कमला हैरिस के कश्मीर पर बयानों की क्यों हो रही है चर्चा

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- Author, विनीत खरे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, वाशिंगटन
अमरीका के राष्ट्रपति चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार जो बाइडन ने भारतीय मूल की सीनेटर कमला हैरिस को उप राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार चुना है.
जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाए जाने और उसके बाद लगे प्रतिबंधों को लेकर कमला हैरिस का रुख भारत सरकार के विपरीत रहा है.
सितंबर 2019 को टेक्सस के ह्यूस्टन में आयोजित एक इवेंट में उनसे कश्मीर में फ़ोन व इंटरनेट पर लगे प्रतिबंध और लोगों को हिरासत में लेने के बारे में पूछा गया था.
इस पर कमला हैरिस ने कहा था, “हम लोगों को ये बताना चाहते हैं कि वो अकेले नहीं हैं, हम नज़र बनाए हुए हैं. एक राष्ट्र के तौर पर ये हमारे मूल्यों का हिस्सा है कि हम मानवाधिकार उल्लंघन के बारे में बोलते हैं, और जहां ज़रूरी होता है, हम दख़ल भी देते हैं.”
किसी ने इसे कश्मीर पर एक कड़ा बयान बताया तो किसी ने कहा कि कमला हैरिस ने जो कहा, राष्ट्रपति पद की दौड़ में शामिल कोई भी अमरीकी नेता अपने कैंपेन के दौरान ऐसा ही कहता.
दिसंबर 2019 में कमला हैरिस ने भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर की भारतीय मूल की अमरीकी सांसद प्रमिला जयपाल से मुलाकात ना करने को लेकर निंदा की थी. प्रमिला जयपाल मोदी सरकार की आलोचक रही हैं.
उन्होंने ट्वीट किया था, “किसी भी विदेशी सरकार के लिए कांग्रेस से ये कहना गलत है कि बैठक में कौन से सदस्य होंगे. मैं प्रमिला जयपाल के साथ खड़ी हूं और मुझे खुशी है कि सदन में उनके सहकर्मियों ने भी ऐसा ही किया.”
कमला हैरिस अप्रवासन, शरणार्थियों और मुस्लिमों पर प्रतिबंध पर ट्रंप प्रशासन की नीतियों की आलोचक भी रही हैं.
मोदी का किया था स्वागत
लेकिन, इन सभी बातों को कमला हैरिस के एक पक्ष के रूप में देखा जाता है.
साल 2017 में उन्होंने एक ट्वीट करके भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अमरीका में स्वागत किया था.
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हडसन इंस्टीट्यूट इंडिया इनिशिएटिव की डायरेक्टर अपर्णा पांडे कमला हैरिस के बारे में कहती हैं कि दोनों ही पक्षों के लिए उनके विचार अत्यधिक कड़े नहीं हैं.
अपर्णा कहती हैं, “क्या उन्होंने ये पूछा कि कश्मीर में क्या हो रहा है? यहां तक कि अमरीका का विदेश विभाग भी कश्मीर के बारे में टिप्पणी करता है.”
हालांकि, पाकिस्तान अमरीकन पॉलिटिकल एक्शन कमिटी के डॉक्टर राव कामरान अली कहते हैं, “पाकिस्तानी अमरीकी होने के नाते हम बहुत खुश हैं. कश्मीर पर उनका बयान स्पष्ट है. उन्होंने कश्मीरियों के अधिकारों को खारिज नहीं किया. वो हाउडी मोदी कार्यक्रम में भी नहीं गईं.”
कुछ महीनों पहले राष्ट्रपित ट्रंप का भारत में बहुत गर्मजोशी से स्वागत किया गया था वहीं, ट्रंप ने ह्यूस्टन में शानदार हाउडी मोदी कार्यक्रम में मोदी के साथ मिलकर लोगों के बीच घूमते हुए हाथ लहराया था.
एक दूसरा नज़रिया ये कहता है कि कमला हैरिस बहुत समझदार हैं और वो खुद को आलोचक या समर्थक की किसी एक श्रेणी में बांधना नहीं चाहतीं.

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कमला हैरिस के रुख पर नज़र
इस समय विश्लेषक विभिन्न मुद्दों और विषयों पर कमला हैरिस के पुराने रुख और बयानों को खंगाल रहे हैं.
पिछले कुछ महीनों में भारत की मोदी सरकार को कश्मीर से धारा 370 हटाने, उसके बाद प्रतिबंध लगाने, सीएए, दिल्ली दंगे और लिंचिंग और मुस्लिमों के ख़िलाफ़ हिंसा को लेकर अमरीका में आलोचना का सामना करना पड़ा है.
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हालांकि, राष्ट्रपति ट्रंप इस पर ज़्यादा कुछ कहने से बचते हैं लेकिन शीर्ष डेमोक्रेट्स जैसे बर्नी सैंडर्स और एलिजाबेथ वॉरेन ने कश्मीर पर भारत की नीतियों को लेकर असहजता प्रकट की है.
क्योंकि कमला हैरिस को जो बाइडेन ने उम्मीदवार बनाया है तो नवंबर में राष्ट्रपति चुनाव जीतने की स्थिति में दक्षिण एशिया के विवादित मुद्दों को लेकर उनके विचार पूछे जा रहे हैं.
अपर्णा पांडे कहती हैं, “हमारा संविधान कहता है कि हम धर्मनिरपेक्ष हैं, हम अल्पसंख्यकों की रक्षा करेंगे. अमरीक का संविधान भी यही कहता है. अगर कोई उम्मीदवार सीरिया, लेबनान, वीगर की बात करता है तो उसे मानवाधिकार की स्थिति (भारत में) पर भी बोलना होगा.”
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लेकिन क्या उन्हें मोदी की आलोचक और भारत की कश्मीर नीति पर मुखर नेता के तौर पर देखना चाहिए?
एक नज़रिया ये कहता है कि उनके बयानों से अभी तक ऐसा कोई संकेत नहीं मिलता.
दूसरा नज़रिया कहता है कि भारत किसी भी आलोचना को लेकर संवेदनशील रहता है.
एक विश्लेषक का कहना है, “अगर मैं आपका दोस्त हूं तो मुझे आपकी हर चीज़ को पसंद करना होगा. कश्मीर का ज़िक्र भी आपको दुश्मन बना देता है. अमरीका बस ये कह रहा है कि अपने संवैधानिक मूल्यों को बनाए रखो.”
जो बाइडन का विज़न डॉक्यूमेंट
जो बाइडन के विज़न डॉक्यूमेंट में कश्मीर और एनआरसी का ज़िक्र होना उस कैंप में कई लोगों को पसंद नहीं आ रहा है. कुछ इसे कमला हैरिस के नज़रिए से भी जोड़कर देख रहे हैं.
‘अमरीका में मुसलमान समुदाय के लिए जो बाइडन का एजेंडा’ शीर्षक के तहत उनका विज़न डॉक्यूमेंट कहता है, “कश्मीर में भारत सरकार को कश्मीर के लोगों के अधिकारों को बहाल करने के लिए सभी ज़रूरी कदम उठाने चाहिए.”
डॉक्यूमेंट कहता है, “असहमति पर प्रतिबंध, जैसे शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों को रोकना या इंटरनेट को बंद या धीमा कर देना लोकतंत्र को कमज़ोर करता है.”
विवादित एनआरसी पर डॉक्यूमेंट कहता है, “जो बाइडन भारत सरकार के उन तरीक़ों से निराश हैं जो असम में राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) को लागू करने के लिए और उसके बाद अपनाए गए और नागरिकता संशोधन अधिनियम पारित किया गया.”
अब इसकी वजह से अब हिंदू अमरीकियों पर भी इसी तरह के पॉलिसी पेपर की मांग होने लगी है.

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जो बाइडन के कैंपेन के अनुसार चुनावी टक्कर वाले आठ राज्यों में 1.31 मिलियन महत्वपूर्ण भारतीय अमरीकी वोट हैं.
जो बाइडन के कश्मीर और एनआरसी का उल्लेख करने के बावजूद उनका चुनाव अभियान भारतीय अमरीकी वोटों को रिझाने में ज़ोर शोर से लगा है.
बाइडन कैंप भारतीय और पाकिस्तानी अमरीकियों को लुभाने के लिए 14 और 15 अगस्त को वर्चुअल इवेंट्स रख रहा है.
ट्रंप के अभियान को भी बड़ी संख्या में भारतीय अमरीकी वोट मिलने की उम्मीद है.
ट्रंप विक्टरी इंडियन अमरीकन फाइनेंस कमिटी के एक अनुमान के मुताबिक 50 प्रतिशत संभावित भारतीय अमरीकी मतदाता “डेमोक्रेट्स को छोड़ देंगे” और “राष्ट्रपति ट्रंप के लिए वोट करेंगे.”
एक विश्लेषक कहते हैं, “भारत में मुसलमानों के साथ जो हो रहा है वो पूरी दुनिया देख रही है और हमारी वैश्विक छवि खराब हो रही है. आप लिचिंग के बारे में सुनते हैं, लोगों को पकड़कर मार दिया जाता है. ये हमारी छवि है.”
लेकिन, कुछ विश्लेषकों का ऐसा भी मानना है कि चुनावी डॉक्यूमेंट में कश्मीर और एनआरसी का ज़िक्र होना सिर्फ़ चुनावी चर्चा भी हो सकती है.
इस पर अपर्णा पांडे कहती हैं, “लोग चुनावी अभियान के दौरान बहुत कुछ कहते हैं जो वो राष्ट्रपति बनने के बाद नहीं करते. जब दुनिया में इतना कुछ हो रहा है तो विदेश नीति में आप कितना बदलाव ला सकते हैं. ये सात दशकों से लंबित मुद्दों की तुलना में आपका ज़्यादा समय ले लेगा.”
हैरिस के भारत कनेक्शन को लेकर चिंता?
हैरिस की मां का जन्म भारत में हुआ था और वो अपनी भारतीय विरासत के बारे में बात करती आई हैं. यह पाकिस्तान में विश्लेषकों के एक वर्ग के बीच कुछ चिंता पैदा कर रहा है.

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अमरीका में 35 साल बिताने वाले वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक फैज़ रहमान कहते हैं, "चिंता है कि भारत से ताल्लुक़ रखने वाला व्यक्ति भारत-समर्थक और पाकिस्तान-विरोधी होगा. लेकिन, यहां रहने वाले बहुत से पाकिस्तानी ऐसा नहीं सोचते."
फैज़ रहमान कहते हैं, “(उप राष्ट्रपति का पद) प्रतीकात्मक होता है. सारी शक्ति राष्ट्रपति के हाथ में होती है. ऐसा कहा जाता है कि क्योंकि बाइडेन की उम्र ज़्यादा है तो ऐसे में उप राष्ट्रपित के लिए ज़्यादा मौका हो सकता है.”
हालांकि, कांग्रेशनल पाकिस्तान कॉकस फाउंडेशन के संस्थापक सदस्य और डेमोक्रेट नेता ताहिर जावेद हैरान नहीं हैं.
वह कहते हैं, “वो मेरी भी उप राष्ट्रपति हैं. जब भी मानावधिकार उल्लंघन होगा तो वो आवाज़ उठाएंगी.”

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मैंने जिन पाकिस्तानी और भारतीय अमरीकियों से बात की उनका कहना था कि वो हैरिस के नामांकन से खुश हैं.
पाकिस्तानी अमरीकन पॉलिटिकल एक्शन कमिटी के डॉक्टर राव कामरान अली कहते हैं, “मेरी बेटी बहुत खुश है. अगर कमला कर सकती हैं, तो वो राष्ट्रपति भी बन सकती हैं. मेरी बेटी के लिए सुज़ैन राइस की तुलना में कमला हैरिस से प्रेरणा लेना ज़्यादा आसान है.”
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