क्राउन प्रिंस सलमान की 'क्रांति' में फंसता जा रहा सऊदी अरब?

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- Author, टीम बीबीसी हिन्दी
- पदनाम, नई दिल्ली
सऊदी अरब के शाही परिवार से असहमति रखने वाले जाने-माने पत्रकार जमाल ख़ाशोज्जी के पिछले हफ़्ते तुर्की के इस्तांबुल स्थित सऊदी अरब के वाणिज्य दूतावास से ग़ायब होने का असर मध्य-पूर्व और अमरीकी हितों पर गहरा पड़ सकता है.
ख़ाशोज्जी दो अक्टूबर को अंकारा स्थित सऊदी अरब के वाणिज्य दूतावास में आए थे और अभी तक कोई सबूत सामने नहीं आया है जिससे पता चल सके कि वो दूतावास से ज़िंदा बाहर निकले थे.
तुर्की का कहना है कि उसके पास सर्विलांस ऑडियो टेप है जिससे पता चलता है कि ख़ाशोज्जी से दूतावास के भीतर पूछताछ हुई, उन्हें प्रताड़ित किया गया और उनकी हत्या कर दी गई. हालांकि तुर्की ने कोई भी ऑडियो टेप अब तक सार्वजनिक नहीं किया है.
सऊदी ने ख़ाशोज्जी के ग़ायब होने में अपनी किसी भी भूमिका से इनकार किया है. दूसरी तरफ़ अमरीका और तुर्की के ख़ुफ़िया अधिकारियों का कहना है कि सऊदी के एजेंट प्राइवेट जेट से उसी दिन अंकारा आए थे जिस दिन जमाल ख़ाशोज्जी ग़ायब हुए.
सऊदी का कहना है कि अगर उसके ख़िलाफ ख़ाशोज्जी मसले को लेकर कोई प्रतिबंध लगाए गए तो वो उसका करारा जवाब देगा
कहा जा रहा है कि शुरुआती सबूतों से यही साफ़ हो रहा है कि सऊदी के इशारे पर जमाल की हत्या की गई है. सऊदी से जुड़े सभी तरह के संकट और विवादों में 33 साल के क्राउन प्रिंस मोहम्मद-बिन-सलमान (एमबीएस) की चर्चा केंद्र में रहती है.
सलमान सऊदी में आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक सुधारों में प्रभावी रूप से आगे बढ़ रहे हैं. ट्रंप प्रशासन ने भी एमबीएस से मज़बूत संबंध बनाए हैं. ट्रंप को लगता है कि मोहम्मद बिन सलमान ईरान को लेकर काफ़ी सख़्त हैं और ये रवैया उनसे मेल खाता है.
एमबीएस को इसराइल से भी मदद लेने में कोई समस्या नहीं है.
कहा जा रहा है कि इतना कुछ होने के बावजूद अगर यह साबित होता है कि ख़ाशोज्जी की हत्या में उनकी भूमिका थी तो इसकी क़ीमत उन्हें चुकानी होगी.
वॉशिंगटन पोस्ट में छपने वाले अपने कॉलम में ख़ाशोज्जी एमबीएस की कड़ी आलोचना करते थे. एमबीएस की एक छवि बनी है वो परिणामों की चिंता किए बिना फ़ैसले लेते हैं और जानकार मानते हैं कि इसके नतीजे यमन में देखे जा सकते हैं जहां सऊदी न जीतने वाली लड़ाई में संसाधन फूंक रहा है. सऊदी की बमबारी से यमन में हज़ारों नागरिक मारे गए हैं.

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पूरे मामले पर वॉल स्ट्रीट जर्नल ने संपादकीय में लिखा है, ''ख़ाशोज्जी मामले में एमबीएस इस गफ़लत में नहीं रह सकते हैं कि वो अपने सबसे बड़े आलोचक को विदेशी ज़मीन पर मरवा दें या अगवा करवा लें और उन पर कोई असर ना पड़े. रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन सामान्य तौर पर अपने आलोचकों को रूस में ही मरवाते हैं.''
ख़ाशोज्जी का जटिल व्यक्तित्व
जॉन ब्रैडली ने ब्रिटिश स्पेक्टेटर में लिखा है कि पश्चिमी मीडिया में ख़ाशोज्जी को उदार और लोकतांत्रिक व्यक्ति के तौर पर पेश किया जा रहा है, लेकिन ख़ाशोज्जी का व्यक्तित्व काफ़ी जटिल रहा है. ख़ाशोज्जी लंबे समय तक मुस्लिम ब्रदरहुड के सदस्य रहे हैं और इस्लामिक राज्य के समर्थक रहे हैं.
उन्होंने लिखा है, ''ख़ाशोज्जी लंबे समय तक सऊदी के शाही परिवार के वफ़ादार रहे हैं. वो ऐसा पत्रकार रहते हुए कर रहे थे. कुछ रिपोर्ट में तो ये बात भी कही गई है कि ख़ाशोज्जी को एमबीएस ने सरकार में अहम पद देने का प्रस्ताव रखा था. एमबीएस का कहना था कि वो अमरीका में निर्वासन छोड़ वापस आ जाएं. कुछ लोगों का ये भी कहना है कि ख़ाशोज्जी का इनकार ही तुर्की में उनकी हत्या का कारण बना.''

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क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन-सलमान मार्च 2015 में जब सत्ता में आए तो वो अपनी छवि उग्र सुधारक की बनाने के लिए बेताब थे. 2016 में उनसे सवाल पूछा गया कि क्या ब्रिटेन की पूर्व प्रधानमंत्री मारग्रेट थैचर की तरह सऊदी में क्रांति करना चाहते हैं? उनका जवाब था, ''बिल्कुल.''
तीन अक्टूबर को ब्लूमबर्ग को दिए इंटरव्यू में एमबीएस ने कहा था कि वो सऊदी को बदलना चाहते हैं, लेकिन अपनी शर्तों पर. कहा जा रहा है कि अगर एमबीएस का यही मॉडल है तो ये थैचर या गोर्बाचोव का नहीं है बल्कि यह शी जिनपिंग और व्लादिमीर पुतिन की तरह है.
हालांकि एमबीएस के नेतृत्व में सऊदी में कई चीज़ें बदली हैं. इनके रहते तेल की क़ीमत दोगुनी हो गई. अमरीका में सत्ता परिवर्तन हुआ और ट्रंप प्रशासन का भरोसा जीतने में एमबीएस कामयाब रहे.
अब अमरीकी शैली में अंग्रेज़ी बोलते हैं सलमान
ब्लूमबर्ग का कहना है कि तीन साल में एमबीएस ने उसे कई इंटरव्यू दिए हैं, लेकिन पहले के इंटरव्यू की तुलना में एक बड़ा परिवर्तन यह आया है कि वो अरबी में नहीं बल्कि अमरीकियों की शैली में अंग्रेज़ी बोलने लगे हैं.
एमबीएस का कहना है कि वो अब भी मुक्त अर्थव्यवस्था के रुख़ को लेकर कायम हैं. उनकी कोशिश है कि सऊदी की अर्थव्यवस्था की निर्भरता तेल से कम हो. इसी योजना के तहत एमबीएस तेल की सरकारी कंपनी अरामको का पांच फ़ीसदी शेयर बेचना चाहते हैं.
एमबीएस को उम्मीद है कि इससे 100 अरब डॉलर का फ़ंड जुटाया जा सकेगा. हालांकि एमबीएस की ये योजना अमल में नहीं आ पाई. कई लोगों का कहना है कि एक डर ये था कि निवेशक कंपनी की क़ीमत एक ख़रब डॉलर से कम लगा सकते थे.

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2015 के बाद से सऊदी में बदलाव आए हैं. सऊदी की सड़कों पर कम ही महिलाएं अब चेहरा ढक कर चलती हैं और बाक़ी रंगीन बुर्क़े भी पहनती हैं. रेस्त्रां में अब संगीत भी बजता है और महिलाएं गाड़ी भी चलाती हैं. सऊदी अरब के लिए यह बड़ी बात है क्योंकि देश की बड़ी आबादी अब भी धार्मिक रूप से रूढ़िवादी है.
एमबीएस का एक दूसरा चेहरा यह भी है कि उनके कार्यकाल में सत्ता ज़्यादा दमनकारी हो गई है. महिला अधिकार के लिए लड़ने वाली एक्टिविस्टों को गिरफ़्तार किया गया और ऐसा महिलाओं को ड्राइविंग की अनुमति देने के कुछ दिन पहले ही हुआ. इनमें से ज़्यादातर अब भी क़ैद हैं.
ख़ाशोज्जी पर शक के दायरे में सऊदी
जमाल ख़ाशोज्जी का मामला अब राजनीतिक हो गया है. ख़ाशोज्जी को लेकर एबीएस ने अपने एक इंटरव्यू में कहा है कि वो तुर्की स्थिति वाणिज्य दूतावास में आने के तत्काल बाद ही निकल गए थे. वाणिज्य दूतावास में कई सर्विलांस कैमरे लगे हैं. लेकिन जमाल का जाना रिकॉर्ड क्यों नहीं हुआ?
ऐसे कई सवाल हैं जिनके जवाब एमबीएस को देने हैं. एमनेस्टी इंटरनेशनल का कहना है कि अगर सऊदी ने ऐसा किया है तो यह बहुत ही ख़राब होगा.

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अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा है कि अगर सऊदी इसमें दोषी पाया जाता है तो उसे गंभीर नतीजे भुगतने होंगे. जर्मनी ने भी जल्दी जांच की मांग की है और ब्रिटेन ने भी इस मामले में कड़ा रुख दिखाया है.
एमबीएस का व्यवहार मानवाधिकारों को लेकर अमरीका का भरोसा खोए बिना आक्रामक रहा है. एमबीएस ने न केवल देश के भीतर अपनी शर्तों पर काम किया बल्कि पड़ोसी देशों के साथ भी ऐसा ही व्यवहार रहा.
एमबीएस ने क़तर पर नाकेबंदी कर दी, यमन में युद्ध छेड़ दिया और ईरान से सारे राजनयिक संबंध ख़त्म कर दिए. क़तर से अमरीका के भी अच्छे संबंध हैं, लेकिन फिर भी वो सऊदी को नाकेबंदी से रोक नहीं पाया.
यमन में सऊदी पिछले तीन सालों से अमरीकी हथियारों के दम पर लड़ रहा है और अमरीका भी साथ दे रहा है. संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक़ इस युद्ध के कारण 80 लाख लोग भुखमरी की कगार पर खड़े हैं.

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सऊदीकरण की नीति
सलमान सऊदी में काम कर रहे विदेशियों को भी कम करना चाहते हैं. इसके लिए उन्होंने कई क़दम उठाए हैं, जिनमें वीज़ा फीस को महंगा करना और कंपनियों के लिए सऊदी के कामगारों को रखना अनिवार्य करना शामिल हैं.
सऊदी के क्राउन प्रिंस इस बात पर भी ज़ोर दे रहे हैं कि लोग सरकारी नौकरी का मोह छोड़ प्राइवेट सेक्टर की तरफ़ रुख़ करें. सऊदी के श्रम मंत्रालय के अनुसार यहां के क़रीब दो तिहाई लोग सरकारी नौकरी करते हैं.
सऊदी कंपनियों पर दबाव बन रहा है कि वो विदेशी कामगारों की जगह सऊदी के नागरिकों को रखें. सऊदी के श्रम मंत्रालय के अनुसार 2017 में यहां बेरोज़गारी दर 12.8 फ़ीसदी थी जिसे 2030 तक सात फ़ीसदी करने का लक्ष्य रखा गया है. हालांकि इसमें अब तक कोई कामयाबी नहीं मिली है.
तेल के विशाल भंडार वाले इस देश में ज़्यादातर नागरिक सरकारी नौकरी करते हैं. इसके साथ ही कई कामों में वहां के नागरिक दक्ष नहीं होते हैं और निजी सेक्टर में नौकरी को लेकर उनमें वैसा उत्साह भी नहीं होता है.

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न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार सऊदी विदेशी कामगारों के लिए वीज़ा महंगा करने जा रहा है. इस रिपोर्ट के अनुसार सऊदी में निजी कंपनियों को सऊदी के नागरिकों की तुलना में ज़्यादा विदेशी कामगार रखने पर जुर्माना देना होता है.
यह नियम सऊदी के श्रम मंत्रालय ने बनाया है. सऊदी के कंपनी मालिकों का कहना है कि सरकार नियम को मानने पर मजबूर तो कर रही है, लेकिन सऊदी में ऐसे दक्ष लोग हैं कहां, जिन्हें काम पर रखा जा सके.
सऊदी की सरकार का कहना है कि सऊदीकरण की नीति से देश में बढ़ती बेरोज़गारी पर काबू पाया जा सकेगा, लेकिन कई विशेषज्ञों का मानना है कि इसका कोई असर नहीं पड़ेगा.
वॉशिंगटन में अरब गल्फ़ स्टेट्स इंस्टीट्यूट के एक स्कॉलर कोरेन युंग ने द अरब न्यूज़ से कहा, ''सऊदी की श्रम शक्ति के लिए सर्विस सेक्टर के वर्तमान ढांचे में शिफ्ट होना आसान नहीं है. इसमें दस साल से भी ज़्यादा का वक़्त लग सकता है. यह सांस्कृतिक रूप से शिफ्टिंग का मामला है. सर्विस, रीटेल और कंस्ट्रक्शन सेक्टर में सऊदी के लोगों के लिए काम करना आसान नहीं है.''
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