इमरान ख़ान की कोशिशों के बावजूद क्यों हो रहा है पाकिस्तानी रुपया कमज़ोर?

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    • Author, फ़रहत जावेद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, उर्दू सेवा

पाकिस्तान के रुपये की कीमत गिर गई है और डॉलर अधिक महंगा हो गया है, ये ख़बर हर जगह है.

लेकिन इसका मतलब क्या है, इसका एहसास आपको तब होता है जब आप अपनी कार के लिए ईंधन लेने पेट्रोल पंप या गैस स्टेशन जाते हैं, या फिर किसी किराने की दुकान पर सामान ख़रीदने पहुंचते हैं.

ईंधन और भोजन बुनियादी तौर पर ऐसी आवश्यक वस्तुएं हैं कि चाहे उनकी लागत कितनी भी बढ़ जाए, बाज़ार में उनकी मांग कभी नहीं घटेगी.

हालांकि, जैसे ही आपको यह अहसास होता है कि पेट्रोल और खाद्य वस्तुएं महंगी हो गई हैं, आपको समझना चाहिए कि डॉलर के मुक़ाबले रुपया कमज़ोर हो गया है.

लेकिन, डॉलर ही क्यों?

दरअसल, किसी भी देश का विदेशी मुद्रा भंडार सोना या डॉलर के रुप में होता है.

अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में, क़रीब 62 फ़ीसदी ख़रीद-फ़रोख्त इसी मुद्रा में होती है.

यही कारण है कि प्रत्येक देश के पास उसके खज़ाने में डॉलर का पर्याप्त भंडार होना चाहिए जिससे वो अपने कर्ज़ चुका सके और साथ ही आयात का खर्च भी निकाल सके.

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आयात, अन्य देशों के साथ आपसी व्यापार, विदेशी निवेश आदि से होने वाली कमाई से इस संतुलन को बनाए रखा जाता है.

हालांकि, यदि किसी तरह यह संतुलन बिगड़ जाये तो डॉलर खजाने से कम होने लगता है और इसकी गिरावट को कम करने के लिए ही स्थानीय मुद्रा का अवमूल्यन किया जाता है.

अब चूंकि प्रत्येक क्रिया के विपरीत प्रतिक्रिया होती है, लिहाजा डॉलर की कमी और स्थानीय मुद्रा के अवमूल्यन से मुद्रास्फीति या महंगाई हो जाती है.

डॉलर और रुपये के बीच चल क्या रहा है?

आम धारणा है कि पाकिस्तान में डॉलर की कीमतों में वृद्धि हुई है और खुले बाज़ार में इसकी अनुपलब्धता अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ़) के साथ हाल ही में हुए कर्ज़ समझौते से जुड़ा है.

हालांकि, कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि आईएमएफ के अलावा भी ऐसे कई कारक हैं जिन्होंने रुपये के अवमूल्यन और डॉलर की मांग और कीमत में वृद्धि में योगदान दिया है.

हम आपको पहले वो कौन-कौन से कारक हैं ये बताएंगे लेकिन ये समझ लें कि डॉलर और रुपये के बीच क्या चल रहा है?

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डॉलर की कीमत कैसे तय की जाती है?

किसी भी मुद्रा की कीमत उसकी मांग और आपूर्ति पर निर्भर है. जब भी किसी मुद्रा की आपूर्ति कम उसकी मांग अधिक होती है तो इसकी कीमत बढ़ जाती है.

यही डॉलर के साथ भी हो रहा है.

डॉलर की कीमत निर्धारण के तीन तरीके हैं.

पहला यह कि विदेशी मुद्रा में कितना डॉलर ख़रीदा जा सकता है, इसे एक्सचेंज रेट या विनिमय दर कहते हैं.

विदेशी मुद्रा बाज़ार में फॉरेक्स ट्रेडर्स इसकी दर निर्धारित करते हैं. वो मांग और आपूर्ति को देख कर इसकी दर तय करते हैं. यही वो वजह है जिसके कारण आपको पूरे दिन डॉलर और रुपये की कीमतों में उतार-चढ़ाव दिखता रहता है.

दूसरा तरीके में ट्रेज़री बांड की कीमत शामिल है. जिसे आसानी से डॉलर में बदला जा सकता है. जब ट्रेज़री बांड की मांग बढ़ती है, तो डॉलर की कीमतें भी बढ़ती हैं.

तीसरा तरीका विदेशी मुद्रा भंडार के माध्यम से मूल्य निर्धारित करना है. मतलब, विदेशी सरकारों के पास खुद कितना डॉलर है.

यदि खजाने में डॉलर कम है तो इसकी आपूर्ति भी कम हो जाएगी, इससे अमरीकी डॉलर की कीमत या मूल्य में भी इज़ाफ़ा होगा.

आर्थिक विशेषज्ञ और एसडीपीआई (सस्टेनेबल डेवलपमेंट पॉलिसी इंस्टीट्यूट) की थिंक टैंक के प्रमुख आबिद सुलेहरी ने बीबीसी को बताया कि उनकी राय में डॉलर की कीमत में वृद्धि का एक कारण 'स्टेट बैंक ऑफ़ पाकिस्तान (पाकिस्तान का रिज़र्व बैंक) का आईएमएफ की निर्धारित शर्तों को पूरा करना हो सकता है. हो सकता है कि अपने विदेशी भंडार को बढ़ाने के लिए एसबीपी (स्टेट बैंक ऑफ़ पाकिस्तान) ने खुले बाज़ार से डॉलर ख़रीदा हो, जिसके कारण खुले बाजार में इसकी मांग बढ़ी और आपूर्ति में कमी आई- लिहाजा इसकी कीमत में वृद्धि हुई है.'

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उनके अनुसार, दूसरा कारण 'अनुमानित ख़रीदारी' हो सकती है. इन दिनों अफ़वाहें हैं कि आईएमएफ के साथ शुरुआती समझौते के कारण आने वाले दिनों में रुपये के मूल्य में और कमी आएगी, क्योंकि यह स्पष्ट नहीं है कि आईएमएफ़ से लिया गया कर्ज़ किन शर्तों पर लिया गया था.

यही कारण है कि डॉलर के ख़रीदार इस उलझन में हैं कि क्या आने वाले दिनों में रुपये की कीमतों में और कमी आयेगी या क्या यह स्थिर हो जाएगा, इसी डर में वे अधिक डॉलर ख़रीद रहे हैं. इससे बाज़ार में डॉलर की कमी हो रही है और जमाखोरी की भी आशंका है.

क्या मनी चेंजर की वाकई इसमें कोई भूमिका है?

आबिद सुलेहरी के अनुसार, "पाकिस्तान में, कभी-कभी बड़े मनी चेंजर भी डॉलर की झूठी (आर्टफिशियल) कमी करते हैं. इससे आपूर्ति कम हो जाती है, लिहाज़ा मांग बढ़ जाती है और डॉलर महंगा हो जाता है नतीजतन इसकी तुलना में रुपया कमज़ोर हो जाता है. मुझे लगता है कि फ़िलहाल डॉलर की बढ़ती कीमतों की वजह में इसी तरह की अफ़वाहों की बड़ी भूमिका है."

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विदेशी मुद्रा और इस तरह की आर्टफिशियल कमी के लिए आमतौर पर जमाखोरी की जाती है या अफ़वाहें फ़ैलायी जाती हैं कि रुपये का अधिक अवमूल्यन होने वाला है, जिसके बाद लोग अधिक से अधिक डॉलर ख़रीदने की कोशिश करते हैं. मांग और आपूर्ति में इस बदलाव से डॉलर की कीमत बढ़ जाती है और रुपये का अवमूल्यन शुरू हो जाता है.

हालांकि, आबिद सुलेहरी की इस बात से एक्सचेंज कमिशन एसोसिएशन के महासचिव ज़फर पराचा पूरी तरह असहमत हैं. उनका कहना है कि यह मनी एक्सचेंजर्स पर बड़े पैमाने पर आरोप है और साथ ही यह सरकार की नीतियों की विफलताओं को छिपाने की एक कोशिश भी है.

वो कहते हैं, "यह सरकार की विफलता है, इस पूरी प्रक्रिया में स्टेट बैंक ऑफ़ पाकिस्तान और आईएमएफ इस कदर शामिल हैं कि अब ख़रीदार हम तक आने से डर रहे हैं, वो अब ग्रे-मार्केट का रुख कर रहे हैं."

ग्रे या ब्लैक मार्केट क्या है?

ज़फ़र परचा का कहना है कि "पाकिस्तान में, ग्रे या ब्लैक मार्केट का आकार डॉलर की ख़रीद और बिक्री के वैध बाज़ार से बड़ा है."

उन्होंने इसके लिए सरकार की सख्त नीतियों को ज़िम्मेदार ठहराया.

वो कहते हैं, "ऐसा लगता है कि सरकार खुद हुंडी और हवाला (वित्तीय हस्तांतरण प्रणाली) को बढ़ावा देने की कोशिश कर रही है. ख़रीदार हमसे दूर चले गए हैं. जब उनसे बेवजह सवाल-जवाब किये जाते हैं तो, तो वे हमारे पास क्यों आएंगे? जब इसकी ख़रीद-बिक्री हमारे ज़रिये नहीं होगी तो विदेशी भंडार तो प्रभावित होंगे ही."

नाम न छापने की शर्त पर स्टेट बैंक ऑफ़ पाकिस्तान के एक कर्मचारी ने कहा कि पाकिस्तान में डॉलर माफ़िया बहुत मजबूत हैं और वे डॉलर की कमी और इसकी आर्टफिशियल कमी पैदा करने की कोशिश करते हैं ताकि रुपये का अवमूल्यन हो और ख़रीदार, ख़ास कर आयातक ऊंची दरों पर डॉलर ख़रीदें."

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पाकिस्तान में इससे कौन प्रभावित हो रहा है?

निश्चित तौर पर आम जनता इससे प्रभावित हो रही है.

आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ रिज़वाना रज़्ज़ाक कहते हैं कि डॉलर की कीमत बढ़ने और रुपये के अवमूल्यन के कारण कोई एक तबका नहीं बल्कि सभी वर्ग प्रभावित होंगे.

वो कहते हैं, "जो सबसे ज़्यादा प्रभावित है उनमें से एक आयातक है. पाकिस्तान में, निर्यात की तुलना में आयात अधिक होता है. डॉलर की कीमत में वृद्धि के कारण आयात की लागत और बढ़ेगी. आयातकों को अधिक महंगा डॉलर ख़रीदना होगा, और ग्राहकों तक ये वस्तुएं बहुत अधिक कीमत पर पहुंचेंगी. यहां तक की इसकी कीमत बढ़ने से स्थानीय उत्पादों की कीमतें भी बढ़ जाती हैं, कभी कच्चे माल के नाम पर तो कभी बढ़ती कीमतों के बहाव की वजह से. यही कारण है कि, डॉलर जितना अधिक महंगा है, पाकिस्तान के लिए समस्याएं उतनी ही अधिक बढ़ेंगी."

दूसरी तरफ, आबिद सुलेहरी के अनुसार, "अगर यह अफ़वाहों या आर्टफिशियल ख़रीदारी की वजह से है, तो कुछ दिनों में चीजें बेहतर हो जाएंगी. लेकिन अगर डॉलर की कीमत में बढ़ोतरी लंबे समय तक रहती है तो इसके भयानक परिणाम होंगे."

उनके अनुसार, डॉलर की कीमत में वृद्धि से तुरंत प्रभावित होने वाला तबका उच्च-मध्यम वर्ग है.

"इसका मतलब है कि वे लोग जो आयातित वस्तुओं का उपयोग करते हैं. उनकी आयात लागत में वृद्धि होगी लिहाज़ा उनकी कीमतें बढ़ेंगी. यह सब पेट्रोलियम उत्पादों के आयात को भी प्रभावित करता है, ये उत्पाद महंगे हो जाते हैं और इसके परिणामस्वरूप इससे संबंधित सभी उत्पाद भी."

लिहाज़ा अब ये देखना बाकी है कि डॉलर, रुपये में उतार-चढ़ाव और आईएमएफ़ के कर्ज़ से मुद्रास्फ़ीति या महंगाई का क्या होगा.

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