कोरोना वायरस: लॉकडाउन से बाहर आना क्या इतना आसान है?

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- Author, जेम्स गैलाघर
- पदनाम, स्वास्थ्य और विज्ञान संवाददाता
कोरोना वायरस के संकट से निपटने के लिए फ़िलहाल दुनिया के तमाम देशों के पास लॉकडाउन छोड़कर कोई दूसरा विकल्प नहीं दिख रहा.
लेकिन लॉकडाउन की वजह से लोगों में निराशा और हताशा बढ़ती जा रही है.
अब दुनिया के तमाम देशों के सामने यह मुसीबत है कि लॉकडाउन को ख़त्म करें तो कैसे करें या फिर पूरी तरह से लॉकडाउन ख़त्म करने की जगह सिर्फ़ कुछ पाबंदियों को ख़त्म किया जाए. लॉकडाउन ख़त्म करने के साथ कोरोना के संक्रमण को नियंत्रित करने और लोगों को बचाने की भी चुनौती सरकारों के सामने होगी.
चीन ने हाल में वुहान में जारी लॉकडाउन को ख़त्म किया था लेकिन इसके बाद वहां संक्रमण के कई मामले सामने आए हैं जिसने अधिकारियों की चिंता बढ़ा दी है.
कोरोना से निपटने की लड़ाई लंबी होने वाली है. यह सिर्फ़ कुछ हफ्तों की बात नहीं लगती.
लंदन स्कूल ऑफ़ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन के डॉक्टर एडम कुचार्सकी ने बीबीसी से कहा, "हमारे पास निश्चित तौर पर बहुत अच्छे विकल्प मौजूद नहीं हैं. ऐसा नहीं है कि एक ही दिन में सब कुछ बदल जाएगा, लेकिन चीज़ें सामान्य हो सकती हैं. "

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लॉकडाउन क्यों है ज़रूरी?
संक्रमण के मामले कम होने के साथ ही हम सीधे सामान्य जीवन की ओर नहीं लौट सकते हैं. अब ब्रिटेन का ही मामला देखिए. वहाँ संक्रमित होने वाले का अनुमानित अनुपात चार फ़ीसदी तक बताया जा रहा है या फिर इसे ऐसे कह सकते हैं कि क़रीब 63 लाख लोगों पर संक्रमण का ख़तरा सबसे ज़्यादा है.
अगर हम लॉकडाउन ख़त्म कर देते हैं तो हो सकता है कि स्थिति एक और विस्फोटक रूप ले लेगी.
बिना लॉकडाउन वाली स्थिति में एक संक्रमित व्यक्ति औसतन तीन लोगों को संक्रमित करेगा. लॉकडाउन की वजह से इस दर में 60-70 फ़ीसदी की गिरावट आ रही है.
अगर हम सोशल डिस्टेंसिंग ख़त्म करते हैं तो इसकी जगह हमें वायरस के संक्रमण को रोकने के लिए कोई और उपाय करने होंगे.
कई देशों में लॉकडाउन काफ़ी सफल रहा है. सत्तर फ़ीसदी से ज़्यादा तक संक्रमण को कम करने में कामयाबी मिली है.
डॉक्टर एडम कुचार्सकी बताते हैं, "इस बात के सबूत हैं कि कई देशों में लॉकडाउन के दौरान संक्रमण के मामले में इससे भी ज़्यादा कमी आई है. चीन में 80 से 90 फ़ीसदी गिरावट आई है."
इसकी वजह से कई देशों में तेज़ी से मामले कम हो रहे हैं. यह एक अच्छा मौक़ा है जब स्थिति पर नियंत्रण रखते हुए कुछ सख़्त पाबंदियों में छूट देने पर विचार किया जा सकता है.
चीन का वुहान जहां से कोरोना के संक्रमण की शुरुआत हुई थी, वहां बहुत लंबा और सख़्त लॉकडाउन चला है. इसका असर भी वहां देखने को मिला. लेकिन दुनिया के दूसरे देशों में अब तक साफ़ नहीं है कि कितनी ऐसी सफलताएँ देखने को मिल सकती हैं या फिर नहीं.

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बड़े पैमाने पर टेस्टिंग की रणनीति
बड़े पैमाने पर होने वाले टेस्ट आपको इस रणनीति पर काम करने की इजाज़त देते हैं कि आप किसी संक्रमित व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति को संक्रमित करने के पहले आइसोलेशन में रख दें.
इसे हम अगर सफलतापूर्वक करते हैं तो फिर यह वायरस के संक्रमण को कम कर देगा और फिर हमें रोज़मर्रा की ज़िंदगी में ज़्यादा पाबंदियां नहीं झेलनी पड़ेंगी.
डॉक्टर एडम कुचार्सकी कहते हैं, "अभी आपको सामाजिक मेलजोल में औसतन 60 से 70 फ़ीसदी की कमी लानी होगी ताकि आप इसके बढ़ते हुए प्रकोप को कम कर पाए."
लेकिन बड़े पैमाने पर टेस्टिंग जीवन को सामान्य नहीं रहने देती. हमें और भी उपायों पर विचार करना होगा जो कि लंबे समय तक अपनाया जा सके क्योंकि वायरस के संक्रमण की प्रवृति और उससे संक्रमित होने वाली आबादी की संभावना हमेशा बनी रहने वाली है.
हमें ये उपाय समय रहते खोजने होंगे ताकि संक्रमण जिस गति से हो रहा है, आप उससे ख़ुद को आगे रख पाएं. मसलन अभी जैसे स्मार्टफ़ोन ऐप की बात हो रही है, जो संक्रमण के मामलों की पहचान कर पाए.
अभी चूंकि संक्रमण को वो स्तर नहीं पहुँचा है इसलिए टेस्टिंग की बात संभव है लेकिन जब यह विस्फोटक रूप ले लेंगी तब यह इतना कारगर नहीं रह पाएगा.

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ख़ुद को सुरक्षित रखना है कारगर उपाय
संक्रमण से बचने की एक दूसरी रणनीति 'ख़ुद को बचाने के प्रयासों को बढ़ाना' है.
कोरोना वायरस को पूरी तरह से ख़त्म करने की बजाए इसे सबसे जोखिम वाले लोगों के बीच फैलने से रोकने का लक्ष्य रखा जा सकता है.
उम्र और मेडिकल सुविधाएँ, दो ऐसी चीज़ें जो कोविड-19 के जानलेवा होने की सबसे बड़ी वजहों में है.
लॉकडाउन की वजह से यह ज़रूर हुआ है कि अब आईसीयू में वो भीड़ नहीं हो रही है लेकिन सबसे जोखिम वाले वर्ग में संक्रमण रोक कर भी हम ऐसा करने में कामयाब हो सकते हैं.
यूनिवर्सिटी ऑफ़ एडिनबर्ग के प्रोफ़ेसर मार्क वूलहाउस का कहना है, "क़ुदरती तौर पर हममें से 80 फ़ीसदी लोगों के लिए यह वायरस वाक़ई में बहुत बुरा है. निश्चित तौर पर यह गंभीर स्वास्थ्य समस्या की एक वजह है. लेकिन हेल्थकेयर सिस्टम को यह बुरी तरह से प्रभावित करने वाला नहीं है और ना ही समाज को पूरी तरह लॉकडाउन करने वाला है."
वो आगे कहते हैं, "अगर हम वाक़ई में एक सुरक्षा कवच तैयार करने में कामयाब होते हैं तो यह आपको ज़्यादा राहत देने वाली बात होगी और इसका मतलब यह होगा कि आप कुछ क़दमों को हमेशा के लिए अपना सकते हैं."
हम पहले से ही यह काम कर रहे हैं और उन्हें 12 हफ़्तों तक घर में रहने को कह रहे हैं.
इस सुरक्षा कवच को हम सभी अस्पताल के कर्मियों और बुज़ुर्गों की देखभाल में लगे लोगों की बराबर टेस्टिंग कर के और मज़बूत कर सकते हैं.

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लॉकडाउन हटाने का क्या है तरीक़ा?
लॉकडाउन के दौरान कौन सी पाबंदियां हम हटा सकते हैं?
कुछ ऐसी पाबंदियां हैं जिन्हें हटा लेने से बहुत बड़ा फ़र्क़ नहीं पड़ता.
डॉक्टर एडम कुचार्सकी कहते हैं, "कुछ गतिविधियां ऐसी होती हैं जिन्हें लेकर जोखिम कम होता है."
वो बताते हैं कि पाबंदियों को तीन श्रेणियों में बांट सकते हैं. पहली तरह की पाबंदी, जिनमें कम जोखिम हो. दूसरी तरह की पाबंदी, जिनमें इससे थोड़ी ज़्यादा संभावना हो और तीसरे तरीक़े की पांबदी वो है जिनके नहीं होने से संक्रमण का ख़तरा बहुत बढ़ जाता है.
कम जोखिम वाली पाबंदी मसलन बाहर निकलकर कसरत करना. कुछ देशों में इस पर भी पाबंदी लगा दी गई है. दूसरी तरह की पाबंदियां जिन्हें हटाने पर विचार किया जा सकता है, वो हैं ग़ैर-ज़रूरी चीज़ों की ख़रीदारी पर से रोक हटा देना या फिर घर से बाहर किसी मौक़े पर इकट्ठा होना.
जो सबसे जोखिम वाली पाबंदियां हैं और जिनके ना रहने से संक्रमण के मामलों में इज़ाफ़ा तेज़ी से हो सकता है, वो है वर्क फ़रॉम होम को समाप्त करना, स्कूल-कॉलेज खोलना या फिर आइसोलेशन और क्वारंटीन को समाप्त करना.
लेकिन अब इनमें से तय करना एक मुश्किल काम है कि किन मामलों में किस हद तक पाबंदियों में छूट ली जा सकती है ताकि समाज और अर्थव्यवस्था को होने वाले नुक़सान को कम किया जा सके.

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इम्युनिटी पासपोर्ट
इम्युनिटी पासपोर्ट की चर्चा भी ख़ूब हो रही है. अगर टेस्ट से पता चला है कि आपको संक्रमण है और आप में वायरस को मारने वाला एंटीबडी भी तैयार है, तब आम रोज़मर्रा की ज़िंदगी को वैसे ही जी सकते हैं.
हालांकि इसे लेकर बहुत सारी वैज्ञानिक चिंताएँ भी शामिल हैं. हमारे पास अभी एंटीबडी बताने वाला सही टेस्ट मौजूद नहीं है. और हमें यह भी नहीं पता कि अगर एंटीबडी आपको बीमार होने से नहीं बचा पाया तो फिर क्या वो वायरस को दूसरे में फैलने से रोकने वाला है कि नहीं.
क्या होगा सबसे असरदार
प्रोफ़ेसर फर्गुसन सलाह देते हैं कि मई के आख़िरी दिनों से पाबंदियों को हटाना शुरू किया जा सकता है. लेकिन यह फ़ैसला इस पर भी निर्भर करता है कि हम वायरस के प्रभाव को कितना कम करने में कामयाब हुए हैं.
हम जितना संभव हो सके उतना इसके प्रभाव के नीचे जाने के बाद यह फ़ैसला कर सकते हैं ताकि वायरस के दोबारा हमला करने की संभावना को कम से कम किया जा सके. लेकिन अगर ऐसा नहीं हुआ तो फिर लॉकडाउन और लंबा जाएगा.
अगर हम लॉकडाउन से थोड़ा पहले ही निकलने का फ़ैसला करते हैं और फिर बड़ी संख्या में मामले सामने आते हैं तब इससे एक अलग ही समस्या खड़ी होगी.

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सबसे बड़ा बदलाव वैक्सीन की खोज होने से होगा. अगर लोगों को वैक्सीन देकर रोग प्रतिरोधी बना दिया गया तब फिर सोशल डिस्टेंसिंग की ज़रूरत ही नहीं रह जाएगी. लेकिन इसमें एक साल से ज़्यादा का वक़्त लग जाएगा.
अगर वैक्सीन बनाने में फ़िलहाल कोई कामयाबी नहीं मिलती है तो हर्ड इम्युनिटी की संभावना के लिए भी जगह बन सकती है.
ऐसा तब होगा जब बड़ी संख्या (आबादी का लगभग 70 फीसदी) में लोग वायरस से संक्रमित हों और वायरस अपना और ज़्यादा प्रकोप ना बढ़ा सके.
वायरस पर असर करने वाली प्रभावी दवाएं भी एक बड़ा फ़र्क़ पैदा कर सकती हैं अगर वो सर्दी और खांसी से ज़्यादा इस वायरस का प्रभाव ना बढ़ने दें तो और फिर जिसमें आईसीयू की ज़रूरत ना पड़े. इसके लिए अब भी हम क्लिनिकल ट्रायल के नतीजों का इंतज़ार कर रहे हैं.
आने वाले महीनों में हो सकता है कि हम सामान्य जीवन की तरफ़ बढ़ें या फिर थोड़ी-बहुत ही सही सामान्य हालात पैदा होनी शुरू हो. लेकिन फ़िलहाल हम एक अंधी खाई में हैं.



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