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पाकिस्तान में हिंदुओं के धर्म परिवर्तन के मामले क्या अब रुक जाएंगे
- Author, रियाज़ सुहैल
- पदनाम, बीबीसी उर्दू, कराची
पाकिस्तान की केंद्रीय कैबिनेट में 5 मई, 2020 को प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग की स्थापना की गई थी.
इस तरह के विभाग को स्थापित करने का आदेश 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फ़ैसले में दिया था. वैसे तो ये आयोग सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के छह साल बाद स्थापित हुआ लेकिन शुरू ही से ऐसी आवाज़ें उठने लगीं की वर्तमान स्थिति में ये धार्मिक अल्पसंख्यकों को न्याय दिलाने में काफ़ी नहीं है.
अल्पसंख्यक आयोग बनाने का मुख्य उद्देश्य अल्पसंख्यकों को धार्मिक आज़ादी उपलब्ध कराना और ऐसे क़दम उठाना हैं जिससे वो मुख्यधारा का पूरी तरह से हिस्सा बन सकें और मुख्यधारा में उनकी पूरी तरह से भागीदारी हो.
लेकिन हाल ही में घटी कुछ घटनाओं को देखकर लगता है कि इस बारे में लोगों की चिंताएं ग़लत नहीं थीं.
इसका ताज़ा उदाहरण सिंध में श्रीमती मेघवाड़ का केस है जो 18 महीने पहले लापता हो गई थी और बाद में एक दरगाह के गद्दीनशीन पर उनके अपहरण का आरोप लगा था.
जबरन धर्म परिवर्तन की पुष्टि करते हैं संगठन
बरामद होने पर ईद के फ़ौरन बाद श्रीमती मेघवाड़ ने उमरकोट की एक स्थानीय अदालत में एक बयान दिया जिसमें उन्होंने आरोप लगाया कि उन्हें '18 महीने पहले अग़वा करके ज़बरदस्ती उनका धर्म परिवर्तन कराया गया, इसके बाद काग़ज़ात पर हस्ताक्षर कराये गए और इतने लम्बे समय तक जिस्मफ़रोशी (वैश्यावृति) के लिए मजबूर किया गया.'
कोर्ट ने इस हलफ़नामे के बाद उन्हें उनके माता-पिता को सौंप दिया.
ढरकी की दरगाह भरचोंडी के गद्दीनशीन के भाई मियां मिट्ठू के बाद उमरकोट के पीर अय्यूब सरहिंदी दूसरे गद्दीनशीन हैं जिन पर हिन्दू लड़कियों के धर्म परिवर्तन कराने के आरोप हैं लेकिन दोनों का कहना है कि वो धर्म परिवर्तन या निकाह लड़कियों की मर्ज़ी से कराते हैं.
सिंध में हिन्दू,पंजाब में ईसाई और ख़ैबर पख़्तूनख़्वाह का कैलाश समुदाय, जबरन धर्म परिवर्तन की शिकायत पिछले कई सालों से करते आ रहा है. ह्यूमन राइट्स कमीशन समेत मनावाधिकार के दूसरे संगठन भी इन शिकायतों की पुष्टि करते हैं.
ह्यूमन राइट्स कमीशन की धर्म या मान्यताओं की आज़ादी के बारे में 2018 की एक समीक्षा रिपोर्ट के अनुसार हर साल अल्पसंख्यक समुदाय से संबंध रखने वाली लगभग एक हज़ार लड़कियों के जबरन धर्म परिवर्तन की घटनाएं सामने आती हैं, जिनमें अधिकतर लड़कियों की उम्र 18 साल से कम होती है.
'जबरन धर्म परिवर्तन पड़ोसी देश का प्रोपेगेंडा'
पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय धर्म परिवर्तन को अपनी सबसे बड़ी समस्या समझते हैं.
सत्ताधारी पार्टी तहरीक ए इंसाफ़ से नेशनल असेंबली के सदस्य लाल चंद माल्ही और मुस्लिम लीग (नवाज़) से तहरीक ए इंसाफ़ में शामिल होने वाले असेंबली मेम्बर रमेश वांकवानी भी अपने भाषणों में ये बात कहते रहे हैं.
लेकिन हाल ही में स्थापित किए गए राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के प्रमुख चेला राम केवलानी जबरन धर्म परिवर्तन के मामले को अंतरराष्ट्रीय मीडिया और पड़ोसी देश का प्रोपेगेंडा बताते हैं.
चेला राम पाकिस्तान के मशहूर व्यापारी हैं जो चावल निर्यात करते हैं और वर्तमान कार्यभार से पहले वो सिंध प्रांत में तहरीक ए इंसाफ़ पार्टी के उपाध्यक्ष के पद पर रहे हैं जिससे अब उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया है.
अल्पसंख्यक आयोग में मुस्लिम भी
कैबिनेट के एक प्रशासनिक आदेश के बाद अल्पसंख्यक आयोग गठित किया गया है, जिसमें हिन्दू समुदाय के अलावा ईसाई, पारसी, सिख और कैलाश समुदाय को भी प्रतिनिधित्व दिया गया है.
इसके अलावा काउंसिल ऑफ़ इस्लामिक आइडियोलॉजी के अध्यक्ष समेत दो मुस्लिम सदस्य भी इसका हिस्सा हैं.
चेला राम कहते हैं कि 'मैं समझता हूँ कि इनके बिना अल्पसंख्यकों की समस्याओं का हल नहीं निकल सकता क्योंकि अल्पसंख्यकों की समस्या इनकी भी समस्या है.'
अल्पसंख्यक आयोग के प्रमुख चेला राम समेत डॉक्टर जयपाल छाबड़ा और राजा क़वी को सदस्य नामित किया गया है. डॉक्टर जयपाल का सम्बन्ध तहरीक ए इन्साफ़ से है जबकि राजा क़वी एफ़बीआर के उच्च पद से रिटायर हुए हैं.
दलितों को नहीं दी गई जगह
आयोग में शिड्यूल कास्ट या दलितों को कोई प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया है.
चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार हिन्दू वोटरों की संख्या 17 लाख से अधिक है जिनमें अधिकतर सिंध प्रान्त में रहते हैं और उनमें थार और अमरकोट ज़िले की चालीस-चालीस प्रतिशत आबादी हिन्दू है.
याद रहे कि दलित जाति की ज़्यादा संख्या इन्हीं ज़िलों में है.
पाकिस्तान पीपल्ज़ पार्टी के दलित असेम्ब्ली मेम्बर सुरेंद्र वलासाई का कहना है 'दलित अल्पसंख्यक आबादी का आधा हिस्सा है और उन्हें आयोग में नज़रअंदाज़ करना पक्षपात है. सरकार को चाहिए था कि इस आयोग को तहरीक ए इन्साफ का पार्टी विभाग बनाने के बजाए इसमें अल्पसंख्यकों के बुद्धिजीवी लोगों को शामिल करती.'
अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष चेला राम केवलानी का कहना है कि 'कोई अपने आपको शिड्यूल कास्ट न समझे. सभी सदस्यों का उद्देश्य समस्याओं का हल निकालना है.'
पाकिस्तान पीपल्ज़ पार्टी की पिछली सरकार ने जबरन धर्म परिवर्तन के ख़िलाफ़ सिंध असेंबली से एक क़ानून भी पास किया था. बाद में गवर्नर ने इसमें कुछ संशोधन के सुझाव दिए थे लेकिन अभी तक संशोधित क़ानून असेंबली फ़्लोर पर नहीं लाया गया.
ये बिल मुस्लिम लीग फ़ंक्शनल के सदस्य नंद कुमार ने तैयार किया था, जिनका कहना है कि पीपल्ज़ पार्टी दबाव में आकर ये बिल पेश नहीं कर रही है. जमीयत उलेमा ए इस्लाम के साथ-साथ मियां मिट्ठू, पीर अय्यूब जान सरहिंदी समेत कई धार्मिक संगठनों ने इस बिल का विरोध किया था.
राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष चेला राम कहते हैं कि अगर ऐसी घटनाएं हुईं तो उनके लिए भी हम कोई नीति बनाएंगे.
उनका कहना था कि 'सिंध में जबरन धर्म परिवर्तन की घटनाएं होती रहती हैं इस बात से इंकार नहीं है. लेकिन ऐसी घटनाएं तो मुस्लिम समुदाय में भी होती हैं महिला को अपराधी घोषित करके मारा जाता है. अगर हिन्दू का अपहरण किया जाता है तो मुसलामानों का भी अपहरण होता है. असल में हमारे यहां पर ऐसी कोई घटना होती है तो पड़ोसी देश और वैश्विक मीडिया बढ़ा-चढ़ाकर दिखाता है.'
राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग की प्राथमिकता क्या होगी?
इस बारे में चेला राम केवलानी का कहना है कि वो पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए नीति बनाएंगे,जो पूजा स्थल हैं उन पर भूमाफ़ियाओं के क़ब्ज़े हैं उनके लिए नीति बनाएंगे, इसके अलावा नौकरियों में पांच प्रतिशत आरक्षण जो कई विभागों में लागू नहीं हो रहा है ये सुनिश्चित कराया जायेगा कि ये लागू हो. होली और दिवाली पर छुट्टी होनी चाहिए इस पर भी नीति बनाएंगे.'
पेशावर में ईसाई समुदाय के गिरजाघर पर 22 सितम्बर 2013 को हुए हमले में 100 से अधिक ईसाई नागरिकों की मौत की घटना में सुरक्षा इन्तिज़ामों में कमी का उस समय के चीफ़ जस्टिस तसद्दुक़ हुसैन जीलानी ने ख़ुद नोटिस लेते हुए जस्टिस शेख़ अज़मत सईद और जस्टिस मुशीर आलम के साथ तीन जजों की बेंच का गठन किया था.
इस बेंच को अल्पसंख्यकों के जान-माल, अधिकार और आज़ादी के हवाले से संविधान के आर्टिकल 20 के तहत ठोस क़ानून बनाने के लिए आधार तैयार करना था और सरकार को व्यावहारिक क़दम उठाने के लिए बाध्य करना था.
इन तीन जजों की बेंच ने 19 जून 2014 को राष्ट्रीय अल्पसंख्यक अधिकार परिषद बनाने के आदेश दिए, जिसके लिए पूर्व आईजी शुऐब सुड़ल की अध्यक्षता में अंतरिम आयोग का गठन किया गया, जिसके सदस्य मुस्लिम लीग (नवाज़) के पूर्व और मौजूदा तहरीक ए इंसाफ़ के सदस्य रमेश वांकवानी और जस्टिस तसद्दुक़ हुसैन जीलानी के बेटे थे.
डॉक्टर शुएब सुड़ल ने सरकार के हालिया आयोग के गठन को सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज किया है.
उन्होंने पिटीशन में कहा है कि राष्ट्रीय आयोग के गठन के लिए उन्होंने चारों प्रांतीय सरकारों, अल्पसंख्यकों, सिविल सोसायटी से परामर्श किया और आयोग के गठन के लिए क़ानूनी मसौदा तैयार किया, उन्हें उम्मीद थी कि धार्मिक मामलों का मंत्रालय इस पर अपना पक्ष रखेगा लेकिन ऐसा नहीं हो सका.
उन्होंने अपनी अर्ज़ी में कहा है कि 'आयोग के गठन के लिए धार्मिक मामलों के मंत्रालय ने उनसे कोई सलाह भी नहीं ली, जब एक आयोग पहले से मौजूद है तो ये दूसरा आयोग क्यों गठित किया गया है. धार्मिक मामलों के मंत्रालय ने अदालत में किये गए वादे को तोड़ा है. ये आयोग धार्मिक मामलों के मंत्रालय के रहमो करम पर है इसकी संवैधानिक हैसियत नहीं, जबकि उनकी तरफ़ से अल्पसंख्यक आयोग को भी राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, राष्ट्रीय बाल आयोग और महिला आयोग की तरह संवैधानिक और क़ानूनी संस्था बनाने की सिफ़ारिश की गई थी.'
नेशनल असेंबली में अल्पसंख्यक आयोग की स्थापना के लिए दो सदस्यों ने एक बिल पेश किया था, जिसमें बताया गया था कि अध्यक्ष के चुनाव के लिए अख़बारों में विज्ञापन दिया जाएगा. इसके बाद जो नाम आएंगे प्रधानमंत्री, विपक्षीय नेता की सलाह से उन्हें नामित करेंगे और सभी धार्मिक अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधियों को प्रतिनिधित्व दिया जायेगा.
सरकार ने इस बिल को असेंबली से मंज़ूर कराने के बजाए कैबिनेट के एक फ़ैसले के तहत इस आयोग का बिल मंज़ूर कर लिया, जिसके बाद अध्यक्ष के रूप में चेला राम केवलानी को नामित करने का ऐलान किया गया.
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