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ब्लॉग: इमरान ख़ान प्यारे हैं लेकिन धर्म से ज़्यादा नहीं
- Author, मोहम्मद हनीफ़
- पदनाम, लाहौर से सीनियर पत्रकार बीबीसी पंजाबी के लिए
अभी इमरान ख़ान को हुकूमत में आए चार दिन भी नहीं हुए कि यार लोगों ने कुछ ज़्यादा ही नाटकबाज़ी शुरू कर दी है.
कोई कहता है कि ख़ान साहिब दफ़्तर हेलीकॉप्टर में क्यों जाते हैं और किसी को तकलीफ़ है वह दफ़्तर जाकर चाय के साथ बिस्कुट कितने खाते हैं.
कोई कह रहा है कि ख़ान साहिब ने जो टीम बनाई है वह बहुत थकी हुई है. इनसे कुछ नहीं होने वाला.
ख़ान साहिब तो खुद ही फ़रमाते रहते थे कि उनको और कुछ आए या न आए पर टीम बनानी आती है.
ख़ान साहिब की टीम
वो कहते थे, 'अगर मैं हुकूमत में आया तो उसी तरह की टीम बनाऊंगा जिस तरह की टीम बनाकर मैंने विश्व कप जीता था.'
एक दिन एक जलसे में ख़ान साहिब ने ऐलान कर दिया कि अमरीका में पाकिस्तान का एक लड़का है जिसे सारी दुनिया बहुत अच्छा अर्थशास्त्री मानती है, मैं उसे बुला कर अपना वज़ीरे खज़ाना (वित्त मंत्री) बनाऊंगा.
लड़के का नाम था आतिश मियां और पाकिस्तान में किसी ने उसका नाम नहीं सुना था.
ख़ान साहब भाषण दे रहे थे जब किसी ने उनके कान में नाम बोला तो ख़ान साहिब ने तकरीर में बोल दिया.
अगले दिन किसी भाई ने ख़ान साहिब को बताया कि वह लड़का तो मरज़ाई है. काफ़िर को हटाओ हमारे पास दूसरा नया लड़का है.
अब 40 साल हो गए है जब हमने अहमदियों को काफ़िर करार दिया था. उनको सीधा रखने के लिए और ठीक करने के ओर भी कई कानून हैं. अहमदियों को यह भी पसंद नहीं कि कोई उन्हें मरज़ाई या कादियानी कहे.
ख़ान साहिब को बात तुरंत समझ में आ गई. उन्होंने कहा कि मुझे नहीं पता था कि यह लड़का काफ़िर है इसको बिल्कुल नहीं बनाना. हमारे पास एक और लड़का है.
जनरल का बेटा बना खजांची
आसिद उमर मुसलमान है और एग्रो का हेड भी रहा है और उसका बाप भी जनरल था, उसी को बना देंगे. ख़ान साहिब की हुकूमत आ गई और उन्होंने खज़ाने की चाबियाँ आसिद उमर को पकड़ा दी.
उन्होंने खज़ाना खोला तो पता चला कि यह तो खाली है.
उन्होंने बुद्धिमान लोगों की एक सभा बनाई, कोई नौकरी नहीं दी, कोई ओहदा नहीं दिया. बस ऐसे ही सलाह-मशविरा दे दिया करो कि हम पैसा कहां से लेकर आएं. अब इस सभा में भी आतिफ़ मियां का नाम डाल दिया.
एक बार फिर शोर हो गया और हुकूमत डट गई पर सिर्फ 24 घंटों के लिए.
इमरान खान के अपने खास फ़वाद चौधरी गरज पड़े, "हम मदीने की रियासत बनाने आए हैं. मदीने की रियासत में तो अकलियत को सारे हक़ हासिल होते हैं, अब हम क्या करें, अकलियत को उठा कर समंदर में फेंक दें."
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खजांची क्यों नहीं बनते मुसलमान
मुसलमानों पर एक इल्ज़ाम हमेशा लगता रहा है कि हम अरबी-फ़ारसी अच्छी बोल लेते हैं, हम से ग़ज़ल लिखवा लो, मरसिया पड़वा लो, हमसे यह मत पूछो कि जीडीपी क्या होता है.
पुराने मुसलमान बादशाह भी अपने खज़ाने के हिसाब-किताब के लिए कभी किसी यहूदी और कभी कोई हिन्दू रखा करते थे.
हुक्म यही था कि भाई आप हमारे खाते संभालो, हम कोठे पर जाकर बाई जी से ज़रा तहज़ीब सीख आएं.
हमारी मदीने वाली रियासत ने तो आतिफ मियां को काफ़िर कह कर भेज दिया पर सऊदी अरब के भाइयों ने मक्के वाली रियासत में बुलाकर उसे बहुत सम्मान दिया है.
मियां ने भी कई हिसाब-किताब की बातें की. उन्होंने सलाह-मशवरा करने के बाद उसका मुँह चूमा और घर भेज दिया.
अब मसला यह है कि ख़ान साहिब सऊदी अरब के शहज़ादे तो है नहीं, पाकिस्तान के शहज़ादे है और यहां बादशाह आवाम है. अब अगर आवाम नहीं चाहता तो ख़ान साहिब क्या करें?
दिलों में भरा है ईमान
हमारा खज़ाना चाहे खाली हो पर दिलों में ईमान ज़रूर भरा है. पिछले 40 सालों में दिमागों में मज़हब का इतना प्रसार हुआ है कि अब किसी चीज़ की जगह नहीं बची.
जिन लड़कों को अभी अपने जूतों के फीते भी बांधने नहीं आते, वह भी अपने-आप को सर्व-ज्ञानी समझते हैं.
मैं भी यहीं पर पला-बढ़ा हूँ और मैं भी आधा तो मौलवी हो ही गया हूँ.
एक पुराने मौलवी साहिब से क़िस्सा सुना था, आप भी सुन लीजिए.
हज़रत मूसा को एक मुसाफिर मिल गया और कहने लगा कि भूख लगी है.
हज़रत मुसा ने कहा कि आओ, बैठो और रोटी खाओ.
मुसाफ़िर रोटी खाने लगा तो मुसा ने कहा कि पहले अल्ला का नाम तो ले लो.
मुसाफ़िर ने कहा मैं तो अल्ला को मानता ही नहीं. हज़रत मुसा ने कहा कि काफ़िरों के लिए कोई रोटी नहीं है, आप दफा हो जाओ.
अल्ला मिया ने हज़रत मियां से सीधा फ़रमान किया कि आप के ख्याल में भूखे मुसाफिर की उम्र कितनी हो सकती है.
हज़रत मुसा ने कहा कि तकरीबन पचास साल तो होगी ही. अल्ला मियां ने फ़रमाया कि यह बंदा मुझे नहीं मानता फिर भी में उसे पचास साल से रोज़ी देता आ रहा हूँ और आप से एक वक़्त की रोटी भी नहीं खिलाई जा सकी और इतनी तकलीफ़ हुई. बड़ा आया है मेरा ठेकेदार.
हज़रत मूसा को बात समझ आ गई. दुआ करो हमें भी यह बात समझ में आ जाए और अल्ला हमारे दिलों में रहम पैदा करे.
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