कंबोडिया: 'ख़मेर रूज' नेता लाखों लोगों का क़त्ल करने के दोषी पाये गए

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- Author, टीम बीबीसी हिन्दी
- पदनाम, नई दिल्ली
कंबोडिया में 1970 के दशक में देश पर राज करने वाले ख़मेर रूज के दो वरिष्ठ नेताओं को पहली बार 'नरसंहार' का दोषी पाया गया है.
92 वर्षीय नूऑन चिया ख़मेर रूज सरकार में विचारधारा प्रमुख थे और 87 साल के क्यू साम्पॉन पूर्व राष्ट्र प्रमुख थे.
इन दोनों नेताओं पर संयुक्त राष्ट्र के समर्थन वाले एक आयोग ने लगभग 20 लाख लोगों की मौत के लिए ज़िम्मेदार होने का आरोप लगाया था.
आयोग के अनुसार कंबोडिया में बंदूक की नोक पर शासन चलाने वाले संगठन ख़मेर रूज के शासनकाल में वियतनामी मूल के चाम मुसलमानों की चुन-चुनकर हत्या की गई थी.

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ये दोनों नेता पहले से ही जेल में हैं और आजीवन कारावास की सज़ा काट रहे हैं.
ट्रिब्यूनल ने ख़मेर रूज सरकार के तीन नेताओं के ख़िलाफ़ ये मुक़दमा शुरू किया था. कंबोडिया के पूर्व विदेश मंत्री लेंग सारी तीसरे अभियुक्त थे जिनका साल 2013 में 87 साल की उम्र में देहांत हो गया था.
जज निल नून ने शुक्रवार को कोर्ट में ख़मेर रूज काल के पीड़ितों के सामने अपना विस्तृत फ़ैसला पढ़कर सुनाया.
कोर्ट ने दोनों नेताओं को मानवता के विरुद्ध अपराध करने, प्रताड़ना, धार्मिक उत्पीड़न, रेप, ज़बरन शादियाँ कराने और हत्याएं करवाने की दोषी पाया.

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सबसे बड़ा नरसंहार
ख़मेर रूज एक कट्टर कम्युनिस्ट आंदोलन था जिसने साल 1975 से 1979 तक कंबोडिया पर राज किया था.
इस कम्युनिस्ट सरकार के प्रमुख सालोथ सार थे, जिन्हें पोल पॉट के नाम से जाना जाता है.
इस दौरान वहाँ हुई हत्याओं को 20वीं सदी के सबसे बड़े नरसंहारों में गिना जाता है.
माना जाता है कि मार्क्सवादी नेता पोल पॉट ने साम्यवादी विचारधारा को अपनी तरह से परिभाषित किया और इसके बाद कंबोडिया का समाज हमेशा के लिए बदल गया.

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मार्क्सवादी नेता पोल पॉट कंबोडिया को ग्रामीण यूटोपिया बनाना चाहते थे. उन्होंने शहरों से हटाकर लोगों को गाँवों में बसाना शुरू किया.
धन और निजी संपत्ति रखना बंद कर दिया गया. उनके शासन में धर्म और आस्था की इजाज़त नहीं थी.
ख़मेर रूज की शुरुआत 1960 के दशक में कंपूचिया साम्यवादी पार्टी की सशस्त्र इकाई से हुई थी.
मार्क्सवादी कंबोडिया को तब कंपूचिया के नाम से पुकारते थे.

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'शून्य वर्ष' की घोषणा
1970 में दक्षिणपंथी सैन्य इकाई ने राजकुमार नॉरदोम सिंहानुक का तख़्तापलट किया और ख़मेर रूज राजनीति में उतरकर तेज़ी से जन समर्थन जुटाने लगे.
क़रीब 5 साल तक चले गृह युद्ध में ख़मेर रूज ने कंबोडिया के अधिकांश हिस्से पर नियंत्रण कर लिया.
साल 1975 में ख़मेर रूज ने राजधानी नाम पेन्ह पर कब्ज़ा कर कंबोडिया को अपने अधीन ले लिया.
दरअसल, पोल पॉट लंबे समय तक पूर्वोत्तर के जंगलों में पहाड़ी आदिवासियों के बीच रहे थे और उनके आत्मनिर्भर जीवन से प्रभावित थे.
आदिवासियों को पैसे की ज़रूरत नहीं होती और वे बौद्ध धर्म से भी दूर थे.
शासन संभालते ही पोल पॉट ने देश में नई शुरुआत के लिए 'शून्य वर्ष' घोषित कर दिया.

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20 साल लंबी लड़ाई
उन्होंने अपने नागरिकों को दुनिया से अलग-थलग कर दिया और शहर खाली कराने शुरू कर दिए.
ख़ुद को बुद्धिजीवी मानने वालों को मार दिया गया.
उनके शासन काल में चश्मा पहनने या विदेशी भाषा जानने वालों को अक्सर प्रताड़ित किया जाता था.
मध्यवर्ग के लाखों पढ़े-लिखे लोगों को विशेष केंद्रों पर प्रताड़ित किया गया और मौत की सज़ा दी गई.
इनमें सबसे कुख़्यात थी नाम पेन्ह की एस-21 जेल, जहाँ ख़मेर रूज के चार साल के शासन के दौरान 17 हज़ार महिलाओं, पुरुषों और बच्चों को क़ैद रखा गया था.

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वियतनाम की सीमा पर संघर्ष के लंबे दौर के बाद वियतनामी सेना ने आख़िरकार 1979 में ख़मेर रूज को सत्ता से बेदखल कर दिया.
लेकिन ख़मेर रूज ने जंगलों से अगले क़रीब 20 साल तक लड़ाई जारी रखी, जब तक कि उसके नेता पोल पॉट की मौत नहीं हो गई.
इस दौरान लाखों लोग भुखमरी, बीमारी, बेगारी और मौत की सज़ा के कारण मारे गए.
साल 1998 में पोल पॉट की मौत हो गई थी. पोल पॉट के अलावा भी कई प्रमुख ख़मेर रूज नेताओं की मौत हो चुकी है.
जिन तीन वरिष्ठ ख़मेर रूज नेताओं पर मुक़दमा शुरू हुआ था वो साल 2007 से हिरासत में थे.

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नरसंहार के बीच एक पत्रकार
कंबोडिया में ख़मेर रूज के दौर में अमरीकी पत्रकार सिडनी शॉनबर्ग ने काफ़ी रिपोर्टिंग की थी. बाद में 82 वर्ष की उम्र में उनका देहांत हो गया.
लेकिन पुलित्ज़र पुरस्कार विजेता शॉनबर्ग की कंबोडिया से की गई रिपोर्टिंग से प्रेरित होकर ही ऑस्कर जीतने वाली फ़िल्म 'द किलिंग फ़ील्ड्स' बनी थी.
पत्रकार सिडनी शॉनबर्ग ने अपनी रिपोर्ट में लिखा था कि कंबोडिया में मरने वालों की तादाद 10 लाख से ज़्यादा बताई जाती है जबकि कुछ अनुमान कहते हैं कि ये आंकड़ा 25 लाख के आसपास था.
साल 1980 में शॉनबर्ग ने एक पत्रिका के लिए लिखा था कि कैसे ख़मेर रूज के दौर में लोगों का उत्पीड़न हुआ और उन्हें क़त्ल किया गया. बाद में उन्होंने इसपर एक किताब भी लिखी.

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साल 1975 में शॉनबर्ग और उनके साथी डिथ प्रान ने न्यूयॉर्क टाइम्स के अपने संपादकों के निर्देशों को अनदेखा करते हुए कंबोडिया में ही रुकने का फ़ैसला किया था जबकि सभी पश्चिमी राजनयिक और पत्रकार वहाँ से भाग गए थे.
शॉनबर्ग और प्रान को ख़मेर रूज ने पकड़ा भी था और जान से मारने की धमकी दी थी.
डिथ प्रान की याचनाओं के कारण शॉनबर्ग की जान बची थी.
शॉनबर्ग की रिपोर्टिंग के आधार पर बनी फ़िल्म 'द किलिंग फ़ील्डस' को आठ बाफ़्टा और तीन ऑस्कर पुरस्कार मिले थे.
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