ईरान से कच्चे तेल के इंपोर्ट पर बैन लगाने के पीछे क्या है डोनल्ड ट्रंप का 'असल खेल'

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- Author, टीम बीबीसी हिंदी
- पदनाम, नई दिल्ली
ईरान से तेल आयात पर अमरीकी प्रतिबंध लागू हुए
अमरीका ने आठ देशों को फ़ौरी तौर पर ईरान से कच्चा तेल इंपोर्ट करने की छूट दी
ईरान की अमरीका को चेतावनी- इस्लामिक रिपब्लिक 40 साल से अमरीका को हराता आया है
तुर्की में ईरान के कुछ विमानों को नहीं मिला तेल, फ्लाइट
नवंबर के पहले हफ्ते में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ये हैडलाइन सुर्खियां बनीं. अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने ईरान से तेल आयात पूरी तरह बंद करने की समयसीमा चार नवंबर रखी है और कहा था कि जो भी देश इस समयसीमा का पालन नहीं करेगा, उसे कड़ा सबक सिखाया जाएगा.
चीन, भारत, दक्षिण कोरिया सरीखी दुनिया की तेज़ी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं का ट्रंप के इस फ़रमान से परेशान होना लाज़मी था क्योंकि ये तीनों ही देश ईरान से सप्लाई होने वाले कच्चे तेल पर बहुत निर्भर रहे हैं.
डर इस बात का भी था कि अगर ईरान से तेल आयात पूरी तरह बंद हो गया तो सप्लाई प्रभावित होने से कच्चे तेल की क़ीमतों में कहीं भारी उछाल न आ जाए. ऐसा होने पर दुनियाभर के उद्योगों पर नकारात्मक असर पड़ना तय था और कुछ जानकार तो इस बात की आशंका भी जता रहे थे कि कहीं अर्थव्यवस्थाएं 'एक और मंदी' की चपेट में न आ जाएं.

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कच्चे तेल की कीमतें अक्टूबर की शुरुआत में 86 डॉलर प्रति बैरल पर पहुँच गई थीं और ये चार सालों में सबसे अधिक थी. शिप ट्रैकिंग फ़र्म कैप्लर के मुताबिक अमरीकी प्रतिबंधों के कारण ईरान से तेल की सप्लाई वैसे ही काफ़ी कम हो गई थी. ये जून में 26.6 लाख बैरल प्रति दिन के मुक़ाबले घटकर 17.6 लाख बैरल पर पहुंच गई थी.
प्रतिबंधों के बाद ईरान से दूसरे देशों को होने वाली तेल सप्लाई में प्रति दिन 10 से 15 लाख बैरल की कमी आने का अनुमान है.
भारत समेत दुनियाभर की अर्थव्यवस्थाएं इससे परेशान हो रही थीं और इकोनॉमी का पहिया सुस्त पड़ने की आशंकाएं जताई जाने लगीं. लेकिन फिर पिछले 15 दिनों में ये उबाल कुछ ठंडा होता दिख रहा है.
हालाँकि कुछ जानकार इसे अस्थाई दौर मान रहे हैं और आशंका जता रहे हैं कि आने वाले दिनों में जब ईरान से तेल की सप्लाई बहुत कम या अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के 'ज़ीरो एक्सपोर्ट' का दावा सही साबित हुआ, तब 'तेल का असल खेल' सामने आएगा.
क्या बढ़ेंगे कच्चे तेल के दाम
लेकिन क्या अमरीकी प्रतिबंधों के अमल में आने के बाद कच्चे तेल के दामों में बढ़ोतरी होगी?
जानकार इस सवाल का जवाब हाँ और ना दोनों में देते हैं.
मार्केट वॉच ने डब्ल्यूटीआरजी इकोनॉमिक्स के अर्थशास्त्री जेम्स विलियम्स के हवाले से लिखा, "अभी तक ये ठीक-ठीक पता नहीं है कि भारत, जापान, दक्षिण कोरिया को छोड़कर किन देशों को इन प्रतिबंधों से आंशिक छूट मिली है. ये देश ईरान से कितना तेल इंपोर्ट कर पाएंगे, इस बारे में भी अभी कुछ स्पष्ट नहीं है. लेकिन इतना तय है कि ट्रंप को अपना रुख़ नरम करना पड़ रहा है और देश को प्रतिबंधों से कुछ छूट देनी पड़ रही है."
तेल कीमतों के बारे में कोई भविष्यवाणी करने से पहले ये जान लेना ज़रूरी है कि बाज़ार में कितना तेल आ रहा है.
ट्रंप का 'असल खेल'

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समाचार एजेंसियों ब्लूमबर्ग और रॉयटर्स के इसी हफ्ते कराए गए सर्वेक्षणों से ये पता चलता है कि तेल कीमतों में बहुत अधिक उछाल आने की संभावना नहीं है क्योंकि तेल निर्यातक देशों के संगठन (ओपेक) ने अपना उत्पादन बढ़ा दिया है और ये 2016 के बाद उच्चतम स्तर पर है.
ओपेक तीसरा बड़ा तेल उत्पादक संगठन है. इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी के मुताबिक ओपेक के सहयोगी देश रूस ने मई से सितंबर के दौरान अपने तेल उत्पादन में भारी इज़ाफ़ा किया है.
एजेंसी के मुताबिक मई से सितंबर तक रूस ने प्रति दिन तेल उत्पादन में चार लाख बैरल की बढ़ोतरी की है और सोवियत युग के बाद अभी सबसे अधिक तेल उत्पादन कर रहा है.
जानकारों के मुताबिक ईरान पर तेल प्रतिबंधों का सबसे अधिक फ़ायदा अमरीका को होने जा रहा है.
अमरीका का तेल उत्पादन भी इस साल अपने उच्चतम स्तर पर पहुंचने का अनुमान है और इसकी वजह है कि शेल गैस क्रांति.
एनर्जी इनफॉर्मेशन एडमिनिस्ट्रेशन फ़ोरकास्ट के मुताबिक साल 2019 में अमरीका का तेल उत्पादन 10 फ़ीसदी बढ़ने का अनुमान है और ये प्रतिदिन 1.18 करोड़ बैरल के स्तर तक पहुंच जाएगा. अगर ऐसा हुआ तो अमरीका दुनिया का सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश बन जाएगा.
जानकारों के मुताबिक तेल कीमतों में इसलिए भी उछाल आने की संभावना कम है क्योंकि ईरान से तेल सप्लाई बहुत कम या बंद होने की स्थिति में दूसरे तेल उत्पादक देशों के बीच उसका हिस्सा हासिल करने की होड़ लगेगी, वे उत्पादन बढ़ाएंगे और इस तरह तेल कीमतें काबू में रहेंगी.
ट्रंप ने इसलिए दी रियायत

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अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ 2015 में हुए समझौते को 'बेहद ख़राब' बताते हुए इसे रद्द कर दिया था. बराक ओबामा के कार्यकाल में हुए इस समझौते के तहत परमाणु कार्यक्रम रोकने के बदले ईरान पर लगे कड़े प्रतिबंध हटाए गए थे.
हालाँकि इस समझौते में शामिल यूरोप के कई देशों ने साफ़ कहा था कि वो ट्रंप के इस रुख़ से सहमत नहीं हैं और ट्रंप की देखादेखी ईरान पर प्रतिबंध नहीं लगाएंगे.
ट्रंप ने कहा है कि ऐसी कंपनियों को इन प्रतिबंधों से छूट है जो अमरीका में रहते हुए ईरान के साथ कारोबार कर रही हैं, लेकिन ऐसी अमरीकी कंपनियों को सज़ा भुगतने की चेतावनी दी गई है जो ईरान के साथ कारोबार करती हैं.
इसके अलावा कोई भी अमरीकी कंपनी ईरान को सोना, बहुमूल्य धातु और ऑटोमोटिव पार्ट्स नहीं बेच सकेंगी.
ट्रंप ने ये भी चेतावनी दी है कि अगर कोई देश उसके ईरान पर लगे प्रतिबंधों को लागू करने से इनकार करता है तो उस पर भी प्रतिबंध लगाए जाएंगे. हालाँकि बाद में कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया है कि ट्रंप प्रशासन ने कुछ ढील देते हुए भारत, जापान, दक्षिण कोरिया समेत आठ देशों को कुछ रियायत दी है और कहा है कि वो ईरान से तेल इंपोर्ट पूरी तरह बंद करने में कुछ समय और ले सकते हैं.
अमरीकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने कहा, "हम आठ देशों को अस्थाई रियायत दे रहे हैं, लेकिन सिर्फ़ इसलिए कि उन्होंने पिछले कुछ समय में ईरान से तेल इंपोर्ट में भारी कटौती की है और इसे ज़ीरो स्तर तक लाने का इरादा दिखाया है."
ईरान से सबसे अधिक तेल चीन इंपोर्ट करता है, इसके बाद भारत का नंबर आता है. दक्षिण कोरिया तीसरे स्थान पर है. तुर्की चौथे और इटली पाँचवें स्थान पर है. साफ़ है कि ईरान से तेल इंपोर्ट करने वाले शीर्ष पाँच देशों में से तीन को ट्रंप ने ढील दी है, मतलब ट्रंप को भी इस बात का अंदेशा है कि उनके 'आदेश' का पालन करना इन देशों के लिए मुश्किल होगा.
ईरान से क्या चाहता है अमरीका

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अमरीका का कहना है कि वो इस्लामिक गणराज्य ईरान में तख्तापलट करने का इरादा नहीं रखता है, लेकिन ईरान पर अपना परमाणु कार्यक्रम छोड़ने के लिए दबाव बना रहा है.
ट्रंप प्रशासन चाहता है कि ईरान अपनी नीतियों में बदलाव करे और परमाणु कार्यक्रम पर फिर से बातचीत की मेज़ पर लौटे.
अमरीकी विदेश मंत्री पोम्पियो ने कहा, "हम चाहते हैं कि ईरान के लोगों को मौका मिलना चाहिए जिस तरह की वो सरकार चाहते हैं. एक ऐसी सरकार जो उनका पैसा दुनियाभर में गड़बड़ी फैलाने वाले कामों में न लगाए."
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