पाकिस्तान में मीडिया को रेंगने पर मजबूर करती सरकार- वुसअत का ब्लॉग

इमरान ख़ान

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    • Author, वुसअतुल्लाह ख़ान
    • पदनाम, पाकिस्तान से, बीबीसी हिंदी के लिए
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भले शुद्ध तानाशाही हो या शेरवानी पहन के जनता पर सवारी गांठने वाली सिविलियन डिक्टेटरशिप, सबका एक ही सपना होता है- ख़ामोशी. जनता की गज़ भर ज़ुबान पर क़ाबू रखना, किसी परेशान करने वाले प्रश्न से बचना, यानी जो हम बताएं वही सत्य है बाक़ि सब बकवास या ग़द्दारी.

मक़सद एक ही है, जनता जनार्दन नामक जानवर पाबंदियों के हंटर की सड़ाक सड़ाक सुनते हुए ग़ुर्राने या सवारी को दुलत्ती मारने की बजाय सीधा-सीधा चलता रहे. तानाशाह विरोध या आलोचना को क़ाबू करने के लिए जितनी भी रस्सियां और फंदे बना ले, उसे यही लगता है कि ये कम हैं अभी और रस्सियां और फंदे बनाने की ज़रूरत है.

अब पाकिस्तानी मीडिया भी हिंदुस्तानी मीडिया की तरह पिछले डेढ़-दो वर्ष से आपका ख़ादिम (सेवक), फ़िदवी (भक्त), बादशाह सलामत के क़दमों की ख़ाक (धूल) और लाल क़ालीन बना हुआ है.

फ़र्शी सलाम करते-करते उसकी कमर जवाब दे चुकी है फिर भी बादशाह सलामत संतुष्ट नहीं, रोज़ाना हर अख़बार और चैनल के न्यूज़ रूम में फ़ोन पर बताया जाता है कि आज क्या किया जाएगा और क्या नहीं करना है.

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बादशाह सलामत को इसके बावजूद शिकायत रहती है कि मीडिया पूरी तरह देश सेवा में सरकार का साथ नहीं दे रही. रही बात सोशल मीडिया की तो वो पहले ही से पाकिस्तान टेलीकम्युनिकेशन रीऑर्गेनाइज़ेशन एक्ट और प्रीवेंशन ऑफ़ इलेक्ट्रॉनिक क्राइम एक्ट के तहत सख्ती से रेग्युलेट और मॉनिटर हो रहा है.

मगर बादशाह सलामत और उनके नवरत्नों को अब भी सोशल मीडिया बेक़ाबू लग रहा है, चुनांचे लगभग एक महीना पहले केंद्रीय मंत्रिमंडल ने चुपके से कुछ और क़ानून मंज़ूर कर लिए और फिर अचानक पिछले हफ़्ते एलान किया कि ये क़ानून तो लागू भी हो चुका है.

अगर ऐसा है तो पाकिस्तान रातोंरात वो देश बन गया है जहां सोशल मीडिया को नियंत्रित करने के लिए सबसे कड़े क़ानून लागू हैं. एशिया इंटरनेट कोअलिशन जिसमें फ़ेसबुक, ट्विटर, गूगल, अमेज़न और एप्पल जैसी बड़ी कंपनियां शामिल हैं, उनका कहना है कि नया क़ानून अगर वापस नहीं लिया जाता या उसमें अतंरराष्ट्रीय नियमों के हिसाब से तब्दीली नहीं की जाती तो हमें पाकिस्तान के लिए अपनी सेवाएं बंद करनी पड़ सकती हैं.

क्या है नया क़ानून?

नया क़ानून यह है कि जिस-जिस सोशल या डिजिटल मीडिया कंपनी को पाकिस्तान में काम करना है वो अगले तीन महीने के अंदर इस्लामाबाद में अपना स्थायी दफ़्तर बनाए, एक साल के अंदर डेटा स्टोरेज का लोकल सर्वर बनाए और सरकारी कोऑर्डिनेटर जिस भी नागरिक (यूज़र) का डेटा मांगे उसे तुरंत मुहैया किया जाए.

सरकारी कर्मचारी जिस वेबसाइट को भी ब्लॉक करने का आदेश दें उसका छह से चौबीस घंटे में पालन किया जाए. जो सोशल मीडिया कंपनी ऐसा नहीं करेगी उस पर 50 करोड़ रुपए तक का जुर्माना लग सकेगा और बार-बार सरकार की बात सुनी अनसुनी करने वाली कंपनी को पाकिस्तान से बोरिया बिस्तर लपेटना पड़ेगा.

विडंबना ये है कि ये कड़े क़ानून ऐसे समय लागू किए जा रहे हैं जब पाकिस्तानी युवा ई-कॉमर्स के मैदान में अपने पांव टिकाने की कोशिश कर रहे हैं.

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इस वक़्त पाकिस्तान में लगभग 100 करोड़ डॉलर का ई-व्यापार हो रहा है. ज़्यादातर देश के अंदर ही हो रहा है क्योंकि देश से बाहर के लिए ई-पेमेंट का सिस्टम अभी तक पूरी तरह से बन नहीं पाया है. अंतरराष्ट्रीय ई-प्लेटफॉर्म PayPal ने भी फ़िलहाल पाकिस्तान आने से इनकार कर दिया है.

ऐसे समय जब पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था को एक-एक पाई की ज़रूरत है और इसके लिए कभी वो आईएमएफ़ के पास जा रहा है तो कभी सऊदी अरब समेत खाड़ी के अमीर देशों की तरफ़ देख रहा है, पाकिस्तान को ई-कॉमर्स और डिजिटल व्यापार की बहुत सख़्त ज़रूरत है.

अगर पाकिस्तान में ई-व्यापार की सारी सुविधाएं उपलब्ध हो जाएं तो अगले तीन वर्षों में ये 500 करोड़ डॉलर तक भी पहुंच सकता है. मगर नए साइबर क़ानून के बाद अगर अंतरराष्ट्रीय सोशल मीडिया और डिजिटल कंपनियां पाकिस्तान में अपने ऑपरेशन बंद करने पर मजबूर होती हैं तो फिर ई-कॉमर्स के भविष्य का ख़ुदा ही हाफ़िज़ है.

लेकिन क़ौमें मर थोड़ी ही जाती हैं. आख़िर उत्तर कोरिया, ईरान और मध्य एशिया के कुछ देश भी तो डिजिटल मीडिया के बग़ैर ज़िंदा हैं. अर्थव्यवस्था तो बनती बिगड़ती रहती है. सबसे बड़ा मसला बस ये है कि सोशल मीडिया को कैसे तेज़ाबी गंगाजल से पवित्र किया जाए.

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