पुतिन ने अपनी नई जीत से दुनिया को दिया ये संदेश

व्लादिमीर पुतिन

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    • Author, सर्वप्रिया सांगवान
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

पुतिन ने रूस को हमेशा के लिए बदल दिया है. उनके समर्थक तो ये पहले ही मानते ही थे लेकिन अब जो उन्होंने बदला, वो ऐतिहासिक है.

पिछले महिने रूस के लोगों को फ़ोन पर मैसेज मिला कि उन्हें लाखों के इनाम जीतने के लिए रजिस्टर किया गया है.

लेकिन क्यों? दरअसल, रूस में संविधान संशोधन के लिए एक जनमत संग्रह करवाया गया.

ज़्यादातर लोगों ने संशोधन के पक्ष में वोट किया. ज़्यादा से ज़्यादा लोग वोटिंग करें, इसके लिए इनाम भी रखे गए.

रूस+संविधान संशोधन

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इमेज कैप्शन, संविधान संशोधम के ख़िलाफ़ रूस के सेंट पीटर्सबर्ग में लोगों ने विरोध प्रदर्शन भी किया

इस संविधान संशोधन का आइडिया था राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का. रूस की संसद तो संशोधन पास कर ही चुकी है लेकिन पुतिन ने इस आइडिया पर जनता की मुहर भी लगवाई और अब पुतिन के 2036 तक सत्ता में रहने का रास्ता तो साफ़ हो गया. ये संभव है कि वे जोसेफ़ स्टालिन से भी ज़्यादा लंबे वक्त तक सत्ता में रहने वाले नेता बन जाएंगे.

वैसे सात दिनों तक चली इस वोटिंग की कोई स्वतंत्र जांच नहीं हुई है. विपक्ष वोटिंग में अनियमितताओं की बात कह रहा है.

संविधान संशोधन को लेकर पुतिन तो कहते हैं कि उन्होंने ये लोकतंत्र और बेहतर सरकार के लिए किया लेकिन रूस में कई जानकार मानते हैं कि ये उनकी बदलाव योजना है.

मतलब 20 साल सत्ता में रहने के बाद उनके कुछ निजी हित हैं, दोस्त हैं, एक सिस्टम है उनका. वो एकदम गायब तो नहीं हो सकते.

व्लादिमीर पुतिन

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इमेज कैप्शन, संविधान संशोधन के लिए जमनत संग्रह पर वोटिंग करने आए पुतिन. ये वोटिंग 25 जून से 1 जुलाई तक चली.

संविधान संशोधन से पुतिन को क्या मिलेगा?

तो सबसे बड़ा सवाल तो यही था कि 2024 में जब उनका राष्ट्रपति का कार्यकाल खत्म हो जाएगा तो फिर क्या होगा. तो इस संविधान संशोधन से क्या ख़ास होगा?

  • पहली बात तो ये कि अब राष्ट्रपति की शक्तियां थोड़ी कम होंगी और पुतिन की तरह और पुतिन जितना लंबा सत्ता में कोई और नहीं रह पाएगा. अब तक किसी भी और देश के मुक़ाबले रूस का राष्ट्रपति पद ज़्यादा ताक़तवर है. रूस का राष्ट्रपति ड्यूमा यानी रूस की संसद को बर्ख़ास्त भी कर सकता है.
  • दूसरी बात, इस संशोधन से संसद की शक्तियां थोड़ी बढ़ेंगी. अभी तक राष्ट्रपति ही प्रधानमंत्री को नियुक्त करता था और ड्यूमा उस फ़ैसले को मंज़ूर करती थी. अब संसद प्रधानमंत्री को नियुक्त कर पाएगी और फिर प्रधानमंत्री अपनी कैबिनेट बनाएगा. पुतिन ने खुद कहा था कि इसका मतलब है कि राष्ट्रपति इन उम्मीदवारों को रिजेक्ट नहीं कर पाएगा. उसे संसद की बात माननी ही पड़ेगी.
  • तीसरी महत्वपूर्ण बात है- स्टेट काउंसिल की शक्तियों का बढ़ना और इसे सरकारी एजेंसी के तौर पर मान्यता देना. अभी तक स्टेट काउंसिल एक सलाहकार परिषद की तरह काम करती थी. माना जा रहा है कि ये स्टेट काउंसिल एक जज की तरह काम कर सकता है. मतलब जब भी कोई विवाद होगा, स्टेट काउंसिल का फैसला ही आख़िरी होगा. इस तरह की अफवाहें हैं कि पुतिन नए स्टेट काउंसिल के प्रमुख हो सकते हैं. अगर ऐसा होता है तो उनका फ़ैसला ही आखिरी फैसला माना जाएगा. यानी एक तरह से सब उनके कंट्रोल में.
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वैसे जानकार कहते हैं कि पुतिन के प्रधानमंत्री बनने के ही आसार ज़्यादा हैं. लेकिन पुतिन को समझना इतना आसान नहीं हैं. कोई नहीं जानता कि वे क्या करने वाले हैं.

पुतिन संविधान को जल्दबाज़ी में बदलने के पक्ष में कभी नहीं थे लेकिन अब उन्होंने इतना बड़ा संशोधन कोरोना महामारी के बीच ही फ़टाफ़ट निपटा दिया.

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इमेज कैप्शन, अगस्त 1999 में तत्कालीन राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन ने व्लादिमीर पुतिन को प्रधानमंत्री नियुक्त किया. 16 अगस्त 1999 को ड्यूमा को संबोधित करते हुए पुतिन

कैसे रूस पर छा गए पुतिन?

पुतिन जब पहली बार प्रधानमंत्री बने थे तो उन्हें रूस में शायद ही कोई जानता था. लोगों को इतना ही पता था कि वे सेंट पीटर्सबर्ग से हैं और सोवियत यूनियन की खुफिया एजेंसी केबीजी में काम करते थे.

लेकिन जब वो आए तो ऐसे छाए कि उनकी अप्रूवल रेटिंग 80 फीसदी तक पहुंच गई. पश्चिमी देशों में कोई नेता ख़्वाब में ही ऐसी रेटिंग के बारे में सोच सकता है.

बहुत लोगों का मानना है कि ये रेटिंग उस छवि की वजह से है जो सरकारी चैनलों ने बनाई है. ये तो जगजाहिर है कि सत्ता में आने के बाद सबसे पहले उन्होंने मीडिया को ही काबू में किया था.

दूसरी एक वजह ये भी थी कि उनके सामने मज़बूत विपक्ष भी नहीं रहा. उनके विरोधियों को या तो देश निकाला दे दिया गया, या वो जेल में रहे या उनकी मौत हो गई.

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इमेज कैप्शन, क्रीमिया को रूस में मिलाने की पांचवी सालग्रिह पर मार्च 2019 में पुतिन क्रीमिया के एक दिन के दौरे पर.

20 साल के उनके कार्यकाल की सबसे बड़ी जीत कही जाती है फरवरी 2014 में पड़ोसी देश यूक्रेन के हिस्से क्रीमिया पर कब्ज़ा करना. पूरी दुनिया उन्हें रोक नहीं पाई. पश्चिम के लिए ये बड़ा झटका था. उसके बाद रूस ने पश्चिमी देशों की पाबंदियां झेली.

अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने रूस को 'क्षेत्रीय शक्ति' कहकर ख़ारिज़ कर दिया था. कभी सुपरपावर रहे रूस के लिए ये ठेस पहुंचाने वाली बात थी.

लेकिन 2020 तक आते-आते पुतिन ने रूस के लिए बहुत कुछ बदला. सीरिया में तो उन्होंने युद्ध का रूख ही मोड़ दिया. मध्य-पूर्व में उन्होंने रूस का प्रभाव बढ़ाया. चीन के साथ संबंध मज़बूत किए.

ट्रंप+पुतिन

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इमेज कैप्शन, अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और व्लादीमिर पुतिन के बीच जापान के ओसाका समिट में मुलाक़ात हुई. (जून 28, 2019)

दुनिया को पुतिन का संदेश

अब देश की सत्ता पर अपनी पकड़ मज़बूत कर पुतिन पूरी दुनिया को संदेश दे रहे हैं. रूस में पुतिन जितना रहेंगे, उतना ही अंतरराष्ट्रीय मंच पर.

पिछले कुछ सालों में सबने देखा है कि रूस अमरीका के नेतृत्व वाली दुनिया को सीधा चुनौती दे सकता है. एक वक़्त ऐसा भी था जब रूस के लिए कहा जाता था कि यह एक 'बड़ा पेट्रोल पंप' है और कुछ नहीं.

पुतिन ने रूस की स्थिति को मज़बूत बनाया है, ऐसे में उनकी लोकप्रियता से इनक़ार नहीं किया जा सकता. वहां के लोग भी चाहते हैं कि उनका नेता कोई ऐसा हो जो पश्चिमी देशों के हाथों की कठपुतली ना हो.

पुतिन खुद कहते हैं कि रूस अभी पश्चिमी देशों के ख़तरे से सुरक्षित नहीं है और इसलिए उनके लिए ये सत्ता छोड़ने का वक्त नहीं.

लेकिन पुतिन के कार्यकाल को उन पर लगे गंभीर आरोपों से अलग रखकर नहीं देखा जा सकता. उन पर अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव 2016 में हस्तक्षेप के आरोप लगे, खेलों में सरकार प्रायोजित डोपिंग के और सरकार प्रायोजित हत्याओं के.

पुतिन ने ही एक बार कहा था कि केजीबी अफसर कभी भूतपूर्व केजीबी अफसर नहीं होता. पुतिन को देखकर तो यही लगता है. वो कैसे सोचते हैं, कैसे काम करते हैं, ये समझना आसान नहीं.

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