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कोरोना: पाकिस्तान में ग़रीब कोरोना और अमीर कोरोना - ब्लॉग
- Author, मोहम्मद हनीफ़
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, पाकिस्तान
अपने मोहल्ले के जनरल स्टोर से घर का सामान ख़रीदते हुए एक व्यक्ति को देखा जो मिनरल वॉटर की पेटियां जमा कर रहा था लेकिन ज़िद पर अड़े हुए था कि पाकिस्तानी नेस्ले नहीं चाहिए,वो दुबई वाला आता है वो चाहिए.
जब जनरल स्टोर वाले ने बताया कि वो अभी उपलब्ध नहीं है तो वो भन्नाते हुए गाड़ी की चाबी घुमाते हुए किसी अच्छे स्टोर की तरफ़ चल दिया.
मेरे मोहल्ले के स्टोर वाली गली में ही कराची का मशहूर पब्लिक होटल 'कैफ़े क्लिफ़्टन' है. ये इतना पब्लिक है कि ईद के दिन भी बंद नहीं होता. कराची की बहुत ही कम ऐसी जगहें हैं जहां मज़दूर और बाबू एक साथ बैठकर चाय पीते हैं.
यहां पर सुबह मुफ़्त नाश्ते का भी इंतज़ाम होता है. कई सालों से देख रहा हूं कि एक पराठे और चाय के कप के लिए लगी लाइन लंबी होती जा रही है. लोग अपने छह बच्चों को भी लाते हैं. नाश्ते का इन्तज़ार करते लोगों के हुलिए से पता चलता है कि वो मेहनतकश हैं, भिखारी नहीं.
उनमें वर्दियां पहने प्राइवेट सिक्योरिटी गार्ड होते हैं, कभी रिक्शा चलाने वाले और एक आध बार तो मैंने पुलिस वाले को भी एक हाथ में बंदूक़ और दूसरे हाथ से चाय पराठा पकड़ते देखा है जो कैफ़े क्लिफ़्टन के कर्मचारी किसी परोपकारी और दर्दमंद शहरी की तरह बांट रहे थे.
सिंध सरकार ने फ़ैसला किया है और अच्छा फ़ैसला किया है कि जनरल स्टोर के अलावा बाकी सभी धंधे बंद किये जाएं तो पहली बार कैफ़े क्लिफ़्टन पर शटर पड़े देखा और साथ ही यह भी अहसास हुआ कि शहर में एक अमीर कोरोना है जो दुबई के मिनरल वॉटर की तलाश में है और एक ग़रीब कोरोना है जिसे सुबह मिलने वाली मुफ़्त चाय और पराठे भी बंद हो गए.
कराची वाले अपने आपको बहुत ही हिम्मत वाला समझते हैं. मैं कहता रहता हूं कि हम ढीट लोग हैं. अल्ताफ़ हुसैन की दादागिरी हो, या रेंजर्स के लगातार ऑपरेशन हों, देश के दूसरे आफ़तज़दा इलाक़ों से आकर पनाह लेने वालों की बड़ी संख्या हो या ताबड़तोड़ होने वाले चरमपंथी हमले, हम दो दिन बाद ही कपड़े झाड़कर खड़े हो जाते हैं और नुक्कड़ वाले पान के ढाबे पर खड़े होकर पान लगवाते हैं और पूछते हैं कि 'और सुनाओ क्या हाल हैं?'
हम इसको ढिटाई कह लें या हिम्मत कह लें लेकिन हक़ीक़त यही है कि ज़्यादातर शहर में ठहराव ही नहीं है कि वो किसी ख़ौफ़ और सदमे की वजह से घर में बंद होकर बैठ जाए.
शहर की आधी से ज़्यादा आबादी दिहाड़ी मज़दूर है. रोज़ कुआं खोदते हैं, रोज़ पानी पीते हैं. घर में चार पांच दिन से ज़्यादा का राशन नहीं होता. जब अल्ताफ़ हुसैन के दबदबे में पूरा कराची आधे घंटे के अंदर-अंदर बंद हो जाता था तो 48 घंटे बाद लोग, 'भाई गया भाड़ में' कहते हुए आहिस्ता-आहिस्ता अपने धंधे के लिए निकल पड़ते थे.
लेकिन अब वो इन धंधों के लिए जाएं भी तो कहां? एक ग़रीब, अमीर स्कूल के बाहर एक भुनी हुई मकई बेचने वाला या टॉफ़ियों की छपड़ी वाला. स्कूल बंद तो धंधा बंद.
हर छोटे बाज़ार के कोने पर एक मोची जो बाबुओं के जूते पॉलिश करके और मज़दूरों की चप्पलें गांठ कर के हलाल रोटी बनाने वाला, बाज़ार बंद तो उसका रोज़गार बंद.
समंदर के किनारे पर थर्मस से कहवा बेचने वाले, करारे पापड़ वाले, ऊँटों और घोड़ों पर सवारी कराने वाले. समंदर का किनारा बंद तो घर का चूल्हा भी बंद.
सड़क के किनारे हथोड़ी, छेनी, ड्रिल मशीन, पेंट ब्रश लेकर काम कराने वाले का इन्तज़ार करते मज़दूर, वो खायें या कोरोना से बचें?
ट्रैफ़िक लाइट पर गुब्बारे, खिलौने बेचते बच्चे और 10 रुपये के बदले आपको हाजी साहब कहने वाली बूढ़ी औरत, शहर के लॉकडाउन के बाद ये सब लोग कहां जायेंगे.
सिंध सरकार के विरोधी भी और वो लोग भी जो भुट्टो के नाम के साथ गाली देना अपना राजनीतिक फ़र्ज़ समझते हैं इस बात के प्रशंसक हैं कि सिंध सरकार ने बाक़ी सूबों की तुलना में बेहतर काम किया है. स्कूल, कॉलेज, बाज़ार बंद करके लोगों को इस महामारी से बचने के लिए तैयार किया है.
अब क्या ही अच्छा हो कि शहर में फैली धर्मार्थ संस्थाओं के जाल जैसे ईधी, सैलानी, अमन फ़ाउंडेशन और इस जैसी दूसरी संस्थाओं के साथ मिलकर इन मेहनतकशों के लिए राशन और दूसरी सामान्य जीवन की ज़रूरत के सामान का बंदोबस्त किया जाए नहीं तो सक्षम लोग तो घरों में बंद होकर अपना मिनरल वॉटर पीते रहेंगे, लेकिन मज़दूर अपनी जान हथेली पर रखकर रोटी की तलाश में निकलने पर मजबूर होगा.
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