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क्या सऊदी अरब के लिए ईरान को नाराज़ करेंगे इमरान ख़ान?
- Author, टीम बीबीसी हिन्दी
- पदनाम, नई दिल्ली
क्रिकेट के मैदान से सियासी मैदान में आए इमरान ख़ान ने प्रधानमंत्री की कुर्सी तो हासिल कर ली है, लेकिन वो बिखरे पाकिस्तान को किस हद तक संवार पाएंगे? ख़ान विदेश नीति के मोर्चे पर क्या अलग करेंगे?
इमरान ख़ान पाकिस्तान में एक लोकप्रिय नेता के तौर पर उभरे हैं और उन्होंने चुनावी अभियानों में घरेलू मुद्दों पर ही ज़्यादा ज़ोर दिया था. उन्होंने देश से भ्रष्टाचार मिटाने का वादा किया है.
लेकिन पाकिस्तान अभी केवल अपने घर में ही अशांत नहीं है बल्कि विदेश नीति के मोर्चे पर भी झटके खा रहा है.
पाकिस्तान के बारे में कहा जा रहा है कि पिछले कुछ समय से मध्य-पूर्व में उसके पास रचनात्मक विदेश नीति का अभाव दिख रहा है. क्या इमरान ख़ान मध्य-पूर्व में पाकिस्तान को कोई मुकम्मल जगह दिला पाएंगे?
इमरान ने प्रधानमंत्री बनने के बाद टेलीविज़न पर राष्ट्र को संबोधित करते हुए जो बातें कहीं उनसे उनकी दुविधा का भी अंदाज़ा लगाया जा सकता है.
इमरान ख़ान ने अपने पहले विदेशी दौरे के लिए सऊदी अरब को चुना है. सऊदी से पाकिस्तान का याराना ऐतिहासिक है, लेकिन क्या पाकिस्तान अपने दक्षिण-पश्चिम सीमा से सटे ईरान की उपेक्षा कर सकता है या उसे नाराज़ कर सकता है?
ज़ाहिर है ईरान और सऊदी अरब के बीच की शत्रुता किसी से छुपी नहीं है. क्या पाकिस्तान इन दो देशों को बिना नाराज़ किए एक साथ इनका दोस्त बनाने की कला जानता है?
इमरान ख़ान ने राष्ट्र को संबोधित करते हुए कहा था, "हम लोग ईरान से अपने संबंधों को सुधारना चाहते हैं. सऊदी हमारा दोस्त है. वो हर मुश्किल घड़ी में पाकिस्तान के साथ खड़ा रहा है."
"हम मध्य-पूर्व में मेल-मिलाप के लिए जो भी कर सकते हैं वो करेंगे. यही हमारा लक्ष्य है. हम अपनी ठोस भूमिका अदा करना चाहते हैं. जिन पड़ोसियों के बीच तनाव और युद्ध के हालात हैं, उन्हें हम क़रीब लाने की कोशिश करेंगे."
संतुलनवादी नीति
पाकिस्तान के लिए ईरान और सऊदी को एक साथ साधना आसान नहीं है. पाकिस्तान लंबे समय से कोशिश कर रहा है कि वो ईरान और सऊदी अरब के बीच संतुलन बनाकर चले, लेकिन संतुलन की नीति हमेशा मुश्किल होती है.
पाकिस्तान के बारे में कहा जाता है कि अगर राजनीतिक और सामाजिक रूप से सबसे ज़्यादा किसी भी देश का प्रभाव है तो वो है सऊदी अरब.
सऊदी में पाकिस्तान के क़रीब 27 लाख लोग काम करते हैं. ये पाकिस्तानी कंस्ट्रक्शन इंडस्ट्री और छोटी-मोटी नौकरियों में हैं. ऐतिहासिक रूप से पाकिस्तान सऊदी के क़रीब रहा है और इसे अमरीका, ब्रिटेन ने बढ़ावा दिया है.
पाकिस्तान को भी इस बात का अहसास है कि उसे सऊदी से सबसे ज़्यादा आर्थिक मदद मिलती है. यहां तक कि पाकिस्तान के परमाणु हथियार प्रोजेक्ट में भी सऊदी ने निवेश किया है.
पाकिस्तान अपनी विदेश नीति को केवल सऊदी अरब तक ही सीमित नहीं रख सकता है. जब इमरान ख़ान की जीत हुई तो सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ने उन्हें आधिकारिक रूप से बधाई दी. ईरान ने एक खुला ख़त लिखा और नई सरकार से सहयोग बढ़ाने की बात कही.
कई विश्लेषकों का मानना है कि इमरान ख़ान ने राष्ट्र के नाम संबोधन में ईरान का नाम लेकर जो सहानुभूति दिखाई है वो असाधारण है.
विल्सन सेंटर में दक्षिण एशिया के उपनिदेशक माइकल कगलमैन ने मिडल ईस्ट आई से कहा है कि यह कभी-कभार ही होता है कि कोई पाकिस्तानी नेता ईरान से इस तरह सहानुभूति जाताए.
इमरान ख़ान यमन में सऊदी अरब के नेतृत्व वाले सैन्य दख़ल में पाकिस्तानी सैनिकों को शामिल करने के ख़िलाफ़ रहे हैं.
द्विपक्षीय संबंध
पाकिस्तान का ख़ज़ाना लगभग ख़ाली है. इमरान ख़ान को जो पाकिस्तान मिला है वो भुगतान संकट से जूझ रहा है कुछ हफ़्तों के खर्च के लिए विदेशी मुद्रा बची है.
पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से 12 अरब डॉलर की मदद लेने की कोशिश कर रहा है. हालांकि यह भी इतना आसान नहीं है क्योंकि अमरीका इसके ख़िलाफ़ है.
ऐसे में पाकिस्तान अगर ईरान के साथ संबंधों को बढ़ाता है तो उसके लिए स्थिति और जटिल होगी क्योंकि ईरान पर अमरीका ने फिर से कई आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए हैं.
सऊदी स्थित इस्लामिक डिवेलपमेंट बैंक ने हाल ही में पाकिस्तान को तेल ख़रीदने के लिए चार अरब डॉलर की वित्तीय मदद सुनिश्चित कराई है. पाकिस्तान के बारे में अक्सर कहा जाता है कि वहां राजनीति सेना की सत्ता के मातहत ही काम करती है.
इमरान ख़ान की जीत में सेना को भी श्रेय दिया जा रहा है. पाकिस्तान के रिटायर्ड आर्मी प्रमुख 'मुस्लिम नेटो' के मुखिया बनने पर राजी हो गए हैं. यह सऊदी के नेतृत्व वाला मुस्लिम देशों का संगठन है.
रिटायर्ड आर्मी प्रमुख राहील शरीफ़ को पाकिस्तान ने मुस्लिम नेटो का प्रमुख बनने की अनुमति पिछले साल ही दे दी थी. इसका वास्तविक नाम इस्लामिक मिलिटरी अलायंस टु फाइट टेरेरिज़म या आईएमएफ़टी है.
दूसरी तरफ़ सऊदी अरब पर ये भी आरोप लगते हैं कि वो बलूचिस्तान में ईरान विरोधी ताक़तों की आर्थिक मदद करता है. मिडल-ईस्ट इंस्टिट्यूट के स्कॉलर आरिफ़ रफ़ीक़ ने अपने एक इंटरव्यू में कहा है कि पाकिस्तान मुस्लिम वर्ल्ड के दो ताक़तवर देशों के बीच फंसा हुआ है.
रफ़ीक़ के अनुसार पाकिस्तान को ईरान और सऊदी के मामले में रणनीतिक करवट लेने के लिए निर्णायक कदम लेना पड़ेगा.
अब तक पाकिस्तान की नीति ईरान और सऊदी अरब के बीच संतुलन बनाकर चलने की रही है. राहील शरीफ़ का यह क़दम ईरान को पसंद नहीं आया था. पाकिस्तान में ईरान के राजदूत ने इससे असहमति जताई थी.
आईएमएफ़टी में ईरान शामिल नहीं है. जब पाकिस्तान ने राहील शरीफ़ को इस संगठन के मुखिया बनने की अनुमति दी थी तो इमरान ख़ान की पार्टी तहरीक-ए-इंसाफ़ ने इसकी आलोचना की थी.
इमरान ख़ान की पार्टी का कहना था कि इससे संदेश जा रहा है कि पाकिस्तान ने सऊदी और ईरान के टकराव में एक पक्ष ले लिया है.
2014 में पाकिस्तानी संसद ने एक प्रस्ताव पास किया था जिसमें यमन युद्ध में तटस्थ रहने की बात कही गई थी.
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