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मसूद अज़हर को अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित करने की मुहिम फिर शुरू?
जैश ए मोहम्मद प्रमुख मसूद अज़हर को संयुक्त राष्ट्र में अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित कराने की भारत की मुहिम को एक बार फिर बल मिलते दिख रहा है.
हाल ही में भारत में ब्रिटेन के उच्चायुक्त डोमिनिक एस्क्वॉथ ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की आंतकियों की सूची में मसूद अज़हर को शामिल किया जाएगा इसको लेकर वह 'आशावादी' हैं.
उन्होंने कहा कि जो देश (चीन) सूची में शामिल करने को लेकर आपत्ति जताता रहा है वह इसे वापस लेगा इसको लेकर ब्रिटेन इंतज़ार कर रहा है. उन्होंने इसके बाद कहा कि वह 'आशावादी' हैं कि इसके निष्कर्ष पर पहुंचा जाएगा.
मार्च 2019 में मसूद अज़हर को अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित करने का प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र में लाया गया था जिसको अमरीका, फ्रांस और ब्रिटेन जैसे देशों का समर्थन हासिल था लेकिन चीन के वीटो के कारण यह प्रस्ताव गिर गया था.
ऐसा पहली बार नहीं हुआ था जब चीन ने मसूद अज़हर को संयुक्त राष्ट्र की सूची में शामिल होने से रोकने के लिए अड़ंगा डाला हो इससे पहले भी वह कई मर्तबा यह कर चुका है.
लेकिन भारत में ब्रिटेन के उच्चायुक्त के हालिया बयान के क्या मायने निकाले जाने चाहिए? क्या चीन को लेकर भारत की कोई कूटनीतिक रणनीति चल रही है? क्या ब्रिटेन भारत के लिए चीन को राज़ी करने जा रहा है?
इन्हीं सवालों के जवाब के लिए बीबीसी संवाददाता मोहम्मद शाहिद ने वैश्विक मामलों के जानकार और अमरीका की डेलावेयर यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर मुक्तदर ख़ान से बात की.
आगे पढ़ें मुक्तदर ख़ान का नज़रिया...
ब्रिटेन ने पहले भी भारत के प्रस्ताव का समर्थन किया था लेकिन वह अब जिस समय बयान दे रहा है उसको देखा जाना ज़रूरी है. ब्रिटेन अभी ब्रेक्सिट जैसे बड़े मुद्दे से जुझ रहा है.
ब्रेक्सिट से पहले वह अपनी अर्थव्यवस्था को मज़बूत बना लेना चाहता है जिसके लिए उसका भारत और चीन जैसे देशों के साथ व्यापार बढ़ाना ज़रूरी है. इसी वजह से जिस दिन भारत में उसके उच्चायुक्त ने यह बयान दिया उसी दिन चीन में ब्रिटेन के एक अधिकारी ने कहा कि चीन का 'वन बेल्ट वन रोड' परियोजना दुनिया के लिए एक 'नज़ीर' है.
इस तरह के कूटनीतिक बयानबाज़ी ब्रिटेन उन देशों के साथ कर रहा है जो उभरती हुई अर्थव्यवस्थाएं हैं.
इसके अलावा मसूद अज़हर को अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित करना पूरी तरह चीन पर निर्भर है क्योंकि वह दो वजहों से यह नहीं होने देना चाहता है.
चीन दो वजहों से डालता है अड़ंगा
इसकी पहली वजह उसका 'वन बेल्ट वन रोड' परियोजना है. इस परियोजना का बड़ा हिस्सा पाकिस्तान में पड़ता है जिसे सीपीईसी (चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर) के नाम से जाना जाता है. अनुमान है कि यह तकरीबन 60 अरब डॉलर का निवेश है.
इसके अलावा चीन को उम्मीद है कि यह निवेश और बढ़ सकता है. साथ ही पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था अगर ख़राब हुई तो चीन के लिए यह एक बड़े बंदरगाह का रास्ता खोलेगा.
दूसरी बड़ी वजह 'वीगर' मुसलमान हैं जिन पर चीन अपने यहां भारी ज़ुल्म ढा रहा है. उसको डर यह है कि अगर उसने मसूद अज़हर का समर्थन कर दिया तो चरमपंथी समूह उसके मुस्लिम बहुल इलाक़ों में आतंक को बढ़ावा दे सकते हैं.
असल में यह जैश ए मोहम्मद के साथ एक मौन सहमति है कि तुम हमारे मामले में चुप रहो और हम तुम्हारे मामले में चुप रहेंगे.
पर्दे के पीछे चल रही कूटनीति?
ब्रिटेन से अधिक अमरीका चाहता है कि मसूद अज़हर जैसे लोग अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित हों. चीन अगर रज़ामंदी दे देता है तो यह आराम से हो जाएगा.
लेकिन यह देखना चाहिए कि ब्रिटेन चीन को राज़ी करने के लिए क्या दबाव डाल रहा है? चीन पर कोई दबाव नहीं है. एक तरह से चीन चरमपंथी की मदद कर रहा है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी कोई दबाव चीन पर नहीं पड़ रहा है.
इस कारण ब्रिटेन के उच्चायुक्त के बयान को केवल बयान की तरह देखा जाना चाहिए जो भारत के हक़ में है. इस बयान से ब्रिटेन और पाकिस्तान के संबंधों पर कुछ असर हो सकता है जो भारत के लिए फ़ायदेमंद है.
मसूद अज़हर को अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित होने से ब्रिटेन को भी कुछ लाभ नहीं होगा. इस मसले को चीन के भारत के साथ कूटनीतिक रिश्ते बढ़ाने से ही सुलझ सकता है.
एक और बड़ी बात यह है कि मसूद अज़हर को अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित करने से भारत को बहुत बड़ा लाभ नहीं होगा क्योंकि मसूद अज़हर अंतरराष्ट्रीय यात्रा नहीं करते, न ही अंतरराष्ट्रीय फ़ंड जुटाते हैं. इससे भारत की एक कूटनीतिक जीत होगी जिसका सिर्फ़ चुनाव में इस्तेमाल हो सकता है.
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