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पाकिस्तान से आए हिंदू शरणार्थी बोले, 'होली-दिवाली से भी बड़ा दिन'
- Author, गुरप्रीत सैनी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
'नागरिकता' को मिलेगी नागरिकता...
सात साल पहले पाकिस्तान से आकर भारत में बसीं हिंदू शरणार्थी मीरा ने अपनी नन्ही पोती की ओर देखकर यही कहा.
दरअसल उनकी पोती का जन्म उस दिन हुआ, जब लोकसभा में नागरिकता संशोधन विधेयक 2019 पारित किया गया था.
उनके घर में एक दिन में ही दो ख़ुशखबरी आई. उन्हें सालों का अपना इंतज़ार ख़त्म होता दिख रहा था, और इसी ख़ुशी में उन्होंने अपनी नन्ही पोती का नाम 'नागरिकता' रख दिया.
मीरा कहती हैं, "पाकिस्तान में मैंने अपने बेटे का नाम भारत रखा था और बेटी का नाम भारती रखा था. फिर हम भारत आ गए. अब भारत में बात चल रही है कि हमें नागरिकता मिल सकती है, तो मैंने सोचा कि अपनी पोती का नाम 'नागरिकता' रखती हूं. ये बच्ची होते ही नागरिकता की बात शुरू हो गई. क्या पता, इसी के भाग्य से हमें नागरिकता मिलने जा रही है."
बच्ची के दादा सुखनंद कहते हैं, "आज हमारे लिए होली-दिवाली से भी बड़ा त्योहार है, क्योंकि आज हमें अपनी नागरिकता मिलने जा रही है."
इस परिवार की तरह ही, दिल्ली में मजनू का टिला स्थित पाकिस्तान से आए हिंदू शरणार्थियों की इस बस्ती में हर चेहरे पर ख़ुशी है.
इस शरणार्थी बस्ती में 140 हिंदू परिवार रहते हैं, जिनमें क़रीब सात सौ लोग हैं. देश में अलग-अलग हिस्सों में पाकिस्तानी से आए हिंदुओं की ओर भी कई बस्तियां हैं.
'नागरिकता' के परिवार की ही तरह बस्ती का हर चेहरा खिला हुआ है, क्योंकि इन्हें अब भरोसा हो चला है कि नागरिकता संशोधन बिल के संसद से पास होने के बाद इनके 'अच्छे दिन' अब आने वाले हैं. इन्होंने तो मान लिया है कि बिल पास होते ही इन्हें नागरिकता मिल गई है, बस अब कागज़ी औपचारिकता ही पूरी करना बाक़ी है.
जिस समय देश के कई हिस्सों में नागरिकता संशोधन विधेयक पर विवाद हो रहा है और लोग ग़ुस्से में हिंसा पर उतर आए हैं, उस वक़्त इन पाकिस्तानी हिंदू शरणार्थियों की ख़ुशी का ठिकाना नहीं है.
ये लोग वर्षों से उस पल का इंतज़ार कर रहे हैं, जब इन्हें भारत की नागरिकता मिल जाएगी और ये लोग 'हिंदुस्तानी' कहलाएंगे.
बेहतर भविष्य की तलाश में भारत आए
सोना दास पाकिस्तान में सिंध प्रांत के हैदराबाद में रहते थे. जहां उनके पास ज़मीन जायदाद, खेत-खलिहान सब था.
वो कहते हैं कि हिंदू होने की वजह से उनके साथ भेदभाव किया गया, उन्हें परेशान किया गया, उनकी संपत्ति हड़प ली गई, जिसके चलते उन्होंने पाकिस्तान छोड़कर भारत आने का फ़ैसला किया.
सोना दास कहते हैं, "हमारे धर्म पर आंच आ रही थी. मेरे लिए धर्म सबसे ज़रूरी थी. मुझे उसकी रक्षा करनी थी. इसलिए मैंने परिवार के साथ पाकिस्तान छोड़ने का फ़ैसला किया."
कई अपने पीछे छूटे
सोना दास की तरह बल देवी भी अपने ससुराल वालों के साथ भारत आ गई थीं. लेकिन उनके मायके वाले पीछे ही छूट गए.
भारत आने के बाद वो कभी वापस पाकिस्तान अपने मायके वालों से मिलने नहीं गईं. उन्हें डर था कि अगर वो फिर से पाकिस्तान गईं तो भारत में नागरिकता मिलने में दिक्कत आ सकती है.
अब उन्हें उम्मीद जगी है. वो कहती हैं कि भारतीय नागरिक बनने के बाद वो बेहिचक पाकिस्तान जा सकेंगे और उनके मायके वालों के लिए भी भारत आने के रास्ते खुल जाएंगे.
कई माएं बच्चों को छोड़कर आईं
हिंदू शरणार्थी बस्ती के प्रधान सुखनंद बताते हैं कि कई औरतों को अपने बच्चे पाकिस्तान में छोड़कर आना पड़ा.
वो बताते हैं कि कई सालों पहले 445 लोगों का जत्था, तीर्थ यात्रा का वीज़ा लेकर भारत आया और फिर यहीं रह गए.
वो बताते हैं कि उस जत्थे में एक महिला थी, जिन्होंने भारत आने से एक दिन पहले ही अपने बच्चे को जन्म दिया. लेकिन बच्चे के कागज़ात नहीं होने की वजह से उन्हें बच्चे को वहीं अपने रिश्तेदारों के पास छोड़कर आना पड़ा. वो बताते हैं कि ऐसी और भी कई औरतें हैं जिन्हें मजबूरी में अपने बच्चों को वहीं छोड़ना पड़ा.
इन बिछड़ी माओं को उम्मीद है कि अब उनके बच्चे भी पाकिस्तान से भारत आकर उनके साथ रह सकेंगे.
'ननद को उठाकर ले गए'
यशोदा जब भारत आईं थी, तब उनकी शादी नहीं हुई थी. भारत आकर शादी हुई और अब उनके तीन बच्चे हैं.
वो बताती हैं कि वो वहां पढ़ नहीं सकीं. लेकिन अब वो अपने बच्चों को पढ़ा लिखाकर काबिल बनाना चाहती हैं.
यशोदा उस घटना के बारे में बताती हैं, जिसके बाद उन्होंने और उनके परिवार ने पाकिस्तान छोड़ने का फैसला कर लिया था, "मेरी ननद को उठाकर ले गए थे, दो-तीन महीने तक उसका कुछ पता नहीं चला. क्या पता उसका धर्मांतरण करवा दिया हो."
पाकिस्तान से बेहतर भविष्य की आस में भारत आए इन लोगों को लगता है कि यहां आकर इनकी स्थितियां बेहतर हुई हैं.
सुखनंद कहते हैं, "हम सब मिलकर हिंदुस्तान आ गए थे. पीछे बहुत कुछ छोड़ आए थे. लेकिन यहां इज़्ज़त की ज़िंदगी जी रहे हैं. रात को चैन से सो पाते हैं. कई बार दो वक्त की रोटी कमाना मुश्किल होता है, लेकिन दो-ढाई सौ कमाकर अपना गुज़ारा कर लेते हैं."
यहां रहने वाले ज़्यादातर मर्द रेहड़ी-पटरी लगाकर, खेतों में काम करके, छोटी-मोटी दुकानें चलाकर परिवार की रोज़ी-रोटी का इंतज़ाम करते हैं.
मूलभूत सुविधाएं
इनके मुताबिक़ स्थितियां तो बेहतर हुई हैं, लेकिन बुनियादी ज़रूरतों की कमी अब भी है.
बीबीसी की टीम जब दिल्ली में मजनू का टिला स्थित इस शरणार्थी बस्ती में पहुंची तो देखा कि ये हिंदू शरणार्थी कच्चे घरों में रहते हैं. बस्ती के उबड़-खाबड़ कच्चे रस्तों में कीचड़ फैला है, शौच के लिए बस्ती की शुरूआत में ही एक कम्युनिटी शौचालय बना हुआ है.
बल देवी बताती हैं, "बिजली नहीं है, पानी नहीं है, रहने का ठीक से इंतज़ाम नहीं है, पांच-छह बार हमारी झुग्गियां जल गईं, यमुना का पानी बढ़ता है तो हमारे घरों में पानी घुस जाता है, सांप घुस आते हैं, हमारे बच्चे सड़कों पर रहने को मजबूर हो जाते हैं. लेकिन फिर भी हम मोदी जी से शिकायत नहीं करते, अब हमें नागरिकता मिल गई, जैसे हमें सब कुछ मिल गया."
इन हिंदू शरणार्थियों का मानना है कि नागरिकता मिलने के बाद इनकी ये सारी परेशानियां दूर हो जाएंगी.
सोना दास ख़ुशी में कहते हैं, "गृह मंत्री अमित शाह हमारे लिए संसद में खड़े रहे. मेरी तो दुआ है कि वो और मोदी जी सौ साल जीएं और ऐसे ही देश का नेतृत्व करते रहें."
विरोध से नाराज़
देश के कई हिस्सों में नागरिकता संशोधन विधेयक का ज़ोरदार विरोध हुआ. कई जगह तो हिंसक प्रदर्शन भी हुए.
विरोध करने वालों में दो तरह के लोग थे. एक वो जो ये कह रहे थे कि ये मुस्लिमों के साथ भेदभाव है, क्योंकि इसमें उन्हें नागरिकता देने का प्रावधान नहीं किया गया है, और विरोध करने वाले दूसरे लोग वो थे, जो कह रहे थे कि घुसपैठिया कोई भी हो उसे नागरिकता नहीं दी जानी चाहिए.
इसपर सोना दास कहते हैं, "भारत हिंदुओं का देश है. किसी भी देश में हिंदुओं पर आंच आएगी, उन्हें तकलीफ होगी तो वो कहां जाएगा? भारत ही हिंदुओं का देश है, जहां आकर हिंदू शरण ले सकते हैं. और जहां तक बात मुस्लिमों की है तो उनके तो बहुत देश हैं. वो कहीं भी जा सकते हैं."
जैसे ही सोना दास से हमारी बातचीत खत्म हुई, वहां उनकी भतीजी आ गई. वो अभी-अभी स्कूल से पढ़कर लौंटी थीं.
10वीं में पढ़ने वाली राम प्यारी की सोच अपने चाचा से बिल्कुल अलग है.
वो कहती हैं, "किसी के साथ भी धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए. मुस्लिम भी वैसे ही हैं, जैसे हिंदू हैं. जो लोग किसी परेशानी या उत्पीड़न की वजह से भारत शरण लेने आए हैं, उन्हें भी उसी आधार पर नागरिकता मिलनी चाहिए, जिस आधार पर हमें मिल रही है."
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