भारत और चीन के बीच तनाव में पाकिस्तान कहाँ खड़ा है?

नरेंद्र मोदी, इमरान ख़ान और शी जिनपिंग

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    • Author, सहर बलोच
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, इस्लामाबाद

भारतीय पत्रकार कुलदीप नैयर अपनी किताब 'बियोंड द लाइंस' में लिखते हैं कि जब चीन और भारत के बीच हिमालयी सरहद पर जंग छिड़ी तो ईरान के शाह ने भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को एक पत्र की कॉपी भेजी, जो उन्होंने पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल अयूब ख़ान को लिखी थी.

इस पत्र में ईरान के शाह ने जनरल अयूब ख़ान को सलाह दी थी कि वो भारत-चीन सीमा पर अपने सैनिक तैनात करें, ताकि 'लाल जंजाल' से बचा जा सके.बांग्लादेश: भारत की सक्रियता क्या बताती है कि सब ठीक नहीं है?

बाद में अयूब ख़ान ने अपने एक बयान में कहा कि बाहरी ताक़तों को ये देखना चाहिए कि पाकिस्तान का भारत की कमज़ोरी का फ़ायदा न उठाना दरअसल पाकिस्तान की दरियादिली के साथ-साथ एक तरह की मदद भी है.

कुलदीप नैयर ने पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना के साथ लॉ कॉलेज लाहौर में अपने साथ हुई बातचीत के बारे में लिखा कि जब जिन्ना से उन्होंने ये सवाल किया कि अगर किसी तीसरी ताक़त ने भारत पर हमला किया, तो पाकिस्तान क्या करेगा? तो जिन्ना ने जवाब दिया था कि पाकिस्तान के सिपाही भारत के सिपाहियों के साथ मिलकर लड़ेंगे.

वर्ष 1961 में चीन के सैनिक तिब्बत और सेंकयांग की सरहद से 70 मील भीतर पश्चिम में भारत के इलाक़े में दाखिल हो चुके थे. लेकिन उससे पहले 1960 में भारत के चीफ़ ऑफ़ आर्मी स्टाफ़ जनरल पीएन थापर ने सरकार को लिखे एक पत्र में कहा था कि भारत के पास जंग के लिए ज़रूरी साज़-ओ-सामान इस क़दर बुरी हालत और इतनी कम तादाद में थे कि चीन और पाकिस्तान में से कोई भी उन्हें शिकस्त देकर भारत में दाख़िल हो सकता था.

लेकिन इसके बावजूद चीन भारत से अक्साई चिन का तकरीबन 15 हज़ार वर्ग मील का इलाक़ा लेने में क़ामयाब हो गया. भारत को अगर ताक़त के लिहाज़ से देखा जाए, तो वो आज भी अपने आप को चीन के मुक़ाबले कमज़ोर मानता है.

अब एक बार फिर दोनों देशों के बीच तनाव चरम पर है और एक बार फिर पाकिस्तान इन दोनों देशों के बीच होने वाली सरगर्मियों को ग़ौर से देख रहा है.

भारत और चीन के बीच तनाव जून के महीने में उस वक़्त चरम पर पहुँच गया, जब गलवान घाटी में दोनों देशों के सैनिकों के बीच हुए हिंसक संघर्ष में 20 भारतीय सैनिकों की मौत हो गई.

गलवान घाटी

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इन सबमें पाकिस्तान कहाँ खड़ा है?

जिस जगह झड़प हुई है, वो इस क्षेत्र के लिए बेहद अहम है, क्योंकि यहाँ आकर भारत, चीन और पाकिस्तान की सीमाएँ मिलती हैं.

चीन और भारत के बीच जारी तनाव के माहौल में कुछ नज़रें पाकिस्तान पर आकर भी टिक गई हैं. इसी हवाले से बीबीसी उर्दू ने कुछ विशेषज्ञों से बात करके ये जानने की कोशिश की है कि पाकिस्तान की भूमिका इन हालात में क्या हो सकती है.

पाकिस्तान की सरकार भारत और चीन के बीच होने वाले तनाव की बुनियाद 5 अगस्त 2019 को भारत सरकार की ओर से कश्मीर को लेकर लिए गए फ़ैसले को समझती है.

भारत ने भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर के संवैधानिक विशेषाधिकार को समाप्त करके इस राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बाँट दिया था.

चीन ने उस वक़्त ही एक बयान में नाराज़गी ज़ाहिर करते हुए कहा था कि लद्दाख़ की हैसियत बदलना सही नहीं है.

वीडियो कैप्शन, भारत-चीन तनाव से पाकिस्तान क्यों परेशान?

पाकिस्तान ने न सिर्फ़ चीन के इस बयान का समर्थन किया बल्कि इसके बदले चीन ने भारत प्रशासित कश्मीर के मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद में पाकिस्तान का साथ भी दिया. पाँच अगस्त 2019 के बाद कश्मीर के मुद्दे पर हुए संयुक्त राष्ट्र के दो सत्रों में चीन ने पाकिस्तान का ही समर्थन किया है.

हाल ही में इस वाक़ये के एक साल पूरा होने पर जारी बयान में भी चीन ने इस मुद्दे पर पाकिस्तान के पक्ष का ही समर्थन किया है.

लेकिन इस समय चीन एक ओर जहाँ कोल्ड वॉर नहीं चाहता है और बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव को बढ़ावा देना चाहता है, वहीं पाकिस्तान भी आर्थिक सड़कों के विकास में चीन का साथ चाहता है.

मुस्लिम लीग नवाज़ के सीनेटर मुशाहिद हुसैन सैयद कहते हैं कि पाकिस्तान चीन का साथ उसूली बुनियादों पर देगा. उसूली तौर पर भारत ग़लत है और ये जानते हुए पाकिस्तान भारत का साथ नहीं देगा, लेकिन बातचीत के ज़रिए अगर ये सुलझाया जा सकता है तो सही है. वरना भारत को क्षेत्र में अपनी आक्रामक नीति की समीक्षा करने की सख़्त ज़रूरत है.

इमरान ख़ान और शी जिनपिंग

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साथ ही कुछ हलकों में ये दावा भी किया जा रहा है कि पाकिस्तान और चीन ने शुरू से ही एक दूसरे का साथ दिया है.

इसका जवाब जानने के लिए थोड़ा इतिहास के पन्ने पलटने होंगे और ये देखना पड़ेगा कि वो कौन से ऐसे बड़े मौक़े थे, जहाँ चीन और पाकिस्तान ने एक दूसरे का साथ दिया.

1962 की चीन-भारत जंग के दौरान पाकिस्तान की ख़ामोश डिप्लोमेसी के बाद साल 1965 की भारत पाकिस्तान जंग में चीन ने पाकिस्तान का साथ दिया.

मुशाहिद हुसैन सैयद कहते हैं कि हालाँकि अमरीका के साथ हमारा सुरक्षा समझौता भी था और वो हमारे प्रतिद्वंदी की तरह भी नहीं था लेकिन अमरीका ने उन सब बातों के बरक्स भारत का साथ दिया. उस वक़्त चीन, जिससे हमारी अभी नई-नई दोस्ती शुरू हुई थी, उसका पाकिस्तान का साथ देना एक अहम मौक़ा था.

नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग

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दूसरा मौक़ा साल 1968 में आया और वजह बना पेशावर से छह किलोमीटर दूर दक्षिण में मौजूद इलाक़ा बड़ी बेर. इस इलाक़े को तकरीबन 1959 से ले कर 1970 तक अमरीका पूर्व सोवियत यूनियन के ख़िलाफ़ जासूसी के लिए इस्तेमाल करता था.

पाकिस्तान ने अमरीका से साफ़-साफ़ कहा कि इसे बंद करे. पाकिस्तान के इस क़दम से चीन ख़ुश हुआ और उसके फ़ौरन बाद सोवियत यूनियन ने पाकिस्तान को एशियाई सुरक्षा समझौते में शामिल होने का न्यौता दे दिया. लेकिन पाकिस्तान ने ये दावत टाल दी.

इस समग्र समझौते के पीछे वजह चीन के ख़िलाफ़ जाना था जो पाकिस्तान नहीं करना चाहता था.

इस तरह 1971 में पाकिस्तान ने अमरीका और चीन के बीच बातचीत की राह आसान की, जिससे चीन को उस ज़माने में उस समय पेश आ रहे अंतरराष्ट्रीय अलगाव में कुछ कमी महसूस हुई. दूसरा अहम पहलू था संयुक्त राष्ट्र का.

मुशाहिद हुसैन कहते हैं कि चीन की संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता बहाल करवाने में पाकिस्तान ने अहम किरदार अदा किया है.

पाकिस्तान और चीन के रिश्ते अब बहुत अलग हैं. इन रिश्तों की बुनियाद में जहाँ पाकिस्तान की जम्मू-कश्मीर को हासिल करने की पुरानी ख़्वाहिश का पूरा होना शामिल है, वहीं इसमें 62 अरब डॉलर के एक प्रोजेक्ट का मंसूबा भी शामिल है.

इमरान ख़ान

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चीन का पक्ष लेकर पाकिस्तान को क्या मिलेगा?

पाकिस्तान इस वक़्त चीन और भारत के बीच चल रहे तनाव को बहुत क़रीब से देख रहा है.

भारत और चीन के बीच हिंसक झड़प के कुछ दिन बाद ही पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसएआई ने अपने हेडक्वार्टर में एक बैठक बुलाई थी. वहीं पाकिस्तानी सेना के शीर्ष अधिकारी भी भारत चीन के बीच हो रही घटनाओं का पल-पल का ब्यौरा लेते रहे हैं.

पाकिस्तान के अधिकारियों ने ज़रूरत पड़ने पर चीन का साथ देने पर भी सहमति ज़ाहिर की है. लेकिन इस समय तीनों ही देश इस हालत में नहीं है कि वो युद्ध कर सकें. और इस हवाले से तीनों देशों के अपने-अपने हित हैं.

चीन की सीमाएँ 13 पड़ोसी देशों से लगती हैं और उनमें से 11 से चीन ने सरहदी समझौते कर लिए हैं. हालांकि भारत और भूटान के साथ अभी चीन का समझौता नहीं हो सका है. अब अपने आर्थिक एजेंडे के तहत चीन की ये ख़्वाहिश है कि भारत से भी समझौता हो ही जाए ताकि उसके कारोबारी प्रोजेक्ट अंजाम तक पहुँच सकें.

कश्मीर में भारतीय सैनिक

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दूसरी ओर साल 2013 में पाकिस्तान को दुनियाभर में एक नाकाम देश कहा गया था, लेकिन उसके बावजूद चीन ने पाकिस्तान के साथ 62 अरब डॉलर के निवेश का समझौता किया. इससे जहाँ दुनियाभर में चिंता पैदा हुई वहीं क्षेत्र के कई देशों इसका हिस्सा बनने के लिए कतार में खड़े भी नज़र आए.

इस्लामाबाद में चीन सेंटर से जुड़े डॉक्टर फ़ैसल उर रहमान कहते हैं, "पाकिस्तान के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ये भरोसा पैदा करना बहुत ज़रूरी था. इसलिए पाकिस्तान न सिर्फ़ समय आने पर भारत के ख़िलाफ़ उसूली बुनियाद पर आवाज़ उठाएगा, लेकिन साथ ही अपने और चीन के हित भी सामने रखेगा और इन हितों में आर्थिक कॉरिडोर सबसे ऊपर हैं."

पूर्व सेक्रेटरी जनरल रियाज़ महमूद ख़ान कहते हैं कि 'पाकिस्तान और चीन की दोस्ती किसी चीज़ या फ़ायदे के एवज़ में नहीं है. यहाँ पर ज़रूरी है कि पाकिस्तान कश्मीर के बारे में चीन का सहारा लेगा.

लेकिन इस वक़्त ये देखना भी ज़रूरी है कि 1962 में इन तीनों ही देशों के पास परमाणु हथियार नहीं थे. लेकिन आज हालात बहुत अलग हैं. और इसलिए अधिक सावधानी की ज़रूरत है.

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