्पतालों में अधिक बेड की व्यवस्था करने और डेडिकेटेड स्वास्थ्यकर्मियों और अधिकारियों के बावजूद कोरोना संक्रमण की बढ़ती दर को रोका नहीं जा सका. इस कारण लॉकडाउन से जो उम्मीद थी वो पूरी नहीं हो पाई."

वो कहते हैं, "सरकार से आईसीयू में बेड्स की संख्या बढ़ाई, लेकिन ये इस बीमारी का अंतिम पड़ाव होता है जहां सरकार ने अधिक ध्यान दिया, जबकि इसी पड़ाव पर मौत की आशंका सबसे अधिक होती है."

वो कहते हैं कि सरकार के इस अप्रोच का मतलब ये था कि इस बीमारी का इलाज अस्पताल में ही हो सकता है, "लेकिन पब्लिक हेल्थ में काम करने वालों को पता है कि हमारी कोशिश ये होनी चाहिए कि कैसे लोगों को उस अंतिम पड़ाव पर पहुंचने से रोका जा सके."

सरकार की आलोचना करते हुए वो कहते हैं कि सरकार ने सेरोलॉजिकल टेस्ट और रेपिड टेस्ट की संख्या बढ़ाई जो संक्रमण के बारे में सटीक जानकारी नहीं देते, लेकिन सरकार को मॉलिक्यूलर टेस्ट की संख्या बढ़ानी चाहिए थी जो संक्रमण के बारे में वास्तविक जानकारी देने में सक्षम हैं.

शुक्रवार तक पेरू में मॉलिक्यूलर टेस्ट के ज़रिए 154,197 मामलों की पुष्टि हुई है जबकि रैपिड टेस्ट के ज़रिए इससे तीन गुना अधिक 467,800 मामलों की पुष्टि हुई है.

कोरोना महामारी की शुरुआत में देश में एक ही ऐसी लैबोरेटरी थी जहां मॉलिक्युलर टेस्ट होते थे. जून तक इनकी संखया 12 और अगस्त तक संख्या बढ़ा कर 35 कर दी गई.

डॉक्टर एडुआर्डो गोटुज़ो कहते हैं कि जब संक्रमण के मामलों की पहचान पहले होने पर उनके संपर्क में आए लोगों की पहचान और उन्हें आइसोलेट करना, कॉन्ट्रैक्ट ट्रेसिंग करना भी पहले होता है और इससे महामारी रोकने में मदद मिलती है.

डॉक्टर गॉज़र कहते हैं कि "सरकार का ज़ोर आईसीयू में बेड्स बढ़ाने पर था जबकि सरकार का ध्यान इस बात पर होना था कि कैसे आईसीयू की नौबत न आए."

तीसरा कारण- ऑक्सीजन की कमी

एक और वजह जिस कारण पेरू में कोरोना से होने वाली मौतें बढ़ी वो थी ऑक्सीजन की कमी.

मीडिया में बार-बार ऐसी तस्वीरें आई हैं जिसमें देखा गया है कि लोग ऑक्सीजन के लिए लंबी-लंबी लाइनों में लगे है. ऑक्सीजन की बढ़ती मांग को देखकर कई ऑक्सीजन सप्लायर्स ने इसकी कीमत बढ़ा दी और ऑक्सीजन सेल्स सेंटर खोल लिए.

जून में सरकार ने ऑक्सीजन को 'राष्ट्रहित' से जुड़ा उत्पाद घोषित कर दिया और कहा कि बढ़ती मांग को देखते हुए देश 2.5 करोड़ डॉलर का ऑक्सीजन खरीदेगी.

डॉक्टर गॉज़र कहते हैं, "ऑक्सीजन की कमी का सीधा असर मृत्युदर पर पड़ा क्योंकि जिन्हें इसकी ज़रूरत थी और जिनका स्वास्थ्य शायद इससे सुधर सकता था उनकी हालत भी बिगड़ती चली गई और उन्हें भी आईसीयू की ज़रूरत पड़ी जहां पहले से ही बेड्स की भारी कमी थी."

चौथा कारण- सरकार की जल्दबाज़ी

जब कोरोना दुनिया के कई देशों में फैल रहा था पेरू सरकार भी तुरंत हरकत में आई और कड़ी पाबंदियां लागू कर दीं.

साथ ही जीडीपी के 9 से 12 फ़ीसदी के हिस्सा उन लोगों की मदद के लिए रखा जिनकी नौकरी लॉकडाउन के कारण चली गई.

लेकिन सरकार की ये मदद नाकाफ़ी थी. पेरू की 71 फ़ीसदी आबादी या तो असंगठित क्षेत्र में काम करती हैं या फिर मज़दूरी का काम करती है. उनके लिए घर से बाहर न निकलना मुश्किल था.

राष्ट्रपति विज़कारा ने मई के महीने में जिन बाज़ार जैसे भीड़भाड़ वाले इलाक़ों को "कोरोना वायरस के केंद्र" कहा मार्च और अप्रैल में उन जगहों पर जाना लोगों के दैनिक जीवन की हिस्सा रहा था.

सरकार ने बैंकों के ज़रिए लोगों को पैसे देने का काम शुरू किया. लेकिन पेरू में केवल 38.1 फ़ीसदी वयस्कों के पार बैंक अकाउंट है, ऐसे में बड़ी संख्या में लोग बैंकों में पहुंचे.

डॉक्टर गोटुज़ो कहते हैं. "सरकार ने भले महामारी पर लगाम लगाने के लिए कदम उठाए लेकिन इस कदमों ने असल मायनों में महामारी को और फैलाने में मदद की."

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के क्षेत्रीय प्रमुख रह चुके हुगो नोपो कहते हैं, "महामारी के मद्देनज़र जो क़दम यूरोप में सरकारें उठा रही थीं, पेरू सरकार ने उन्हीं की नक़ल की. लेकिन पेरू की स्थिति को समझते हुए हमें देश के लिए अलग उपायों के बारे में सोचने की ज़रूरत थी."

"देश में महामारी के बारे में किसी को जानकारी नहीं थी. किसी को उम्मीद नहीं थी कि सरकार ग़लती करेगी. लेकिन अगर सरकार ग़लती करे तो उसे पारदर्शिता बरतते हुए सुधार की गुंजाइश रखनी चाहिए."

पेरू सरकार के अपनी ग़लतियों में सुधार भी किया, बाज़ारोंको सुरक्षित करने और बाज़ार व्यवस्था में सुधार के लिए कदम उठाए, बैंकिंग का समय बढ़ाया, 18 साल से अधिक उम्र की लोगों के ऑटोमैटिक बैंक अकाउंट खोलने की व्यवस्था की.

पांचवा कारण - लॉकडाउन के नियमों का उल्लंघन

हाल में दिनों में कई लोगों ने सरकार के लगाए नियमों का पालन करने वालों की आलोचना की और कहा कि महामारी फैलाने के लिए यही लोग ज़िम्मेदार हैं.

इसका कारण हाल में लीमा में हुई एक पार्टी थी जहां मची भगदड़ में 13 लोगों की मौत हो गई. पेरू में सार्वजनिक आयोजनों पर रोक है जिसके बावजूद तोमस रेस्ट्रोबा में हुई इस पार्टी में 130 लोग शामिल हुए. पुलिस के पहुंचने पर यहां भगदड़ मच गई थी.

हुगो नोपो कहते हैं, "ये इस जैसा एक ही मामला नहीं था. लेकिन ये इस ओर इशारा करता है कि लोग नियमों का कतन पलन करना चाहते हैं. दुर्भाग्य ही बात है लेकिन हमें इसकी क़ीमत चुकानी पड़ रही है."

गुरुवार को पुलिस ने एक अख़बार को बताया कि महामारी की शुरुआत के बाद से देश में 321 ऐसी पार्टियां हुई हैं.

अख़बार के अनुसार, "देश में संक्रमण का आँकड़ा बढ़ने का एक बड़ा कारण हमारी ग़लतियां भी हैं. लेकिन इस कारण एक और बात हुई है वो है विक्टिम ब्लेम यानी जो परेशान है उसी को दोष देना जबकि इसके लिए दोषी सामाजिक व्यवस्था है."

यूनिवर्सिदा डेल पेसिफ़ियो में इकोनॉमिक्स के प्रोफ़ेसर पाब्लो लावाडो कहते हैं, "ये बात सच है कि इस तरह की पार्टियों का कारण मौतों की संख्या बढ़ी है, लेकिन मैं नहीं मानता कि कोरोना से हुई मौतों का यही मुख्य कारण है. ऐसा कोई डेटा भी अब तक सामने नहीं आया जो इस बात की पुष्टि करे."

अधिक मृत्युदर पर सरकार की प्रतिक्रिया

पेरू के ने हाल में दिए एक इंटरव्यू में स्वीकार किया था कि कोरोना से मरने वालों की संख्या के हिसाब से पेरू की मृत्युदर दुनिया में सबसे अधिक है.

उन्होंने कहा, "मुझे नहीं पता अगर महामारी के दौर में कोई और देश है जो मृत्युदर को लेकर हमारी तरह पारदर्शी है."

उन्होंने कहा, "लोग कोरोना को रोकने के लिए लगाए गए नियमों का पालन करें इसके लिए पुलिस सड़कों पर, बैंकों में, बाज़ारों में, बस स्टॉप पर काम करने के लिए तैयार है."

सरकार का कहना है कि अब सोशल डिस्टेन्सिंग के नियमों का पालन करने के बारे में जागरूकता फैलाई जाएगी ताकि लोग सुरक्षित रहें.

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