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चीन में मुसलमानों से क्रूरता पर मुस्लिम देशों की चुप्पी के मायने
- Author, टीम बीबीसी हिन्दी
- पदनाम, नई दिल्ली
पिछले साल बीबीसी ने अपनी एक पड़ताल में पाया था कि चीन ने अपने पश्चिमी प्रांत शिनजियांग में वीगर मुसलमानों के लिए नज़रबंदी बस्ती बना रखी है.
चीन ने पिछले कुछ सालों में ऐसी ही तमाम जेल सरीखी इमारतें शिनजियांग सूबे में बना डाली हैं.
बीबीसी उस नज़रबंदी कैम्प को देखने से पहले दबानचेंग क़स्बे मे भी पहुंचा था. चीन ने इस बात से लगातार इनकार किया है कि उसने मुसलमानों को बिना मुक़दमा चलाए क़ैद कर के रखा है. इस झूठ को छुपाने के लिए ही तालीम का पर्दा चीन ने लगा दिया है.
दुनिया भर में उठ रहे आलोचना के सुरों को दबाने और उनका मुक़ाबला करने के लिए चीन ने बड़े पैमाने पर प्रचार अभियान छेड़ दिया है. चीन का कहना है कि इन केंद्रों का प्रमुख मक़सद उग्रवाद का मुक़ाबला करना है.
दुनिया के किसी भी देश में मुसलमानों पर कथित अत्याचार होता है तो मुस्लिम बहुल देश खुलकर इस पर आपत्ति जताते हैं. भारत में अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ होने वाली हिंसा को लेकर भी पाकिस्तान समेत कई मुस्लिम देश उंगली उठाते रहे हैं.
हाल ही में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने कहा था कि हिन्दुस्तान में मुसलमान महफ़ूज नहीं हैं.
तुर्की ने उठाई आवाज़
दिलचस्प है कि चीन में वीगर मुसलमानों के ख़िलाफ़ उसकी क्रूरता को लेकर मुस्लिम देशों में ख़ामोशी रहती है. पहली बार तुर्की ने इसी महीने 10 फ़रवरी को चीन के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई और कहा कि चीन ने लाखों मुसलमानों को नज़रबंदी शिविर में बंद रखा है. तुर्की ने चीन से उन शिविरों को बंद करने की मांग की.
तुर्की के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता हामी अक्सोय ने कहा कि चीन का यह क़दम मानवता के ख़िलाफ़ है. तुर्की के अलावा दुनिया के किसी भी मुस्लिम देश ने चीन के इस रुख़ के ख़िलाफ़ आवाज़ नहीं उठाई.
पाकिस्तान में इस्लाम के नाम पर कई चरमपंथी संगठन हैं लेकिन ये चरमपंथी संगठन भी चीन के ख़िलाफ़ शायद ही कोई बयान देते हैं.
हाल ही में सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन-सलमान ने पाकिस्तान, भारत और चीन का दौरा संपन्न किया है. सलमान से चीन में मुसलमानों को नज़रबंदी शिविरों में रखे जाने पर सवाल पूछे गए तो उन्होंने चीन का बचाव किया.
सलमान ने कहा, ''चीन को आतंकवाद के ख़िलाफ़ और राष्ट्र सुरक्षा में क़दम उठाने का पूरा अधिकार है.'' सलमान ने इसे आतंकवाद और अतिवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई क़रार दिया.
सऊदी क्या कर रहा है?
दूसरी तरफ़ ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन में सऊदी अरब भारत प्रशासित कश्मीर में भारतीय सुरक्षाबलों की कार्रवाई की कड़ी निंदा करता रहा है.
आख़िर सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस ने चीन का बचाव क्यों किया? सऊदी अरब में मक्का-मदीना है और यह दुनिया भर के मुसलमानों के पवित्र स्थल है. सऊदी ख़ुद मुसलमानों का प्रतिनिधि देश भी मानता हैं. ऐसे में सऊदी चीन में मुसलमानों के ख़िलाफ़ अत्याचार का समर्थन क्यों कर रहा है?
वॉशिंगटन पोस्ट ने अपनी संपादकीय में लिखा है कि क्राउन प्रिंस सलमान का चीन का बचाव करना बिल्कुल स्वभाविक है.
संपादकीय में लिखा है, ''इस बचाव को बड़ी आसानी से समझा जा सकता है. चीन ने हाल ही में सऊदी के गोपनीय रूप से हत्या के अधिकार का समर्थन किया था और इसे उसका आंतरिक मामला कहा था. आपका नज़रबंदी शिविर आपका आंतरिक मामला है और हत्या के लिए मेरी साज़िश मेरा आंतरिक मामला है. कमाल की बात है. हमलोग एक दूसरे को बख़ूबी समझते हैं.''
पांच महीने पहले तुर्की में सऊदी मूल के पत्रकार जमाल ख़ाशोग्जी की हत्या कर दी गई थी. यह हत्या सऊदी के दूतावास में हुई थी. इस मामले में सऊदी ने कई झूठ बोले और बाद में सारे झूठ पकड़े गए.
ख़ाशोग्जी की हत्या के बाद ऐसे कई तथ्य सामने आए जिनसे पता चलता है कि सऊदी अरब की सरकार इसमें शामिल थी.
इसी साल पिछले महीने जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान से पूछा गया कि वो चीन में मुसलमानों के ख़िलाफ़ अत्याचार पर कुछ बोलते क्यों नहीं हैं तो वो असामान्य रूप से ख़ामोश रह गए.
पूर्व क्रिकेटर से पाकिस्तान के पीएम बने इमरान ने कहा कि वो इस बारे में बहुत नहीं जानते हैं. दूसरी तरफ़ इमरान ख़ान म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों के ख़िलाफ़ अत्याचार की निंदा कर चुके हैं.
पाकिस्तान और चीन की दोस्ती जगज़ाहिर है. चीन पाकिस्तान में चाइना पाकिस्तान इकनॉमिक कॉरिडोर के तहत 60 अरब डॉलर का निवेश कर रहा है. दूसरी तरफ़ पाकिस्तान पर चीन के अरबों डॉलर के क़र्ज़ भी हैं. तीसरी बात ये कि पाकिस्तान कश्मीर विवाद में चीन को भारत के ख़िलाफ़ एक मज़बूत पार्टनर के तौर पर देखता है. ऐसे में पाकिस्तान चीन में वीगर मुसलमानों के ख़िलाफ़ चुप रहना ही ठीक समझता है.
दुनिया भर के मुस्लिम बहुल देश इंडोनेशिया, मलेशिया, सऊदी और पाकिस्तान पूरे मामले पर ख़ामोश रहे हैं. दूसरी तरफ़ ये देश रोहिंग्या मुसलमानों के ख़िलाफ़ म्यांमार में हुईं हिंसा की निंदा करने में मुखर रहे हैं.
चीन के पलटवार का डर
पाकिस्तान ने तो यहां तक कहा है कि पश्चिमी मीडिया ने चीन में वीगर मुसलमानों के मामले को सनसनीख़ेज बनाकर पेश किया है.
ऑस्ट्रेलियन यूनिवर्सिटी में चाइना पॉलिसी के एक्सपर्ट माइकल क्लार्क मुस्लिम देशों की ख़ामोशी का कारण चीन की आर्थिक शक्ति और पलटवार के डर को मुख्य कारण मानते हैं.
क्लार्क ने एबीसी से कहा है, ''म्यांमार के ख़िलाफ़ मुस्लिम देश इसलिए बोल लेते हैं क्योंकि वो कमज़ोर देश है. उस पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाना आसान है. म्यांमार जैसे देशों की तुलना में चीन की अर्थव्यवस्था 180 गुना ज़्यादा बड़ी है. ऐसे में आलोचना करना भूल जाना अपने हक़ में ज़्यादा होता है.''
मध्य-पू्र्व और उत्तरी अफ़्रीका में चीन 2005 से अब तक 144 अरब डॉलर का निवेश किया है. इसी दौरान मलेशिया और इंडोनेशिया में चीन ने 121.6 अरब डॉलर का निवेश किया. चीन ने सऊदी अरब और इराक़ की सरकारी तेल कंपनियों ने भारी निवेश कर रखा है. इसके साथ ही चीन ने अपनी महत्वाकांक्षी योजना बन बेल्ट वन रोड के तहत एशिया, मध्य-पूर्व और अफ़्रीका में भारी निवेश का वादा कर रखा है.
चीन में वीगर मुसलमानों पर हो रहे अत्याचार को लेकर अमरीका के अलावा ऑस्ट्रेलिया और यूरोप के देश बोलते रहे हैं लेकिन मुस्लिम देश ख़ामोश रहना ही ठीक समझते हैं. सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस ने तो चीन का बचाव कर इस ख़ामोशी को और मान्यता दे दी है.
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