अमरीका को छोड़ रूस के साथ आया सऊदी अरब तो क्या होगा?

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- Author, अभिजीत श्रीवास्तव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
जी20 सम्मेलन के पहले ही दिन रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान का गर्मजोशी के साथ हाथ मिलाती तस्वीर सामने आयी और साथ ही यह बात भी सामने आई कि सऊदी अरब रूस में अपना निवेश बढ़ाने की तैयारी कर रहा है.
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ऐसी अटकलें लगाई जा रही हैं कि सऊदी अरब रूस से नज़दीकी बढ़ाना चाहता है.
ऐसे में अंतरराष्ट्रीय राजनीति में यह चर्चा शुरू होने लगी है कि जो सऊदी अरब अब तक अमरीकी सहयोग की बदौलत मध्य पूर्व में अपनी ताक़त का परचम लहरा रहा था वो यदि रूस के साथ आ गया तो क्या होगा.
2 अक्तूबर को तुर्की की राजधानी इस्तांबुल के सऊदी दूतावास में पत्रकार जमाल ख़ाशोज्जी की हत्या के बाद से पूरी दुनिया सऊदी अरब की तरफ़ टेढ़ी निगाह से देख रही थी वहीं अमरीका में विरोध होने के बावजूद राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के साथ खड़े थे और उनके प्रति उनका दोस्ताना रवैया जस का तस बना रहा.
पूरी दुनिया सऊदी अरब को ख़ाशोज्जी की हत्या के कारण शक की निगाह से देखता रहा. वहीं राष्ट्रपति ट्रंप अपने बयान में ईरान के ख़िलाफ़ अमरीकी लड़ाई में सऊदी अरब को अहम सहयोगी मानने की बात की. प्रिंस सलमान के प्रति उनके नज़रिये में कोई बदलाव नहीं दिखा. इससे अमरीकी सीनेटर भी ख़फ़ा हो गए.
उधर सऊदी अरब इस हत्या के बारे में प्रिंस सलमान को सब कुछ पता होने के आरोपों को ख़ारिज करता रहा है.

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जी20 में पुतिन-सलमान की मुलाक़ात के मायने
ख़ाशोज्जी की हत्या के दो महीने बाद प्रिंस सलमान पहली बार जी20 समिट के बड़े अंतरराष्ट्रीय मंच पर विश्व अर्थव्यवस्था के 19 शीर्ष देशों के नेताओं के साथ नज़र आए.
जी-20, दुनिया के 19 सर्वाधिक औद्योगिक देशों का समूह है जिसमें यूरोपीय संघ भी शामिल है. इन जी20 देशों में जहां दुनिया की दो तिहाई आबादी बसती है वहीं विश्व अर्थव्यवस्था का 85 प्रतिशत हिस्सा भी इन्हीं देशों में मौजूद है.
यहीं वो रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ इतनी गर्मजोशी के साथ मिलते हुए दिखे कि इस चर्चा को बल मिलने लगा कि सऊदी प्रिंस का झुकाव रूस की ओर हो रहा है.
यह बात भी की जा रही है कि सऊदी अरब रूस में अपने निवेश को बढ़ाने की तैयारी कर रहा है.
रूसी प्रत्यक्ष निवेश कोष (आरडीआईएफ) के प्रमुख किरिल दिमित्रिव ने ब्यूनस आयर्स में जी20 शिखर सम्मेलन के पहले दिन शनिवार को संवाददाताओं से कहा था कि सऊदी अरब के साथ सहयोग के संबंध में हमारी एक महत्वपूर्ण बैठक होगी.
इसके बाद जब पुतिन और क्राउन प्रिंस सलमान की मुलाक़ात हुई. पुतिन ने ओपेक में सऊदी अरब के साथ सहयोग को बढ़ाने की बात की. इसके अलावा यह भी सामने आया कि सऊदी अरब रूस में अपने निवेश को बढ़ाएगा.

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तेल का खेल
पूरी दुनिया की तेल आपूर्ति पर अमरीका, सऊदी अरब और रूस का दबदबा है जो तेल उत्पादन में क्रमशः नंबर एक, दो और तीन की भूमिका में हैं.
वहीं अमरीका जहां बड़ा उत्पादक है वहीं वो सबसे बड़ा कंज्यूमर भी है. लिहाजा वो चाहता है कि दैनिक उत्पादन बढ़ाए जाएं जिससे कि तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में कमी आए. लेकिन सऊदी अरब के साथ ये बात नहीं है.
सऊदी अरब में दुनिया के कुल तेल भंडार का 18 फ़ीसदी पेट्रोलियम मौजूद है और यह इसके शीर्ष तीन निर्यातक देशों में भी है.
तेल और गैस सेक्टर का यहां की जीडीपी में 50 फ़ीसदी और निर्यात में क़रीब 85 फ़ीसदी का हिस्सा है. यानी तेल की कीमतों के घटने का सीधा असर सऊदी अरब की अर्थव्यव्स्था पर पड़ सकता है. यहीं पर सऊदी अरब को रूस का समर्थन मिल रहा है. वो तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों को लेकर सऊदी अरब के समर्थन में खड़ा है.
ऐसी ख़बरें हैं कि 6 दिसंबर को वियना में ओपेक (तेल उत्पादक-निर्यातक देशों के गठबंधन) की होने वाली बैठक में रूस और सऊदी अरब के साथ तेल के दैनिक उत्पादन को घटाने के प्रस्ताव के पक्ष में खड़ा होगा ताकि कच्चे तेल के दामों में गिरावट को रोका जा सके.
इसके अलावा ये भी समझा जा रहा है कि पुतिन और प्रिंस सलमान की मुलाकात में सऊदी अरब के रूस में निवेश को बढ़ाने पर भी बात हुई है. यहां बता दें कि सऊदी अरब ने रूस में पहले से ही 2 अरब डॉलर से अधिक का निवेश कर रखा है.
अमरीका को सऊदी से इतना प्रेम क्यों?
हालांकि पिछले कुछ दिनों के दौरान ख़ाशोज्जी की हत्या के बाद से अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप पर क्राउन प्रिंस सलमान से दूरी बनाने का दबाव ज़रूर हैं लेकिन ये जगज़ाहिर है कि उनका सऊदी अरब के प्रति प्रेम उसके (सऊदी के) मिलियन डॉलर के निवेश की वजह से है.
सऊदी अरब अमरीका में अच्छा ख़ासा निवेश करता है. खुद राष्ट्रपति ट्रंप ने पिछले हफ़्ते कहा था कि "मुझे अमरीका में 110 बिलियन डॉलर के निवेश को रोकने का विचार पसंद नहीं है."
ट्रंप को चिंता इस बात की है कि सऊदी अरब न केवल वहां निवेश करता है बल्कि वो मध्य पूर्व में अमरीकी हथियारों का सबसे बड़ा ख़रीदार भी है.
दुनियाभर में हथियारों का सबसे बड़ा विक्रेता खुद अमरीका है और इन हथियारों का करीब आधा हिस्सा वो अकेले मध्यपूर्व के देशों को बेचता है और क़रीब एक तिहाई एशिया के देशों को.
इंटरनेशन पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के मुताबिक पिछले पांच साल के दौरान दुनिया भर में बेचे गए कुल हथियारों का करीब एक तिहाई हिस्सा अमरीका ने बेचे हैं.
सऊदी अरब न केवल अमरीकी हथियारों का बल्कि मध्य पूर्व के किसी भी देश से अधिक हथियार ख़रीदता है. वो दुनिया में बेचे जाने वाले कुल हथियार का करीब दसवें हिस्से का ख़रीदार है.
दुनिया के हथियार ख़रीदने वाले देशों में सऊदी अरब भारत के बाद दूसरे स्थान पर आता है.
भारत अपने हथियारों का अधिकांश हिस्सा रूस से ख़रीदता है वहीं अमरीका पूरी दुनिया में जो हथियार बेचता है उसका 18 फ़ीसदी हिस्सा केवल सऊदी अरब ख़रीदता है.
यानी कुल मिलाकर ट्रंप का सऊदी अरब के प्रति प्रेम अमरीका के आर्थिक हित की वजह से है.

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ट्रंप की उलझन
अमरीका में ट्रंप के सत्ता में आने के बाद से प्रिंस सलमान उनसे नज़दीकियां बढ़ाने लगे और उनका भरोसा जीतने में इस हद तक कामयाब रहे कि न केवल ख़ाशोज्जी के मसले पर बल्कि यमन के मुद्दे पर भी अमरीका आंखें मुंदे है.
सऊदी अरब पिछले तीन सालों से यमन में अमरीकी हथियारों के दम पर युद्ध छेड़ रखा है. संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक़ इस युद्ध के कारण 80 लाख लोग भुखमरी की कगार पर खड़े हैं.
क्राउन प्रिंस सलमान ने क़तर पर नाकेबंदी कर दी है. कतर के साथ अमरीका के भी अच्छे संबंध हैं, फिर भी वो सऊदी को नाकेबंदी से रोक नहीं पाया.
इधर मार्च 2015 में सत्ता में आने के बाद से क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन-सलमान ने एक उग्र सुधारक के रूप में अपनी छवि बनानी शुरू की.
उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा कि वो सऊदी अरब को बदलना चाहते है लेकिन अपनी शर्तों पर. विशेषज्ञों की नज़र में यह वो ही मॉडल है जिस पर शी जिनपिंग और व्लादिमीर पुतिन चल रहे हैं.

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रूस की स्थिति
अब बात करें रूस की तो शीत युद्ध के दौर में सोवियत संघ महाशक्ति था लेकिन आज दुनिया की महाशक्ति के केंद्र बदल गए हैं.
आज अमरीका अर्थव्यवस्था के मामले में दुनिया का सबसे बड़ा देश है वहीं उसके बाद चीन दूसरे स्थान पर पहुंच गया है.
तीन साल पहले तक दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में रूस का स्थान 9वां था जो अब 12वें स्थान पर आ गया है.
लेकिन व्लादिमीर पुतिन ने देश को फिर से एकजुट करना शुरू कर दिया है जो तमाम दिक्क़तों के बावजूद रूस को महान शक्ति के तौर पर देखते हैं.
राजनीतिक विश्लेषकों की नज़र में घरेलू मोर्चे पर चुनौतियों से घिरे और आर्थिक तौर पर कमज़ोर दिखने के बावजूद रूस के बढ़ते अंतरराष्ट्रीय प्रभाव के पीछे भी वर्तमान अमरीकी प्रशासन की ग़लतियां ही हैं.
ईरान से परमाणु समझौता ख़त्म करने के अमरीका के एकतरफ़ा फ़ैसले ने पश्चिमी देशों को नाराज़ किया.
वहीं चीन के साथ उसने ट्रेड वार छेड़ रखा है इसकी वजह से चीन और रूस के बीच भी रिश्ते गहरे हो रहे हैं. दोनों देशों के बीच सैन्य और आर्थिक साझेदारी बढ़ रही है.
समाचार एजेंसी शिन्हुआ के मुताबिक़ रूस में साल 2017 में चीन का प्रत्यक्ष निवेश 72 फ़ीसदी बढ़ा है और आज चीन ही रूस से सबसे ज़्यादा तेल ख़रीदता है.
रूस के साथ चीन की नजदीकियां बढ़ने की वजह से ही जी20 में शी जिनपिंग से मुलाक़ात के बाद ये ख़बरें आई कि ट्रेड वॉर की आशंकाओं को 90 दिनों के लिए दरकिनार कर दिया गया है.

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आखिर ऊंट किस करवट बैठेगा?
उधर रूस हथियार बेचने वाले देशों में भी अमरीका के बाद दूसरे स्थान पर है. दुनिया भर के 20 फ़ीसदी हथियार रूस से निकलते हैं.
शीत युद्ध के दौरान सारी पॉलिटिक्स ये थी कि रूस को किसी तरह मध्य पूर्व से हटाया जाए और भले ही आर्थिक मोर्चे पर रूस की दिक्कतें बढ़ी हैं लेकिन सीरिया की जंग से लेकर तेल को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होने वाले खेल तक पुतिन के कार्यकाल के दौरान रूस का दबदबा बढ़ने लगा है.
राष्ट्रपति ट्रंप यूक्रेन के मसले को लेकर रूस से ख़फ़ा हैं. दरअसल रूस ने यूक्रेन के तीन जहाज़ों को चालक दल के सदस्यों समेत पकड़ लिया था. ट्रंप ने इस पर अपनी नाखुशी जाहिर करते हुए मामले को जल्द से जल्द सुलझाने की उम्मीद की और जी20 सम्मेलन के दौरान राष्ट्रपति पुतिन से मिलने से मना भी कर दिया है.
हालांकि विश्लेषकों की राय में आज वर्ल्ड स्टेज पर कोई नेता अगर परिपक्व है तो उसमें पुतिन बिल्कुल शामिल हैं और वो अपने देश को दोबारा महाशक्ति के तौर पर देखना चाहते हैं. पुतिन की रणनीति और विदेश नीति को कामयाब बताया जाता है और कहा जा रहा है कि दुनिया में उनका दबदबा डंके की चोट पर बढ़ रहा है.
लिहाजा सऊदी अरब का झुकाव यदि अमरीका की जगह रूस की तरफ होता है तो यह अमरीका के लिए जहां एक बड़ी नाकामी होगी वहीं रूस के लिए अंतरराष्ट्रीय राजनीति में बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि के साथ-साथ आर्थिक मोर्चे पर भी बड़ी जीत होगी.
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