कोरोना: लॉकडाउन के कारण गांव गए मज़दूर क्या फिर काम पर लौटेंगे?

    • Author, ज़ुबैर अहमद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

लॉकडाउन के बाद अपने गांवों और घरों को लौटने वाले मज़दूरों में से एक पश्चिम बंगाल में पुरुलिया ज़िले के गांव बांगीढ़ी के विजय सिंह लाया हैं.

कॉलेज में पढ़ रहे विजय ग़रीबी से लड़ रहे थे. अपनी पढ़ाई अधूरी छोड़ कर वो चेन्नई चले गए जहाँ वो एक फैक्ट्री में काम करने लगे. लेकिन लॉकडाउन के कारण उन्हें अपने गांव लौटना पड़ा है.

उनके पास कुछ जमा पैसे हैं जिनसे उनका और उनके घर वालों का गुज़ारा हो रहा है. वो कहते हैं, "हम अब वापस नहीं जाना चाहते हैं. मेरे शहर या गांव में कोई नौकरी मिले तो हम करना चाहते हैं."

विजय की तरह अपने घरों को लौट रहे लाखों मज़दूर अब वापस काम के लिए शहर नहीं जाना चाहते हैं. उन्हें अचानक हुए लॉकडाउन से भारी झटका लगा है.

विजय कहते हैं, "हम सब बहुत घबरा गए. हमें काम से अधिक परिवार की चिंता होने लगी और अब हम अपने घर लौट कर ख़ुश हैं."

मज़दूरों को झटका लगने का कारण ये था कि लॉकडाउन की घोषणा 24 मार्च की शाम की गई और साढ़े तीन घंटों बाद देश की 135 करोड़ आबादी अपने घरों में क़ैद हो कर रह गई. यातायात के सभी साधन इससे पहले ही बंद कर दिए गए थे.

इसके साथ ही विजय जैसे श्रमिकों की आर्थिक सुरक्षा बस कुछ घंटों में चली गयी. सामाजिक और पारिवारिक सुरक्षा पाने के लिए वो बड़ी संख्या में अपने गावों के लिए पलायन कर गए. सड़कों और हाईवे पर हमने वो नज़ारा देखा जिसके बारे में अब सभी कई लोग चर्चा कर रहे हैं.

अब पिछले कुछ दिनों से उन्हें उनके घरों को ले जाने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों ने रेलगाड़ियों और बसों की विशेष का इंतज़ाम किया गया है.

लेकिन घर लौटकर भी विजय को मिली सामाजिक सुरक्षा केवल कुछ वक़्त तक के लिए ही है. वो नहीं जानते कि भविष्य में उनका गुज़रबसर किस तरह होगा.

अब जब कि मोदी सरकार धीरे-धीरे अर्थव्यवस्था को पटरी पर वापस लौटाने के लिए उद्योग और व्यवसाय खोल रही है, क्या ये मज़दूर काम पर वापस लौटना चाहेंगे? क्या आने वाले महीनों में खुलने वाले उद्योग और व्यवसाय में मज़दूरों की कमी एक बड़ी समस्या पैदा कर सकती है?

ये लगभग तय है कि घरों को लौटे मज़दूरों का तुरंत काम पर लौटना संभव नहीं होगा.

श्रमिकों से चलने वाले खाद्य व्यसाय से जुड़े लोगों के अनुसार जब भी कैफ़े और रेस्टोरेंट खुलेंगे वेटरों और बावर्चियों की भारी कमी होगी.

उद्योग और व्यसाय के संगठन फ़िक्की के अनुसार "कंस्ट्रक्शन, रियल एस्टेट और बुनियादी ढांचों के क्षेत्र में मज़दूरों की कमी होगी जो महीनों तक जारी रह सकती हैं."

प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से टेक्सटाइल यानी वस्त्र उद्योग से 10 करोड़ श्रमिक जुड़े हैं जो कृषि के बाद भारत में नौकरी देने वाला सब से बड़ा क्षेत्र है. दस्ताने, मास्क और कोरोना वायरस से लड़ने वाले दूसरे वस्त्र इसी उद्योग के अंतर्गत आते हैं जिसका मतलब ये हुआ कि ये उद्योग पूरी तरह से रुका हुआ नहीं है.

अब धीरे-धीरे इस उद्योग की दूसरी इकाइयां भी खुलने लगी हैं. क्या इस क्षेत्र में भी मज़दूरों की कमी महसूस की जा रही है?

टेक्सटाइल्स उत्पादकों के एसोसिएशन की दिल्ली इकाई के अध्यक्ष डीके सिंह कहते हैं, "सारे लोग चले गए हैं ये सही नहीं है. अधिक समस्या नहीं होगी क्योंकि एक साथ सारी इंडस्ट्री नहीं खुलेगी. जैसे-जैसे हमारा उद्योग खुलेगा वैसे-वैसे लोग वापस आते जाएंगे".

हालांकि उन्होंने स्वीकार किया कि सारे मज़दूर वापस काम पर नहीं लौटेंगे, "ये ज़रूर है कि सारे लोग वापस नहीं आएंगे. लगभग 70-80 प्रतिशत लोग ही वापस आएंगे."

एसोसिएशन के अध्यक्ष ने आगे साफ़ किया कि जो मज़दूर वापस भी आएंगे उन्हें आने में लंबा समय लग जाएगा.

कपड़ा उद्योग के उत्पाद का 60 प्रतिशत सामान निर्यात होता है जो भारत के कुल निर्यात का एक बड़ा हिस्सा है इसीलिए केंद्र सरकार इसे धीरे-धीरे खोलने वाले उद्योगों में प्राथमिकता दे रही है

अब सवाल ये पैदा होता है कि क्या श्रमिकों को उद्योग में, फैक्ट्रीज और व्यापारों में वापस लाने के लिए कुछ क़दम उठाने पड़ सकते हैं?

सरकारी हलकों में ये चर्चा गर्म है कि एक बड़ा आर्थिक पैकेज आने वाला है जिसमें श्रमिकों के फायदे के लिए भी कई सुझाव मान लिए गए हैं लेकिन सरकार फ़िलहाल इस पर ऑन रिकॉर्ड बात नहीं कर रही है.

अंतर्राष्ट्रीय संस्था 'वर्ल्ड रिसोर्स इंस्टिट्यूट' के सीईओ डॉक्टर ओपी अग्रवाल का मानना है कि मज़दूरों के बारे में हमारी सोच ही ग़लत बात पर आधारित थी और वो ये कि अब तक उन्हें हम बोझ समझते आए थे.

वो कहते हैं, "शहरी अर्थव्यवस्था के लिए ये लोग जितना योगदान दे रहे हैं शहरी अर्थव्यवस्था उनका उतना ख़याल नहीं रख रही है. हमें उनको भार नहीं बल्कि ज़रूरत समझना चाहिए और जब भी किसी चीज़ की ज़रूरत हो, हमें उसकी देखभाल करनी चाहिए."

तो इनके लिए क्या हाउसिंग, चिकित्सा और स्वास्थ्य बीमा की सुविधा होनी चाहिए?

आईआईटी दिल्ली और एमआईटी अमरीका से पढ़े हुए डॉक्टर अग्रवाल के अनुसार सभी मज़दूर एक जैसे नहीं हैं, सब की ज़रुरतें एक दूसरे से अलग हैं.

वो कहते हैं, "कुछ तो आस पास से आये हैं. ऐसे मज़दूर तो वापस आ जाएंगे काम पर. कुछ लोग बहुत दूर से आए हैं, जैसे ओडिशा के मज़दूर पंजाब में, अब उनमें भी सब की अलग-अलग मजबूरियां होंगीं. उनके आने या ना आने का फ़ैसला उनकी मजबूरियों पर टिका होगा."

अग्रवाल कहते हैं, "कुछ लोग इनमें ऐसे हैं जिन्होंने क़र्ज़ ले रखा है. अब क़र्ज़ों को चुकाने के लिए उन्हें दोबारा शहर आना पड़ सकता है, और फिर कुछ लोग ऐसे हैं जो अपने परिवार के साथ आए और उनका अनुभव काफ़ी बुरा रहा तो वो शायद अपने परिवार को छोड़कर अकेले वापस लौटें."

वो कहते हैं कि हैरानी की बात ये है कि केंद्र सरकार के पास मज़दूरों की सही संख्या है ही नहीं, बस एक अनुमान है कि ये संख्या 40 करोड़ के आस-पास है.

इनमें से अगर 20 प्रतिशत भी अपने घरों में रह जाएं तो राज्य सरकारों के लिए नई तरह की चुनौती पैदा हो सकती है.

डॉक्टर अग्रवाल कहते हैं कि उनके लिए सबसे पहले नौकरियों के अवसर पैदा करने होंगे और फिर उनके लिए चिकित्सा और आवास की व्यवस्था करनी होगी. हो सकता है कि इसी बहाने ग्रामीण क्षेत्रों के आर्थिक विकास पर योजना बनानेवालों का ध्यान इस तरफ जाए.

वो कहते हैं, "ये मौक़ा है कि छोटे-छोटे शहरों में हम अवसर पैदा करें. लेकिन ये सभी चीज़ें केवल सरकार अकेले नहीं कर सकती."

उनके अनुसार अगर ग्रामीण क्षेत्रों का विकास हुआ तो बड़े शहरों पर उद्योगीकरण का बोझ कम होगा और शहरों में प्रदूषण में भी कमी आएगी.

टेक्सटाइल्स उत्पादकों के एसोसिएशन की दिल्ली इकाई के अध्यक्ष डीके सिंह का तर्क ये है कि सभी मज़दूरों को एक तरह से न देखा जाए.

वो कहते हैं कि मज़दूरों का एक हिस्सा वो है जो आज से 25-30 साल पहले घर छोड़ कर शहर आया, अब उसकी दूसरी पीढ़ी काम पर है, उसका अपना घर भी वहीं है.

मज़दूरों का दूसरा तबक़ा वो है जो कारख़ानों और फ़ैक्टरियों के अंदर ही रहता है क्योंकि वहां उसे रहने और दूसरी कई तरह की सुविधाएं मिली हुई हैं.

उनके अनुसार प्रवासी मज़दूरों की मानसिकता ये होती है कि वो पैसा कमाने के लिए घर छोड़ कर शहर जाते हैं और जब भी उन्हें कोई परेशानी पेश आती है तो उनकी पहली प्रतिक्रिया घर लौटने की होती है.

वो उम्मीद जताते हैं कि, "एक साल से डेढ़ साल में सब कुछ पहले जैसा हो जाएगा."

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