बेनज़ीर भुट्टो के गांव की लड़कियों की दिक़्क़तें क्या हैं? #BBCShe

- Author, शुमाइला जाफ़री
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, लरकाना (सिंध), पाकिस्तान
बलूचिस्तान के सर्द पहाड़ों में 'बीबीसी शी' इवेंट के तहत युवा महिलाओं से रुबरू होने के बाद हमने अपने अगले पड़ाव सिंध प्रांत की ओर रुख़ किया. वहां हम लरकाना की महिलाओं के साथ रुबरू होना चाहते थे.
कराची से लगभग साढ़े चार सौ किलोमीटर दूर स्थित लरकाना को पंजाब के राजनीतिक पटल पर सबसे ताक़तवर शहरों में से एक माना जाता है क्योंकि ये भुट्टो परिवार का पैतृक निवास स्थान है.
शहर से लगभग डेढ़ घंटे की दूरी पर स्थित गढ़ी ख़ुदा बख़्श गांव से भुट्टो परिवार की क़ब्र वाली ऊंची इमारत नज़र आने लगती है.
इस इमारत के ऊंचे सफ़ेद गुंबद अंधेरे में भी मोतियों से चमकते हैं.
इस गांव में भुट्टो परिवार के लोगों को संतों जैसी प्रतिष्ठा हासिल है और उनकी क़ब्रगाह एक तीर्थस्थल बन चुकी है जहां हर रोज़ दर्जनों लोग आते हैं.
भुट्टों के गांव में विकास कहां?
इस गांव से निकलने वाला भुट्टो परिवार एक लंबे समय तक पाकिस्तान की सत्ता पर काबिज़ रहा है. लेकिन इसके बावजूद इस क्षेत्र में आधारभूत ढांचे की कमी और ग़रीबी साफ़ नज़र आती है.
लरकाना ही नहीं सिंध प्रांत के अंदरूनी हिस्सों में कई जगह कुछ इसी तरह का नज़ारा दिखाई पड़ता है.
इसी इलाक़े ने मुस्लिम दुनिया और पाकिस्तान को उसकी पहली महिला प्रधानमंत्री दी थी.
ऐसे में हमारी रुचि ये जानने में थी कि इस क्षेत्र की लड़कियां कितनी जागरुक हैं.

हमने शहीद ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो इंस्टिट्यूट ऑफ़ साइंस एंड टेक्नोलॉजी में युवा महिलाओं से रूबरू होने की योजना बनाई.
हमारे इस आयोजन में तकरीबन पचास युवा महिलाओं ने हिस्सा लिया. इस दौरान इन्होंने समाज में टैबू यानी वर्जित माने-जाने वाले महिला स्वास्थ्य, प्रजनन के अधिकार, और मानसिक सेहत जैसे मुद्दों पर बात की.


सिंध की महिलाओं का साहसी अंदाज़
महिलाओं में मासिक धर्म कुछ इस तरह का मुद्दा है कि शहरों में रहने वाली पढ़ी-लिखी महिलाएं भी इन मुद्दों पर बात करने से हिचकती हैं. लेकिन जब बीबीसी शी के इस इवेंट के दौरान एक युवा छात्रा ने इस मुद्दे को उठाया तो मैं हैरान रह गई.
ये लड़की कहती है कि सिंध प्रांत में हज़ारों महिलाएं चुप्पी के साथ ये सब बर्दाश्त कर रही हैं, वे साफ़ सेनिटरी उत्पाद नहीं खरीद सकती हैं, किसी तरह की समस्या पैदा होने पर वे डॉक्टरी मदद नहीं ले सकती हैं, सिंध प्रांत के अंदरूनी इलाक़ों में वे अपने हारमोनल डिसऑर्डर और स्तन कैंसर जैसी बीमारियों के बारे में बात करने से भी हिचकती हैं.

यही लड़की उदाहरण देकर समझाती है कि अगर कोई अविवाहित लड़की महिला रोग विशेषज्ञ के पास जाती है तो समाज उसका जीना मुश्किल कर देता है.
वहीं, एक दूसरी लड़की कहती है कि अगर कोई लड़की इस बारे में बात करे तो उनके परिवार वाले उन्हें जबरन चुप करा देते हैं.
यह लड़की अपने अनुभव को साझा करते हुए कहती है, "हमें ये बताया जाता है कि हम बेशरम हैं. ऐसी बातों पर चर्चा करना हमारे धर्म और तौर-तरीक़ों के ख़िलाफ़ है."


महिलाओं के अधिकार
सिंध प्रांत के कांडकोट इलाक़े से आने वाली एक लड़की कहती है कि महिलाओं का उनके मन और शरीर पर किसी तरह का अधिकार नहीं है. उन्हें कम उम्र में शादी करके बच्चे पैदा करने के लिए विवश किया जाता है. इसके बाद अगर वह एक लड़के को जन्म नहीं देती हैं तो उनके पति उन्हें छोड़कर दूसरी शादी कर लेते हैं.
कांडकोट से आने वाली यह लड़की बताती है, "गर्भ धारण के दौरान अगर पति को ये पता चल जाए कि वो एक लड़की को जन्म देने वाली है तो उसका पति उसे छोड़ देता है, उसे ज़रूरत के हिसाब से खाना और डॉक्टरी मदद नहीं दी जाती है."
संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट 'टर्निंग प्रोमिसेज़ इनटू एक्शन: जेंडर इक्वैलिटी इन द 2030 एजेंडा' इन दावों की पुष्टि करते हुए बताती है कि सिंध प्रांत में महिलाओं की एक बड़ी संख्या कुपोषण की शिकार है.
यह रिपोर्ट बताती है कि कुपोषण के लिहाज़ से सिंध प्रांत के ग़रीब घरों की महिलाओं की हालत पूरे पाकिस्तान के किसी और समाज से बदतर है.

हमारे इवेंट में हिस्सा लेने आई एक लड़की बताती है कि महिलाओं की ख़राब शारीरिक और मानसिक हालत समाज पर एक बुरा असर डाल रही है. अगर आप प्रसव के दौरान महिलाओं और नवजातों की मौत के आंकड़ों पर नज़र डालेंगे तो आप हैरान रह जाएंगे.
महिलाओं ने हमें उस तनाव के बारे में बताया जिसका सामना यहां की महिलाएं करती हैं.


घरेलू हिंसा का मुद्दा
एक लड़की बताती है कि पुरुष अपने काम के दौरान जिन चुनौतियों का सामना करते हैं, उसकी हताशा महिलाओं पर निकालते हैं.
पाकिस्तान में अल्पसंख्यक हिंदू समाज से आने वाली एक लड़की कहती है कि सिंध प्रांत में मुस्लिम पुरुष हिंदू महिलाओं को जबरन धर्म परिवर्तन के लिए विवश करते हैं.
वह बताती है कि हिंदू समाज इन वजहों के चलते अपनी लड़कियों को आगे पढ़ने नहीं देते.
वह कहती हैं, "हम भी पाकिस्तानी हैं और सिंधी समाज में अच्छे ढंग से रचे-बसे हैं. ऐसे में जबरन धर्म परिवर्तन बंद होने चाहिए. हमें इस मुद्दे की वजह से अपने सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुंचाने से बचना चाहिए."

इस आयोजन में शामिल हुई कुछ लड़कियों ने मुख्यधारा की मीडिया से ये अपेक्षा जताई कि उसे बाल शोषण को लेकर बात करनी चाहिए. इसके साथ ही महिलाओं को उनकी शारीरिक सुरक्षा को लेकर शिक्षित करना चाहिए, यौन शिक्षा को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाना चाहिए क्योंकि इससे बच्चों के यौन शोषण पर लगाम लगेगी.
यह लड़की कहती है, "मीडिया को बच्चों को गुड और बैड टच के बारे में शिक्षा देनी चाहिए."


अच्छी लड़की बनाम बुरी लड़की
कई लड़कियों ने ये भी बताया कि पुरुष किस तरह महिलाओं की पसंद और नापसंद के आधार पर उन्हें अच्छी महिला और बुरी महिला जैसे खांचों में फिट करते हैं.
इनमें से कई लड़कियां इस बात पर भी एक राय थीं कि समाज ही महिलाओं के ख़िलाफ़ सोच को विकसित करने के लिए ज़िम्मेदार है.
इस दौरान दफ़्तरों, शिक्षण संस्थानों के परिसरों और गलियों में यौन शोषण, ईव टीज़िंग, सोशल मीडिया पर आवारगी, लैंगिक भेदभाव और निर्णय लेने के अधिकार जैसे मुद्दे भी उठाए गए.

इस आयोजन के बाद एक बार फिर मैं इन लड़कियों की बहादुरी की कायल हो गई. इनमें से कई लड़कियां पहली बार कैमरे का सामना कर रही हैं लेकिन ये महिलाएं बेहिचक होकर अपने विचार रख रही थीं.
मैंने उनकी आवाज़ में निराशा महसूस की. मुझे लगता है कि यही ग़ुस्सा लोगों को निर्भीक बनाता है. ये लड़कियां निश्चित रूप से समाज की ओर से मिल रहे बर्ताव पर नाराज़ थीं.
मैं सिंध की महिलाओं के बारे में जो सोचती थीं वो पूरी तरह से बदल गई. बीबीसी शी इवेंट के दौरान अब तक मेरी मुलाक़ात ऐसी महिलाओं से हुई जिनके साहस को देखकर मैं दंग हूं.
देखते हैं बीबीसी शी के सफर में हमारे अगले पड़ाव ख़ैबर पख़्तूनख़्वा प्रांत में क्या होता है.
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