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कोरोना वायरस: खाड़ी देशों में फंसे प्रवासी कामगार किस हाल में हैं?
- Author, समीर हाशमी
- पदनाम, मध्य पूर्व व्यापारिक मामलों के संवाददाता, दुबई
प्रदीप और उनकी पत्नी प्रेमलता को पिछले हफ़्ते दो रातें एक बेसमेंट की कार पार्किंग में गुज़ारनी पड़ीं.
पैसे ख़त्म होने की वजह से किराया नहीं दे पाने के बाद इनके मकान मालिक ने घर ख़ाली करने को कह दिया था. आख़िरकार, एक स्थानीय दानार्थ संस्था इनकी मदद के लिए आगे आई.
प्रदीप कुमार के लिए ये दुस्वप्न फ़रवरी में शुरू हुआ था. प्रदीप जिस होटल में काम करते थे वहां उनकी नौकरी चली गई.
कोरोना वायरस की वजह से आमदनी कम होने पर होटल को अपना काम कम करना पड़ा. इस वजह से होटल ने प्रदीम कुमार को एक महीने की तनख़्वाह भी नहीं दी.
इसके बाद प्रदीप और उनकी पत्नी प्रेमलता डायबिटीज़ की वजह से प्रेगनेंसी में आ रही दिक़्क़तों का सामना करते हुए भारत में अपने शहर मदुरई लौटना चाहते हैं.
बीबीसी से बात करते प्रदीप बताते हैं, "मेरे पास मेरी पत्नी की डिलिवरी के लिए बिलकुल पैसे नहीं हैं. मेरे पास घर जाने के लिए फ़्लाइट के पैसे भी नहीं हैं. डॉक्टरों ने कहा है कि अगर मेरी पत्नी ने 33वें हफ़्ते के बाद यात्रा की तो ये बच्चे और माँ के लिए काफ़ी जोख़िमभरा होगा. मैं बस अपने बच्चे को बचाना चाहता हूँ."
खाड़ी देशों में आने वाले ये लोग क्या करते हैं?
कुमार उन लाखों प्रवासी कामगारों में शामिल हैं जिनकी नौकरियां खाड़ी देशों में कोरोना वायरस फैलने के बाद चली गई हैं.
इनमें से सबसे ज़्यादा प्रभावित वर्ग में वे लोग शामिल हैं जो सिर्फ़ इसलिए खाड़ी देशों में जाते हैं ताकि वे भारत में मौजूद अपने घरवालों की आर्थिक मदद कर सकें.
दशकों से ऐसे ही प्रवासी कामगार खाड़ी अरब देशों की अर्थव्यवस्था में एक अहम भूमिका निभाते आ रहे हैं.
ये लोग इमारत निर्माण, होटल इंडस्ट्री, रिटेस और ट्रेवल सेक्टर में काम करते हैं.
अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के मुताबिक़, गल्फ़ को-ऑपरेशन काउंसिल के सदस्य देशों सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, क़तर, बहरीन, कुवैत और ओमान में 2.3 करोड़ प्रवासी कामगार रहते हैं.
इनमें से ज़्यादातर एशिया से आने वाले लोग हैं.
नौकरी जाने के बाद इनमें से कई प्रवासी मज़दूर घर वापस जाना चाहते हैं. लेकिन कमर्शियल फ़्लाइट्स बंद हो चुकी हैं.
खाड़ी देशों की ओर से दबाव बढ़ने के बाद भारत और पाकिस्तान ने इन क्षेत्रों में फंसे अपने नागरिकों को वापस लाने के लिए विशेष विमान सेवाएं शुरू कर दी हैं. हालांकि, ये काफ़ी चुनौतीपूर्ण काम दिख रहा है.
सिर्फ़ संयुक्त अरब अमीरात में दो लाख से ज़्यादा भारतीयों ने वापस आने के लिए अर्ज़ियां दे दी हैं. पिछले हफ़्ते लगभग 2000 लोगों को भारत वापस बुलाया गया है.
भारत सरकार ने कहा है कि वह आने वाले हफ़्तों में और फ़्लाइट्स चलाएगी. लेकिन फ़िलहाल सरकार मेडिकल इमरजेंसी वाले लोगों, वृद्धों, प्रेगनेंट महिलाओं और कम अवधि के वीज़ा वाले लोगों को प्राथमकिता दे रहा है.
सीटें कम होने की वजह से जो लोग इन शर्तों को पूरा भी कर रहे हैं, उनके लिए भी विमानों में चढ़ना चुनौती पूर्ण साबित हो रहा है.
कुछ भारतीय अपनी फ़्लाइट्स और भारत में 14 दिन के क्वारंटीन के लिए पैसा देने में असमर्थ हैं.
मोहम्मद अनस के साथ 9 अन्य भारतीय प्रवासी कामगार रहते हैं. ये सभी लोग एक ट्रेवल कंपनी के लिए काम करते थे. लेकिन फ़रवरी के बाद इनकी नौकरियां चली गईं. मोहम्मद अनस को उनकी दो महीने की तनख़्वाह भी नहीं मिली.
वो कहते हैं, "मैं पिछले हफ़्ते भारत जाने वाली फ़्लाइट में जगह हासिल करने की उम्मीद लगा रहा था लेकिन मुझे इंडियन कॉन्सुलेट की ओर से कोई फ़ोन कॉल नहीं आया. मैंने उन्हें लिखा है कि मेरे पास कोई नौकरी नहीं है और पैसे भी नहीं हैं."
भारत सरकार आने वाले दिनों में पूरी दुनिया से दो लाख भारतीयों को वापस लाने की तैयारी कर रही है.
सरकार ने 16 से 23 मई के बीच 35 विशेष फ़्लाइट्स चलाने का ऐलान कर दिया है.
पाकिस्तान ने बुलाए 9000 लोग
पाकिस्तान अप्रैल की शुरुआत से लेकर अब तक अपने 9000 नागरिकों को संयुक्त अरब अमीरात से लेकर जा चुका है.
पाकिस्तानी दूतावास के मुताबिक़, साठ हज़ार से ज़्यादा पाकिस्तानी लोगों ने वापस बुलाए जाने की अर्ज़ी लगाई है.
लेकिन बाबर हनीफ़ जैसे पाकिस्तानी नागरिक सरकार से ज़्यादा फ़्लाइट्स चलाने की अपील करते हैं क्योंकि उनके लिए अब नौकरी के बिना अरब देशों में रहना मुश्किल होता जा रहा है.
हनीफ़ बीते 15 सालों से दुबई में काम कर रहे थे. लेकिन बीती फ़रवरी में उनकी कंपनी ने उन्हें अनिश्चितकालीन छुट्टी पर भेज दिया है.
पिछले हफ़्ते से वह कई फ़्लाइट्स में टिकट बुक करने की कोशिश कर रहे हैं.
बीबीसी से बात करते हुए वो कहते हैं, "मैं यहां के ख़र्चे नहीं झेल सकता हूँ. मैंने पाकिस्तानी दूतावास को कई बार फ़ोन किया है लेकिन उनकी ओर से कोई जवाब नहीं आया है."
दानार्थ संस्थाएं कहतीं हैं कि हज़ारों दक्षिण एशियाई कामगारों ने उनसे मदद की गुहार लगाई है. वे स्थानीय प्रशासन की मदद से खाना दे रही हैं.
दुबई की एक संस्था पीसीटी ह्युमैनिटी के संस्थापक जोगिंदर सिंह सालारिया कहते हैं, "इनमें से ज़्यादातर कामगार काफ़ी कम पैसे कमा रहे हैं. और इस तरह के लोगों की संख्या बहुत ज़्यादा है."
कोरोना वायरस फैलने का डर
इसी समय खाड़ी देश सघन आबादी वाली जगहों पर कोरोना वायरस को पहुंचने से रोकने की हरसंभव कोशिश कर रहे हैं.
एमनेस्टी इंटरनेशनल के मुताबिक़, इस तरह की जगहों में ज़्यादातर कमरों में छह से बारह लोग रहते हैं. ऐसे में साफ़-सफ़ाई और सोशल डिस्टेंसिंग के दिशानिर्देश मानना असंभव सा है.
ये मानवाधिकार समूह कहता है, "किसी को भी ऐसी स्थितियों में नहीं रहना चाहिए. लेकिन कोविड-19 ने समस्या को उजागर कर दिया है और अब इसे जल्द से जल्द ठीक किए जाने की ज़रूरत है."
स्थानीय प्रशासन ने इन कैंपों को बंद करके टेस्टिंग शुरू कर दी है. कहीं-कहीं पर भीड़ इकट्ठी नहीं किए जाने को लेकर क़दम उठाए गए हैं.
इन सभी क़दमों के बावजूद कोरोना वायरस फैलता ही जा रहा है.
बीते बुधवार तक संयुक्त अरब अमीरात में 206 लोगों की मौत होने के साथ बीस हज़ार से ज़्यादा लोग संक्रमित हो चुके थे. वहीं, सऊदी अरब में 44 हज़ार मामले हैं और 273 लोगों की मौत हो चुकी है.
संयुक्त अरब अमीरात की सरकार मानती है कि इस संकट ने निम्न आयवर्ग वाले प्रवासी कामगारों पर बुरा असर डाला है. लेकिन सरकार ये दावा करती है कि वह इनकी मदद कर रही है.
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने बीबीसी को बताया है, "हमने इन लोगों की सहायता और सुरक्षा करने के लिए कई क़दम उठाए हैं. इनमें वीज़ा आदि को स्वत: आगे बढ़ाया जाना, रहने-खाने की व्यवस्था और मुफ़्त इलाज जैसी सुविधाएं शामिल हैं."
"कामगार टेस्टिंग कार्यक्रम से भी लाभांवित हो रहे हैं जिसके मुताबिक़ कामगारों के घरों के पास ही टेस्टिंग की जा रही है."
संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी सरकार ने बीते हफ़्तों में व्यवसायिक गतिविधियों पर लगे प्रतिबंधों में कुछ ढील दी है. इसके साथ ही अपनी अर्थव्यवस्था को मज़बूत करने के लिए आर्थिक पैकेज जारी करने की घोषणा भी की है.
लेकिन महामारी के नियंत्रण में नहीं आने की वजह से व्यापारिक संस्थानों की गतिविधियां सामान्य होने के आसार नज़र नहीं आ रहे हैं.
अनस जैसे प्रवासी कामगारों के लिए ऐसे माहौल में नई नौकरी तलाशना असंभव होगा.
वो कहते हैं, "मैं यहां अपने सपने पूरे करने के लिए आया था. लेकिन अब मैं सिर्फ़ अपने घर वापस जाना चाहता हूँ. अब कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा, अगर मैं कुछ कम पैसा कमाऊं."
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