खालिस्तान समर्थक ‘सिख फॉर जस्टिस’ की 40 वेबसाइट ब्लॉक की गईं - आज की बड़ी ख़बरें

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भारत सरकार ने प्रतिबंधित समूह 'सिख फॉर जस्टिस से जुड़ी 40 वेबसाइट ब्लॉक कर दी है.
खालिस्तान समर्थक समूह, सिख फॉर जस्टिस पर गै़र-क़ानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम 1967 के तहत प्रतिबंध लगा हुआ है.
गृह मंत्रालय ने ट्वीट कर जानकारी दी है कि इस संगठन ने एक अभियान शुरू किया था जिसके तहत खालिस्तान के समर्थन में 'रेफरेंडम 2020' यानी जनमतसंग्रह के लिए लोगों से वोटर के तौर पर रजिस्ट्रेशन करने के लिए कहा जा रहा है.
इस जनमतसंग्रह के तहत सिखों के लिए अलग देश की मांग की जा रही है.
लेकिन केंद्रीय गृह मंत्रालय और इलेक्ट्रॉनिक्स व सूचना तकनीक मंत्रालय की सलाह पर आईटी एक्ट 2000 के तहत आदेश जारी कर इस संगठन से जुड़ी 40 वेबसाइट को ब्लॉक कर दिया है.
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न्यूज़ीलैंड से छोड़ा गया रॉकेट अंतरिक्ष तक पहुंचने से पहले हुआ ग़ायब

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न्यूज़ीलैंड से छोड़ा गया अमरीकी लॉन्च कंपनी का नया रॉकेट कहीं खो गया है.
रॉकेट लैब के अनुसार कि उसका इलेक्ट्रॉन रॉकेट उत्तरी द्वीप के माहिया प्रायद्वीप से लॉन्च होने के बाद ऊपर जाने में नाकाम रहा. माना जा रहा है कि रॉकेट जो सैटलाइट ले कर जा रहा था वो सभी तबाह हो गए हैं.
बीबीसी विज्ञान संवाददाता जॉनथन अमॉस के अनुसार इन सैटलाइट में जापान के कैनन इलेक्ट्रॉनिक्स और कैलिफोर्निया के प्लैनेट लैब इंक का इमेजिंग स्पेसक्राफ्ट और इन-स्पेस मिशन्स नाम के ब्रितानी स्टार्ट-अप का एक टेक्नोलॉजी डेमोंस्ट्रेशन प्लेटफॉर्म शामिल था.
रॉकेट लैब के सीईओ पीटर बेक ने इसके लिए अपने उपभोक्ताओं से माफ़ी मांगी है.
उन्होंने ट्वीटर पर लिखा, "मुझे इस बात का बेहद अफ़सोस है कि हम आज अपने उपभोक्ताओं के सैटेलाइट अंतरिक्ष तक पहुंचाने में नाकाम रहे. हम इस बात का भरोसा दिलाते हैं कि हम समस्या का पता लगाकर, उसे ठीक करेंगे और जल्द ही बेहतरीन सेवाएं देंगे."
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शनिवार को न्यूज़ीलैंड से किया गया इलेक्ट्रॉन रॉकेट का ये 13वां लॉन्च था. एक लॉन्च को छोड़ कर इससे पहले के इसके सभी लॉन्च सफल रहे थे. इसका पहला रॉकेट अपने ऑर्बिट तक पहुंचने में नाकाम रहा था.
फिलहाल ये साफ़ नहीं है कि इस बार लॉन्च में क्या गड़बड़ी हुई. वीडियो फुटेज में देखा जा सकता है, कि रॉकेट का सेकेंड-स्टेज इंजन उड़ान के पांच मिनट चालीस सेकेंड तक सामान्य तौर से चल रहा था.
वो 3.8 किलोमीटर प्रति सेकेंड की रफ्तार से 192 किलोमीटर तक गया. इसके बाद वीडियो फ्रीज़ हो गया.
भारत-चीन तनाव के बीच अमरीका ने दक्षिण चीन सागर में भेजे एयरक्राफ्ट

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अमरीकी नौसेना ने 2014 के बाद पहली बार दक्षिण चीन सागर में दो बड़े एयरक्राफ्ट भेजे हैं. अमरीका ने ये क़दम ऐसे वक़्त में उठाया जब चीन विवादित जल क्षेत्र में सैन्य अभ्यास कर रहा था.
अमरीकी नौसेना ने शनिवार को कहा, स्वतंत्र और खुले हिंद-प्रशांत क्षेत्र के समर्थन में यूएसएस निमित्ज़ और यूएसएस रोनाल्ड रीगन दक्षिण चीन सागर में अभ्यास कर रहे हैं.
चीन की पीपल्स लिबरेशन आर्मी विवादित द्वीप समूह, पार्सेल आईलैंड्स के आसपास पांच दिवसीय ड्रिल कर रही है. वियतनाम और फिलीपींस ने इस अभ्यास का विरोध किया है. अमरीका ने इसकी ये कहते हुए आलोचना की है कि ये क्षेत्रीय तनाव को कम करने की कोशिशों के उलट क़दम है.
पेंटागन ने गुरुवार को कहा, "चीन की ये कार्रवाई दक्षिण चीन सागर में हालात को और ज़्यादा अस्थिर कर देगी." पेंटागन ने साथ ही ये भी कहा कि ये अभ्यास उस समझौते की प्रतिबद्धताओं का उल्लंघन करता है, जो चीन ने अन्य दावेदारों के साथ किया था.
चीनी और अमरीकी सैन्य बलों का विवादित पानी में एक साथ सैन्य अभ्यास करना बेहद हाई प्रोफाइल मामला है. हालांकि पिछले महीनों में इस तरह के अभ्यास होते रहे हैं क्योंकि दोनों ही शक्तियां एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अपना प्रभुत्व दिखाने की होड़ में लगी हैं.

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अमरीका ने उस वक़्त भी दक्षिण चीन सागर में कई बार युद्धपोत भेजे थे जब चीन वियतनाम और मलेशिया से आने वाले मछुआरों और तेल ढूंढने वाले जहाज़ों को परेशान कर रहा था.
मौजूदा सैन्य अभ्यास के तहत दो युद्धपोत एक साथ फिलीपीन सागर में 28 जून से घूम रही हैं. चीनी और अमरीकी सेना के एयरक्राफ्ट और जहाज अक्सर दक्षिण चीन सागर में एक दूसरे का पीछा करते हैं. ये इलाक़ा बाशी चैनल कहलाता है जो इसे प्रशांत और फिलीपीन सागर से जोड़ता है.
ताइवान के सैन्य सूत्रों और विशेषज्ञों के अनुसार, 24 जून को ताइवान के दक्षिण पूर्व में एक चीनी लड़ाकू विमान, अचानक से एक अमरीकी सैन्य टैंकर और नौसैनिक निगरानी विमान के पास पहुंचा.
सैन्य विश्लेषक कहते हैं कि ये निगरानी एयरक्राफ्ट उड़ान के दौरान ही ईंधन भरने लगा ताकि वो प्रतास के नज़दीक घूम रही चीनी पनडुब्बी पर नज़र रख सके. प्रतास दक्षिण चीन सागर स्थित एक द्वीप है, जो फ़िलहाल ताइवान के नियंत्रण में है.
स्ट्रैटिजिक स्टडीज सोसाइटी आरओसी के एक रिसर्च फेलो और ताइवान की नौसेना में पूर्व कमांडर कैप्टन चांग चिंग कहते हैं, "ये बहुत जोखिम भरा युद्धाभ्यास है."
पेकिंग यूनिवर्सिटी के साउथ चाइना सी प्रोबिंग इनिशिएटिव की ओर से साझा किए गए जहाज और विमान ट्रैकिंग वेबसाइटों के आंकड़ों के अनुसार, पार्सेल में बुधवार को चीनी सैन्य अभ्यास शुरू होने के बाद से अमरीका के निगरानी जहाज और विमान स्थिति पर नज़र रख रहे हैं.
हवा और समंदर में तनाव को टालने के लिए अमरीका और चीन के बीच कई समझौते हुए हैं. कैप्टन चांग कहते हैं, बड़ी सैन्य गतिविधियों को लेकर हुए एक समझौते के तहत चीन ने अगर पहले से पार्सेल द्वीप पर अभ्यास की घोषणा कर दी है तो अमरीका वहां नहीं जा सकता.
हालांकि सातवीं फ्लीट के प्रवक्ता लेफ्टिनेंट केली कहते हैं कि ये अभियान अमरीका की उन प्रतिबद्धताओं का समर्थन करता है कि वो अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों की इजाज़त से मिलने वाले उन अधिकारों के साथ खड़ा रहेगा. इसके तहत सभी देशों को उड़ान भरने, समुद्री यात्रा और संचालन के अधिकारी मिलते हैं.
कैप्टन चांग कहते हैं कि अमरीका चीन को अपनी श्रेष्ठ नौसेनिक क्षमता दिखाना चाहता था.
वो कहते हैं, चीन के दूसरे कैरियर ने पिछले साल सेवाएं देनी शुरू की. इसके बाद से चीनी जनता इस बात से उत्साहित है कि उनका देश 'डुअल कैरियर' के युग में प्रवेश कर चुका है.
"अब अमरीकी नौसेना इस आत्मविश्वास को ये दिखाकर हिलाना चाहती है कि सिर्फ़ वो ही इस तरह के अभियान को आगे बढ़ा सकती है."
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