You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
रूस, तालिबान और अफ़ग़ानिस्तान में अमरीकी सैनिकों को 'मारने की डील' की कहानी
- Author, ओल्गा इफ़्शिना
- पदनाम, बीबीसी रूसी सेवा
एक पूर्व रूसी जासूस ने बीबीसी रूसी सेवा से कहा है कि रूसी ख़ुफ़िया एजेंसी 'एक ऐसी विशाल मशीन है जिसका मक़सद युद्ध कराना है.'
यह दावा ऐसे समय में किया गया है, जब न्यूयॉर्क टाइम्स, वॉशिंगटन पोस्ट और वॉल स्ट्रीट जर्नल ने रूसी सैन्य ख़ुफ़िया अधिकारियों के हवाले से कहा था कि उनका तालिबान से पिछले साल यह समझौता हुआ था कि अफ़ग़ानिस्तान में अमरीकी सैनिकों को मारने के लिए वो पैसा देंगे.
हालाँकि, अमरीका, रूस और तालिबान कमांडरों ने इन आरोपों को ख़ारिज किया है.
वहीं, मंगलवार को ब्रिटेन के रक्षा मंत्री ने कहा था कि वो ख़ुफ़िया संबंधित इन रिपोर्टों से परिचित हैं.
बेन वॉलेस ने कहा, "मुझे लगता है कि न्यूयॉर्क टाइम्स में इस मुद्दे पर रिपोर्ट थी. मैं सिर्फ़ यही कह सकता हूं कि मैं इससे वाकिफ़ हूँ."
उन्होंने संसदीय समिति से कहा कि ये सच हो या नहीं, वो इस पर कोई टिप्पणी नहीं करेंगे लेकिन 'हम इस पर क़दम उठाएँगे.'
रूसी जीआरयू ख़ुफ़िया एजेंसी
तीन अमरीकी अख़बारों ने व्हाइट हाउस सूत्रों के हवाले से दावा किया था कि रूसी अफ़सर जनरल स्टाफ़ ऑफ़ रशिया (जीआरयू) डायरेक्टरेट के विभागों के साथ कथित समझौते में शामिल थे.
ब्रिटेन में संसदीय रक्षा समिति के प्रमुख टोबायस एलवुड ने कहा कि वो अफ़ग़ानिस्तान में रूसी सैन्य ख़ुफ़िया की संभावित कार्रवाई के सवाल को संयुक्त राष्ट्र में उठाएंगे.
तालिबान को रूस के प्रतिबंधित चरमपंथी संगठनों की सूची में शामिल किया गया है. तालिबान ने रूस के साथ ऐसे किसी भी समझौतों को ख़ारिज किया है. वहीं रूस ने अख़बार की इन रिपोर्टों को 'झूठ' और 'बेतुका' बताया है.
ये भी पढ़ें: भारत चीन विवाद में रूस किसके साथ?
व्हाइट कॉलर्ड एजेंट और उनके ऑपरेशन
रूस के विदेश ख़ुफ़िया सेवा (एसवीआर) के पूर्व एजेंसी सर्गेई जिरनोफ़ से मैंने बात की.
उन्होंने मुझे बताया कि जीआरयू की कार्रवाई रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच चल रहे बड़े खेल का हिस्सा हो सकता है.
जीआरयू रूस के सैन्य ख़ुफ़िया एजेंसी के साथ सौदा करता है जबकि एसवीआर राजनीतिक ख़ुफ़िया चीज़ों को देखता है. ऐसा माना जाता है कि यह दोनों एक-दूसरे के साथ प्रतिस्पर्धा में हैं और रूस के राष्ट्रपति कार्यालय में अपनी पहुंच मज़बूत करना चाहते हैं.
जिरनोफ़ कहते हैं, "जीआरयू एक विशाल मशीन है जो युद्ध करने की दिशा में काम करती है. यह विभिन्न दिशाओं में विभिन्न तरीक़ों से काम करती है."
"जीआरयू में एक रणनीतिक ख़ुफ़िया सेक्शन है जो व्हाइट कॉलर्ड लोग हैं. और इन लोगों का काम होता है ग्राउंड पर ऑपरेशन को अंजाम दिलवाना. इसके अलावा राजनीतिक पहलुओं को भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जाता. पुतिन को अपने वहां हाथ फैलाने में ज़्यादा मज़ा आता है जहां से प्रतिशोध की कोई उम्मीद नहीं होती."
यूनिट 29155
न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार, जीआरयू की यूनिट 29155 तालिबान के साथ इस समझौते के पीछे थी.
पत्रकारों का दावा है कि पिछले साल तक अमरीकी काउंटर इंटेलिजेंस को इस टुकड़ी के बारे में पता नहीं था.
अख़बार के लेख में दावा है कि सैन्य ख़ुफ़िया एजेंसी की यह यूनिट 'यूरोप को अस्थिर करने के अभियान' के लिए ज़िम्मेदार रही है, साथ ही पूरी दुनिया में विशेष अभियानों और आत्मघाती हमलों को आयोजित करती रही है.
ट्रेनिंग सेंटर नंबर 161
अख़बार में सैन्य यूनिट 29155 का ज़िक्र है, जिसे रूस में ख़ुफ़िया स्पेशलिस्ट ट्रेनिंग सेंटर नंबर 161 के रूप में जाना जाता है.
यह सोवियत संघ के समय से है. इसकी शुरुआत मॉस्को में 1962 में हुई थी. इसका काम सेना की विभिन्न ब्रांच में काम कर रहे अफ़सरों को ख़ुफ़िया यूनिट में दोबारा प्रशिक्षण देना था.
ऑनलाइन स्रोतों के अनुसार, यह सेंटर बाद में उपकरण-हथियारों, खाद्य गोदामों को ख़राब करने और दुश्मनों के बुनियादी ढांचे को कमज़ोर करने की ट्रेनिंग देने लगा.
1990 में यह केंद्र आतंक-निरोधी अभियानों की ख़ास ट्रेनिंग देने लगा.
जीआरयू के पूर्व अफ़सरों का कहना है कि नए रंगरूटों को राजनीतिक या रणनीतिक ख़ुफ़िया जानकारी के लिए तैयार नहीं किया जाता था. उनको सिर्फ़ हथियार चलाने के अलावा दुश्मन को नुक़सान पहुंचाने की ट्रेनिंग दी जाती थी.
स्पार्क-इंटरफ़ैक्स डाटाबेस के अनुसार, इस यूनिट के प्रमुख अभी जनरल आंद्रेई एवेरयानोफ़ हैं.
सॉल्सबरी नर्व एजेंट हमला
न्यूयॉर्क टाइम्स के संवाददाताओं और बेलिंगकैट जांचकर्ताओं ने पाया है कि एवेरयानोफ़ जीआरयू के अफ़सर एनातोली चेपिगा और एलेक्ज़ेंडर मिशन की कमांडिंग अफ़सर रहे हैं.
ब्रिटेन की विभिन्न एजेंसियों ने पाया था कि इन दोनों ने सॉल्सबरी में जीआरयू के पूर्व अफ़सर सर्गेई स्क्रिपल को ज़हर देने की कोशिश की थी.
एवेरयानोफ़ से पहले सैन्य यूनिट नंबर 29155 का नेतृत्व जनरल दिमित्री प्रोन्यागिन कर रहे थे.
जनरल प्रोन्यागिन 2014 में क्रीमिया पर रूस के क़ब्ज़े की प्रक्रिया में शामिल थे. वो सीरिया में सैन्य अभियानों में भी भाग ले चुके हैं.
1997 में उन्हें रूस का सर्वोच्च सम्मान 'हीरो ऑफ़ रशिया' मिल चुका है. उनको यह सम्मान 'छिपे' आदेश के तहत दिया गया जो उनको रूस के लिए ख़ुफ़िया अभियान चलाने के लिए दिया गया.
रूस और अमरीका की प्रतिक्रिया
रूसी प्रशासन ने साफ़ कहा है कि जीआरयू और तालिबान के बीच किसी भी साज़िश को लेकर कोई सवाल ही पैदा नहीं होता है.
रूसी राष्ट्रपति के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोफ़ ने कहा, "पहली बात तो यह है कि ये आरोप झूठे हैं और दूसरा ये कि अमरीका की स्पेशल सर्विसेज़ राष्ट्रपति को लेकर जवाबदेह हैं और हमें राष्ट्रपति ट्रंप के हालिया बयानों पर ध्यान देना चाहिए. वो इन रिपोर्ट पर पहले ही अपनी प्रतिक्रिया दे चुके हैं."
अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा था कि यह पहली बार है जब वो सुन रहे हैं कि अमरीकी ख़ुफ़िया एजेंसी उन्हें पहले ही जीआरयू और तालिबान की साज़िश के बारे में बता चुकी थी.
उन्होंने ट्विटर पर लिखा था कि उनको इस बारे में पहली बार पता चला है और न ही उप-राष्ट्रपति ने उन्हें कुछ बताया था.
रूस का बदला या सामान्य अभियान?
न्यूयॉर्क टाइम्स ने व्हाइट हाउस के एक अनाम सूत्रों के हवाले से बताया है कि तालिबान के साथ सौदा करके जीआरयू के अधिकारी अमरीका से फ़रवरी 2018 में सीरिया में हुई झड़प का बदला लेना चाहते थे.
देर एज़-ज़ोर में हुई लड़ाई में अमरीकी सेना ने सीरियाई राष्ट्रपति बशर अल-असद के समर्थन वाले सैकड़ों लड़ाकों को मार दिया था.
अमरीकी दस्तावेज़ों के अनुसार, इन लड़ाकों में दर्जनों रूसी नागरिक थे जो सीरिया में एक निजी सैन्य कंपनी 'वैगनर' के ज़रिए लाए गए थे.
एसवीआर के पूर्व एजेंट जिरनोफ़ के अनुसार, अफ़ग़ानिस्तान में 1979-1989 में युद्ध शुरू होने से पहले सोवियत और अमरीकी ख़ुफ़िया एजेंट में एक छिपा हुआ टकराव होता रहा है.
वो कहते हैं, "अफ़ग़ानिस्तान में सोवियत अभियान के दौरान वहां कोई अमरीकी सैनिक नहीं था. जबकि सीआईए के लोग अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान में थे और इन लोगों को जीआरयू ने निशाना बनाया. लेकिन उस समय रूसियों ने इन अमरीकियों को जान से मारने की कोशिश नहीं की. वो केवल इन्हें रंगे हाथों पकड़ना चाहते थे और दिखाना चाहते थे कि कैसे सीआईए जासूसों के ज़रिए दोनों देशों में इस्लामी समूहों को अवैध तरीक़े से समर्थन दे रहा है."
अमरीका की अफ़ग़ानिस्तान में हार
अमरीकी रक्षा विभाग के अनुसार, 2019 में अफ़ग़ानिस्तान में 22 अमरीकी सैनिकों की मौत हुई थी.
2015 में 'गार्ड ऑफ़ फ़्रीडम' अभियान की शुरुआत के बाद अमरीका का यह सबसे बड़ा नुक़सान था.
2019 में अफ़ग़ानिस्तान में चार सैन्य जवान ग़ैर-सैन्य गतिविधियों में मारे गए थे. इनमें तकनीकी ख़राबी के कारण हुई हेलिकॉप्टर दुर्घटना भी शामिल है. बाकी के 18 जवान गोलीबारी या देसी बमों से हमले में मारे गए थे.
ये लगभग सभी जवान अमरीकी सेना के एलीट यूनिट्स का हिस्सा थे.
मारे गए जवानों में 10 अमरीकी स्पेशल ऑपरेशन सेना के सदस्य, तीन स्पेशल एयरफ़ोर्स के जवान और तीन मरीन शामिल थे.
2020 की शुरुआत में अफ़ग़ानिस्तान में 9 अमरीकी सैनिकों की मौत हुई है.
फ़रवरी के अंत में अफ़ग़ानिस्तान में शांति प्रक्रिया के लिए अमरीका और तालिबान में एक समझौते पर सहमति बनी थी.
समझौते के तहत अमरीकी सैनिकों को चरणबद्ध तरीक़े से अफ़ग़ानिस्तान से निकलना है और तालिबान और अलक़ायदा समेत उसके सहयोगी अमरीकी सैनिकों पर हमला नहीं करेंगे.
अप्रैल से एक भी अमरीकी सैनिक तालिबान के हाथों नहीं मारा गया है और अफ़ग़ानिस्तान में अमरीकी सैनिकों की संख्या 13,000 से 8,600 हो चुकी है.
ब्रिटेन के जवानों पर ख़तरा?
न्यूयॉर्क टाइम्स संवाददाताओं ने अमरीकी ख़ुफ़िया एजेंसियों के हवाले से बताया था कि तालिबान ने ब्रिटेन के जवानों को पैसे के बदले मारने का वादा किया था.
मंगलवार को ब्रिटेन की संसदीय समिति के रक्षा मंत्री बेन वॉलेस ने कहा, "ख़ुफ़िया मामलों पर मैं टिप्पणी नहीं करूंगा और हमने अपने जवानों को सुरक्षित रखने के लिए कई क़दम उठाए हैं और उनको तैनात करने के बाद सुरक्षित रख रहे हैं."
न्यूयॉर्क टाइम्स के दावे की विश्वसनीयता को परखना बेहद मुश्किल है क्योंकि 2016 से अफ़ग़ानिस्तान में संघर्ष के बाद से अब तक ब्रिटेन के एक भी जवान की मौत नहीं हुई है.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)