अमरीका कोरोना के आगे बेबस क्यों नज़र आ रहा है

    • Author, सर्वप्रिया सांगवान
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

जिस तरह अमरीका में कोविड 19 के मरीज़ बढ़ रहे हैं, वो पूरी दुनिया को ही हैरानी में डाल रहा है. जिस देश की जनसंख्या 35 करोड़ भी नहीं है, वहाँ अब तक 33 लाख से ज़्यादा लोग कोरोना से संक्रमित हो चुके हैं.

जॉन्स हॉप्किन्स यूनिवर्सिटी के मुताबिक़ अब तक अमरीका में 1 लाख 37 हज़ार से ज़्यादा मौतें हो चुकी हैं. 7 जुलाई को तो अमरीका ने एक दिन में रिकॉर्ड नए केसेस दर्ज किए. 60 हज़ार से ज़्यादा.

ज़मीन पर हालात बिगड़ रहे हैं. वॉशिंगटन पोस्ट के मुताबिक़ अस्पतालों पर बोझ बढ़ गया है. आईसीयू भी अपनी क्षमता तक पहुँच गए हैं. एक बार फिर से हेल्थ केयर वर्कर्स को मास्क, ग्लव्स और पीपीई की कमी हो रही है.

यूएसए टुडे के मुताबिक़ अमरीका में तो अब चीन से भी ज़्यादा मामले हैं, वो चीन जहाँ सबसे पहले कोरोना वायरस संक्रमण के मामले मिले थे.

अगर ये भी मान लिया जाए कि चीन अपने आँकड़ें कम करके बता रहा है तो भी चीन की 140 करोड़ की जनसंख्या में प्रति व्यक्ति संक्रमण दर हुआ- 16000 में एक व्यक्ति. वहीं अमरीका में 110 लोगों में एक व्यक्ति कोरोना संक्रमित है.

इतना ही नहीं, अमरीका में हर साल जितनी मौतें दूसरी बीमारियों से होती हैं, उनसे ज़्यादा अब कोरोना से होने लगी हैं. जैसे कॉमन फ्लू से हर साल अमरीका में 55000 मौतें होती हैं और अल्ज़ाइमर से 1 लाख 21 हज़ार. कोरोना से पिछले 4 महीने में ही इनसे ज़्यादा मौतें दर्ज की गई हैं.

ख़ास बात ये है कि सरकार कुछ और कहती है और विशेषज्ञ कुछ और. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कोरोना संक्रमण को लेकर जब भी बोला, वे अपने शब्दों में इस ख़तरे की गंभीरता को बयां नहीं कर पाए.

अब भी जो हालात हैं उसके बावजूद सरकार स्कूल खोलने की भी बात कर रही है. राष्ट्रपति ट्रंप अब भी कह रहे हैं कि अमरीका महामारी को देखते हुए अच्छी स्थिति में है. अमरीकी सरकार इस बात से संतुष्टि है कि अमरीका में कोरोना से मृत्यु दर कम है और स्थिर भी. अमरीकी सरकार के लोग बार-बार जनता को इसी तरह आश्वासन दे रहे हैं.

क्या सरकार एक्सपर्ट की राय नहीं सुन रही?

अमरीका के संक्रामक रोग विशेषज्ञ डॉक्टर एंथनी फॉउची कोरोनावायरस पर व्हाइट हाउस के सलाहकार भी हैं. वो तो ये कह रहे हैं कि कम मृत्यु दर की बात पर ज़ोर देना एक ग़लत नैरेटिव है.

उन्होंने आगाह किया है कि 'अभी तो अमरीका में ये कोरोना की पहली लहर ही है और उसमें भी अमरीका पूरी तरह धंसा हुआ है. लोगों ने एहतियात नहीं बरती तो हर दिन 1 लाख केस भी हो सकते हैं.'

मार्च में ही फाउची ने अनुमान लगाया था कि अमरीका में 1 लाख से 2 लाख के बीच मौतें हो सकती हैं. फ़िलहाल जो आँकड़ें हैं, वो उनके अनुमान को साबित कर चुके हैं.

अमरीका की सेंटर फॉर डिजीज़ कंट्रोल एंड प्रिवेंशन यानी सीडीसी संस्था के डायरेक्टर डॉक्टर रॉबर्ट रेडफ़ील्ड ने कहा था कि केस एक रिपोर्ट हो रही है और असल में 10 और लोग संक्रमित हैं. उनके मुताबिक़ देश में 5 से 8 फ़ीसदी जनसंख्या संक्रमित हो चुकी है.

पिछले महीने सीडीसी की डिप्टी डायरेक्टर डॉक्टर ऐन शुकट ने एक इंटरव्यू में कहा था कि 'अमरीका...न्यूज़ीलैंड, सिंगापुर या दक्षिण कोरिया जैसी स्थिति में नहीं है, वहाँ नए केस जल्द से जल्द पता कर लिए जाते हैं और कांटेक्ट ट्रैसिंग कर लोगों को आइसोलेट किया जाता है. लेकिन अमरीका में फ़िलहाल बहुत ज़्यादा वायरस फैला हुआ है.'

मृत्यु दर कम होने पर सरकार का ज़ोर

तो जो बार-बार मृत्यु दर के कम होने की बात पर ज़ोर दिया जा रहा है और कई देशों की सरकारें ऐसा कर रही हैं, उसको लेकर एक्सपर्ट्स आगाह करते हैं.

न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक़ कोरोना से संक्रमित बुज़ुर्ग मरीज़ों को अस्पताल में भर्ती करवाने की नौबत ज़्यादा आती है और बुज़ुर्ग ही इससे सबसे ज़्यादा प्रभावित हुए हैं.

सीडीसी के आँकड़ों के मुताबिक़ हर 10 में से आठ मौतों में मरीज़ की उम्र 65 साल से ज़्यादा थी. लेकिन अब तो बहुत युवा मरीज़ भी कोरोना पॉज़िटिव आ रहे हैं और उनमें मौत होने के चांस बेहद कम हैं.

जैसे अमरीका के एरिज़ोना राज्य में आधे मामलों में तो मरीज़ों की उम्र 20 से 44 साल है. टैक्सस में आधे से ज़्यादा मामले 50 साल से कम उम्र के हैं. तो जब मृत्यु दर निकाली जाती है तो वो कम ही निकलती है.

दूसरी बात ये कि कोविड 19 संक्रमण का नतीजा सिर्फ़ मौत ही नहीं होता. लोगों में ठीक होने के बाद भी शारीरिक और मानसिक समस्याएँ रहती हैं.

अमरीका में केस बढ़ क्यों रहे हैं?

इसके पीछे कई वजहें हो सकती हैं. पहली तो ये कि शुरुआत में ही सरकार ने तेज़ी नहीं दिखाई. सरकार ने गंभीरता नहीं समझी. टेस्ट कम किए. वायरस संक्रमण को काबू करने के लिए क़दम नहीं उठाए.

अमरीका के अलावा और भी ऐसे देश हैं जिन्होंने तुरंत क़दम नहीं उठाए और वहाँ संक्रमित मामलों की भरमार हो गई, जैसे इटली, स्पेन और ब्रिटेन.

कुछ और भी दिक्कतें हुईं जैसे राज्य और स्थानीय स्वास्थ्य विभाग को अपने टेस्ट किट बनाने की इजाज़त नहीं थी और इसलिए सभी सैंपल्स को अटलांटा में सीडीसी में भेजा जाता था. उसके बाद सीडीसी ने ही राज्यों को ख़राब टैस्ट किट भेजे जिससे और देरी हुई.

अब गर्मियां आ गई हैं और लोग अपनी सामान्य गतिविधियों की ओर लौट रहे हैं. कहा जा रहा है कि अमरीका में युवाओं में ये सोच बन गई है कि उन्हें ज़्यादा ख़तरा नहीं है.

ऐसी खबरें आईं कि जब राज्यों ने लॉकडाउन में ढील दी तो युवा लोग घूमते फिरते नज़र आए. बिना मास्क और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन ना करते हुए यानी ख़तरे को कम आँकते हुए.

तो अमरीका में इतने बड़े पैमाने पर कोरोना संक्रमितों की संख्या का मामला अगर खँगालें तो ऐसा लगता है कि सरकार अलग बात कह रही है, विशेषज्ञ अलग बात कह रहे हैं और आम लोगों में भी इसकी गंभीरता का संदेश नहीं पहुँच पा रहा है.

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