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कोरोना वायरस: इसराइल ने क्या तोड़ खोज लिया है?
- Author, गुरप्रीत सैनी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
कोरोना वायरस का इलाज ढूंढ़ने के लिए दुनियाभर में कोशिशें चल रही हैं. अब इसराइल ने दावा किया है कि उसने कोरोना वायरस को ख़त्म करने वाला एंटीबॉडी विकसित कर लिया है.
इसराइल के रक्षा मंत्री नफ्ताली बेनेट ने दावा किया है कि देश के प्रमुख बायोलॉजिकल रिसर्च इंस्टिट्यूट के वैज्ञानिकों ने कोरोना वायरस के लिए एक एंटीबॉडी विकसित करने में "महत्वपूर्ण सफलता" हासिल की है.
इस बारे में जारी बयान में कहा गया है कि ये एंटीबॉडी, वायरस पर अटैक करता है और उसे शरीर में बेअसर कर देता है.
रक्षा मंत्री के मुताबिक़, एंटीबॉडी को विकसित करने का काम पूरा हो चुका था और संस्थान "इसे पेटेंट कराने की प्रक्रिया में है". जिसके बाद इसके बड़े पैमाने पर उत्पादन का काम किया जाएगा.
मंगलवार को इसराइल के रक्षा मंत्रालय के ट्विटर हैंडल पर इससे जुड़े तीन ट्वीट किए गए.
इनमें लिखा था कि पिछले दो दिनों में आईआईबीआर ने एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक सफलता हासिल की है. संस्थान ने एक ऐसा एंटीबॉडी बनाया है, जो कोरोना वायरस को बेअसर कर देगा.
दूसरे ट्वीट में लिखा था, "प्रमुख पैरामीटर: 1. एंटीबॉडी मोनोक्लोनल, नई और शुद्ध है. इसमें हानिकारक प्रोटीन की मात्रा कम है. 2. एंटीबॉडी कोरोना वायरस को बेअसर कर सकती है. 3. जानलेवा तरह के कोरोना वायरस पर इस एंटीबॉडी का ख़ास तौर पर परीक्षण किया गया है."
तीसरे ट्वीट के मुताबिक, "अगर दुनियाभर के विस्तृत वैज्ञानिक पब्लिकेशन को देखा जाए तो ऐसा लगता है कि आईआईबीआर पहला संस्थान है जिसने उपरोक्त तीनों मापदंडो को एक साथ पूरा करने में वैज्ञानिक सफलता हासिल की है."
होता क्या है मोनोक्लोनल एंटीबॉडी
अमरीका के नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट के मुताबिक, मोनोक्लोनल एंटीबॉडी एक तरह का प्रोटीन होता है, जिसे लैब में बनाया जाता है. ये मरीज़ के शरीर में मौजूद दुश्मन सेल से जाकर चिपक जाता है.
कई तरह के मोनोक्लोनल एंटीबॉडी होते हैं. मोनोक्लोनल एंटीबॉडी का इस्तेमाल पहले भी कई तरह के कैंसर के ट्रीटमेंट में होता रहा है.
दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में मेडिसिन डिपार्टमेंट के वाइस चेयरमैन डॉ अतुल कक्कड़ भी कहते हैं कि मोनोक्लोनल एंटीबॉडी कोई नई चीज़ नहीं है. पहले भी इसका इस्तेमाल कैंसर, गठिया और कई तरह के इंफेक्शन में होता रहा है.
वे कहते हैं, "मोनोक्लोनल एंटीबॉडी रेडिमेट होती है. इसके नाम में है मोनो यानी एक. मोनोक्लोनल एंटीबॉडी एक टारगेट पर काम करती है."
कैसे काम करती है
डॉ अतुल के मुताबिक़, हमारा शरीर इंफेक्शन से बचने के लिए कई स्तर पर काम करता है. शरीर ख़ुद इम्युनोग्लोबुलिन एंटीबॉडी बनाता है, जो प्लाज़्मा सेल से बनते हैं.
मोनोक्लोनल एंटीबॉडी ठीक इम्युनोग्लोबुलिन एंटीबॉडी जैसी ही होती है, इसलिए इसके नाम में क्लोन है. मोनोक्लोनल एंटीबॉडी का टारगेट इम्युनोग्लोबुलिन एंटीबॉडी के अंदर स्थित एक साइट में होता है.
मोनोक्लोनल एंटीबॉडी संक्रमित सेल पर जाकर चिपक जाती है और उसे न्यूट्रलाइज़ यानी बेअसर कर देती है.
कैसे बनाया जाता है मोनोक्लोनल एंटीबॉडी
डॉ अतुल कक्कड़ के मुताबकि, हमें जिस तरह के सेल की ज़रूरत होती है, उसे पहले जानवरों (अक्सर चूहों) में इंजेक्ट किया जाता है. जानवर को लैब में ले जाया जाता है.
लिवर के बिल्कुल पास तिल्ली नाम का एक अंग होता है, जानवर के इस अंग में एंटीबॉडी बनता है. एंटीबॉडी और तिल्ली के सेल को फ्यूज़ करके एक हाइब्रडोमा बनाता है. इससे ही वो एंटीबॉडी बनता है, जिसकी ज़रूरत होती है. जिसे निकालकर इंसानों को दिया जाता है.
हालांकि डॉ अतुल कक्कड़ कहते हैं कि इसराइल के परीक्षण की जानकारी आने के बाद ही पता चलेगा कि ये तरीका कोरोना वायरस पर कितना काम कर सकता है. वो कहते हैं, जब तक पेपर पब्लिश नहीं होगा और हमें डिटेल नहीं मिलेंगी तब तक कुछ कह नहीं सकते.
इसराइल में मौजूद पत्रकार हरेंद्र मिश्रा के मुताबिक़, रिसर्चरों ने फ़िलहाल ये बताया है कि उन्होंने ऐसे प्रोटीन की पहचान की है जो मरीज़ के शरीर के अंदर वायरस के ख़त्म करने में सक्षम है. और संस्थान जल्द ही इन फाइंडिग के बारे में एक पेपर पब्लिश करेगा.
अभी इस एंटीबॉडी के बारे में और अधिक जानकारी नहीं दी गई है. ना ही बयान में ये बताया गया है कि इंसानों पर इस एंटीबॉडी का ट्रायल करके देखा गया या नहीं.
हालांकि हरेंद्र मिश्रा को मिली जानकारी के मुताबिक़, आईआईबीआर ने कुछ क्लीनिकल ट्रायल ज़रूर किए हैं.
इसराइल के रक्षा मंत्री ने ख़ुद जाकर देखा एंटीबॉडी
रक्षा मंत्री बेनेट ने आईआईबीआर की लैब का दौरा किया और कोरोना वायरस के लिए एक वैक्सीन बनाने का आदेश दिया.
रक्षा मंत्री के कार्यालय की ओर से जारी बयान के मुताबिक़, रक्षा मंत्री को लैब में वो एंटीबॉडी दिखाई गई जो वायरस पर मोनोक्लोनल तरीके से हमला करती है और बीमार व्यक्ति के शरीर में वायरस को बेअसर कर देती है.
बयान के अनुसार, एंटीबॉडी को विकसित करने का काम पूरा हो चुका है और संस्थान "इसे पेटेंट कराने की प्रक्रिया में है". इस प्रक्रिया के अगले चरण में, रिसर्चर अंतर्राष्ट्रीय कंपनियों से संपर्क करेंगे ताकि वाणिज्यिक स्तर पर एंटीबॉडी का उत्पादन किया जा सके.
रक्षा मंत्री बेनेट ने कहा, "मुझे इस महत्वपूर्ण सफलता के लिए संस्थान के कर्मचारियों पर गर्व है, उनकी रचनात्मकता ने इस उपलब्धि की खोज का मार्ग प्रशस्त किया."
इस साल मार्च में इसराइली अख़बार Ha'aretz ने मेडिकल स्रोतों के हवाले से बताया था कि संस्थान के वैज्ञानिकों ने वायरस के जैविक तंत्र और गुणों को समझने में अहम सफलता हासिल की है.
आईआईबीआर की स्थापना साल 1952 में इसराइल डिफेंस फोर्सेज साइंस कॉर्पस के एक भाग के रूप में हुई थी. बाद में ये एक नागरिक संगठन बन गया. तकनीकी रूप से ये प्रधानमंत्री कार्यालय की देखरेख में है, लेकिन रक्षा मंत्रालय के साथ मिलकर काम करता है.
कहा जाता है कि इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने 1 फरवरी को संस्थान को कोविड-19 के लिए एक वैक्सीन विकसित करने का आदेश दिया था.
जैविक संस्थान एक विश्व-प्रसिद्ध अनुसंधान और डेवलपमेंट एजेंसी है और इसमें 50 से अधिक अनुभवी वैज्ञानिक काम कर रहे हैं.
मोनोक्लोनल एंटीबॉडी के संभावित साइड इफ़ेक्ट
अमरीका के नेशलन कैंसर इंस्टिट्यूट के मुताबिक़, मोनोक्लोनल एंटीबॉडी के कई तरह के साइड इफेक्ट भी हो सकते हैं. अलग-अलग लोगों को अलग-अलग तरह के साइड इफेक्ट होने का डर होता है, जो इसपर निर्भर करता है कि इलाज से पहले मरीज़ कितना सेहतमंद है, बीमारी कितनी गंभीर है और किस तरह की एंटीबॉडी और उसका कितना डोज़ मरीज़ को दिया जा रहा है.
ज़्यादातर इम्यूनोथेरेपी की तरह ही मोनोक्लोनल एंटीबॉडी देने पर निडल वाली जगह स्किन रिएक्शन हो सकता है और फ्लू जैसे लक्षण हो सकते हैं. ये हल्के साइड-इफेक्ट होते हैं.
गंभीर साइड-इफेक्ट होने पर मुंह और त्वचा पर फोड़े हो सकते हैं, जिससे गंभीर इंफेक्शन हो सकता है. हार्ट फेल हो सकता है, हार्ट अटैक आ सकता है या फेफड़ों की गंभीर बीमारी हो सकती है.
हालांकि बहुत कम मामलों में इतना गंभीर रिएक्शन होता है कि इंसान की मौत हो जाए. उस स्थिति में कैपिलरी लीक सिंड्रोम हो सकता है, जिसमें छोटी रक्त वाहिकाओं में से तरल पदार्थ और प्रोटीन लीक होकर आस-पास के टिश्यू में जा सकता है. जिसकी वजह से बल्ड प्रेशर बहुत कम हो सकता है. कैपिलरी लीक सिड्रोम की वजह से मल्टीपल ऑर्गन फेलियर का डर हो सकता है.
इस तरह की वैक्सीन विकसित करने के लिए आम तौर पर जानवरों पर प्री-क्लीनिकल ट्रायल की लंबी प्रक्रिया करनी होती है. जिसके बाद क्लीनिकल ट्रायल होते हैं. इस दौरान साइड-इफेक्ट को समझा जाता है और देखा जाता है कि अलग-अलग तरह के लोगों पर इसका क्या असर हो सकता है.
फरवरी में न्यूज़ पोर्टल वायनेट में छपे लेख के मुताबिक़, जापान, इटली और दूसरे देशों से वायरस सैंपल लेकर पांच शिपमेंट इसराइल पहुंची थी. तभी से वहां वैक्सीन बनाने की कोशिशें जारी थीं.
दुनियाभर में रिसर्च टीमें कोविड-19 की वैक्सीन बनाने में जुटी हैं. कई सरकारी और प्राइवेट संस्थाओं ने कोविड-19 का इलाज ढूंढ लेने का दावा भी किया, लेकिन अभी तक किसी की भी पूरी तरह से पुष्टि नहीं हो सकी है.
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