क्या श्रीलंका के चुनावी नतीजे भारत के साथ उसके रिश्तों को बदल देंगे?

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- Author, मुरलीधरन के विश्वनाथन
- पदनाम, कोलंबो से बीबीसी हिंदी के लिए
16 नवंबर को श्रीलंका में राष्ट्रपति चुनाव होने हैं. क्या इन चुनावों का असर श्रीलंका के साथ भारत और चीन के संबंधों पर भी पड़ेगा?
इस बार राष्ट्रपति पद के लिए हो रहे चुनाव की दौड़ में 30 उम्मीदवार हैं. लेकिन माना जा रहा है कि मुख्य लड़ाई यूनाइटेड नेशनल पार्टी के सजित प्रेमदासा और श्रीलंका पोडुजाना पेरामुना के गोटाबाया राजपक्षे के बीच है.
निवर्तमान राष्ट्रपति मैत्रिपाला सिरीसेना का कार्यकाल बहुत विवादास्पद रहा है. वो चुनाव नहीं लड़ रहे हैं. उनकी श्रीलंका फ़्रीडम पार्टी की ओर से भी इस चुनाव में कोई उम्मीदवार नहीं खड़ा है.
उनकी पार्टी वैचारिक रूप से दो गुटों में विभाजित हो गई है. एक तरफ एक गुट गोटाबाया राजपक्षे का समर्थन कर रहा है तो, दूसरी तरफ पूर्व राष्ट्रपति चंद्रिका कुमारतुंगा के समर्थक साजित का समर्थन कर रहे हैं.
साल 2015 में हुए राष्ट्रपति चुनावों में मैत्रिपाला सिरिसेना ने आरोप लगाया था कि उनके विरोधी और तत्कालीन राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे की चीन से क़रीबी रिश्ते हैं.
उस समय ये भी सवाल खड़ा हुआ था कि अगर महिंदा की चुनावों में हार होती है तो क्या चीन को लेकर श्रीलंकाई सरकार के फ़ैसले भी बदल जाएंगे.
हालांकि इस तथ्य के बावजूद कि महिंदा की इन चुनावों में हार हुई, श्रीलंका में चीनी निवेश और उसके साथ क़रीबी संबंध बरक़रार रहे.
उस समय महिंदा राजपक्षे के समर्थकों ने आरोप लगाया था कि उनकी अभूतपूर्व हार में भारत ने बड़ी भूमिका निभाई थी.

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चीन का दख़ल
इस पृष्ठभूमि में देखा जाए तो ये सवाल खड़ा होता है कि इस महीने होने वाले राष्ट्रपति चुनाव का श्रीलंका के भारत और चीन के साथ रिश्तों पर क्या असर पड़ेगा?
कोलंबो यूनिवर्सिटी में राजनीतिक विज्ञान और पब्लिक पॉलिसी विभाग में प्रोफ़ेसर रहे जयदेव उयांगगोडे का कहना है, "कुछ दिन पहले ही राजपक्षे की ओर से रानिल विक्रमसिंघे पक्ष को अमरीका और पश्चिमी ताक़तों का समर्थक बताने की कोशिश हुई. अब इसमें थोड़ी कमी आई है. आम तौर पर चुनावों में विदेश नीति कोई बहुत बड़ी भूमिका नहीं निभाती."
दस साल से अधिक समय से चीन श्रीलंका को वित्तीय रूप से मदद कर रहा है. अब उसने श्रीलंका के दक्षिण पश्चिमी तट के पास अम्बाथोट्टाई में महिंदा राजपक्षे बंदरगाह को अपने नियंत्रण में ले लिया है.
इस अधिग्रहण की सामरिक अहमियत है. ये बंदरगाह महिंदा राजपक्षे के कार्यकाल में बनाया गया था.
ये बंदरगाह चीनी युद्धपोतों की आवाजाही के लिए हिंद महासागर में बहुत ही सुलभ जगह पर स्थित है जहां से इन्हें तेल की आपूर्ति हो सकती है.
चीन ने कोलंबो बंदरगाह को भी विकसित करने में काफ़ी बड़ी भूमिका निभाई है.
भारत ने कोलंबो बंदरगाह में ईस्टर्न कंटेनर टर्मिनल बनाने को लेकर श्रीलंका के साथ एक समझौता किया है.
लेकिन इस तरह की बहुत कम ही परियोजनाओं पर श्रीलंका ने अपनी रुचि ज़ाहिर की है. यहां तक कि कोलंबो कंटेनर समझौता भी बहुत लंबे समय बाद हो सका.
मैत्रिपाला सिरिसेना ने भारत के साथ समझौते करने में बहुत दिलचस्पी नहीं दिखाई, जिस पर बीते अक्तूबर में हुई बैठक में प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे और राष्ट्रपति ने सवाल भी उठाए थे.

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संबंध साधने की जद्दोजहद
जापान के हस्तक्षेप के बाद इस समझौते पर हस्ताक्षर हो सका. भारत की इस समझौते को लेकर काफ़ी रुचि थी क्योंकि भारत को आने वाला बहुत सारा सामान कोलंबो बंदरगाह से होकर आता है.
श्रीलंका में कोई भी सत्ता में आए, भारत उससे सहयोग लेना चाहेगा. लेकिन तमिलों और चीन के साथ क़रीबी के मुद्दे पर राजपक्षे परिवार के रुख़ को लेकर उसकी कुछ चिंताएं रही हैं.
श्रीलंका की राजनीति और अर्थव्यवस्था पर नियमित रूप से लिखने वाले अगिलान काथिरकुमार के अनुसार, "पड़ोसी देशों से श्रीलंका के संबंधों में बहुत कुछ बदलाव नहीं आने वाला है. कोई भी उम्मीदवार जीते वो भारत और चीन के साथ दोस्ती चाहेगा. दूसरी तरफ़ दोनों ही देश श्रीलंका के साथ मिलकर काम करना चाहेंगे."
उनका ये भी कहना है कि ये मुद्दा चुनावों में बहुत अहमियत नहीं रखता.
बहुत सारे लोग इस बात की ओर इशारा करते हैं कि गृह युद्ध के बाद श्रीलंका के विदेशी मामलों में भारत की अहमियत कम हुई है.
जयदेव उयांगगोडे के अनुसार, "श्रीलंकाई तमिलों और भारत के बीच के संबंध गृह युद्ध के बाद कमज़ोर हुए हैं. यहां बहुत से तमिलों को लगता है कि भारत ने उन्हें धोखा दिया है. सिंघली भी भारत के साथ बहुत क़रीबी नाता नहीं महसूस करते और उसे एक ख़तरे के रूप में देखते हैं."
लेकिन भारत के मुक़ाबले चीन ने बहुत खामोशी लेकिन लगातार श्रीलंका में निवेश किया है और देश को कर्ज के तले दबा दिया है.
श्रीलंका में कई इमारतें, बंदरगाह और सड़कें इस बात का सबूत हैं.

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भारत के साथ कमज़ोर हुए रिश्ते?
जयदेव उयांगगोडे के मुताबिक़, "पिछले 30 सालों में भारत ने धीरे-धीरे श्रीलंका पर अपनी पकड़ को खोई है. मैं नहीं समझता कि भारत के साथ संबंधों का कोई बड़ा महत्व रह गया है."
हालांकि महिंदा के पक्ष ने आरोप लगाया है कि भारत ने 2015 के राष्ट्रपति चुनावों में उलटफेर के लिए भूमिका निभाई. इसके बाद उनके भारत दौरों की संख्या बढ़ गई.
श्रीलंका के वरिष्ठ पत्रकार वीराकाथी थानाबालासिंघम कहते हैं, "श्रीलंका के साथ भारत अपने संबंधों को आर्थिक आधार पर ही तय कर सकता है. अब वो तमिल मुद्दे के आधार पर दबाव नहीं बना पाएगा."
वो कहते हैं कि ना तो भारत और ना ही अमरीका संबंध बनाए रखने और चीन से दूरी बनाने के लिए दवाब डालने की स्थिति में हैं.
हालांकि वो यूनाइटेड नेशनल पार्टी के चीन विरोधी रुख में बदलाव आने का भी इशारा करते हैं. वो कहते हैं, "यूएनपी पहले तो हम्बनटोटा बंदरगाह को चीन को दिए जाने का विरोध किया. रानिल विक्रमसिंघे के कार्यकाल में यही बंदरगाह चीन को 99 साल की लीज़ पर दे दिया गया था."
चीन श्रीलंका के साथ अपने संबंधों को लगातार मजबूत कर रहा है क्योंकि वो हिंद महासागर में अपनी उपस्थिति सुनिश्चित करना चाहता है. वो श्रीलंका में भारी निवेश भी कर रहा है.
वहीं इसके मुक़ाबले अभी हाल तक भारत का श्रीलंका के साथ रिश्ता तमिल मुद्दे पर आधारित था.
सत्ता में कोई भी राष्ट्रपति आए, यही अंतर श्रीलंका के भारत और चीन के साथ रिश्तों की रूपरेखा तय करेगा.
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