पाकिस्तान FATF के सामने चार महीने में ख़ुद को साबित नहीं कर पाया तो क्या होगा: नज़रिया

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चरमपंथ को मिलने वाली वित्तीय मदद की निगरानी करने वाली एजेंसी फ़ाइनेंशियल एक्शन टास्क फ़ोर्स (एफ़एटीएफ़) ने ठोस कार्रवाई करने के लिए पाकिस्तान को चार महीने का वक़्त दिया है.

इस अंतरराष्ट्रीय एजेंसी ने पिछले साल पाकिस्तान को अपनी ग्रे लिस्ट में डाल दिया था.

इस सूची में वे देश शामिल हैं जिन्होंने मनी लॉन्ड्रिंग और चरमपंथी गुटों को मिलने वाली आर्थिक मदद पर अंकुश लगाने में कोताही बरती.

एजेंसी ने कहा है कि अगर अगले चार महीने में कोई नतीजा नहीं निकलता है तो पाकिस्तान पर कार्रवाई होगी.

अगर एफएटीएफ़ पाकिस्तान को ब्लैकलिस्ट करता है तो पहले से ही लचर चल रही अर्थव्यवस्था पर ख़तरा और बढ़ जाएगा, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक मदद नहीं मिल पाएगी.

इस अल्टीमेटम के बाद पाकिस्तान चार महीने में कैसे लक्ष्यों को पूरा कर पाएगा और उसके सामने क्या चुनौतियां हैं, इसी पर बीबीसी संवाददाता संदीप राय ने इस्लामाबाद से वरिष्ठ पत्रकार हारून रशीद से बात की.

पढ़ें उनका नज़रिया उन्हीं के शब्दों में:

वीडियो कैप्शन, क्या पाकिस्तान ब्लैकलिस्ट होने से सिर्फ़ एक कदम दूर है?

अमरीका नहीं चाहता था

एफ़एटीएफ़ से पाकिस्तान को जो मोहलत मिली वो न सिर्फ़ चीन के कारण मिली बल्कि तुर्की ने भी पाकिस्तान का साथ दिया और अमरीका भी नहीं चाहता था उसकी मौजूदा ख़राब आर्थिक हालत और बैठ जाए.

हालांकि एफ़एटीएफ़ की अगुवाई इस समय चीन ही कर रहा है.

एफ़एटीएफ़ ने पाकिस्तान को 29 टास्क दिए थे जिसमें सिर्फ़ पांच पूरे हुए हैं और बाकी पर आंशिक या बिल्कुल भी प्रगति नहीं हुई है. यानी पाकिस्तान का प्रदर्शन बहुत अच्छा नहीं रहा है.

अब देखना यही है कि पाकिस्तान अगले चार माह में ये टास्क पूरे कर पाता है या नहीं.

हालांकि जब बीते जून में पाकिस्तान को अक्तूबर की समय सीमा दी गई थी, उसके बाद से सरकार ने कुछ गंभीरता तो दिखाई है.

क्योंकि एफ़एटीएफ़ ने भी माना है कि अर्थव्यवस्था में जो खामियां दूर करनी हैं या तब्दीलियां लानी हैं, पाकिस्तान उस दिशा में कोशिश कर रहा है.

लेकिन काम बहुत ज़्यादा है और कहा जा रहा है कि सरकार और सेना का नेतृत्व मिलकर काम कर रहा है.

मसला ये है कि क्या पाकिस्तान में इतनी क़ाबिलियत है कि वो इन्हें समय रहते अंजाम दे पाएगा, क्योंकि इसमें बहुत सारे तकनीकी और वित्तीय पक्ष हैं जिनको हल करने के लिए बहुत विशेषज्ञता की ज़रूरत है.

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पाकिस्तान की मुश्किलें

सबसे बड़ी मुश्किल है कि वित्तीय लेनदेन पर नज़र रखने वाली पाकिस्तान की फ़ाइनेंशियल मैनेजमेंट एजेंसी का प्रदर्शन बहुत अच्छा नहीं है.

चरमपंथी संगठनों को आर्थिक मदद रोकने को लेकर भारत का काफ़ी दबाव था और वो चाह रहे थे कि भारत प्रशासित कश्मीर में जो चरमपंथी संगठन हैं, जो पाकिस्तान से संचालित हैं, उन्हें बंद किया जाए.

जहां तक हमारी जानकारी है पाकिस्तान ने ऐसे संगठनों पर कार्रवाई की है. उनके दफ़्तरों को बंद किया है, जो सरकार की ओर से पैसे मिल रहे थे उन्हें बंद किया गया है.

इसकी बड़ी वजह है कि एफ़एटीएफ़ उस हर चीज़ की रसीद मांग रहा है जिससे जुड़ी कार्रवाई करने का दावा पाकिस्तान दावा करता है.

वित्तीय लेनदेन की पूरी जानकारी रखी जा रही है. इस पर सवाल पूछे जा रहे हैं और इस पर पाकिस्तान के लिए कुछ भी छुपाना मुमकिन नहीं है.

एफ़एटीएफ़ की सबसे बड़ी चिंता यही है कि इन कार्रवाइयों में सज़ा का प्रतिशत बहुत ही कम है.

दूसरी चिंता ये है कि पाकिस्तान ने किसी बड़े लेन-देन को नहीं पकड़ा है, जिसकी राशि अरबों-खरबों में हो. मनी लॉन्ड्रिंग का कोई बहुत बड़ा मामला सामने नहीं आया है.

हालांकि एजेंसियों ने कुछ लोगों को पकड़ा है और कुछ मामले अदालतों तक भी गए हैं लेकिन इसमें बहुत कम लोगों को सज़ाएं हुई हैं.

एफ़एटीएफ़ की कोशिश तो यही है कि पाकिस्तान में जो वित्तीय अनियमितता हो रही है वो पकड़े जाएं और उन्हें अदालतों से सज़ाएं भी मिलें.

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पाबंदी से बढ़ जाएगी मुश्किलें

अगर जमात उद दावा की मिसाल लें तो इससे जुड़े कुछ लोगों को एजेंसियों ने गिरफ़्तार भी किया है और कुछ मामले अदालतों तक गए हैं लेकिन किसी को सज़ा नहीं हुई है.

पहला लिटमस टेस्ट तो यही है पाकिस्तान के लिए वित्तीय अनियमितता में किन किन को सज़ाएं होती हैं.

पाकिस्तान पर एक आरोप तो काफ़ी लगाया गया कि वो इन चरमपंथी संगठनों का समर्थन कर रहा था और उन्हें आर्थिक मदद मुहैया कराता था.

सरकार ऐसा करना बंद करती हुई हमें दिख रही है, लेकिन ये उसके लिए एक बड़ी चुनौती भी है.

ऐसा इसलिए भी है क्योंकि पाकिस्तान से सक्रिय अलक़ायदा, इस्लामिक स्टेट या तालिबान के साथ जो लेन-देन है उसपर निगरानी करना बहुत कठिन है क्योंकि ये सारे लेन-देन नक़दी में होते हैं और रोज़ाना ऑनलाइन और नक़दी में करोड़ों के लेनदेन हो रहे हैं.

हालांकि एफ़एटीएफ़ ने पाकिस्तान को अगले साल फ़रवरी तक का मौका दिया है और कहा है कि अगर दिए गए लक्ष्यों को वो पूरा नहीं करता है तो उसके ख़िलाफ़ कार्रवाई होगी.

अगर पाकिस्तान ब्लैकलिस्ट होता है तो उसे अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जो आर्थिक मदद मिल रही है वो नहीं मिल पाएगी, चीन के साथ जो द्विपक्षीय व्यापार तो होगा लेकिन अंतरराष्ट्रीय लेनदेन नहीं हो सकेगा.

इमरान ख़ान

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शायद और मोहलत मिल जाए

ईरान के साथ पाकिस्तान गैस पाइप लाइन का प्रोजेक्ट शुरू करना चाहता है लेकिन प्रतिबंधों की वजह से वो कई साल से लटका पड़ा है.

प्रतिबंधों की वजह से व्यापार भी प्रभावित होगा क्योंकि अंतरराष्ट्रीय लेनदेन की निगरानी होने लगेगी और कई तरह की इजाज़तें लेने की ज़रूरत पड़ेगी.

लेकिन कुछ जानकारों का कहना है कि पाकिस्तान शायद ब्लैकलिस्ट में कभी न जाए क्योंकि वो एफ़एटीएफ़ के साथ सहयोग कर रहा है और इस सूची में केवल ईरान और उत्तर कोरिया ही हैं जो सहयोग नहीं करते.

कुछ लोगों का कहना है कि चार महीने का समय बहुत कम है और पाकिस्तान को कम से कम एक साल का वक़्त दिया जाए.

ऐसे में लगता यही है कि फ़रवरी में शायद पाकिस्तान को और मोहलत मिल जाए क्योंकि वो एफ़एटीएफ़ के साथ सहयोग कह रहा है, भले ही थोड़ा सुस्त तरीक़े से.

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