चर्च में अनिवार्य ब्रह्मचर्य की शुरुआत कब और कैसे हुई

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- Author, एडिसन वेगा
- पदनाम, मिलान से बीबीबी न्यूज़ ब्राज़ील के लिए
ऐसे कोई संकेत नहीं मिल रहे जिनसे लगता हो कि चर्च हाल-फ़िलहाल पादरियों के लिए अनिवार्य ब्रह्मचर्य के नियम में कोई बदलाव करने वाला है.
पोप फ्रांसिस ने खुद इसकी पुष्टि की है मगर साथ ही यह भी कहा है कि 'क्लेरिकल सेलिबसी' ऐसी प्रतिज्ञा है जो पादरियों को 'पवित्र' रहने के लिए बाध्य करती है मगर यह धर्मसिद्धांत नहीं बल्कि चर्च का नियम है.
कुछ ऐसे धर्म सिद्धांत हैं जिन्हें चर्च 'परम सत्य' मानता है. वह इन्हें अपने मत के आधारभूत और निर्विवाद बिंदु मानता है जिन्हें बदला नहीं जा सकता. जैसे कि ईसा का फिर से जी उठना और होली ट्रिनिटी.
पत्रकारों से बात करते हुए पोप ने हाल ही में माना, "ब्रह्मचर्य हमारा धर्मसिद्धांत नहीं है, यह जीवन का ऐसा नियम है जिसका मैं बहुत सम्मान करता हूं और मानता हूं कि यह चर्च के लिए एक तोहफ़ा है. चूंकि यह धर्मसिद्धांत नहीं हैं, इसलिए इसे बदलने का द्वारा खुला हुआ है. हालांकि अभी हमारा इसे बदलने का विचार नहीं है."
क्या है 'क्लेरिकल सेलिबसी'
क्लेरिकल सेलिबसी यानी पादरियों का अनिवार्य ब्रह्मचर्य क्या है और कैथलिक चर्च के लिए यह इतना महत्वपूर्ण क्यों है? और वेटिकन का उस तर्क पर क्या जवाब है कि इस नियम को ख़त्म कर देने से पादरियों द्वारा यौन शोषण की घटनाओं को घटाने में मदद मिल सकती है?
ब्राज़ील की यूनिवर्सिटी पीयूसी-एसपी के समाजशास्त्री फ्रैंसिस्को बोर्बा रिबेरो नेतो कहते हैं, "सामान्य तौर पर ब्रह्मचर्य का मतलब उस व्यवस्था से है जिसके तहत लोग अपनी मर्ज़ी से विवाह नहीं करते."

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पादरियों के ब्रह्मचर्य की शुरुआत तब होती है जब पादरी बनते समय धार्मिक कार्यों के लिए समर्पण का संकल्प करते हुए इसका चुनाव किया जाता है.
रिबेरो नेतो के मुताबिक़ अक्सर पांच कॉन्सेप्ट को लेकर भ्रम हो जाता है. ये हैं- चैस्टटी, वर्जिनिटी, वर्जिनल वोकेशन, सेलिबेसी और प्रीस्टली सेलिबेसी.
वह बताते हैं, "प्रीस्टली सेलिबेसी यानी पुरोहितों का ब्रह्मचर्य ऐसी व्यवस्था है जिसमें कोई व्यक्ति ईश्वर और समुदाय की सेवा में पूरी तरह समर्पित हो जाता है. यह एक तरह के वर्जिनल वोकेशन यानी वर्जिन रहने के संकल्प से जुड़ा हुआ है पूरी तरह से उस जैसा नहीं है."
जो धार्मिक व्यक्ति पुरोहितों की भूमिका नहीं निभाते, वे भी वर्जिन रहने का संकल्प ले सकते हैं.
वह समझाते हैं कि विवाहित लोग ब्रह्मचर्य नहीं रख सकते, लेकिन वे अपने जीवन में कुछ समय के लिए कौमार्य का संकल्प ले सकते हैं. वे जीवनसाथी के साथ रह सकते हैं मगर यौन संबंध नहीं बना सकते.
वहीं कौमार्य वह स्थिति है जिसमें किसी ने कभी सेक्स न किया हो. लेकिन वर्जिनल वोकेशन का मतलब है आप पहले भले सेक्स करते रहे हों मगर फिर आप इससे एकदम किनारा कर लें. यानी आपको इसका चयन करने के लिए पहले से वर्जिन होना ज़रूरी नहीं है.
एक्सपर्ट बताते हैं, "वर्जिनल वोकेशन में व्यक्ति अपनी एक्टिव सेक्शुअल लाइफ़ का परित्याग करके अपनी पूरी ऊर्जा को और ख़ुद को भी ईश्वर में लगा देता है."

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कहां से आया ब्रह्मचर्य का विचार?
रिबेरो नेतो यह भी बताते हैं कि यह विचार ईसाईयत का आविष्कार नहीं है.
वह बताते हैं, "बौद्ध भिक्षु और प्राचीन रोम की देवी वेस्टा की पुजारिन पवित्र कुंवारियां भी ईश्वर के प्रति समर्पण को दिखाने के लिए इस तरह का संकल्प लेती थीं."
जबकि दूसरी तरफ़ कैथलिक चर्च की मौलिक शिक्षा के अनुसार विवाहित लोगों के लिए चैस्टटी यानी इंद्रियों को वश में करने को इस तरह से बताया गया है कि वे एक-दूसरे से ही यौन संबंध रखें और एक-दूसरे के प्रति ईमानदार रहें, एक ही व्यक्ति के प्रति ईमानदार रहें.
शुरू में कैथलिक पादरी बनने के लिए ब्रह्मचर्य अपनाना ज़रूरी नहीं था.
रिबेरो बताते हैं, "सदियों बाद इसे महत्वपूर्ण बात समझा जाने लगा. ऑर्थडॉक्स ईसाइयों के बीच तो आज भी विवाहित पादरी देखने को मिलते हैं."
तीसरी और चौथी सदियों में कैथलिक संप्रदाय के अंदर ही ब्रह्मचर्य को धार्मिक परंपरा के रूप में अपनाने के लिए अभियान चले. इस मुद्दे को लेकर चर्च में कई नियम बनाए गए, कई नियम बदले गए और अलग-अलग क्षेत्रों में अलग पंरपराएं अपनाई गईं.

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11वीं सदी के बाद बदला नियम
11वीं सदी में ब्रह्मचर्य को लेकर ज्यादा चिंता जताई जाने लगी. लियो नौवें और ग्रेगरी सातवें जैसे पोप उस समय पादरियों के 'नैतिक पतन' को लेकर चिंतित थे.
ऐसे में ब्रह्मचर्य को रोमन कैथलिक चर्च की दो महाभाओं में मान्यता दी गई- पहली बार 1123 में और फिर 1139 में.
महासभाओं के ज़रिये आदेश जारी किया गया कि पादरी शादी नहीं कर सकते और न ही किसी को 'रखैल' बना सकते हैं. 1215 और फिर 1545 से 1563 के बीच हुई चर्च की अन्य महासभाओं में ब्रह्मचर्य का बचाव किया गया.
दार्शनिक और धर्मशास्त्री फर्नांदो अल्टेमेयेर जूनियर कहते हैं, "बहुत से लोग कहते हैं कि 10वीं सदी में ब्रह्मचर्य के कारण चर्च मज़बूत हुआ क्योंकि पुजारियों के बेटे नहीं थे कि जिनके विवाद के कारण चर्च को नुकसान होता. इसमें कुछ सच्चाई तो है मगर ब्रह्मचर्य को अनिवार्य करने का असल लक्ष्य ऐसे मिशनरी तैयार करना था जो नए अभियानों और नए पदों पर नियुक्त होने के लिए तैयार रहें."
आजकल क्या स्थिति है
12वीं सदी में ब्रह्मचर्य का विचार पोप पायस 12वें के समय फिर से उभरा जब उन्होंने इसका बचाव किया. फिर 1965 में वेटिकन में हुई दूसरी महासभा में पोप पॉल 6ठे ने इस मामले पर 'De Priesti Ministeriali' नाम से एक दस्तावेज़ जारी किया था.

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1979 में पोप जॉन पॉल द्वितीय ने कहा था, "गोलमोल बातों से यह विचार अक्सर फैलाया जाता है कि कैथलिक चर्च में पादरियों पर ब्रह्मचर्य का नियम थोप दिया जाता है. हम जानते हैं कि ऐसा नहीं होता है. जो कोई पादरी बनना चाहता है, वह अपनी इच्छा और समझ के साथ ब्रह्मचर्य अपनाता है. वह कई सालों की तैयारी और प्रार्थना के बाद ऐसा करता है."
"वो ये फ़ैसला तभी करता है जब उसे पूरा यक़ीन हो जाता है कि ईसा ने उसे चर्च और बाक़ी लोगों की सेवा करने का मौक़ा दिया है. इसके बाद ही वह पूरा जीवन इस तरह से बिताने का निर्णय करता है."
उनके उत्तराधिकारी बेनेडिक्ट सोलहवें ने भी ब्रह्मचर्य पर बयान दिया था. उन्होंने कहा था, "चैस्टटी को समझने के लिए यह समझाना होगा कि किसी व्यक्ति को कैसे ईसा ने पवित्र बना दिया और इंसानों के लिए समर्पित हो जाने की राह पर बढ़ाया."
"चैस्टटी का प्रण लेने के साथ ही पादरी, पुरुष और महिलाएं खुद को व्यक्तिवाद या अकेलेपन के लिए समर्पित नहीं करते बल्कि वे वचन लेते हैं कि अपना गहरा रिश्ता ईश्वर के साम्राज्य की सेवा के साथ ही रखेंगे."
शादीशुदा पादरी
नेशनल मूवमेंट ऑफ़ फ़ैमिलीज़ ऑफ़ मैरिड पेरेंट्स के मुताबिक ब्राज़ील में 7 हज़ार लोगों ने चर्च से ब्रह्मचर्य के संकल्प से छूट मांगी है ताकि वे शादी कर सकें. इसका मतलब है कि ब्राज़ील में पादरी बनने वाले हर चार में से एक व्यक्ति शादी करने के लिए पादरी का चोला छोड़ देता है.
रोम में 1850 से प्रकाशित की जा रही एक पत्रिका के अनुसार पूरी दुनिया में ऐसे लोगों की संख्या 60000 से ज्यादा है.

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जो लोग शादीशुदा हैं और कैथलिक चर्च में धार्मिक भूमिका चाहते है, उनके लिए अलग से एक काम निर्धारित है. कैथलिक चर्च ऐेसे शादीशुदा मर्दों को 'परमानेंट डीकन' कहते हैं.
रीबेरो नेतो बताते हैं, "परमानेंट डीकन कन्फ़ेशन में क्षमादान करने और अपने अनुभव साझा करने वाले ईसाइयों के समूहों में का आयोजन करने के अलावा वे पादरियों वाले सभी काम कर सकते हैं.
पादरियों के बीच से ही बहुत से लोग सवाल उठाते हैं कि कहीं इस नियम को बदलने का समय तो नहीं आ गया है. ब्राज़ील के सबसे चर्चित कैथलिक पादरियों में गिने जाने वाले फ़ादर फ़ेबियो डि मेलो ने कई इंटरव्यू दिए हैं जिनमें उन्होंने कहा है कि ब्रह्मचर्य का नियम ख़त्म कर दिया जाना चाहिए क्योंकि 'यह मध्ययुगीन परंपरा' जैसी है.
वह मानते हैं कि चर्च को शादीशुदा पादरियों को भी स्वीकार करना चाहिए.
दुविधा में चर्च
1934 से चल रही अमरीकी एजेंसी 'रिलिजन न्यूज़ सर्विस' में प्रकाशित एक लेख में कैथलिक फ़ादर थॉमस रीस तर्क देते हैं कि पादरियों के लिए ब्रह्मचर्य वैकल्पिक है.
उन्होंने लिखा है, "पोप फ्रैंसिस ने कहा है कि वह संभावनाओं का स्वागत करते हैं मगर वह चाहते हैं कि यह मांग कैथलिक चर्चों के बिशप की असेंबलियों की तरफ़ से आए."
रीस संकेत देते हैं कि इतिहास में कई लोग ऐसे रहे हैं और आज भी दुनिया में कई ऐसे लोग हैं जो इस नियम को नहीं मानते. हालांकि चर्च ने इस नियम को बनाकर रखा हुआ है क्योंकि उसका मानना है कि इससे धार्मिक कार्यक्रम ठीक होते हैं.

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समाजशास्त्री रिबेरो नेतो कहते हैं, "अन्य आम व्यवसायों से इतर कैथलिक पादरी बनना ऐसा काम है जिसमें व्यक्ति को लगता है कि वह इस काम के लिए चुना गया है. ऐसे में अगर कोई व्यक्ति शादी करना चाहता है तो यह संकेत है कि उसे पादरी के कार्य के लिए नहीं चुना गया है.''
वह बताते हैं, "चर्च को लगता है कि पादरियों को शादी करने की इजाज़त देने से चर्च में ऐसे लोग आ जाएंगे जिनका समर्पण सच्चा नहीं होगा और फिर वे ठीक ढंग से पादरी की भूमिका नहीं निभा पाएंगे."
यह ऐसा तर्क है जिसे चर्च उस समय देता है जब कहा जाता है कि ब्रह्मचर्य की बाध्यता ख़त्म करने से बालशोषण के मामले घट सकते है.
इस मामले पर वेटिकन की राय के बारे में रिबेरो बताते हैं, "चर्च कहता है कि हाल ही में बाल शोषण के जो मामले सामने आए हैं वे उन लोगों को चुन लिए जाने के कारण हुए हैं जिनकी निष्ठा सच्ची नहीं थी. चर्च का मानना है कि अगर पादरी शादीशुदा होंगे तो इसका ख़राब प्रभाव होगा क्योंकि सच्ची आध्यात्मिकता और सच्ची निष्ठा न रखने वाले लोगों को भी पादरी बनने का मौका मिल जाएगा."
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