अमरीका यूरोप से सेना कम कर एशिया में क्यों लाना चाहता है?

अमरीकी सेना

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    • Author, शुभम किशोर
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

भारत-चीन के बीच जारी विवाद के बीच अमरीका के विदेश मंत्री का एक बयान आया है. गुरुवार को दिए अपने बयान में माइक पोम्पियो ने कहा कि अमरीका दुनियाभर में तैनात अपनी सेनाओं की समीक्षा कर रहे हैं ताकि चीन के कारण भारत, मलेशिया, इंडोनेशिया और फिलीपींस के जैसे देशों के लिए जो ख़तरा उत्पन्न हो रहा है उससे निपटा जा सके.

2020 ब्रस्ल्स फ़ोरम में एक सवाल के जवाब में पोम्पियो ने कहा, "हम ये सुनिश्चित करेंगे, कि पीप्लस लिबरेशन अर्मी से सामना करने के लिए तैयार रहें. हम समझते हैं कि ये हमारे समय की एक चुनौती है और हम ये सुनिश्चित करेंगे कि इसके लिए हमारे संसाधन सही जगह पर मौजूद हों,"

किन सैन्य टुकड़ियों की बात कर रहे हैं?

अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार मुक्तदर ख़ान के मुताबिक, "ये इशारा यूरोपियन एलाइज़ की तरफ़ है. अमरीका ने दूसरे विश्य युद्ध के बाद जर्मनी और जापान पर कब्ज़ा किया था. अभी भी दोनों ही देशों में अमरीका की सैन्य टुकड़ियां मौजूद हैं."

ख़ान आगे बताते हैं, "जर्मनी में क़रीब 40 हज़ार फ़ौजी हैं और 15 हज़ार असैनिक बल हैं. यानि क़रीब 65 हज़ार से 70 हज़ार लोग हैं जिन्हें अमरीका हटाना चाह रहा है. पहले ट्रंप ने उन्हें पोलंड की तरफ भेजने की भी बात की थी."

अंतर्राष्ट्रीय मामलों के जानकार हर्ष पंत बताते है, "ओबामा के समय से ही बात चल रही थी कि सैन्य टुकड़ियों को बैलेंस किया जाए, लेकिन वो सेना को शिफ्ट नहीं कर पाए. ट्रंप भी काफ़ी समय से ये चाह रहे थे."

बयान के क्या मायने?

पंत के मुताबिक, "ये एक तरीके से यूरोप के लिए अमरीका की चेतावनी है और वो चीन को भी चेतावनी देना चाह रहे हैं कि अब वो एशिया- पैसिफ़िक की ओर मुड़ रहे हैं. ये बात तो पहले से चल रही थी लेकिन ट्रंप को अब ये एक मौका मिल गया है."

हालांकि मुक्तदर ख़ान इस बयान को ध्यान बंटाने का ज़रिए मानते हैं. उन्होंने बीबीसी को बताया, "अमरीका में कोविड के मामले बढ़ रहे हैं, ये हफ़्ता अमरीका के लिए सबसे ख़राब ग़ुज़रा है, इस मामले से ध्यान बंटाने के ट्रंप लगातार चीन के ख़िलाफ़ बातें कर रहे हैं. मैं इस बयान को उसी संदर्भ में देखता हूं.

ख़ान आगे बताते हैं, "जो सैन्य टुकड़ियां वहां पर हैं उनके पास न तो समुद्र में लड़ने की ट्रेनिंग है, ना हिमालय जैसी जगहों पर लड़ने की. ये बिल्कुल भी गंभीर बयान नहीं है."

ख़ान भी मानते हैं कि अमरीका मिलिट्री ख़र्चे कम करना चाह रहा है, लेकिन उनके मुताबिक किसी दूसरे जगह पर इन्हें नहीं भेजा जाएगा.

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अमरीका कहां कर सकता है तैनाती?

जानकारों का मानना है कि अगर अमरीका सैन्य टुकड़ियों की तैनाती चाहता है तो उसके पास ज़मीन पर बेस की कमी नहीं है. इसके अलावा वो इसके लिए नौसेना का इस्तेमाल बड़ी मात्रा में कर सकता है.

ख़ान के मुताबिक,"सेंट्रल एशिया में अमरीका ने ईरान को घेरने के लिए कई बेस बनाए थे जैसी कि कज़ाकिस्तान और उज़बेकिस्तान में. उस रास्ते से अमरीका चीन के बॉर्डर पर आ सकता है. जहां तक उनकी नौसेना की बात है, तो अमरीकी नौसेना की जो पूर्वी एशिया में उपस्थिति है, वो उस इलाके से सभी नौसेनाओं से बड़ी है."

भारत के लिए क्या महत्व

ख़ान के मुताबिक अमरीका को भारत पर दबाव बनाने का एक मौका मिल गया है. अब ये भारत के ऊपर है कि वो इसे किस तरह से देखता है.

वो बताते हैं, "भारत ये चाहता है कि वो अपनी विदेश नीति आज़ाद रखे, शुरू से ही भारत की यही नीति रही है. अगर भारत अमरीका के इस दबाव में आता है तो विदेश नीति की आज़ादी ख़त्म हो जाएगी. भारत की डिफेंस पॉलिसी कैसी होगी, वो किस तरह के हथियार ख़रीदेगा और वो रूस से हथियार नहीं ख़रीद पाएगा."

भारत क्या अमरीका के सुरक्षा आश्वासन के बदले ये क़ीमत अदा करने को तैयार होगा? ख़ान का मानना है कि मौजूदा सरकार ऐसा नहीं चाहेगी.

नरेन्द्र मोदी और डोनल्ड ट्रंप

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ख़ान बताते हैं, "आपने ये भी बयान सुना होगा कि जो बाइडन ने कहा है कि अगर वो राष्ट्रपति बनें तो वो चाहेंगे कि भारत कश्मीर में अपनी पॉलिसी को वापस ले. उन्होंने एनआरसी और सीएएए के ख़िलाफ़ भी सीधे तौर पर बयान दिया है,"

ख़ान आगे कहते हैं, "अगर अमरीका में डेमोक्रेटिक राष्ट्रपति आ जाते हैं और भारत सुरक्षा के लिहाज़ से अमरीका पर निर्भर हो जाता है, तो कई मामलों में अमरीका का दख़ल हो जाएगा. ये भारत के लिए एक चुनौती होगी. मुझे नहीं लगता भारत की मौजूदा सरकार इतनी आसानी अपनी आज़ादी को खोना चाहेगी."

ख़ान इस बात पर ज़ोर देते हैं कि निकट भविष्य में इस बयान का कोई असर नहीं होगा.

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