व्लादिमीर पुतिनः रूस पर सबसे लंबे समय तक राज करने की ओर बढ़ते क़दम

व्लादिमिर पुतिन

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    • Author, नॉर्बर्टो पैरेडेज़
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़ वर्ल्ड

रूस के संविधान में राष्ट्रपति पद के लिए केवल दो कार्यकाल का प्रावधान है लेकिन व्लादिमीर पुतिन चार कार्यकाल पहले ही पूरा कर चुके हैं.

बीस साल पहले साल 1999 में जब व्लादिमीर पुतिन ने क्रेमिलन में कदम रखे थे तो किसी को इस बाता का अंदाज़ा नहीं था कि वे इतने लंबे समय तक सत्ता में बने रह सकेंगे.

लेकिन तमाम बाधाओं और अड़चनों को पार करते हुए पिछले साल 31 दिसंबर को पुतिन ने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तरीके से सत्ता में दो दशक पूरे कर लिए.

अपने पूरे राजनीतिक जीवन में पुतिन को फोर्ब्स मैगज़ीन ने साल 2013 से 2016 के बीच दुनिया के सबसे ताक़तवर शख़्स का खिताब दिया.

रूस में उनकी लोकप्रियता के ये आलम है कि किसी को भी इससे ईर्ष्या हो सकती है.

राष्ट्रपति पुतिन जिस बुलंद और करिश्माई तरीके से अपनी बात रखते हैं, उससे बाक़ी दुनिया भले ही असहज हो जाती हो लेकिन रूसी लोगों के एक तबके का वो दिल जीत लेते हैं.

लेकिन ऐसा नहीं है कि रूस में हर कोई उनका दीवाना है. ऐसी आवाज़ें भी हैं जो सालों से बदलाव की मांग कर रही हैं.

पुतिन-ट्रंप

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यूनिवर्सिटी ऑफ़ हेल्सिंकी में राजनीति विज्ञान के प्रोफ़ेसर व्लादिमीर जेलमेन कहते हैं, "मॉस्को और सेंट पीटर्सबर्ग जैसे शहरों में रहने वाले नौजवान लोग, जिनके पास बेहतर तालीम है, यकीनन पुतिन के लगातार सत्ता में बने रहने का विरोध करते हैं. लेकिन दूसरी तरफ़ पुतिन के पास पुरानी पीढ़ी के, कम पढ़ा-लिखे और हाशिये पर रहने वाले लोगों का समर्थन है."

रूस के आम लोग पुतिन को लेकर जो भी रुख रखें, ये सवाल उठना लाजिम है कि वे कैसे इतने लंबे समय तक सत्ता में बने रहने में कामयाब हो सके और उनके राजनीतिक सफ़र में ऐसे कौन से पड़ाव थे जिन्हें मील का पत्थर कहा जा सकता है.

1. सत्ता के फलक पर पुतिन का अप्रत्याशित उदय (साल 1999)

साल 1999 में बोरिस येल्तसिन के इस्तीफ़े के बाद व्लादिमीर पुतिन देश के राष्ट्रपति बने. सोवियत संघ के विघटन के बाद बोरिस येल्तसिन ने रूस की कमान संभाली थी.

लेकिन येल्तसिन के बाद नेतृत्व की दावेदारी को लेकर संभावित उम्मीदवारों के बीच जबर्दस्त प्रतिस्पर्धा हुई और तब जाकर पुतिन को ये मौका मिला.

पुतिन

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विशेषज्ञों का कहना है कि तब पुतिन एक अनजाने से पूर्व केजीबी एजेंट थे कई वजहों से राष्ट्रपति पद के एक पर्फेक्ट कैंडिडेट भी.

रूसी सुरक्षा मामलों के जानकार और प्राग इंस्टीट्यूट फ़ॉर इंटरनेश्नल रिलेशंस के प्रोफ़ेसर मार्क गैलिओट्टी कहते हैं, "पुतिन की छवि एक ऐसे शख़्स की रही थी जो अपने बॉस को बचाने के लिए जाने जाते थे. जब वे मॉस्को के डिप्टी मेयर थे, तो उन्होंने उस वक्त के मेयर एनाटोली सोबचाक को भ्रष्टाचार के मामलों में गिरफ़्तारी से पहले हवाई जहाज में बिठा दिया था."

"पुतिन उस तुलनात्मक रूप से जवान और एक डायनमिक उम्मीदवार थे. लेकिन इन सबसे ऊपर जो बड़ी बात थी, वो ये कि उन्हें वफादार शख़्स के तौर पर देखा जा रहा था, जिस पर दांव लगाया जा सकता था."

इस वफ़ादारी ने सत्ता से विदा हो रहे बोरिस येल्तसिन और उनके परिवार की सुरक्षा की गारंटी दी थी. और पुतिन को इसलिए भी जाना जाता है कि वे अपने वादे पूरे करने वाले शख़्स रहे हैं.

यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ़ लंदन में रूसी राजनीति के प्रोफेसर बेन नोबल कहते हैं, "पुतिन ने न तो येल्तसिन पर कोई क़ानूनी कार्रवाई की और न ही उन्हें क़ैद करने की कोशिश की. और न ही उन्होंने नब्बे के दशक की नाकामियों के लिए बोरिस येल्तसिन को जिम्मेदार ही ठहराया."

"पुतिन तब चुनकर आए थे लेकिन उन्हें लोकप्रियता बाद में हासिल हुई. और ऐसा दूसरे चेचन युद्ध की वजह से हुआ. लोगों ने उन्हें एक कद्दावर शख़्स के तौर पर देखा जो चेचन्या पर रूस के नियंत्रण को फिर से हासिल कर रहा था. इस घटना को रूस की ताक़त के फिर से पुख़्ता होने के तौर पर भी देखा गया."

पुतिन

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सत्ता पर पुतिन की पकड़ मजबूत होने की एक वजह ये भी थी कि उनके कार्यकाल में रूसी लोगों का जीवनस्तर सुधरा.

यूनिवर्सिटी ऑफ़ हेल्सिंकी के प्रोफ़ेसर व्लादिमीर जेलमेन कहते हैं, "साल 2000 के दशक में रूस की जो आर्थिक तरक्की हुई, उससे पुतिन की लोकप्रियता तेजी से बढ़ी. मुझे लगता है कि येल्तसिन और उनके सहयोगियों ने किसी और को भी अपने उत्तराधिकारी के तौर पर चुना होता तो भी अस्सी के दशक की मंदी के बाद तेजी से हुए आर्थिक सुधार का फायदा मिलता और उसकी लोकप्रियता भी बढ़ती."

2. मिखाइल खोदोकोवस्की का मामला (साल 2003)

विशेषज्ञ इस बात पर सहमत हैं कि नब्बे के दशक में रूस का पतन नहीं होने की एक वजह ये भी थी कि बोरिस येल्तसिन, उनके राजनीतिक साथियों और रूस के कुलीन वर्ग के बीच एक किस्म का समझौता हो रखा था. सत्ता की तीनों धुरियों के बीच एक तरह का सामंजस्य था जिसमें सभी पक्षों के सहअस्तित्व को लेकर सहमति थी.

प्रोफेसर बेन नोबल कहते हैं, "लेकिन राष्ट्रपति बनते ही पुतिन ने ये घोषणा की कि ऐसा कोई करार अब अतीत का हिस्सा है. रूस के कुलीन वर्ग ने नब्बे के दशक में जो दौलत जुटाई थी, पुतिन ने उसके लिए तो छूट दे दी लेकिन साथ ही ये भी तय कर दिया कि मुल्क के सियासी मामलों में अब वे दखल नहीं दे सकेंगे. पुतिन के लिए रूस की सियासत पर अब उनका कब्ज़ा था."

मिखाइल खोदोकोवस्की

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लेकिन पुतिन के फ़ैसले से प्रभावित होने वाले इसी कुलीन वर्ग के अगुआ मिखाइल खोदोकोवस्की उनकी राय से सहमत नहीं हुए.

फोर्ब्स मैगज़ीन के मुताबिक़ मिखाइल खोदोकोवस्की रूस के सबसे दौलतमंद शख़्स और दुनिया के सबसे अमीर लोगों में से एक थे. लेकिन सरकार ने जैसे ही नब्बे के दशक में हुई धोखाधड़ी, गबन और टैक्स चोरी के इलज़ाम उन पर लगाए, मिखाइल खोदोकोवस्की की दौलत का बहुत बड़ा हिस्सा रातोंरात उनके हाथों से निकल गया.

प्रोफेसर बेन नोबल कहते हैं, "पुतिन और उनके क़रीबी लोगों ने मिखाइल खोदोकोवस्की को सज़ा दी. उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया. उनकी संपत्तियां ज़ब्त कर ली गईं. इसमें दुनिया की सबसे बड़ी तेल कंपनियों में से एक इओउकोस भी शामिल थी."

प्रोफ़ेसर नोबेल की राय में ये वो लम्हा था जो ये बताने के लिए काफी है कि व्लादिमीर पुतिन ने किस तरह से इतने लंबे समय तक सत्ता पर अपना नियंत्रण बनाए रखा है.

"इस घटना के बाद कुलीन वर्ग के लोगों के सामने स्पष्ट हो गया कि अगर वो मिखाइल खोदोकोवस्की का रास्ता चुनते हैं तो उनके साथ क्या हो सकता है."

3. गवर्नरों के सीधे चुनाव की व्यवस्था ख़त्म करने का फ़ैसला (2004)

ये सितंबर, 2004 की घटना है. नकाब पहने कुछ लोग हथियारों और असलहों से लैस नॉर्थ ओस्सेटिया के बेसलान के स्कूल नंबर वन में दाखिल हुए. उस दिन उस स्कूल की स्थापना दिवस का कार्यक्रम आयोजित हो रहा था. हमलावरों ने तकरीबन हज़ार लोगों को बंधक बना लिया, जिनमें बच्चे और शिक्षक भी शामिल थे. 50 घंटे तक अपहरण की ये घटना जारी रही.

पुतिन रूस

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आख़िरकार इस घटना में 331 लोग मारे गए जिनमें 186 बच्चे भी शामिल थे. ये वो लम्हा था जिसने दूसरे चेचन युद्ध को जारी रखने का मौका दे दिया. जब पुतिन राष्ट्रपति बने तो उनका इरादा स्पष्ट था. वे ऐसे ताकतवर शख़्स की छवि दिखाना चाहते थे जो चेचन रिपब्लिक पर रूस के नियंत्रण की गारंटी दे सकता था.

लेकिन बेसलान की घटना को रूस के चेचन्या पर नियंत्रण के ख़िलाफ़ चुनौती के रूप में देखा गया. स्कूल पर हमला करने वाले विद्रोही आज़ादी, रूस से रिश्ते ख़त्म करने और चेचन्या पर मॉस्को के नियंत्रण के ख़ात्मे की मांग कर रहे थे.

प्रोफेसर बेन नोबल का कहना है कि पुतिन ने इसे एक ताक़तवर नेता की उनकी छवि पर सीधे हमले के तौर पर देखा.

"पुतिन को लगा कि ये घटना इस बात का संकेत है कि रूसी फेडरेशन में सत्ता पर पूरी तरह से नियंत्रण हासिल करने के लिए उन्होंने जो कुछ किया था, वो काफी नहीं था. इसलिए उन्होंने इस मौके का इस्तेमाल रूस के प्रांतों में गवर्नरों के सीधे चुनाव की व्यवस्था ख़त्म करने के लिए किया."

प्रोफेसर बेन नोबल का मानना है कि ये वो घड़ी थी जब लोगों ने पुतिन को एक ऐसे राष्ट्रपति के तौर पर देखना बंद कर दिया जो रूस को लोकतंत्र के रास्ते पर आगे ले जाता. उन्हें एक ऐसे राष्ट्रपति के तौर पर देखा जाने लगा जिसका लोकतंत्र के प्रति नज़रिया काफी हद तक संकीर्ण था.

"वो चाहते थे कि कंट्रोल उनके हाथ में रहे और उन्हें कोई भी चुनौती नहीं दे सके. अगर किसी ने ऐसा करने की जुर्रत की तो उस शख़्स या फिर उस गुट का अच्छा अंजाम नहीं होने वाला था."

4. पुतिन-मेदवेदेव की टैंडेमोक्रेसी (2008)

साल 1993 का रूस का संविधान ये कहता है कि एक राष्ट्रपति केवल दो लगातार कार्यकाल तक इस पद पर बने रह सकता है. साल 2007 में बतौर राष्ट्रपति पुतिन का दूसरा कार्यकाल ख़त्म होने जा रहा था. उसी साल दिसंबर में पुतिन ने दिमित्री मेदवेदेव को अपने उत्तराधिकारी के तौर पर लॉन्च किया.

प्रोफ़ेसर व्लादिमीर जेलमेन याद करते हैं, "कई सालों की आर्थिक तरक्की के बाद पुतिन की लोकप्रियता आसमान छू रही थी. बहुत से लोग उनके नेतृत्व को बेहद कामयाब मान रहे थे."

यहां तक कि उनकी घोषणा से पहले कई लोगों को ये लग रहा था कि बोरिस येल्तसिन के उत्तराधिकारी का राजनीतिक करियर ख़त्म होने जा रहा है.

व्लादिमिर पुतिन

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लेकिन प्रोफेसर बेन नोबल बताते हैं कि दिमित्री मेदवेदेव को राष्ट्रपति पद पर अपना उत्तराधिकारी घोषित करने से पुतिन को चार सालों तक प्रधानमंत्री बनने और साल 2012 में राष्ट्रपति पद पर लौटने का मौका मिल गया.

"ये रूस में एक अजीब और नए तरह के राजनीतिक प्रयोग की शुरुआत थी जिसे टैंडेमोक्रेसी के नाम से जाना गया. दिमित्री मेदवेदेव के औपचारिक तौर पर रूस के राष्ट्रपति बने रहने के दौरान पुतिन की पकड़ देश पर बनी रही. लेकिन ऐसा नहीं था कि सब कुछ इतना आसान रहा."

"ऐसे सबूत हैं जो ये संकेत देते हैं कि मेदवेदेव ने कुछ मामलों में सत्ता पर पकड़ हासिल करने की पूरी कोशिश की. उन्होंने सुधार की कई परियोजनाएं शुरू कीं. ऐसा नहीं था कि मेदवेदेव हर बात पुतिन की हां में हां मिला रहे थे. ऐसे मामले सामने हुए जिनमें दोनों के बीच असहमतियां थीं."

रूसी समाज ने दिमित्री मेदवेदेव को स्वीकार कर लिया था लेकिन प्रोफ़ेसर व्लादिमीर जेलमेन कहते हैं, "अगर पुतिन ने किसी और को भी अपना उत्तराधिकारी चुना होता तो भी रूस के लोग उसे स्वीकार कर लेते. पुतिन को उस दौर में जबर्दस्त जनसमर्थन हासिल था."

5. संविधान में सुधार (2008)

साल 2008 के नवंबर महीने में रूस के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव ने मुल्क के संविधान में संशोधन के तीन प्रस्ताव रखे. इसमें एक संशोधन प्रस्ताव अनुच्छेद 81 और 91 से भी जुड़ा हुआ था. अनुच्छेद 81 में संशोधन के जरिए राष्ट्रपति पद का कार्यकाल चार से छह साल करने का प्रस्ताव रखा गया था जबकि अनुच्छेद 93 में बदलाव के जरिए रूस की संसद ड्यूमा के कार्यकाल को चार साल से बढ़ाकर पांच साल करने का प्रस्ताव रखा गया था.

पुतिन

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कैबिनेट के मंत्रियों को सालाना ड्यूमा के सामने रिपोर्ट करने के लिए प्रावधान किया गया था.

प्रोफ़ेसर व्लादिमीर जेलमेन कहते हैं, "पुतिन के लिए ये बहुत अच्छी बात थी क्योंकि दिमित्री मेदवेदेव ने आधिकारिक रूप से इसका प्रस्ताव रखा था, पुतिन ने खुद नहीं. ये वो बदलाव थे जिससे रूस के राष्ट्रपति को आठ साल के बजाय 12 साल तक सत्ता में बने रहने का अवसर मिल गया था."

"पुतिन उस वक़्त पृष्ठभूमि में रहे लेकिन दिमित्री मेदवेदेव के इस कदम का सबसे बड़ा फ़ायदा उन्हें ही मिला."

सत्ता में बने रहने के लिए जनमत संग्रह

इसी साल जनवरी के महीने में व्लादिमीर पुतिन ने संविधान में संशोधन के लिए प्रस्ताव रखा. इस जनमत संग्रह का पहला चरण पिछले गुरुवार से शुरू होकर इस बुधवार को ख़त्म हो गया.

अगर वे कामयाब होते हैं तो इससे पुतिन को राष्ट्रपति पद पर बने रहने के लिए दो और कार्यकाल मिल सकते हैं. अगर पुतिन ये कर पाने में कामयाब होते हैं तो वे सत्ता में 36 सालों तक बने रह सकते हैं.

सोवियत संघ पर तकरीबन तीन दशकों तक राज करने वाले स्तालिन से पुतिन आगे निकल जाएंगे.

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लेकिन क्या पुतिन साल 2036 तक रूस का नियंत्रण अपने हाथ में रखना चाहेंगे.

प्रोफेसर बेन नोबल कहते हैं, "इस सवाल का जवाब कोई नहीं जानता, शायद पुतिन भी नहीं. हमें फिलहाल इतना ही मालूम है कि पुतिन संविधान संशोधन के उस प्रस्ताव का समर्थन कर रहे हैं जिसे वेलेंटीना टेरेश्कोवा ने औपचारिक रूप से रखा है. पुतिन को उम्मीद है कि साल 2024 की स्थिति से निपटने में उनके कुछ हद तक मदद मिलेगी."

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