क्या नरेंद्र मोदी और डोनल्ड ट्रंप के रिश्ते ईरान से तेल कारोबार को बचा पाएंगे?

कच्चा तेल

इमेज स्रोत, AFP

इमेज कैप्शन, भारत ईरान से भारी मात्रा में कच्चा तेल ख़रीदता है
    • Author, मुक़्तदर ख़ान
    • पदनाम, अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार

ईरान के ख़िलाफ़ अमरीका का रवैया और सख़्त होता जा रहा है. अमरीका समझता है कि ईरान की अर्थव्यवस्था इतनी कमज़ोर हो गई है कि यदि उस पर और दबाव डाला जाए तो ईरान में सत्ता परिवर्तन हो जाएगा.

ओबामा के कार्यकाल को छोड़ दिया जाए तो हाल के दशकों में अमरीका की यही नीति रही है कि ईरान में सत्ता परिवर्तन कर दिया जाए.

ईरान के साथ अमरीका का सबसे बड़ा मसला इसराइल के प्रति ईरान का रवैया है. इसराइल और अमरीका मानते हैं कि ईरान इसराइल को लेकर आक्रामक है और उसके ख़िलाफ़ कार्रवाइयां करता है.

ईरान के पूर्व राष्ट्रपति अहमदीनेजाद ने कहा था कि ईरान इसराइल को दुनिया के नक़्शे से मिटा देगा और यही बयान अमरीका में बार-बार दोहराया जाता है.

अमरीका की ईरान पर सख़्ती के पीछे इसराइल ही है. अब अमरीका को लग रहा है कि ईरान आर्थिक तौर पर बेहद कमज़ोर हो गया है और उसकी अर्थव्यवस्था को ठप्प कर देने का मौक़ा आ गया है. भारत, चीन और जो अन्य देश ईरान से अभी भी तेल ख़रीद रहे हैं अगर वो बंद कर दें तो शायद ईरानी अर्थव्यवस्था पूरी तरह से गिर जाएगी.

राष्ट्रपति ट्रंप ने जब ईरान पर नए आर्थिक प्रतिबंध लगाए थे तो भारत और चीन जैसे देशों ने इनका विरोध किया था. उस समय ट्रंप प्रशासन को ये भी डर था कि इन प्रतिबंधों को लेकर शायद पूरी दुनिया अमरीका के साथ सहयोग न करे.

उदाहरण के तौर पर भारत नवंबर 2018 तक यूरो में ईरान से तेल ख़रीद रहा था. लेकिन वो भी रास्ता बंद हो गया था और अब भारत ईरान से आईडीबीआई बैंक के ज़रिए रुपए में तेल ख़रीद रहा है.

ट्रंप और रूहानी

इमेज स्रोत, EPA

इमेज कैप्शन, ट्रंप प्रशासन ईरान में व्यवस्था परिवर्तन करना चाहता है

अब ट्रंप को लग रहा है कि उनकी ईरान पर सख़्ती की नीति काम कर रही है.

भारत ईरान के साथ सालाना 13-14 अरब का कारोबार करता है. भारत ईरान को तीन अरब डॉलर का सामान भेजता है और दस अरब डॉलर से अधिक का तेल ख़रीदता है.

अपनी घरेलू ज़रूरतें पूरी करने के लिए भारत मध्य पूर्व के तेल पर बहुत हद तक निर्भर है. ये हो सकता है कि भारत शायद अपने तेल के स्रोत बदल दें. लेकिन भारत के ईरान के साथ कुछ रणनीतिक हित भी जुड़े हैं. अफ़ग़ानिस्तान को ध्यान में रखते हुए भारत ईरान की ओर से पूरी तरह मुंह नहीं फेर सकता है.

अमरीका ने आठ देशों को ईरान से तेल ख़रीदने की जो झूट दी थी वो आज समाप्त हो रही है. अब देखना यही होगा कि क्या भारत इन प्रतिबंधों को मान लेगा और ईरान से अपने आर्थिक संबंध पूरी तरह ख़त्म कर लेगा या फिर अमरीका को चुनौती देगा?

Presentational grey line
Presentational grey line
ईरान

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, अमरीका को लगता है कि वो ईरान की अर्थव्यवस्था को ठप्प कर वहां व्यवस्था परिवर्तन कर सकता है

लेकिन कहा ये भी जाता है कि भारत और अमरीका के रिश्ते बहुत अच्छे हैं और ट्रंप और मोदी के बीच दोस्ताना संबंध हैं. भारत और अमरीका के रिश्तों और ईरान के साथ भारत का आर्थिक व्यापार अलग-अलग चीज़ें हैं.

हाल के सालों में अमरीका के साथ भारत के रिश्ते बहुत अच्छे हुए हैं. इस दौरान अमरीका के रिश्ते पाकिस्तान के साथ ख़राब होते जा रहे हैं. बीते सप्ताह से ही ट्रंप प्रशासन ने एक तरह से पाकिस्तानी नागरिकों को वीज़ा देना बंद कर दिया है.

दक्षिण एशिया के संदर्भ में देखा जाए तो अमरीका के रिश्ते भारत के साथ बेहतर हुए हैं. अमरीका को ये भी लगता है कि भारत के चीन से संबंध बहुत अच्छे नहीं है और इस क्षेत्र में अमरीका और चीन के बीच तनाव होने की स्थिति में भारत चीन के साथ खड़ा नहीं होगा.

ट्रंप-मोदी की दोस्ती का असर होगा?

ट्रंप और मोदी

इमेज स्रोत, Getty Images

हाल के सालों में अमरीका और भारत के बीच रक्षा क्षेत्र में भी रिश्ते बेहतर हुए हैं. भारत अमरीका से अधिक रक्षा उपकरण ख़रीद रहा है. अमरीका में बीस लाख के क़रीब भारतीय रहते हैं जो आर्थिक तौर पर काफ़ी प्रभावशाली भी हैं.

लेकिन मोदी और ट्रंप के बीच जो निजी रिश्ते हैं उन्हें दुनियाभर के रूढ़िवादी नेताओं के नज़रिए से देखा जाना चाहिए. भारत के मोदी हों, इसराइल के बेन्यामिन नेतनयाहू हों या ब्राज़ील के नए राष्ट्रपति ज़ाइर बोलसोनारो हों, ये सभी नेता अपने देशों में अपने समर्थकों को ये जताने की कोशिश करते हैं कि वो ट्रंप के कितने क़रीब हैं. ऐसा करके वो अपने राजनीतिक हित साधने की कोशिश भी करते हैं.

लेकिन ये ज़रूरी नहीं है कि ये बेहतर निजी रिश्ते कूटनीतिक या राजनयिक नतीजों में तब्दील हों. निजी संबंधों की एक सीमा होती है. ये बातचीत को सहज कर देते हैं. अगर आपके रिश्ते बेहतर हों तो आप अधिक खुलकर बात कर सकते हैं. लेकिन इसका मतलब ये नहीं होता कि इनसे देशों के हित बदल जाएंगे.

अमरीका का ताज़ा हित ये है कि वो ईरान की अर्थव्यवस्था को ठप्प करना चाहता है. अब मोदी नाराज़ हों या ख़ुश हों, अमरीका ईरान को लेकर अपनी नीति नहीं बदलेगा.

ट्रंप और मोदी

इमेज स्रोत, AFP

हाल के सालों में भारत इसराइल के अधिक क़रीब आया है. प्रधानमंत्री मोदी ने नेतनयाहू को गले लगाया है. उन्होंने ऐसा अमरीका को ख़ुश करने के लिए ही किया है. मोदी ने ट्रंप को ख़ुश करने के लिए इसराइल को गले तो ज़रूर लगाया है लेकिन इससे भारत को कोई नीतिगत फ़ायदा नहीं होगा. इसकी स्पष्ट वजह ये है कि इस समय ईरान को लेकर अमरीका की नीति इसराइल के लिए है.

ट्रंप स्वयं इस समय इस स्थिति में हैं कि वो इसराइल के ख़िलाफ़ नहीं जा सकते हैं. अमरीकी राजनीति में उन पर यहूदी लॉबी और ईसाई लॉबी का ख़ासा प्रभाव है. उनके मतदाता वर्ग में इन लॉबियों का ख़ासा असर भी है. ट्रंप को 2020 का चुनाव लड़ना है और उसके लिए उन्हें इस लॉबी का समर्थन चाहिए.

अलग-थलग पड़ गया है ईरान

ट्रंप ने जब अमरीका को परमाणु समझौते से अलग करके ईरान पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए थे तब यूरोपीय देशों ने बयान तो दिए लेकिन वो ठोस तरीके से ईरान के साथ खड़े नहीं हो पाए. यूरोपीय कंपनियों ने ईरान के साथ व्यापार ख़त्म कर लिया.

अमरीका अपने प्रतिबंधों के तहत उन कंपनियों पर कार्रवाई करता है जो ईरान के साथ किसी भी तरह का कारोबार करती हैं. ऐसे में यूरोपीय कंपनियों ने अमरीका की कार्रवाई से बचने के लिए ईरान से ही व्यापार ख़त्म कर लिया.

रूहानी और मोदी

इमेज स्रोत, Getty Images

लेकिन सिर्फ़ चीन ने ईरान के साथ कारोबार करते रहने का तरीका निकाला है. चीन में कुछ कंपनियां ऐसी हैं जो सिर्फ़ ईरान के साथ ही कारोबार करती हैं. ऐसे में अमरीका इन कंपनियों पर अमरीका के आर्थिक प्रतिबंध बेअसर हो जाते हैं.

अब हो सकता है कि अगर भारत अमरीकी प्रतिबंधों से बचने की कोशिश करे तो वो ऐसे बैंक या कंपनियों के ज़रिए ईरान के साथ कारोबार करे जिनका कहीं और कोई कारोबार न हो. इस तरह भारत ईरान के साथ डॉलर रहित कारोबार कर सकता है या रुपए में कारोबार कर सकता है. लेकिन ये बहुत आसान नहीं होगा.

अगर सभी देश मिलकर अमरीकी प्रतिबंधों को रोकने की कोशिश करते तो शायद अमरीका की ये नीति नाकाम हो जाती लेकिन दुनिया के अधिकतर देशों ने इसे अपना लिया है ऐसे में भारत का इसके सामने खड़ा हो पाना मुश्किल है.

भारत की विदेश नीति के सामने अब ये सवाल भी होगा कि क्या वो ईरान के लिए अमरीका से रिश्ते ख़राब करने का ख़तरा उठा पाएगा. और अगर भारत अमरीका के प्रतिबंधों से बचने का कोई तरीका निकालेगा तो क्या अमरीका ख़ामोश बैठेगा? उदाहरण के तौर पर अमरीका भारतीयों के लिए वीज़ा मुश्किल कर देगा.

अमरीका के साथ व्यापार करने की एक क़ीमत ये भी है कि उसके राजनीतिक फ़ैसलों का बोझ भी उठाना पड़ता है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)