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कोरोना वायरसः चीन पर कैसे चलेगा मुक़दमा
- Author, स्टेफ़ानिया गोज़्ज़र
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
चीन के वुहान शहर से निकलकर कोविड-19 की महामारी ने छह महीनों के भीतर ही 250,000 से ज़्यादा लोगों की जान ले ली है.
ये महामारी दुनिया की अर्थव्यवस्था को तीन फ़ीसदी का नुक़सान पहुंचाने जा रही है और दुनिया भर में हर दो में से एक आदमी की नौकरी इस वारस के कारण ख़तरे में है.
कोरोना संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए पैसे का इंतज़ाम कई देशों के लिए मुश्किल पड़ रहा है और वे क़र्ज़ ले रहे हैं.
लाखों कंपनियों की कमाई बंद हो गई है और पर्यटन जैसे उद्योगों पर तो रातोंरात जैसे ताला जड़ गया है.
इन हालात में ऐसी आवाज़ें उठ रही हैं कि इसकी ज़िम्मेदारी तय की जाए. और कई लोग तो सीधे चीन पर उंगली उठा रहे हैं.
राष्ट्रपति ट्रंप ने क्या कहा
पिछले हफ़्ते अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कहा, "इसकी ज़िम्मेदारी तय करने के कई तरीक़े हैं. हम इस दिशा में गंभीरतापूर्वक जाँच कर रहे हैं. जैसा कि आप जानते होंगे कि हम चीन को लेकर ख़ुश नहीं हैं."
उन्होंने कहा, "हम पूरी स्थिति से नाख़ुश हैं क्योंकि हम मानते हैं कि कोरोना वायरस को वहीं पर रोका जा सकता था, जहां से उसकी शुरुआत हुई. अगर इसे वहीं पर बिना वक़्त गंवाए रोक लिया गया होता तो ये पूरी दुनिया में नहीं फैलता."
राष्ट्रपति ट्रंप जब ये कह रहे थे तो उन्होंने चीन से हर्जाना वसूलने की संभावना पर साफ़ तौर से तो कुछ नहीं कहा लेकिन इससे कयासों के दरवाज़े खुल गए.
इस रविवार को 'फ़ॉक्स न्यूज़' को इंटरव्यू देते वक़्त ट्रंप ने अपनी बात फिर दोहराई. कोरोना वायरस के संक्रमण की शुरुआत कहां से हुई, इस पर एक निर्णायक रिपोर्ट तैयार करने का ट्रंप ने वादा भी किया है.
आर्थिक नुक़सान का हिसाब
जर्मन अख़बार 'बिल्ड' ने महामारी से जर्मनी को हुए आर्थिक नुक़सान का हिसाब-किताब लगाया है.
अख़बार का कहना है कि जर्मनी को 160 मिलियन डॉलर का नुक़सान हुआ है और इसकी देनदारी चीन पर बनती है.
दुनिया भर में कई कंपनियां, आम से ख़ास लोग चीन से नुक़सान की भरपाई की संभावना तलाश रहे हैं.
सभी का ये कहना है कि चीन ने महामारी की शुरुआत के समय क़दम नहीं उठाए और दुनिया को इससे आगाह करने में देरी की.
ऐसे ही लोगों में से एक हैं फ्रैंकलिन ऑर्डोनेज़. पेशे से वकील और राजनेता फ्रैंकलिन की उम्र 62 साल है और वे इक्वाडोर के रहने वाले हैं.
मार्च में उनके बड़े भाई की मौत कोविड-19 के कारण हो गई थी.
'किसी की तो ज़िम्मेदारी होगी'
इक्वाडोर में कोरोना वायरस से सबसे ज़्यादा प्रभावित गुआयाक्विल शहर से फ्रैंकलिन ने फोन पर बीबीसी मुंडो से कहा, "दुनिया में इतने लोगों की मौत हुई है, किसी की तो ज़िम्मेदारी होगी."
गुआयाक्विल में हालात इतने ख़राब हो गए थे कि वहां अस्पताल ठप हो गए थे और क़ब्रिस्तानों में जगह ख़त्म हो गई थी.
लॉकडाउन के कारण फ्रैंकलिन काम नहीं कर सकते. इसलिए उन्हें अपनी बचत के पैसों से ज़िंदगी चलानी पड़ रही है.
ये जानते हुए भी कि कोई सबूत नहीं है, फ्रैंकलिन ऑर्डोनेज़ को ये भरोसा है कि कोरोना वायरस चीन की एक प्रयोगशाला में तैयार किया गया था.
वे कहते हैं, "चीन के जिस प्रांत से संक्रमण की शुरुआत हुई, उसके पड़ोसी प्रांतों में महामारी नहीं फैली लेकिन पूरी दुनिया में ये फैल गई. अमरीका जिसके पास अपनी हिफ़ाज़त के लिए हर हथियार मौजूद है, वो भी इस तूफ़ान से ख़ुद को बचा नहीं पाए."
फ्रैंकलिन महीनों से अपने भाई से नहीं मिले थे और न ही आख़िरी सफ़र पर जाते वक़्त वो उन्हें अलविदा ही कह पाए.
वे कहते हैं, "मुझे लगता है कि जिस किसी ने भी इस बीमारी के कारण अपनों को खोया है, वो ये चाहेंगे कि चीन इस महामारी का जुर्माना भरे."
मिशन इम्पॉसिबल?
नए कोरोना वायरस से निपटने में चीन से चूक हुई? ये इल्ज़ाम उस पर लगाना कहां तक मुमकिन है.
ब्रितानी थिंकटैंक चैटम हाउस में इंटरनेशनल लॉ के एक्सपर्ट विम मुलर कहते हैं, "इसके लिए तो दूसरे देशों को ही क़दम उठाना होगा. इसके लिए पहले उन्हें किसी ऐसे अंतरराष्ट्रीय क़ानून या किसी प्रावधान का पता लगाना होगा जिसका चीन ने उल्लंघन किया हो."
"इसके बाद जिस दूसरी चीज़ का ख़्याल रखना होगा, वो ये है कि एक ऐसा कोर्ट खोजा जाए जिसके पास इसका ज्यूरिसडिक्शन हो यानी मामले की सुनवाई का अधिकार हो. अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों में ये हमेशा बहुत मुश्किल होता है. क्योंकि आम तौर पर कोई देश ये नहीं चाहता कि किसी कोर्ट के पास उसके आचरण पर फ़ैसला सुनाने का अधिकार हो."
"उदाहरण के लिए आपके पास हेग में इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस है लेकिन यहां किसी मामले की सुनवाई के लिए देशों की रज़ामंदी की ज़रूरत होती है. इसलिए जहां तक मुमकिन होगा चीन भी किसी बाहरी अदालत के सामने अपनी पेशी से इनकार करेगा."
तो क्या कोई संभावना है?
विम मुलर का कहना है कि चीन पर क़ानूनी कार्रवाई के लिए जितने भी तरीक़े सुझाए गए हैं, उसमें इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस में चीन को खड़ा करने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन के संविधान के अनुच्छेद 75 के इस्तेमाल की बेहतर संभावना है.
वो बताते हैं, "इसमें कहा गया है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के संविधान के किसी प्रावधान को लेकर अगर कोई विवाद उठता है और वो विवाद बातचीत से या हेल्थ एसेंबली में नहीं सुलझ पाता है तो कोई देश इसे आईसीजे में ले जा सकता है. जैसे कि इस मामले में विवाद इस बात पर है कि चीन ने अपनी ज़िम्मेदारी का निर्वाह नहीं किया."
"लेकिन फिर भी चीन को आईसीजे में ले जाने की चाहत रखने वाले देश को पहले उससे बात करने की कोशिश करनी होगी. विश्व स्वास्थ्य संगठन की हेल्थ एसेंबली में मुद्दा ले जाना होगा."
स्पेन की यूनिवर्सिटी ऑफ़ सेविया में पब्लिक इंटरनेशनल लॉ के प्रोफ़ेसर जोआक्विन एलकैड कहते हैं, "अगर चीन को आईसीजे में ले जाना है तो पहले उसकी ज़िम्मेदारी तय करने की ज़रूरत है. कोई बात उसके इलाक़े में हुई, या फिर उसने किसी अंतरराष्ट्रीय बाध्यता का पालन नहीं किया है, इसलिए उसकी ज़िम्मेदारी बनती है? ये तय करने की ज़रूरत है."
"यहां तो आपको इस बात पर हैरत होगी कि बाक़ी दुनिया में जो कुछ भी हो रहा है, उसके लिए चीन को ज़िम्मेदार ठहराया जा रहा है."
कूटनीति का रास्ता
प्रोफ़ेसर जोआक्विन की राय है कि सबसे व्यावहारिक रास्ता कूटनीतिक हल का है.
वो कहते हैं, "आप डिप्लोमैटिक चैनल्स से अपनी कोई ज़रूरत या मांग सामने रख सकते हैं. क़ानून की बुनियाद पर तथ्य सामने रखे जा सकते हैं. ये मांग भी रखी जा सकती है कि मुआवज़ा चाहिए या फिर बस आप अपनी ग़लती मान लीजिए."
हालांकि फ्रैंकलिन ऑर्डोनेज़ का मानना है कि उनके जैसे लोग निजी हैसियत से चीन से सीधे हर्जाने की मांग कर सकते हैं और इसके लिए वे किसी दूसरे देश की किसी अदालत का दरवाज़ा खटखटा सकते हैं.
इसलिए फ्रैंकलिन नई जांच के नतीजों का इंतज़ार कर रहे हैं ताकि चीन के ख़िलाफ़ केस बनाया जा सके. वे अमरीकी लॉ फर्म 'बेरमैन लॉ ग्रुप' की ओर से लाए गए 'क्लास एक्शन लॉ सूट' का हिस्सा हैं.
'क्लास एक्शन लॉ सूट' का मतलब ऐसे मुक़दमे से है जहां एक पक्ष कोई व्यक्ति न होकर लोगों का एक समूह होता है.
'क्लास एक्शन लॉ सूट'
'बेरमैन लॉ ग्रुप' के प्रवक्ता जेरेमी अल्टर्स कहते हैं, "चीन सूबतों को ठिकाने लगाने के लिए जाना जाता है. इसलिए हमें ये जानने की ज़रूरत है, और वो भी जितनी जल्दी हो सके कि दरअसल वहां हुआ क्या था."
इस लॉ फर्म ने दो अलग-अलग मुक़दमें अमरीकी अदालतों में दायर किए हैं. इन मुक़दमों में चीन पर टेक्सास के कोर्ट में एक केस इस बात को लेकर दायर किया गया है कि उसने कोरोना वायरस को एक जैविक हथियार के तौर पर तैयार किया था.
मिसूरी और मिसिसिपी की अदालतों में जो मुक़दमा दायर किया गया है, उनमें चीन पर ये आरोप लगाया गया है कि उसने महामारी रोकने के लिए ज़्यादा कोशिश नहीं की और इसके बारे में दुनिया को बताने में देर की.
'बेरमैन लॉ ग्रुप' के 'क्लास एक्शन लॉ सूट' में 46 देशों के 14 हज़ार लोग पार्टी बने हैं. इनमें कंपनियां शामिल हैं, कोरोना वायरस से मरने वाले लोगों के फ्रैंकलिन ऑर्डोनेज़ जैसे रिश्तेदार हैं.
कोविड-19 की महामारी
नित्साना डारशान लीटनर इसराइल के एक ग़ैरसरकारी संगठन 'शुरत हाडिन' की अध्यक्ष हैं.
उनका संगठन भी चीन के ख़िलाफ़ 'क्लास एक्शन लॉ सूट' लाने की तैयारी कर रहा है.
वो इस बात को लेकर पूरी तरह से आश्वस्त हैं कि मुक़दमे के लिए पार्टी या फिर एक्सपर्ट खोजने में उन्हें कोई परेशानी नहीं होगी.
ऐसे एक्सपर्ट जो इस सवाल का जवाब खोज सकें कि कोविड-19 की महामारी के लिए चीन ज़िम्मेदार है या नहीं?
वो कहती हैं, "सबसे बड़ी बाधा तो चीन की वो दलील है कि उन पर मुक़दमा चलाने के लिए किसी कोर्ट के पास ज्यूरिसडिक्शन ही नहीं है. हम इस दलील को काटने की दलील खोज रहे हैं."
'इम्यूनिटी ज्यूरिसडिक्शन'
'इम्यूनिटी ज्यूरिसडिक्शन' वो न्यायिक सिद्धांत है जिसके तहत किसी संप्रभु राष्ट्र पर उसकी ज़मीन के बाहर मुक़दमा नहीं चलाया जा सकता है.
यूनिवर्सिटी ऑफ़ शिकागो में इंटरनेशनल लॉ के प्रोफ़ेसर टॉम गिंसबर्ग कहते हैं, "आप किसी संप्रभु राष्ट्र पर कुछ एक अपवादों को छोड़कर किसी और देश में मुक़दमा नहीं चला सकते हैं."
चीन के ख़िलाफ़ अमरीका में लाए जा रहे ऐसे 'क्लास एक्शन लॉ सूट' यानी साझा मुक़दमों में कामयाबी की कितनी संभावनाएं हैं?
इस सवाल पर प्रोफ़ेसर टॉम गिंसबर्ग जवाब देते हैं, "सच कहें तो रत्ती भर भी नहीं."
अमरीका का FSI क़ानून
यूएस ज्यूरिसडिक्शन इम्यूनिटीज़ एक्ट (FSIA) के तहत किसी देश को मिलने वाली छूट कुछ मामलों में ख़त्म की जा सकती है.
प्रोफ़ेसर टॉम गिंसबर्ग कहते हैं, "अगर कोई विदेशी सरकार किसी व्यावसायिक गतिविधि में शामिल हो. जैसे कोई सरकारी कंपनी अमरीका में कुछ बेचती हो तो ये मुक़दमे का आधार हो सकता है. दूसरा आधार है कोई ऐसी 'ग़लती' जिससे दुर्घटनावश कोई नुक़सान हो जाए. लेकिन ये 'नुक़सान' किसी ऐसे 'काम' से होना चाहिए जो अमरीका की ज़मीन पर किया गया हो."
"चीन के ख़िलाफ़ लाए गए ज़्यादातर मुक़दमे इन्हीं अपवादों की बुनियाद पर दायर किए गए हैं. लेकिन जब आप इनकी दलीलों को ध्यान से पढ़ेंगे तो पाएंगे कि उनमें बहुत ज़्यादा दम नहीं है."
लेकिन 'बेरमैन लॉ ग्रुप' के लीड अटॉर्नी मैथ्यू मरे दलील देते हैं कि नुक़सान अमरीकी ज़मीन पर हुआ है.
चीन के ख़िलाफ़ दलीलें
मैथ्यू मरे कहते हैं, "चीन को दिसंबर के आख़िर से ही मालूम था कि इंसानों से इंसानों में संक्रमण हो रहा है. ये वायरस ख़तरनाक़ है. लेकिन इसके बावजूद उसने लोगों को वुहान से दुनिया भर की यात्रा करने की इजाज़त दी."
"ये लोग दरअसल वायरस बम की तरह थे. वे कहीं भी संक्रमण फैलाने की स्थिति में थे. सच तो ये है कि उन्हें वुहान से जाने की जैसे ही इजाज़त दी गई, उसी क्षण वे चीन की सरकार के एजेंट बन गए. और वे लोग अमरीका में वायरस फैला रहे हैं, इसलिए नुक़सान अमरीका में हो रहा है."
मैथ्यू मरे की ये भी दलील है कि अगर कोरोना वायरस की शुरुआत किसी लैब या मार्केट से हुई तो दोनों ही जगह व्यावसायिक गतिविधियों में शामिल है. इसलिए अदालत में दूसरे अपवाद को भी माना जाएगा.
लगता नहीं कि मैथ्यू मरे यहीं पर रुक जाएंगे. उनका कहना है कि चीन की कम्युनिस्ट पार्टी को पार्टी बनाने के लिए मुक़दमे के आवेदन में संशोधन किया जाएगा.
"ये एक स्वतंत्र संगठन है. कोई देश नहीं है. इसका मतलब हुआ कि 'इम्यूनिटी ज्यूरिसडिक्शन' के नाम पर चीन की कम्युनिस्ट पार्टी को कोई छूट नहीं मिलने वाली है."
सफलता की गुंज़ाइश
लेकिन मैथ्यू मरे की दलील से इंटरनेशनल लॉ के एक्सपर्ट विम मुलर सहमत नहीं हैं.
वे कहते हैं, "उदाहरण के लिए अगर आप शी जिनपिंग को कसूरवार ठहराना चाहते हैं तो आप ये मुक़दमा नहीं जीत पाएंगे क्योंकि वे एक राष्ट्र के प्रमुख हैं. उन्हें भी 'इम्यूनिटी ज्यूरिसडिक्शन' के तहत छूट हासिल है और उनके जूनियर अधिकारियों को भी."
विम मुलर और प्रोफ़ेसर टॉम गिंसबर्ग दोनों ही इस बात पर सहमत हैं कि ऐसे मुक़दमों से लॉ फर्म्स और सरकारी वकील केवल प्रचार चाहते हैं.
लेकिन प्रोफ़ेसर टॉम गिंसबर्ग कहते हैं, "क्लास एक्शन सूट दायर करने वाले वकीलों के पास एक ही वक़्त में कई मुक़दमे होते हैं. उनमें से ज़्यादातर मुक़दमों में सफलता की गुंजाइश न के बराबर होती है. लेकिन अगर वे जीतते हैं तो बड़ी रक़म का मामला बन जाएगा."
वो हंसते हुए कहते हैं, "भले ही संभावनाएं कम हों लेकिन अगर एक ट्रिलियन डॉलर का मुक़दमा हो तो कोशिश करने में क्या बुराई है?"
अमरीका में मौजूद चीन की प्रॉपर्टी
'बेरमैन लॉ ग्रुप' के प्रवक्ता जेरेमी अल्टर्स कहते हैं, "हमारे यहां 24 से 25 लोग रोज़ाना इस केस पर काम कर रहे हैं. हमने इस पर बहुत पैसा ख़र्च किया है. और हम इस केस पर अपना पैसा ख़र्च करना जारी रखेंगे. अगर हमें इस मुक़दमे पर भरोसा नहीं होता और जीत का यक़ीन नहीं होता तो हम ये जोख़िम नहीं उठाते."
'बेरमैन लॉ ग्रुप' जैसी पार्टियों को ये उम्मीद है कि उन्हें वित्तीय मुआवज़ा मिलेगा और ये अमरीका में मौजूद चीन की प्रॉपर्टी से वसूला जाएगा.
हालांकि जेरेमी अल्टर्स ये भी मानते हैं कि जिन लोगों की जान चली गई है, उन्हें वापस तो नहीं लाया जा सकता है लेकिन उनके नुक़सान की थोड़ी भरपाई ज़रूर की जा सकती है.
वे कहते हैं, "चीन ने इस वायरस को वुहान से फैलने दिया और बाक़ी दुनिया को इसके ख़तरे से आगाह करने में वो नाकाम रहा जिससे हम ख़ुद को बचा सकते थे. वे इसके लिए ज़िम्मेदार हैं."
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