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इमरान ख़ान को नोबेल पुरस्कार देने की मांग क्यों उठी: उर्दू प्रेस रिव्यू
- Author, इक़बाल अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पाकिस्तान से छपने वाले उर्दू अख़बारों में इस हफ़्ते देश में औरतों का मार्च, अफ़ग़ानिस्तान शांति समझौता और दिल्ली के दंगों से जुड़ी ख़बरें सबसे ज़्यादा सुर्ख़ियों में रहीं.
पहले बात अमरीका और तालिबान के बीच समझौते की.
अमरीका और तालिबान के बीच अफ़ग़ानिस्तान में शांति बहाल करने के लिए क़तर की राजधानी दोहा में समझौते पर दस्तख़त तो हो गए थे लेकिन शांति समझौता ख़तरे में पड़ गया है.
अख़बार जंग ने सुर्ख़ी लगाई है, ''काबुल शांति समझौते पर संगीन हमला, अब्दुल्लाह अब्दुल्लाह, करज़ई के जलसे पर फ़ायरिंग.''
हज़ारा समाज के एक नेता अब्दुल अली मज़ारी की 25वीं बरसी मनाई जा रही थी जिसमें अफ़ग़ानिस्तान के चीफ़ एक्ज़क्यूटिव अब्दुल्लाह अब्दुल्लाह और राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी मौजूद थे. इस कार्यक्रम पर हमले में 32 लोग मारे गए और क़रीब 60 घायल हुए.
अख़बार जंग के अनुसार ख़ुद को इस्लामिक स्टेट कहने वाले चरमपंथी संगठन ने हमले की ज़िम्मेदारी ली है. तालिबान पहले ही कह चुका है कि इस हमले में उसका हाथ नहीं था.
अफ़ग़ानिस्तान में हमला और शांति समझौता
राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी ने इसे मानवता और अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रीय एकता पर हमला क़रार दिया. पाकिस्तानी विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी ने कहा कि इस हमले के पीछे वहीं ताक़तें हैं जो अफ़गानिस्तान में तालिबान और अमरीका के बीच शांति समझौता को नाकाम करना चाहती हैं.
शाह महमदू क़ुरैशी ने कहा कि ये सबके लिए परीक्षा की घड़ी है.
अमरीकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने कहा कि पिछले पाँच-छह साल की तुलना में अफ़गानिस्तान में हिंसा में असाधारण कमी आई है.
अख़बार जंग में संपादकीय भी लिखा गया है जिसमें अफ़ग़ानिस्तान शांति समइझौते को बचाने की वकालत की गई है.
शांति समझौते में अफ़ग़ानिस्तान की जेलों में बंद पाँच हज़ार तालिबान क़ैदियों की रिहाई का मुद्दा भी रोड़े अटका रहा है.
तालिबान ने कहा है कि समझौते पर दस्तख़त के 10 दिनों के अदंर उसके क़ैदियों की रिहाई होनी चाहिए, लेकिन राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी ने कहा है कि शांति समझौते के तहत ऐसी कोई शर्त नहीं रखी गई थी.
इस बीच अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अशरफ़ ग़नी को फ़ोन किया है. अख़बार नवा-ए-वक़्त के अनुसार ट्रंप ने फ़ोन पर अशरफ़ ग़नी से कहा कि उन्हें अफ़ग़ानिस्तान की सरकार पर पूरा भरोसा है.
इमरान ख़ान को नोबेल पुरस्कार की मांग
पाकिस्तानी पंजाब प्रांत के गवर्नर ने माँग की है कि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को अफ़ग़ानिस्तान शांति समझौते में अहम भूमिका निभाने के लिए शांति का नोबेल पुरस्कार दिया जाना चाहिए.
अख़बार नवा-ए-वक़्त के अनुसार पंजाब के गवर्नर सरवर चौधरी ने कहा, ''अफ़ग़ानिस्तान शांति समझौते में इमरान ख़ान के नेतृत्व में पाकिस्तान का ऐतिहासिक और निर्णायक रोल रहा है. ये समझौता इमरान ख़ान के सैद्धान्तिक स्टैंड की जीत है. इसलिए इमरान ख़ान हर लिहाज़ से नोबेल शांति पुरस्कार के हक़दार हैं.''
महिलाओं का मार्च
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौक़े पर पाकिस्तान में महिलाएं एक मार्च निकाल रहीं हैं. लेकिन कुछ लोग इस पर पाबंदी लगाने की गुहार के साथ इस्लामाबाद हाईकोर्ट पहुंचे. हालांकि अदालत ने मार्च पर पाबंदी की अपील ख़ारिज कर दी.
अख़बार एक्सप्रेस के अनुसार हाईकोर्ट के चीफ़ जस्टिस अतहर मेनल्लाह ने याचिकाकर्ता के वकील से पूछा, ''मार्च में लगने वाले नारे तो वही हैं जो इस्लाम ने 1400 साल पहले महिलाओं को दिए थे.''
जस्टिस अतहर ने कहा कि याचिकाकर्ताओं को महिलाओं के मार्च को सकारात्मक तरीक़े से देखना चाहिए. मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि मार्च की आयोजनकर्ताओं ने तो साफ़ कहा है कि वो वहीं माँग कर रही हैं जो मुसलमानों के धार्मिक ग्रंथ क़ुरान में महिलाओं को दिए गए हैं.
इससे पहले प्रधानमंत्री इमरान ख़ान की ख़ास सलाहकार फ़िरदौस आशिक़ आवान ने कहा था, ''मुठ्ठी भर औरतें हमारी बेटियों को गुमराह कर रही हैं. ऐसे नारों की हमारे धर्म, समाज और घरों में कोई गुंजाइश नहीं.''
अख़बार दुनिया के अनुसार फिरदौस आशिक़ आवान का कहना था, ''पाकिस्तान का संविधान महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करता है. शांतिपूर्वक विरोध प्रदर्शन सब किसी का संवैधानिक अधिकार है लेकिन महिलाएं जो नारे लगा रही हैं वो किस समाज का आईना दिखा रही हैं.''
मनमोहन सिंह के लेख की चर्चा
दिल्ली में हुए दंगों से जुड़ी ख़बरें भी सारे पाकिस्तानी अख़बारों में प्रमुखता से छपीं.
अख़बार नवा-ए-वक़्त ने सुर्ख़ी लगाई है, ''गैस चैम्बर की ज़रूरत नहीं, घरों को तंदूर में बदल देते हैं: मोदी के ज़ुल्म पर भारतीय मीडिया बोल पड़ा.''
अख़बार नवा-ए-वक़्त के अनुसार एक भारतीय अख़बार ने दिल दहला देने वाली रिपोर्ट पब्लिश की है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि दिल्ली में दंगों के दौरान दंगाइयों ने जो तरीक़ा अपनाया था, वो नाज़ी जर्मनी से भी ज्यादा एडवांस था.
भारत के पूर्व प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह का एक लेख भी पाकिस्तान के सारे अख़बारों में छपा है.
कई अख़बारों ने तो पूरे लेख को हूबहू छाप दिया है. अख़बार दुनिया ने इस पर सुर्ख़ी लगाई है, ''भारत बहुत तेज़ी से साथ मंज़र से ग़ायब हो रहा है.''
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