ओपेक पर लगाम कसने चीन-भारत आएंगे साथ?

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- Author, प्रतीक जाखड़
- पदनाम, पूर्वी एशिया विशेषज्ञ, बीबीसी मॉनिटरिंग
भारत-चीन 'ऑयल बायर्स क्लब' के गठन की संभावनाएं बन रही हैं जो ग्लोबल एनर्जी मार्केट की गतिविधियों को बदल सकते हैं.
भारत, चीन समेत आठ देशों को ईरान से कच्चे तेल के आयात के लिए मिली छह महीने की छूट दो मई को ख़त्म होने के बाद हाल के दिनों में इस प्रस्ताव पर हलचलें तेज़ हुई हैं.
यदि इस क्लब का गठन हो गया तो दोनों देश एक साथ तेल की क़ीमत के मोलभाव के साथ ही ओपेक के प्रभाव को कम कर सकेंगे. ग़ौरतलब है कि ओपेक दुनिया के 40 फ़ीसदी तेलों को नियंत्रित करता है.
ओपेक के तेल उत्पादन पर लगाए गए प्रतिबंधों से तेल की क़ीमतें बढ़ी हैं, जिससे भारत और चीन दोनों की अर्थव्यवस्था को नुक़सान पहुंचा है. दोनों देशों में पेट्रोलियम उत्पाद मुख्यतः आयात पर ही निर्भर हैं.
लेकिन सवाल उठता है कि क्या ये दोनों एशियाई देश साथ काम करने के लिए एक दूसरे के बीच बने अविश्वास से ऊपर उठ सकेंगे. इतिहास गवाह है कि दोनों देशों ने बढ़ती ऊर्जा की अपनी मांगों को पूरा करने के लिए दुनिया के कई तेल और गैस भंडारों में हिस्सा पाने की होड़ में एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा की है.

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क्या इस बार मिलेगी कामयाबी?
'ऑयल बायर्स क्लब' गठित करने का विचार काफ़ी पहले से चल रहा है- सबसे पहले यह 2005 में सामने आया था- लेकिन इस पर बहुत आगे बात नहीं बन सकी.
2005 में, भारत के तत्कालीन तेल मंत्री मणिशंकर अय्यर ने इसका प्रस्ताव दिया था लेकिन यह दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंधों की पेचीदगी में फंस कर रह गया, जैसा की चीन की राष्ट्रीय दैनिक ग्लोबल टाइम्स ने 2018 में बताया था.
भारत ने 2014 में फिर एक बार इस तरह का क्लब बनाने की कोशिश की लेकिन उस पर भी बातें बहुत आगे नहीं बढ़ीं.
नाम नहीं बताने की शर्त पर एक भारतीय अधिकारी ने 26 अप्रैल को लाइवमिंट वेबसाइट को बताया, "हालांकि, हमने (भारत ने) पहले भी प्रयास किए थे, लेकिन हमने पाया कि ऐसी किसी भी व्यवस्था को बनाने में बहुत सारी खींचतान है क्योंकि कुछ देश हैं जो इस समूह के गठन के ख़िलाफ़ हैं."

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क्या एशियन प्रीमियम से निजात पा सकेगा भारत?
एक बार फिर इस प्रयास को बल मिला जब भारत के वर्तमान पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने बीते वर्ष इसे पुनर्जीवित करने का संकेत दिया, यहां तक कि उन्होंने इसमें जापान और दक्षिण कोरिया को शामिल करने का भी सुझाव दिया.
यह उल्लेख करते हुए कि एशियाई देशों को तेल ख़रीदने के लिए ओपेक को लागत से अधिक चुकाना पड़ता है, धर्मेंद्र प्रधान ने अप्रैल 2018 में कहा था कि "आखिर सबसे बड़े उपभोक्ता इसके लिए अधिक पैसे क्यों खर्च करें. आख़िर क्यों एशियन प्रीमियम के नाम पर इन देशों को तेल की अधिक क़ीमतें चुकानी पड़ती हैं. सभी चार प्रमुख एशियाई अर्थव्यवस्थाओं को साथ आना चाहिए."
यह मुद्दा लंबे समय से एशियाई ख़रीदारों के लिए असंतोष का कारण रहा है जो इसे भेदभावपूर्ण कीमत तय करने के रूप में देखते हैं.
तब से, इस तरह की व्यवस्था की लॉजिस्टिक पर काम करने के लिए भारतीय और चीनी अधिकारी एक-दूसरे देशों में कई यात्राएं कर चुके हैं.
मार्च में चीन के नेशनल एनर्जी एडमिनिस्ट्रेशन के उप-प्रमुख ली फेनरॉन्ग के भारत दौरे के बाद दोनों पक्षों ने तेल-गैस पर एक संयुक्त कार्यदल बनाया, जल्द ही इसकी पहली बैठक होने की उम्मीद है.

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बदलतेसमीकरण
पूरी दुनिया में तेल खपत के मामले में भारत और चीन की हिस्सेदारी लगभग 17 प्रतिशत है, लिहाजा ऊर्जा की आपूर्ति के लिए तालमेल से उन्हें क़ीमतों पर अधिक लाभ मिलेगा.
इसमें यदि जापान और दक्षिण कोरिया को भी मिला ले तो ये चार देश दुनिया भर में ख़रीदे जा रहे तेल का एक तिहाई हिस्सा आयात करते हैं.
यानी यदि ये चारों देश मिल जाएं तो तेल की कीमतें तय करने को लेकर इनकी मांग और मज़बूत हो जाती है.
पहली मई को इकॉनमिक टाइम्स अख़बार ने अपने संपादकीय में लिखा, "भारत और चीन के कारण वैश्विक तेल बाज़ार का ताक़तवर ढांचा एक बहुत बड़े और संभावित दूरगामी बदलाव के कगार पर हो सकता है."
इसमें लिखा गया है कि 'ख़रीदारों का समूह' सौदेबाजी की ताक़त को नाटकीय रूप से आयातकों के पक्ष में झुका सकता है और इससे पूरी दुनिया में तेल की क़ीमतें भारत और चीन के समीकरणों के अनुसार चलेगी."
इतना ही नहीं, इस बार की पहल के सफल होने के बेहतर मौक़े हैं क्योंकि अमरीका में जिस तरह शेल एनर्जी में जबर्दस्त तरक्की हुई उसने ओपेके के प्रभाव को कम किया है.
हिंदू बिज़नेस लाइन ने जून 2018 के अपने लेख में लिखा कि शेल एनर्जी में हुई इस तरक्की की वजह से पूरी दुनिया में मांग-आपूर्ति के समीकरणों में बड़ा बदलाव आया और क़ीमतों पर इसका असर पड़ा. 2014 से 2017 के बीच तेल की क़ीमतों में कमी आई और इसकी वजह से तेल का शक्ति संतुलन भी बदल गया.
सिंगापुर स्थित ऊर्जा विश्लेषक वंदना हरि को लगता है कि "वर्तमान ईरान संकट नए क्लब के लिए अपनी पहचान बनाने का एक शानदार अवसर है."
17 मई को जापान के निक्केई एशियन रिव्यू में छपे एक लेख में वो लिखती हैं, "तेल को लेकर ओपेक एकमात्र समुदाय नहीं है जिससे उन्हें निपटने की ज़रूरत है. इसके लिए सबसे महत्वपूर्ण होगा अमरीका के साथ बातचीत करना."
चाइना यूनिवर्सिटी ऑफ़ पेट्रोलियम में असोसिएट प्रोफ़ेसर जिन लेई ने 28 अप्रैल को ग्लोबल टाइम्स को बताया कि ओपेक का संकट के दौर में गठन हुआ था. वर्तमान स्थिति से ऐसा ही कुछ नया पैदा हो सकता है."

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'गठन पहले ही बेजान'
काग़ज़ पर यह प्रस्ताव बहुत अच्छा दिखता है, लेकिन इसे अमलीजामा पहनाना एक अन्य मामला है.
ऊर्जा विश्लेषक साउल कावोनिक ने द सिडनी मॉर्निंग हेराल्ड से जून 2018 में कहा, "एशिया में अंतरराष्ट्रीय तेल ख़रीदार संगठन बनाने का विचार सुनने में तो बहुत अच्छा लगता है लेकिन व्यावहारिक रूप से इसे बना पाना और चला पाना बहुत चुनौतीपूर्ण होगा."
वो कहते हैं, "अल्पकालिक मांग में लचीलेपन को देखते हुए यह ज़रूरी नहीं है कि तेल की ख़रीदार एक ही क़ीमत पर तेल की ख़रीद करने में सक्षम होंगे क्योंकि इसकी आपूर्ति तो ओपेक को ही करनी है, जो उसकी भूमिका को चुनौती देने वाले ख़रीदारों के लिए एक तय सीमा का सुझाव दे सकता है."
इस क्लब के प्रभावी होने के लिए, दोनों देशों और उनकी ऊर्जा कंपनियों को एक अच्छी तेल मशीन की तरह काम करना होगा. इसके बावजूद, यह सवाल भी है कि वे तेल की मांग को कैसे नियंत्रित करेंगे जो प्रत्येक देश की बाज़ार आवश्यकताओं से निर्धारित होती हैं?
साथ ही, वैश्विक राजनीतिक कारक भी इसकी एक संभावित बाधा है, क्योंकि समान आर्थिक हित होने के बावजूद भी शायद ही कभी कोई दो एशियाई प्रतिद्वंद्वी देश आपस में टीम की तरह काम करते हैं.
ज़ियामेन यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर लिन बोकियांग ने ग्लोबल टाइम्स से जून 2018 में कहा, "इसमें भी कोई शक नहीं है कि, भले ही यह ऊर्जा के क्षेत्र में गठजोड़ की बात हो, यह चीन और भारत के बीच राजनीतिक संबंध की जटिलता से जुड़ा हुआ होगा."
2017 की गर्मियों में डोकलाम गतिरोध के बाद दोनों प्रतिद्वंद्वियों (चीन और भारत) के बीच संबंध धीरे-धीरे स्थिर हो गये हैं, लेकिन इसमें अंतर्निहित अविश्वास अब भी बरकरार है.
8 मई को नई दिल्ली स्थित हिंदुस्तान टाइम्स ने अपने संपादकीय में सवाल किया कि क्या भारत ने कभी चीन पर भरोसा किया है, और यह जाहिर किया कि 'ऑयल बायर्स क्लब' का विचार अब तक अपने 'गठन से पहले ही बेजान' है.
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